गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
गोपथ-ब्राह्मण-भाष्यम्
प्रकाशक
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VRAJAJIVAN PRACHYABHARTI GRANTHAMALA
71
THE
GOPATHA - BRĀHMAṆA - BHĀṢY
HINDI TRANSLATION
BY
PT. KSHEMKARANDASS TRIVEDI
Edited By
DR. PRAGYA DEVI
&
MEDHA DEVI
ज्ञाने सर्वं प्रतिष्ठितम्
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गोपथ-ब्राह्मण-भाष्यम्
आर्यभाषायामनुवादः—भाषानुवादसहितम्
श्री पं० क्षेमकरणदासत्रिवेदी
(रिक्त पृष्ठ / Blank page)
सम्पादकीय
वैदिक वाङ्मय की परम्परा में अथर्ववेद के गोपथ ब्राह्मण का महत्त्वपूर्ण स्थान
सर्वसम्मत है । जिस प्रकार कालक्रम से वैदिक ज्ञानधारा विलुप्त विच्छिन्न होती हुई आज
भी अपने कुछ अवशेषों द्वारा अपने चिरजीवित होने का तथा देदीप्यमान अतीत का
प्रमाण दे रही है, इसी रूप में गोपथ ब्राह्मण की इस समय उपलब्धि समझनी चाहिये ।
जब कि सहस्रशः दुर्लभ ग्रन्थ अपने नामावशेष के रूप में ही इस समय जीवित हैं तो गोपथ
का मूल रूप में उपलब्ध होना सचमुच ही सौभाग्य की बात है, यद्यपि वर्त्तमान में उपलब्ध
ऐतरेय शतपथादि ब्राह्मणों की तुलना में यह सर्वाधिक उपेक्षित ब्राह्मण ग्रन्थ है ऐसा
निश्चित रूप से उसके बहुसंख्य भ्रष्टपाठों, मूल संस्करणों की न्यूनताओं एवं इसके किसी भी
भाष्य की अनुपलब्धि को देखकर कहा जा सकता है । महाभाष्य में १'नवधा अथर्वणः'
कहकर अथर्ववेद की नौ शाखायें थीं ऐसा प्रकट किया गया है । इन सभी शाखाओं के अपने-
अपने ब्राह्मण रहे होंगे, ऐसी पूर्ण सम्भावना है पर अब तो अथर्व की दो शौनक एवं पैप्पलाद
शाखायें ही प्राप्त हैं नौ शाखाओं के नौ ब्राह्मणों की तो बात ही क्या ? इस प्रकार
अथर्ववेद जिसे ब्रह्मवेद२ भी कहते हैं, उसका इकलौता जीवित ब्राह्मण होने के कारण इसकी
उपादेयता एवं सुरक्षणीयता को कौन अस्वीकार कर सकता है ।
यह अथर्ववेद का ब्राह्मण है, यह तथ्य इसके वर्णनों से भी प्रकट हो जाता है । इस
ग्रन्थ के कई स्थानों पर अथर्व की उपयोगिता तथा महनीयता सिद्ध करने के लिये कई
आख्यान दिये गये हैं।३ उनका सार यही है कि जो कार्य्य ऋक्, यजु, साम इन तीनों वेदों
से सम्पन्न नहीं हो सका वह अथर्व ने कर दिखाया अतः यह परम उपादेय है, पुनरपि
गोपथ ब्राह्मण के अन्तः साक्ष्य के आधार पर यह भी मानना होगा कि जिस शौनक शाखा
वाला अथर्व आज उपलब्ध है उस शाखा का यह ब्राह्मण नहीं है । उपलब्ध गोपथ ब्राह्मण
पैप्पलाद शाखा का है । पैप्पलाद शाखा का प्रथम मन्त्र 'शन्नो देवीरभिष्टये'''' से प्रारम्भ
होता है किन्तु शौनक शाखा में ऐसा नहीं। गोपथ ब्राह्मण में "शन्नो देवीरभिष्टय इत्येवमादि
कृत्वा अथर्ववेदमधीयते"४ ऐसा कहा है इससे स्पष्ट पता चलता है कि यह पैप्पलाद
शाखा वाले अथर्व का ही ब्राह्मण है।
ज्ञानकाण्ड वाला होने के कारण विषय की दृष्टि से अथर्ववेद का अन्तर्भाव प्रायः
ऋग्वेद में ही हो जाता है अतः प्राचीन ग्रन्थों में 'त्रयो वेदाः' ऐसा कहने की परिपाटी
है । प्रस्तुत ब्राह्मण ग्रन्थ में भी कतिपय स्थलों में तीन वेद बताये हैं५ किन्तु एक६ स्थल
१. महाभाष्य १।१।१ पस्पशाह्निक
२. यज्ञकार्य के समय ब्रह्मा का ही यह प्रमुख वेद माना गया है अतः ब्रह्मवेद अथर्ववेद की संज्ञा हुई ।
३. द्रष्टव्य गो० पू० २। १८-१९
४. गो. पू. १। २९
५. स तांस्त्रीन् वेदान् अभ्यश्राम्यत् गो. पू. १।६
६. गो. पू. १। २९
( ४ )
पर स्पष्ट रूप से अथर्व को मिलाकर चार वेद बताये हैं। यह अथर्व के पृथक् अस्तित्त्व का
प्रतिपादन उसकी अपनी महत्ता का ज्ञापन ही है, इस प्रकार गोपथ ब्राह्मण ने अथर्ववेद के
महत्त्व को बढ़ाया है यह कहा जा सकता है।
इस ब्राह्मण में अथर्व कां उल्लेख करते समय 'अथर्वाङ्गिरस्' शब्द का प्रयोग बार-
बार देखा गया है। इसका कारण यही प्रतीत होता है कि अङ्गिरस् ऋषि में ही अथर्ववेद का
प्रकाश हुआ है।
गोपथ का काल—यह गोपथ ब्राह्मण अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों की अपेक्षा बहुत अर्वाचीन
प्रतीत होता है। इस ग्रन्थ में कहीं भी उदात्तादि स्वरों का प्रयोग नहीं प्राप्त होता, तथा
इसकी भाषा में वैदिक शब्दों एवं निपातों का भी उतना प्रयोग नहीं है। ग्रन्थ की भाषा शैली
एवं वाक्य-विन्यास भी इस प्रकार का प्रतीत होता है कि इसकी रचना काल तक संस्कृत
भाषा की व्यापकता में न्यूनता आ चुकी थी, यह सब इसकी अर्वाचीनता का ही द्योतक है।
इस ग्रन्थ में स्थान-स्थान पर अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों के उद्धरण दिये गये हैं, जिन्हें कई
