कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
आरती विधि
(५०)
ज्ञानप्रकाश
धन्य धन्य जननी सुखदायी । जिन्हयह मोहि उपदेश बतायी॥
जाय भवन निज पहुंचे जबही । धाय जननि पग लगै तबही ॥
छन्द-तुम धन्य माता मोहि उधारेउ कहेउ सार उपदेश हो ॥
जाय दास कबीर कहि उन्ह हरेउ कालकलेश हो ॥
मैं थकेउँ उनते वाद करि वे ब्रह्म अविचल नाथ हो ॥
कछु कहत बने ना कला उनकी भयउ बहुत सनाथ हो ॥
साखी-सुनु जननी यह चित दै, हम उनकर शिक्षा लीन्ह ॥
मोहि प्रतीति उनसे वैसी, उन्ह गुरु कै दिशा दीन्ह ॥
सोरठा-भै जन्म शुभ मोर, पहुंचेउ मोक्ष रु मुक्ति घर ॥
जननी गुण बड़ तोर, कबहुँ न ददय तेविसारिहौं ॥
इति सर्वांनन्दकी गोष्ठी
सतगुरु वचन-चौपाई
हे धर्मदास तोहि कहि ससुझावा । सर्वांनन्द सो जो बनि आवा॥
धर्मदास वचन
धन्यधन्यसाहिबअविगतनाथा । प्रभुमोहिनिशिदिनराखोसाथा॥
सुतपरिजन मोहि कछु न सोहाई। धनदारा तिहुँ लोक बड़ाई ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्मनि तुम्ह हमरे साथा । मिलीसुरतितब दुइ नहिंवाता॥
निरखोसुरति नाम लौ लाओ । तनछूटे सत्यलोक सिधाओ ॥
जीवन शब्द चेतावहु भाई । चेतिहिं जीव पुरुष लौ लाई ॥
अङ्ग मोर तुम लेहु सँभारी । जम्बूद्वीप तुम करहु कडिहारी॥
लै जीवन सतभक्ति ददाओ । तब तुम्ह सत्य पुरुष कहँ भाओ॥
सवालाख लै आरति करई । बोधहु जाहि लोक संचरई ॥
धर्मदास वचन
हे साहब मैं बूझों तोही । दयाकरी प्रभु कहिये सब मोही॥
सवालाख नहिं होय जेहि पाहीं। ताहि कहहु बोधबकी नाहीं ॥
बोधसागर
(५१)
सतगुरु वचन
धर्मदास जनि ताहि प्रबोधो । सवा लाख अरपै तेहि बोधो ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब तब बनिहैं नाहीं । सवा लाख विनु जीव यम खाहीं ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्मनि जो आधौ होई । करि आरति देउ पान सजोई ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब भाषहु कछु थोरा । होय निस्तार जीवन बन्दीछोरा ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास जो विन्ती करहु । सवा लाख चौथाई धगहु ॥
धर्मदास वचन
हो समरथ यह दायो कीजै । बोझ थोर जीवनपर दीजै ॥
द्रव्यहीन जिव केहि विधि तरिहैं । यम राजा तेहि भक्षण करिहैं ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि चौथाइहु चौथाई । यहि प्रमाण लै आरति लाई ॥
धर्मदास वचन
अहो साहेब कलिजीव अयाना । भाषहु शब्द थोर परवाना ॥
भाषहु थोर तुव पद लौलीना । कलियुग जीव द्रव्यके हीना ॥
सतगुरु वचन
हो धर्मदास मानहु शिर नार्ई । अब जो कहा सो राखु दढार्ई ॥
हम निःइच्छा चाव कछु नाहीं । है मर्याद गुरुसेवा चाहीं ॥
गुरु साधु सेवा नहिं करिहैं । कहो सो जीव कौने विधि तरिहैं ॥
चौथाई कर जो चौथाई । तासु चौथाई मान लेहु भाई ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु मैं चित बहुत सकाऊं । कत साहिब सो उत्तर लाऊं ॥
जाहि न होय शक्ति गुरु एता । सो जिव ऐसहि जाय अचेता ॥
औरो थोर कहौ प्रभु राई । जेहि ते जीव न यम धरि जाई ॥
(५२)
ज्ञानप्रकाश
सतगुरु वचन
धर्मदास बहु कीन्ह निहोरा । कह्यो सो वचन मान लियो तोरा ॥
यह जो कहेऊँ चौथाई तेहि होई । तासु चौथाई करि आरति सोई ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु कलिके जीव दरिद्रा । जाहि न होइहैं एतिक सुद्रा ॥
सो कैसे तोहिं पैहै स्वामी । कहहु थोर प्रभु अन्तर्यामी ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास बहु कियेहु महताई । सवा पाँच सुद्रा लेहु भाई ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु विनती करो बहोरी । जाहि न एतिक किमि बंदी छोरी ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्मनि दोय नारियर आने । सवा पाँच आधो लै ठानै ॥
धर्मदास वचन
सवा पाँच आधो जेहि नाहीं । हो प्रभु सो जिव कैसत राहीं ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जेहि इतनो नहिं होई । तासु प्रमोधेहु कहौ बिलोई ॥
