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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

आदिका वर्णन

सर्वज्ञसागर

(१२९)

साहब हते और नहीं कोई । शिष्य गुरु हते नहीं होई ॥
नहीं तब ब्रह्मा वेद निशानी । नहीं तब शिवकी उत्पानी ॥
नहीं तब विष्णु न निरंजन राया । नहीं तब अच्छर सृष्टि बनाया ॥
नहीं तब अतीत पुरुष कर ताना । नहीं तब रचे लोक अरु धामा ॥
नहीं सृष्टि न सिरजनहारा । नहीं कछु असार नहीं कछु सारा ॥
नहीं नरसिंग न कलकी नाहीं । गुरु और शिष्य बताऊ काहीं ॥

सारखी-पिण्ड ब्रह्माण्ड तब ना हता, नहीं लोक विस्तार ॥
पुरुष एक निश्चल हता, जिनकी सकल पसार ॥

धर्मदास बचन-चौपाई

सुनु सद्गुरु विनती चित लायी । तुम गुरु रूप सदा सुखदायी ॥
ब्रह्मा देवता वेद विचारा । सो हम बूझे हृदय मँझारा ॥
चारि वेद भे तहैं चारी । चारि धाम गुरु कहौ विचारी ॥
सर्व ज्ञान गति तुम भाखा । क्षर अक्षर थापि जो राखा ॥
उत्तर पुरुष सब कछु कीना । सो तौ हम जीवन सब चीन्हा ॥
यही भेद विरञ्चि विचारा । सोई आठों योग पुकारा ॥
सोई सकल मुनिन ठहराई । सोई शुक्रदेव संसार सुनाई ॥

सारखी-सोई पुरुष तुमही कहो, हम चीन्हा जियमाँहि ॥
तुम काहेको आयऊ, सोई बतावो थाहि ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

तब सतगुरु बोले विहँसाई । धर्मदास बोले लडकाई ॥
जो कछु और विरञ्चि विचारा । सबकी गतिमतिकह्यौ निरधारा ॥
तेहिते और कहाँ है भाई । यही भेद सब जीवन पायी ॥
त्रिवाचिक तुम पूछो मोही । नितप्रति अगम कहाँ मैं तोही ॥