स्थान पर “तदप्येतदृचोक्तम् इति ब्राह्मणम्” कहकर प्रस्तुत किया गया है। इनमें सर्वाधिक
उद्धरण ऐतरेय ब्राह्मण के हैं जिसे इसी भाष्य में अनुपद मूल संकेत देते हुये दिखा दिया
गया है, इस प्रकार यह अन्य ब्राह्मणों की अपेक्षा अर्वाचीन है ऐसा प्रतीत होता है, निश्चित
रचना काल बता सकना तो इस ग्रन्थ के ग्रन्थकर्त्ता के ज्ञान के समान ही व्यर्थ प्रयास है।
गोपथ ब्राह्मण का विषय—जैसा कि ब्राह्मण ग्रन्थों का मुख्य लक्ष्य यज्ञ निष्पत्ति,
याज्ञिक-प्रक्रियाओं द्वारा विज्ञान के रहस्यों का उद्घाटन करना है तदनुसार इस ब्राह्मण
ग्रन्थ में भी मुख्य प्रतिपाद्य याज्ञिक प्रक्रिया ही है। अथर्ववेद में आधि-व्याधि नाश एवं
भैषज्य-कर्म का बाहुल्य है पर गोपथ में अथर्व के इस प्रमुख विषय को छुआ भी नहीं गया,
इसका कारण ब्राह्मण ग्रन्थों की यज्ञ प्रतिपादन परिपाटी ही है। यज्ञ प्रतिपादन में बहुत
सी आख्यायिकाओं एवं कण्डिकाओं के भाग तद्वत् अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों एवं श्रौत ग्रन्थों से
लिये गये हैं, जिनमें अधिक भाग ऐतरेय ब्राह्मण का है। 'ओ३म्' की विवेचना या अन्य
वर्णनों में इस ब्राह्मण ने व्याकरण तथा उपनिषद् से भी कुछ ऋण लिया है। इस प्रकार
कुछ सुभाषितादि एवं अथर्व की प्रशंसा-परक आख्यान ही इस ब्राह्मण के अपने अंश कहे
जा सकते हैं।
ग्रन्थ के पूर्वभाग के प्रारम्भ में ही 'ओ३म्' की महिमा विस्तृत रूप से गाई गई है।
ओ३म् के इस वर्णन में माण्डूक्य तथा छान्दोग्य उपनिषद् का बहुत सा अंश वर्त्तमान है।
एक विशेषता यह है कि इस ब्राह्मण में ओम् को द्विवर्ण तथा चतुर्मात्र माना है२।
एकमात्रिक “अ” तथा द्विमात्रिक “ऊ” = ओ एवं म् ये चार मात्रायें हैं इन चारों मात्राओं
से जगत् के विभिन्न पदार्थों की उत्पत्ति बताई गई है, पर माण्डूक्य आदि उपनिषदों में तो
इसे तीन ही मात्रा वाला बताया गया है। सम्भवतः माण्डूक्य के 'सोऽयमात्मा चतुष्पा३त्'
१. द्र. गो. पू. ५ । ५ ॥ यह अंश श. ब्रा. १२ । ३ । २ । ७ से तुलनीय है।
२. द्रष्टव्य गो. पू. १ । १६
३. माण्डुक्य उपनिषद् १ । २
( ५ )
इस वचन के द्वारा चतुष्पात् आत्मा को मानने के कारण ओ३म् को चतुर्मात्र मानना उचित
समझा हो, इसी प्रसङ्ग में ओम् की प्रकृति प्रत्ययादि के विषय में ३६ प्रश्न किये गये हैं
तथा उनके उत्तर भी दिये गये हैं, जो बहुत ही रोचक हैं ।
इस प्रकरण में ओंकार के सम्बन्ध में दो आलङ्कारिक मनोरञ्जक आख्यायिकायें उद्धृत
करते हुये यह भी सिद्ध किया गया है कि उच्चारण करते समय प्रत्येक मन्त्र से पूर्व ओ३म्
को बोलना चाहिये १ ।
द्वितीय प्रपाठक के प्रारम्भ में ही ब्रह्मचारी का महत्त्व तथा उसके कर्त्तव्यों का
विवेचन बहुत ही उत्तमता से हुआ है । इन वर्णनों के मध्य में अथर्ववेद के प्रसिद्ध ब्रह्मचर्य-
सूक्त की ऋचाओं को पुष्ट्यर्थ उद्धृत किया गया है । यहाँ वर्णित ब्रह्मचारी के कर्त्तव्यों
का वर्णन प्रमुख रूप से तैत्तिरीय उपनिषद् से तुलनीय है । इसी प्रकरण में ब्रह्मचारी को
गृहपत्नी द्वारा भिक्षा न दिये जाने पर उस गृहपत्नी का पुण्य-कर्म २ और धनादि का नष्ट
होना लिखा है, ३ इस प्रकार ब्रह्मचारी को भिक्षा देना अत्यावश्यक हैं यह बताया गया है ४ ।
आज के युग में यह बड़ी उत्तम सीख है । ब्रह्मचारी के लिये चारों वेदों का अध्ययन
अत्यावश्यक है अतः प्रत्येक वेद के पढ़ने के लिये बारह-बारह वर्ष बांट देने पर ४८ वर्ष का
ब्रह्मचर्य आवश्यक है, यह बात भी इस प्रकरण में कही है ।
इसके आगे अन्त तक यज्ञों का ही वर्णन है । बीच-बीच में यज्ञों के विभिन्न अवयवों
का वर्णन करते समय आख्यायिकायें भी दी गई हैं । दर्शपूर्णमास तथा अन्य छोटे यज्ञों के
साथ-साथ अग्निष्टोम आदि बड़े-बड़े सोमयागों की भी चर्चा है तथा उस सम्बन्ध में बहुत
सी बातें आख्यायिकाओं के माध्यम से बताई गई हैं ।
ग्रन्थ में कतिपय स्थलों में मांस अभक्षण की भी चर्चा है । इससे पता चलता है कि
वैदिक सिद्धान्तानुसार ग्रन्थकार का आशय भी मांस को अभक्ष्य मानने में ही है । जिन
किन्हीं वाक्यों से ऐसा भ्रम होता भी है उनका भाष्यकार ने समुचित अर्थ प्रदर्शित कर
दिया है या उसे प्रक्षिप्त सिद्ध कर दिया है ।
एक स्थल पर बहुपत्नीवाद की गन्ध की प्रतीति होने पर भाष्यकार ने स्पष्ट उसे
अवैदिक कहकर अपना अभिमत प्रकाशित किया है । हमने वहाँ टिप्पणी देकर यह स्पष्ट
किया है कि वहाँ साम और ऋक् की आलंकारिक चर्चा है न कि लौकिक पति-पत्नी की ।
वस्तुतः किन्हीं ब्राह्मणों में ऐसे स्थलों पर बहुपत्नीत्व की चर्चा भी उपलब्ध हो तो वह उस
१. क—“न माम् अनीरयित्वा ब्राह्मणाः ब्रह्म वदेयुः, यदि वदेयुः अब्रह्म तत् स्यादिति” ॥ गो. पू.
