कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सत्यपुरुषका जोगजीतजीको निरंजनके पास उसे मानसरोवरसे निकाल देनेकी आज्ञा देकर भेजना
अनुरागसागर
( २३ )
सत्पुरुषका जोगजीतका निरंजनके पास उसे मानसरोवरसे
निकाल देनेकी आज्ञा देकर भेजना
जोगजीत कह पुरुष बुलावा । धर्मचरित सब कहि समुझावा॥
सत्पुरुष वचन जोगजीत प्रति
जोगजीत तुम बेगि सिधारो । धर्मरायको मारि निकारो ॥
मानसरोवर रहन न पावै । अब यहि देशकाल नहिं आवै॥
धर्मके उदर माहिं है नारी । तासो कहो निजशब्द सम्हारी॥
जाकर रहो धर्म वहि देश । स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेशा ॥
उदर फारिकै बाहर आवै । धर्मविदार उदार फल पावे॥
धर्मरायसों कहो विलोई । वहै नारि अब तुम्हारी होई ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
जोगजीत चल भे शिर नार्ई । मानसरोवर पहुँचे जाई ॥
जोगजीत कहै देखा जबहीं । अति भो काल भयंकर तबहीं ॥
निरंजनवचन जोगजीतप्रति
पूछा काल कौन तुम आई । कौन आज तुम यहां सिधार्ई॥
जोगजीतवचन निरंजन प्रति
जोगजीत अस कहै पुकारी । अहो धर्म तुम ग्रासेहु नारी॥
आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही । इहिते बेगि निकारो तोही ॥
जोगजीतवचन अधा प्रति
जोगजीत कन्या सो कहिया । नारी कहे उदरमहैं रहिया ॥
उदरफारि अब आवहु बाहर । पुरुष तेज सुमिरो तेहि ठाहर॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सुनिके धर्म कोध उर जरेऊ । जोगजीत सौ सन्मुखभिरेऊ॥
जोगजीत तब कीन्है ध्याना । पुरुष प्रताप तेज उर आना॥
पुरुष आज्ञा भई तेहि काला । मारहु माझ लिलार कराला॥
जोगजीत पुनि तैसो कीन्हा । जस आज्ञा पुरुष तेहि दीन्हा॥
( २४ )
अनुरागसागर
छन्द
गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोकत न्यारहो॥
भयो त्रासित पुरुष डरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो॥
निकसि कन्या उदरते पुनि, देख धर्महि अतिडरी॥
अब नाहिंदेखोदेश वह, कहौ कौनविधिकहवाँपरी १७
सोरठा-कामिनिरहीसकाय, त्रासितकालकडर अधिक
रही सो सीस नवाय, आसपासचितवत खड़ी ॥१७॥
निरंजनवचन अध्याप्रति
कहै धर्म सुनि आदि कुमारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी॥
पुरुषा रचा तोहि हमरे काजा । इकमति होय करहु उपराजा॥
हम हैं पुरुष तुमहि ही नारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी॥
अध्यावचन निरंजनप्रति
कहै कन्या कस बोलहु बानी । आता जेठ प्रथम हम जानी॥
कन्या कहै सुनो हो ताता । ऐसी विधिजनिबोलहु बाता॥
अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । ताते उदरमांझलियो डारी॥
जेष्ठ बन्धु प्रथमहिके नाता । अब तो अहो हमारे ताता॥
निरमलदृष्टिजब चितवहु मोहीं । नहिं तो पाप होय अब तोहीं॥
मन्द दृष्टिजनिचितवहु मोही । ना तो पाप होय अब तोही॥
निरंजनवचन अध्याप्रति
कहै निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी॥
पाप पुण्य डर हम नहिं डरता । पाप पुण्यके हमहीं करता ॥
पाप पुन्य हमहींसे होई । लेखा मोर न लेहै कोई ॥
पाप पुन्य हम करब पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥
ताते तोहि कहौ समुझाई । सिख हमार लो सीस चढ़ाई॥
पुरुष दीनतोहि हमकहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