सवा सेर मिष्टान्न मँगाओ । पान सवा सै उत्तम लाओ ॥
सवा हाथ बस्तर पुनि श्वेता । अग्र पुहुप पूँगी फल चेता ॥
गोघृत शुचि दीपक बारी । बैठि सिंहासन नाम सुधारी ॥
अन्तरध्यान सुरति संचरिये । सत्यसुकृत कहैं मालुम करिये ॥
यम तृण तोरहु वीरा दीजै । शक्ति होय तब आरति कीजै ॥
प्रति सम्भवत गुरु आरति चाही । आरति करै शक्ति होय जाही ॥
शक्ति अछतनहि आरति करई । भक्तिहीन बहु संकट परई ॥
माया ठगनी आहि रे भाई । यह काहूके संग न जाई ॥
जिन गुरु साधु सेवा चित लावा । सो माया कहैं जीति सिधावा ॥
जिन माया कहैं जोगयो भाई । नहिं परमारथ स्वारथ लाई ॥
सो जीव अन्त बहुत दुख पावै । भक्तिहीन यम नाच नचावै ॥
बोधसागर
(५३)
धर्मदास वचन
हो प्रभु तुम्ह सतपुरुष कृपाला । अन्तर्यामी दीन दयाला ॥
मोहि निश्चय तुवपद विश्वासा । यह माया स्वप्नेकी आशा ॥
जिन्ह जिन्ह माया नेह बढाया । तिन्ह २ निज २ जन्म गँवाया ॥
सवालाख तुम मोहि बतायो । सवा करोड प्रभु आरति लायो ॥
औ जन सप्पति मोर घरआही । अरपौ सभै संतन जो चाही ॥
तुम प्रभु निःइच्छा नहिं चाहो । धन्य समरथ मर्याद दिढाहो ॥
सो जिव पाँवर नरकै जायी । शक्ति अक्षत जो राखु छिपायी ॥
हो प्रभु कलु विनती अनुसार्हूँ । बकसहु दिढाई तो वचन उचारहूँ ॥
सवाशेर भाषहु मिष्टाना । औरौ वस्तु सवासो पाना ॥
हो प्रभु कोई जिव भिक्षुक होई । भीख माँगि तन पालै सोई ॥
सो जिव शब्द तोहार न जानै । कहहु केहि विधि लोक पयानै ॥
सतगुरु वचन
हो धर्मनि जो अस जिव होई । गुरु निज ओर करै पुनि सोई ॥
इतने विनु जिव रोकि न राखा । छोरी बन्ध नाम तिहि भाखा ॥
धर्मदास वचन
धन्य धन्य तुम दीन दयाला । दया सिन्धु दुखहरण कृपाला ॥
छन्द-तुम धन्य सदगुरु जीव रक्षक कालमर्दन नाम हो ॥
शुभ पन्थ भक्ति दिढायऊ प्रभु अमर सुखके धाम हो ॥
मैं सुदिन आपन तबहिं जान्यो प्रथमपद जब देखेऊँ ॥
अब भयेऊँ सुखी निशङ्क यमते सुफल जीवन लेखेऊँ ॥
दोहा-विनती एक करौ प्रभु, कृपा करहु जंगदीश ॥
दो सेवक जो तुम मिले, सो तो कहूँ नहिं दीश ॥
सतगुरु वचन
सोरठा-धर्मदास लेहु जानि, हम वो एकै थान है ॥
कहौ शब्द परमान, वो हम में उन माँहि हम ॥
(५४)
ज्ञानप्रकाश
धर्मदास वचन-चौपाई
हो प्रभु उन मोहिँ बड़ सुख दीन्ह। तुम भये गुप्त राखि उन्ह लीन्ह॥
विरह सिन्धु बूड़त उन्ह राखा। उन्ह दृशन की है अभिलाखा॥
सतगुरु वचन
हो धर्मनि हम माँहि उन्ह देखो। उन्ह मोहिँ द्वितीय भाव जनिलेखो॥
स्वामा सेवक एकै प्र ना। परिचै सुरति नाहिँ विलगाना॥
हो धर्मनि तुमहूँ हम माहीं। मोहिँ तोहिँ अब अन्तर नाहीं॥
जो सेवक गुरु सुरति खमीरा। जीवन मुक्ति सो आहि कबीरा॥
जेहि सेवक गुरुहीं परशंसा। कहै कबार सो निर्मल हंसा॥
सेवक कहँ अस चाहिये भाई। गुरुहिँ रिझावे आपु गँवाई॥
जिमि नटकला मगन होय खेला। तिमि गुरु भक्ति मगन होय चेला॥
निजतन मन सुख स्वाद गँवावै। मन वच कर्म गुरु सेवा लावै॥
निशि वासर सेवा चित देई। गुरुहिँ रिझाय परम पद लेई॥
जग पहाँ सेवा वश भगवाना। धर्मदास यह वचन प्रमाना॥
सेवक सुरति प्रीति वश भाई। शून्य महा वस्ती होय जाई॥
तैसी प्रीति सुरति शुचि सेवा। किमि प्रसन्न नहिँ होहिँ गुरु देवा॥
धर्मनि सो सेवक मोहिँ भावै। जो गुरु साधु सेवा चित लावै॥
सेवा करि नहिँ धरै हंकारा। रहै अधीन दास सोइ प्यारा॥
हा धर्मनि तुम्ह अससिख अहहू। हम तुम्ह एक साँच हिय गहहू॥
धर्मदास वचन
धर्मदास पद गहे अनुरागा। हो प्रभु तुम्ह सोहि कीन्ह सुभागा॥
मैं पामर गुणहीन कुचाली। तुम्ह दीन्है उ मोहि पन्थ मराली॥
हे प्रभु नहि रसना प्रभुताई। अमित रसन गुण वरणि नहि जाई॥
महिमा अमित अहे हो स्वामी। केहि विधि वणौ अन्तर्यामी॥
जेहि सेवक पर होय तव दाया। ताके हृदय बुद्धि अस आया॥
पूर्ण भाग करै सेवकाई। धन्य सेवक जिन्ह गुरुहिँ रिझाई॥
मैं सब विधि अयोग्य अविचारी। मोहि अधर्महि तुम लीन्ह उबारी॥