१ । २३ ॥ ख—“मामिकामेव व्याहृतिमादिनः आदितः कृणुध्वम् इत्येवं मामका आधीयन्ते......तस्मात्
ब्रह्मवादिनः ओंकारमादितः कुर्वन्ति” ॥ गो. पू. १ । २८ ॥
२. “तस्मात् ब्रह्मचारिणेऽहरहर्भिक्षां दद्यात गृहिणी मामेयमिष्टापूर्त्तंसुकृतद्रविणमवरुन्ध्यादिति ॥
गो. पू. २ । ६ ॥
३. द्र. गो. पू. २ । ६ ॥
४. भिक्षा न देने से गृहपत्नी के पुण्य-कर्मों का इसलिये नाश होता है कि इससे तपस्वी ब्रह्मचारी
का अपमान है । मनु महाराज ने तो यह भी कहा है ( मनु० २ । ५० ) कि जो भिक्षा देने से मना
करने वाला कन्जूस प्रवृत्ति का हो उससे भिक्षा ब्रह्मचारी माँगे ही नहीं ॥
( ६ )
समय के गिरे हुये काल के अनुसार इतिहास पर आधारित विवरण ही होना चाहिये। इस
प्रकार के विवरणों से वैदिक सिद्धान्त दूषित नहीं होता। ऐतिहासिक विवरणों के आधार
पर धर्म की गति का निर्धारण नहीं होता है क्योंकि इतिहास का कार्य तो अतीत में
घटित तथ्यों का संकलन मात्र है उसमें तो अच्छे बुरे सभी वृत्तान्त होंगे, उन सभी को धर्म
में कैसे गिना जा सकता है ? अतः ऐसे तथ्यों को धार्मिक तथ्यों के रूप में लेना ही
नहीं चाहिये।
गोपथ ब्राह्मण तथा ज्योतिष—गोपथ ब्राह्मण में यथावसर ज्योतिष एवं खगोल
विद्या की भी बातें आई हैं जिनसे कई वैदिक तथ्यों का महत्त्वपूर्ण उद्घाटन होता है।
ऋतु, संवत्सर तथा मासों का वर्णन इस ग्रन्थ में मिलता है¹। यहाँ ३, ६ अथवा
७ ऋतुयें भी मानी गई हैं। स्पष्टतः यह उस समय के प्रचलित विभिन्न मत हैं। इसी प्रसङ्ग
में १२ मासों की चर्चा भी हुई है। यद्यपि उनके नामों का विवरण इसमें नहीं है। बिना
कोई नाम लिये १३ वें ²अधिमास का भी वर्णन हुआ है अर्थात् १२ अथवा १३ मास के वर्ष
का उल्लेख है।
ज्योतिष से सम्बन्धित एक प्रसङ्ग यहाँ अत्यन्त उद्धरणीय है—एक स्थान पर
'फल्गुनी पौर्णमासी' का नाम लिया गया है इससे ज्ञात होता है कि चित्रा, विशाखादि नक्षत्रों
के नाम से पूर्णमासी तथा मासों के नाम रखने की परम्परा तब प्रारम्भ हो चली थी।³
इसी वाक्य का पूरा उद्धरण यह कहता है—कि फल्गुनी पौर्णमासी ही संवत्सर का
मुख है।⁴ यह उद्धरण ज्योतिर्विदों के लिये अतीव ध्यातव्य है। आज तो वर्ष का प्रारम्भ
फाल्गुन पूर्णमासी के अनन्तर होता है। यह उचित नहीं जँचता। जब से नये मास का
प्रारम्भ हुआ है तब से ही नये वर्ष का प्रारम्भ मानना चाहिये। चैत्र का प्रारम्भ १५ दिन
बाद तथा वर्ष का प्रारम्भ १५ दिन पूर्व होने में कोई औचित्य या सामञ्जस्य नहीं लगता पर
गोपथ ब्राह्मण के इस महनीय वाक्य से यह संकेत मिलता है कि वर्ष का प्रारम्भ भी चैत्र
मास के प्रारम्भ के साथ ही अर्थात् फल्गुनी पौर्णमासी के ठीक अनन्तर माना जाता था।
यहाँ ज्योतिष की दृष्टि से तर्क संगत भी है। बाद के समय में १५ दिन की यह भूल कब से
प्रारम्भ हुई, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
इस ग्रन्थ में एक स्थान पर उत्तरायण तथा दक्षिणायन का भी वर्णन है जो कि
अन्य प्राचीन ग्रन्थों से तुलनीय है⁵। इसमें ही एक यह भी उद्धरण है कि पृथ्वी गोल है
१. द्रष्टव्य गो. पू. ५ । ५॥
२. यजुर्वेद २२ । ३१ में अधिमास = मलमास की अंहसस्पति संज्ञा है। ऋग्वेद १ । २५ । ८ में
१२ मास एवं १३ वें लांद मास का स्पष्ट उल्लेख है ॥
३. वेद में १२ मासों के नाम इस प्रकार आये हैं—"मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभ, नभस्य, इष,
ऊर्ज, सह, सहस्य, तप, तपस्य" ( यजु० २२ । ३१ ) इन दो-दो मासों के जोड़े वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा,
शरद, हेमन्त, शिशिर इन छः ऋतुओं के द्योतक हैं ॥
४. "एतद्वै संवत्सरस्य मुखं यत् फल्गुनी पौर्णमासी" • • • 'द्र. गो. उ. १ । १९ ॥
५. द्र. गो. उ. ६।६ यह तैत्तिरीय संहिता ६ । ५ । ३ से तुलनीय है ॥
( ७ )
तथा घूमती है। सूर्य कभी छिपता नहीं, अपितु घूमती हुई पृथिवी के ओट में पड़ जाता है¹ ।
गोपथ में आये कुछ शब्दों की व्युत्पत्तियां—निरुक्त के अनुसार गोपथ ब्राह्मणकार
भी “अर्थनित्यः परीक्षेत” (निरु० २ । १) के पूर्ण समर्थक हैं। निरुक्तकार ने जिस
प्रकार निर्वचन के सम्बन्ध में “अविद्यमाने सामान्येऽप्यक्षरवर्णसामान्यान्निब्रूयात्” का
सिद्धान्त स्थिर किया है, उसका पूर्ण अनुसरण ग्रन्थकार करते हैं।²
प्रस्तुत ग्रन्थ में आयी कुछ मार्मिक शब्द व्युत्पत्तियाँ यहाँ प्रस्तुत की जा रही हैं—
( क ) सुवेदं सन्तं स्वेद इत्याचक्षते (गो० पू० १ । १) यहाँ एक कथा के आधार
पर बताया गया है कि सुवेद अर्थात् वेद के अच्छे जानकार होने से ही पसीने को स्वेद कहा
जाता है। वेदाभ्यास करने पर पसीना निकला वह पसीना ही उसके वेदाध्ययन का
परिचायक या प्रतीक था अतः वह पसीना ही 'सुवेद' होने से अन्ततः वह स्वेद बन गया।
( ख ) तं वा एतं रसं सन्तं रथ इत्याचक्षते (गो० पू० २ । २१) यहाँ रसपूर्ण
अर्थात् आनन्द पूर्ण होने से ही इसकी रथ संज्ञा बताई गई है।
( ग ) श्रेष्ठां धियं क्षियतीति दीक्षितः (गो पू० ३ । १६) अर्थात् श्रेष्ठ बुद्धि का
ज्ञापक होने से दीक्षित संज्ञा है। यहाँ “धीक्षितं” ही दीक्षित है।
( घ ) छिद्रं खमित्युक्तं तस्य मेति प्रतिषेधः, मां यज्ञं छिद्रं करिष्यतीति (गो.
उ. २ । ५) ॥ यह यज्ञार्थक 'मख' शब्द की अतीव उपयोगी तथा सुन्दर व्युत्पत्ति है, इसमें
बताया है कि 'ख' का अर्थ छिद्र है; इसका 'मा' शब्द द्वारा प्रतिषेध किया है, अर्थात् ऐसा
कृत्य जो कि सभी छिद्रों या अशुद्धियों से विरहित हो। इससे स्पष्ट है कि यज्ञ में कोई
अशुद्धि या भूल न होनी चाहिये।
( ङ ) अथर्ववेद के प्रसिद्ध कुन्ताप सूक्त के कुन्ताप शब्द की बड़ी सुन्दर व्युत्पत्ति
प्रस्तुत है—'कुयं वै नाम कुत्सितं तद्यत्तपति, तस्मात् कुन्तापः' (गो. उ. ६ । १२)
स्पष्टतः यह अन्वर्थ व्युत्पत्ति है।
( च ) गो. उ. ३ । २० में साम शब्द की सुन्दर व्युत्पत्ति की गई है। इसमें
सा + अम यह पदच्छेद बताया गया है। वस्तुतः यह व्युत्पत्ति इससे पूर्व की बृहदारण्यको-
पनिषद् ६ । ४ । २० से तुलनीय है।
गोपथ ब्राह्मण के सुभाषित—प्रस्तुत ब्राह्मण में कुछ बड़े ही मार्मिक सुन्दर
सटीक सुभाषितों का प्रयोग किया गया है। जिसके कुछ उदाहरण पाठकों के रसास्वादनार्थ
प्रस्तुत हैं—
( क ) “परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः” ( गो.
पू. १ । १ ) ।
अर्थात् देवता ज्ञानी पुरुष परोक्ष से प्रेम करते हैं तथा प्रत्यक्ष से द्वेष करने वाले होते
हैं। यह उस अचिन्त्य शक्ति के सन्दर्भ में कहा गया है कि वह ईश्वर परोक्ष होकर भी प्रिय
है तथा अन्य दृश्यमान भौतिक पदार्थ प्रत्यक्ष होकर भी द्वेष-योग्य हैं।
१. द्र. गो. उ. ४ । १०॥
२. द्र. “रूपसामान्यादर्थसामान्याद्” ॥ गो. पू. १ । २६ ।
( ८ )
( ख ) 'यज्ञे अकुशला ऋत्विजो भवन्त्यचरितिनो ब्रह्मचर्यमपराग्या वा तद्वै
यज्ञस्य विरिष्टम् इत्याचक्षते' ( गो० पू० १।१३ )
यहाँ यज्ञ के सम्बन्ध में कहा कि यदि यज्ञ में ऋत्विज् अकुशल, ब्रह्मचर्य धारण न
करने वाले, वैराग्य रहित होते हैं तो यज्ञ का नाश हो जाता है। इसके आगे भी इस
कण्डिका का सम्पूर्ण भाग अत्यन्त ही द्रष्टव्य है जिसमें बड़ी मनोरञ्जकता से यह स्पष्ट
किया है कि ऋत्विजों के अकुशल अयोग्य होने पर किस प्रकार क्रमशः ऋत्विज्, यजमान,
ऋत्विजों की दक्षिणायें यजमान के पुत्र-पशु एवं योग-क्षेम सब कुछ नष्ट हो जाते हैं।
तात्पर्य यह है कि यज्ञ में श्रेष्ठ सदाचारी ऋत्विज् अवश्य होने चाहियें।
( ग ) 'यथा आमपात्रम् उदक आसिक्ते निर्मृज्येत् एवं यजमानाः निर्मृज्येरन्'
(गो० पू० ४।१३ ) ।
यहाँ भी संवत्सर एवं महाव्रत का वर्णन करते हुये ऋत्विजों की पात्रता के सम्बन्ध में
कहा है कि ऋत्विज् तेजस्वी, सत्यवादी संशितव्रत होने चाहियें, जो ऐसे नहीं होते उनके
द्वारा कराया हुआ यज्ञ ऐसे ही नष्ट हो जाता है जैसे कच्चे मिट्टी के घड़े में भरा हुआ जल
घड़े के टूट जाने के कारण बह जाता है, यजमान का यज्ञ भी इसी प्रकार बह जाता है
नष्ट हो जाता है।
( घ ) 'कुम्भे लोष्टः प्रक्षिप्तो नैव शौचार्थाय कल्पते, नैव शस्यं निर्वर्त्तयति'
( गो० पू० २।२३ )
अर्थात् घड़े में मिट्टी के ढेले के डालने पर उसका उपयोग न तो सफाई के लिये
हो पाता है, न ही उससे धान्य सम्पत्ति हो पाती है इसका तात्पर्य यही कि उपयोगी वस्तु
का भी यदि अस्थान में प्रक्षेप कर दिया जाय तो उसकी उपयोगिता नष्ट हो जाती है।
( ङ ) 'एनं पूर्वे वयसि पुत्राः पितरमुपजीवन्ति उपोत्तमे वयसि पुत्रान् पितो-
पजीवति य एवं वेद स वा एष संवत्सरः' ( गो० पू० ४।१७ ) ।
यहाँ यह बताया है कि पहली अवस्था में पिता के सहारे पुत्र जीता है किन्तु पिछली
अवस्था = बुढ़ापे में पिता पुत्रों के सहारे जीता है जो यह समझता है वही संवत्सर यज्ञ का
वेत्ता है। वस्तुतः बुढ़ापे में माता-पिता की सेवा ही वास्तविक श्राद्ध एवं तर्पण है इस
विषय में यहाँ बड़ा हृदयग्राही प्रकाश डाला गया है।
( च ) 'परिमितं भूतम् अपरिमितं भव्यम्' ( गो० उ० ५।३ )
अर्थात् भूत सीमित है परन्तु भविष्य असीम है इसलिये किसी बुरे कार्य के कर लेने
पर केवल सदैव दुःख ही करते रहने की आवश्यकता नहीं है अपितु वर्त्तमान को सुधार कर
भविष्य बनाने की चेष्टा करनी चाहिये, क्योंकि भविष्य असीम है। निराशा में डूबे हुये
व्यक्ति के लिये ये वाक्य आशा-सञ्चाररूपी औषध है।
गोपथ की मूल पाठगत अशुद्धियाँ—प्रस्तुत गोपथ ब्राह्मण के भाष्यकार श्री पं०
क्षेमकरणदास जी त्रिवेदी के समक्ष भाष्य करते समय एशियाटिक सोसाइटी कलकत्ता से
सन् १८७२ में प्रकाशित श्री पं० राजेन्द्रलाल मित्र सम्पादित गोपथ मूल की प्रति एवं
( ६ )
सन् १८६१ में प्रकाशित श्री पं० जीवानन्द विद्यासागर, कलकत्ता द्वारा सम्पादित मूल
गोपथ की प्रति ये दो ही संस्करण उपलब्ध थे । श्री मित्र जी के पास गोपथ मूल की हस्त-
लिखित प्रतियों का प्रायः अभाव होने से इस सर्वप्रथम प्रकाशित संस्करण में अशुद्धियों
की भरमार है। थोड़ा भी अर्थ के विचार करने पर जिन पाठों को शुद्ध या सम्भावित
कह कर टिप्पणी में दिखाया जा सकता था, वह भी नहीं किया गया । बीच-बीच में कई-
कई पंक्तियाँ त्रुटित एवं च्युत हैं¹। इस विषय में श्री जीवानन्द जी विद्यासागर ने भी
मित्र संस्करण का ही प्रायः अनुकरण किया है । पाठ भ्रष्टता की दृष्टि से दोनों ही संस्क-
रण प्रायः एक जैसे हैं ।
यतः भाष्यकार अपने भाष्य से पाँच वर्ष पूर्व १६१६ में E. J BRILL, LEI-
DEN में छपे Dr. DIEUKE GAASTRA द्वारा सम्पादित संस्करण से पूर्णतया
अपरिचित हैं अतः पाठ के संशोधन में यह ( जर्मन सस्करण ) गोपथ का मूल संस्करण जो
अतीव उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है उससे त्रिवेदी जी लाभ नहीं उठा सके हैं । निःसन्देह
यह संस्करण यदि उन तक उस समय पहुँच पाता तो गोपथ मूल एवं भाष्य दोनों में ही
अत्यन्त यथेष्ट परिवर्तन हो सकते थे । इस संस्करण में पूर्व दोनों संस्करणों की अपेक्षा
पर्याप्त परिश्रम किया गया है, यद्यपि कुछ भ्रष्टपाठ एवं त्रुटित पाठ इस संस्करण में भी
हैं पर वे इन दोनों संस्करणों की अपेक्षा से नगण्य ही हैं । दुर्भाग्य की बात तो यह है कि
इतने भ्रष्ट मित्र संस्करण की सन् १६७२ में पुनः इन्डोलॉजिकल बुक हाउस द्वारा फोटो
कॉपी करा ली गई है, जिससे अशुद्धियाँ तद्वत् रह गईं । अब तो जर्मन संस्करण को देखकर
शुद्ध करके छपवाना चाहिये था । वैदिक ग्रन्थों के प्रति भारतीयों की यह उपेक्षा, उदासी-
नता, परिश्रम न्यून तथा धनोपार्जन एवं यश अधिक अर्जित करने की प्रवृत्ति बड़ी ही
चिन्तावह है । व्यापारिक दृष्टिकोण के समक्ष आर्ष ग्रन्थों के संरक्षण का प्रश्न समाप्त-
प्राय सा हो रहा है ।
भाष्यकार ने यद्यपि ऐतरेय ब्राह्मणादि से कण्डिकाओं का मिलान करके कुछ
भ्रष्टपाठों को शुद्ध करने का प्रयास किया है परन्तु अधिकांश भ्रष्ट पाठों को आर्षशैली,
आर्ष प्रयोग कहकर पूर्ववत् पाठ रहने दिया है। स्पष्ट लेखक प्रमाद द्वारा हुई त्रुटियों को भी
“आर्षो ह्रस्वत्वम्” “आर्षो दीर्घः” इत्यादि कहकर वह उसे साधु सिद्ध कर देते हैं । ऐसे शब्दों
की भाष्यगत शब्द सिद्धियों में भरमार है। प्रस्तुत संस्करण में जर्मन संस्करण के आधार पर
ऐसे शब्दों का संशोधन करके प्रायः उनकी आर्ष-प्रयोगः भाषा को निकाल कर शब्द सिद्धियाँ
ठीक कर दी गई हैं । यथासंभव ऐसे स्थलों में टिप्पणियाँ देकर पूर्व संस्करण के भ्रष्टपाठ
को भी दिखा दिया गया है । यहाँ कुछ शब्दों के नमूने जिन्हें भाष्यकार द्वारा आर्ष-प्रयोगः कहा
गया था, दिखाये जा रहे हैं—
आर्ष-प्रयोगः कहे हुये पाठ शुद्ध परिवर्त्तित पाठ
विन्वन्ति ( आर्षरूपम् ) गो. पू. २ । १६ विदन्ति
विद्धूते ( ऊकारः आर्षः ) ,, ,, १ । २७ विद्यते
१. गो. उ. २ । १३ प्रस्तुत संस्करण का पृष्ठ ३३५ पंक्ति २० यहाँ पूरी पंक्ति त्रुटित है ।
कण्डिकाओं के मूल पाठों को ठीक न समझ सकने के कारण भी भाष्यगत शब्द
( १० )
आथर्वाणः ( आर्षो ह्रस्वः ) गो० पू० २ । २२ अथर्वाणः
कञ्चना ( आर्षो दीर्घः ) ,, ,, ३ । १५ कञ्चन
वेदा ( आर्षो दीर्घः ) ,, ,, ४ । ८ वेद
अतिरिच्येते ( आर्षप्रयोगः ) ;, ,, ४ । १८ अतिरिच्यते
प्रश्नायेयुः ( आर्षरूपम् ) ,, ,, ५ । २ प्रस्नायेयुः
ब्रह्म णस्याम् ( आर्षो ह्रस्वः ) ,, ,, ५ । २४ ब्राह्मणस्योम्
तानूनप्तृत्त्वम् ( आर्षो दीर्घः ) गो० उ० २ । २ तानूनप्त्रत्त्वम्
बभूवुः (आर्षं वहुवचनम्) गो० पू० ३ । ८ बभूव
पाठाशुद्धि समझते हुए भी पाठान्तरों के अभाव में जो पाठ हमने तद्वत् रहने दिये हैं
उनके कुछ उदाहरण निम्न हैं—
आर्ष-प्रयोगः कहे गये पाठ अपेक्षित शुद्ध पाठ
शृण्विति गो० पू० २ । २२ शृणोति
परिशिषेदेत् ,, ,, ३ । ५ परिषेधेत्
अद्यत्ति ,, ,, ३ । १० अत्ति
प्रातर्यावद्भ्यः ,, ,, ४ । ७ प्रातर्यावभ्यः
आश्यन्नः ,, ,, ३ । १६ आश्यानः
यद्यपि पाठान्तरों के अभाव में बहुत से भ्रष्टपाठ समझते हुये भी हमने तद्वत् रख
दिये हैं पुनरपि बहुत से ऐसे पाठ संशोधित भी किये हैं जो स्पष्ट रूप से व्याकरणानुसार
असाधु थे इनकी व्याकरण प्रक्रिया भी हमने ठीक की है। इनके कुछ नमूने यहाँ प्रदर्शित हैं—
पूर्व संस्करण प्रस्तुत संस्करण
मेहि गो० पू० २ । २० ( मा+एहि=मैहि ) मैहि
प्रायच्छत् ,, ,, २ । २१ ( अर्थसङ्गत्यनुसार ) प्रायच्छन्
तिष्ठन् ,, ,, २ । १६ ( व्याकरणानुसारी ) अतिष्ठन्
अत्तुर्वै पुरुषः ,, ,, २ । १५ ( जर्मन सं० में भी अभक्तर्तुर्वै पुरुषः पाठ है,
'अभवतुर्वै पुरुषः अर्थानुसार बदला है )
पर्युपसीदेरन् ,, ,, २ । १४ पर्युपासीरन्
यहाँ षद्लृ धातु के परस्मैपद होने से पर्युपसीदेरन् नहीं होगा, आस धातु से
पर्युपासीरन् पाठ उचित है।
कण्डिकाओं के मूल पाठों को ठीक न समझ सकने के कारण भी भाष्यगत शब्द
सिद्धियों में कतिपय भयंकर एवं हास्यास्पद भूलें हुई हैं, तद्यथा—
( १ ) गो० पू० १।२१ में 'वाकोवाक्यम्' शब्द के अर्थ को ठीक न समझ सकने
के कारण 'वाकः' 'वाक्यम्' ये पृथक्-पृथक् पद मानकर सिद्धि की गई है जिससे भाष्य भी
१. यहाँ भाष्य भी इस परिवर्तित पाठानुसार हमने कर दिया है ।।
( ११ )
नितान्त असङ्गत हो गया है, जब कि 'वाकोवाक्यम्' उक्ति प्रत्युक्ति रूप आख्यान ग्रन्थ
की संज्ञा है ।
( २ ) दीक्षिता ( गो० पू० ५।२४ ) यहाँ इतच् ङीप् किया है, जिससे अर्थ संगत
नहीं होता है । जर्मन संस्करणानुसार हमने दीक्षिता क्तान्त पद रखा है ।
( ३ ) गो० पू० १।२२ में सहस्रकृत्वो इस अशुद्ध शब्द को सिद्ध करने के लिये
भाष्य में सहस्रकृत्वः बनाकर पुनः सहस्रकृत्वः इत्यस्य उपधादीर्घो बाहुलकात् कहकर
सहस्रकृत्वो बनाया गया है । इसी कण्डिका में सिद्धन्ति भ्रष्टपाठ को यथावस्थित रखकर
व्यत्यय से सिध्यन्ति माना है ।
(४) गो० पू० १।२३ में 'ऋगि ऋच्' ऐसा पाठ है । यह ऋगि पाठ ऋच् शब्द का
सप्तमी एकवचन का रूप है अतः ऋचि होना चाहिये । स्पष्ट है कि लेखक प्रमाद से पूर्व
हस्तलेखों में ऋगि पाठ हो गया होगा । श्री त्रिवेदी जी ने इस ऋगि को ही शुद्ध मानकर
'चस्य गः' लिखकर उसकी सिद्धि कर दी है । इस प्रकार बहुत से नमूने दिखाये जा सकते हैं ।'
कुछ ऐसे भी शब्दों के निर्वचन भाष्यकार ने किये हैं जो उस प्रक्रिया से शब्द के
निष्पन्न होने पर भी व्याकरण-प्रक्रियानुसार ठीक नहीं या कष्ट साध्य है । तद्यथा--
परिदेवयाञ्चक्रिरे ( गो० पू० १।२८ ) की सिद्धि में भाष्यकार ने परिदेवयाम् की सिद्धि
उणादि से क्यन् प्रत्यय करके की है जब कि 'परिदेवयाञ्चक्रिरे' सम्पूर्ण रूप ही लिट्
लकार बहुवचन १ का है । ऐसे स्थलों में मूल पाठ को शुद्ध करते हुये भाष्यगत उनकी सिद्धियों
एवं भाष्य को भी यथावश्यक इस संस्करण में शुद्ध करने का पूर्ण प्रयत्न किया गया है ।
पूरी संगति लगाते हुये इस कार्य को करने में हमें बड़ी ही कठिनता हुई है । वस्तुतः देखा
जाये तो गोपथ भाष्य छापने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण एवं कठिन कार्य यहाँ मूल संशोधन
का था क्योंकि भाष्य के साथ-साथ शुद्ध मूल पाठ की प्रति भी पाठकों को उपलब्ध कराना
आवश्यक था । यतः ये पाठ बहुसंख्य थे अतः अनेक स्थलों में एवं प्रारम्भ के प्रायः ७-८-६
फर्मों में टिप्पणी भी पाठ परिवर्त्तन की प्रायः नहीं दी जा सकी क्योंकि भ्रष्टपाठों की बहुलता
को सोचकर ग्रन्थ के अन्त में परिशिष्ट रूप में सभी पाठ दिखाने की इच्छा बन गई थी
किन्तु हमें दो-तीन फर्मों के पश्चात् ही यह अनुभव हुआ कि टिप्पणी पाठकों की सुविधा
की दृष्टि से तत्-तत् स्थलों में ही देनी उचित है अतः वहीं देनी प्रारम्भ कर दी । उपयुक्त
भ्रष्टपाठों के नमूने प्रायः ऐसे ही हैं जहाँ हमने टिप्पणियाँ नहीं दी है । जिन संशोधित पाठों
में हम टिप्पणी न दे सके उनकी कुछ सूची निम्न है—
अशुद्ध शुद्ध
गो० पू० २।१३ ह्यप्रश्नान् ह्वाः प्रश्नान्
,” ” २।१३ व्याचक्षीय व्याचक्षीत
” ” २।२८ प्रतिश्रुत ( प्रतिशृणु के स्थान में प्रतिश्रुतम्
प्रतिश्रुत तिङन्त माना है)
१. द्रष्टव्य गो० पू० १।२८
कण्डिका २।१० में तन्वमभि पर नं० २ की टिप्पणी का चिह्न छप गया है यह टिप्पणी
( १२ )
अशुद्ध शुद्ध
गो०पू० २।२१ जिघत्सुरतमः जिघत्सुतमः
,, ,, २।२१ अभिहुत्वा अभिहुत्य
,, ,, २।२१ अग्निः पदम् अग्निपदम्
,, ,, २।२१ ब्राह्मणम् ब्राह्मद्यम्
,, ,, ३।४ पं०१६ अशांसीन्ये३ (यहाँ यह पाठ अपपाठ. है क्योंकि शंसन होता का कर्म है)
,, ,, ३।४ ये ऽङ्गिरसः (इस पाठ की पुनरावृत्ति है)
गोपथ के मूल संस्करणों में इतने अधिक भ्रष्टपाठों का गोपथ की उपेक्षा के अतिरिक्त
एक और भी महत्त्वपूर्ण कारण ये है कि गोपथ ब्राह्मण का कोई भाष्य प्रस्तुत भाष्य के
अतिरिक्त नहीं उपलब्ध होता यदि श्री राजेन्द्रलाल मित्रादि को इसका भाष्य भी करना
होता तो पदे-पदे पाठों पर पूर्ण गहनता से विचार करना पड़ता। हमारे भाष्यकार के सामने
यह बहुत बड़ी कठिनता थी कि इससे पूर्व अर्थ की दृष्टि से पाठ शुद्धि पर विचार ही नहीं
किया गया, सर्व प्रथम उन्हें ही इस विषय में घोर परिश्रम करना पड़ा। प्रमाणाभाव में आर्ष-
प्रयोगः कहकर अशुद्धियों को उन्हें टालने की आवश्यकता पड़ी।
इस संस्करण में पाठशुद्धि के प्रति इतना सचेष्ट रहने पर भी यह कदापि नहीं कहा
जा सकता कि अब सर्वथा पाठ शुद्ध किये जा चुके हैं। भूलें अनेकों बाधाओं के कारण अब
भी रह गयी हैं जिनका हमें दुःख है तद्यथा--
(१) तत्सम्राज्यस्य सम्राट्त्वम् गो० पू० ५।१३ यह पाठ जर्मन एवं सभी संस्क-
रणों में ऐसा ही है किन्तु पं० चमूपति द्वारा सम्पादित वेदार्थ कोष में 'तत्सम्राजः सम्राट्-
त्वम्' गो० पू० ५।१३ पाठ है। इसके अनुसार हमने संशोधन किया किन्तु मुद्रण की
अनवधानता से पूर्ववत् वही पाठ रह गया। इसी प्रकार--
अशुद्ध शुद्ध अशुद्ध शुद्ध
पृ० पृ०
पुनन्त ११५ पुनन्तः रूपायामो १४५ रुपयामो
तिस्त्रो १४० तिस्रो शकृत् १४५ सकृत्
घ्याप्नोति ३३३ प्राप्नोति सपवेदम् २१ सर्पवेदम्
व्याहृतिर्गायत्रम् ३२ व्याहृति गायत्रम्
कण्डिका २।१० में तन्वमभि पर नं० २ की टिप्पणी का चिह्न छप गया है यह टिप्पणी
चिह्न कण्डिका की चौथी पंक्ति "वै" पर जानी चाहिये।
मेरा निश्चित विचार है कि ब्राह्मण-ग्रन्थों का अध्ययन अध्यापन करते हुये किसी को भी
श्रौत क्रियाओं एवं उसमें वर्णित यज्ञ यागादि का सामान्य परिचय अवश्य होना चाहिये इसका
ज्ञान न होने से अर्थ एवं पाठ में भ्रान्ति सुनिश्चित है। प्रस्तुत भाष्य में ऐसे स्थल बहुत
हैं जहाँ तद्वर्णित याज्ञिक प्रक्रिया का संकेत न करके शाब्दिक अर्थ मात्र से काम चलाया
गया है। तद्यथा- गो० उ.३।८ को देखें। यहाँ सोम याग की एक प्रक्रिया का रहस्योद्घाटित
है। इसके ज्ञान के लिये याज्ञिक प्रक्रिया की पूर्वपीठिका का ज्ञान होना चाहिये वह इस
प्रकार है-सभी श्रौतयज्ञों में वषट्कार से आहुति देते हैं किन्तु सोमयाग में विशेषता यह
कण्डिका में 'स योऽत्र भक्षयेत्' ·········आदि वाक्यों का भाव है उस सोमरस का
( १३ )
है कि वहां अनुवषट्कार ( एक वषट्कार के पश्चात् दूसरा वषट्कार ) भी किया जाता है
जो कि प्रधानाहुति का समर्थक एवं समाप्ति सूचक है ।
संवत्सर के अन्तर्गत छहों ऋतुओं के देवताओं के लिये ऋतुयाज के नाम से सोमरस
दिया जाता है । यतः इन ऋतुओं में प्राणी को सृष्टि के पूर्ण काल तक अन्न प्राप्त करना
अत्यन्त अपेक्षित है अतः ऋतुयाज में समाप्तिसूचक अनुवषट्कार नहीं होता क्योंकि ऋतुओं
को पूर्णता की सूचना देने पर उनके द्वारा प्राप्त होने वाली अन्नादिक वस्तुओं में भी समाप्ति
सम्भावित है अतः अनुवषट्कार न करने के कारण सोमरस का शेष भक्षण भी अन्न की
सर्वदा प्राप्ति की इच्छा के कारण नहीं होता, केवल ओष्ठ में सोमरस का लेपन करके
विधि पूर्ण मान लेते हैं इसीलिये कण्डिका में 'तथैव ह भवति लिम्पेदिति' कहा है ।
कण्डिका में 'स योऽत्र भक्षयेत्' ·········आदि वाक्यों का भाव है उस सोमरस का
शेष भक्षण जो करे उसे कहें कि बिना अनुवषट्कार किये हुए भक्ष को तुमने अपने शरीर
में प्राप्त कर लिया है अतः तुम नहीं जीवोगे अर्थात् उसका भक्षण करके अपने-आप को
पूर्णता प्राप्त कर लेने वाला मान लेने से याग में समृद्धि फल को नहीं प्राप्त कर सकोगे ।
यह यहाँ भाव है। इसी प्रकार गो. उ. १।६ का स्थल देखें, जिसकी पूर्वपीठिका इस प्रकार है—
शतपथ एवं अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों में देवताओं के दो भेद किये गये हैं । एक दिव्य देवता
तथा दूसरे मर्त्यलोक निवासी वेदज्ञ विद्वान् व्यक्ति । इन दोनों देवताओं की प्रसन्नता एवं
आशीर्वाद लाभ के लिये यज्ञ किया जाता है प्रस्तुत कण्डिका में स्पष्ट किया है कि देवताओं
के यज्ञीय भाग लेने की प्रक्रिया से अवान्तर दो भेद हैं। एक सोमपा दूसरे असोमपा देवता ।
दूसरे वर्ग में हुताद देवता एवं अहुताद देवता । द्वितीय वर्ग के अहुताद देवताओं में मनुष्य
लोकवासी विद्वानों की गणना है । ये मन्त्र द्रष्टा ब्राह्मण ऋषियों की देवानुग्रह प्राप्त सन्तान
है अतः उन ऋषियों के अनुग्रहकारी देवता से संबद्ध होने के कारण विभिन्न ऋषि विभिन्न
देवता स्वरूप हैं । इन ऋषियों और उनकी सन्तानों को मनुष्य देवता के रूप से यज्ञ में
अग्नि मुख से आहुति नहीं दी जाती है इसलिये इनको यज्ञीय दक्षिणाग्नि में पके हुए अन्वा-
हार्य नाम के चार व्यक्तियों के भोजन योग्य मात्र को दक्षिणा स्वरूप से देकर प्रसन्न किया
जाता है। इस प्रकार ये ब्राह्मण देवता अग्नि मुख में हवन के बिना यज्ञीय पाक को खाते
हैं अतः अहुताद है। जब इनको अन्वाहार्य संज्ञक यज्ञाग्नि सिद्धपाक को दक्षिणा स्वरूप से
दे दिया जाता है तो वे इस यजमान के घर में अपने आशीर्वाद से इषम् = अन्न ऊर्जम् =
बल को परिपूर्ण कर देते हैं किन्तु प्रथम ही इनको यज्ञीय पाक का भाग न देने पर यजमान
के इष एवं ऊर्ज को लेकर ये चले गये थे, और अब भी जा सकते हैं ।
स्थाली-पुलाक न्याय से हमने यहाँ दो स्थलों का याज्ञिक प्रक्रियानुसार अर्थ प्रदर्शित
किया है । ऐसे कतिपय स्थलों में टिप्पणी में भी हमने याज्ञिक भाव को स्पष्ट किया है किन्तु
ऐसा सर्वत्र नहीं किया जा सका क्योंकि उससे ग्रन्थ के कलेवर विस्तार का भय था । वैसे
गोपथ पर इस दृष्टिकोण से पृथक् कार्य की अपेक्षा है ताकि जिन परम्पराओं की सुरक्षार्थ
यह गोपथ है-उस पर पर्याप्त प्रकाश पड़ सके ।
( १४ )
गोपथ ब्राह्मण पर प्रस्तुत भाष्य—किसी भी भाष्य की सहायता के बिना इस
पर भाष्य करना निश्चय ही एक बड़े साहस का काम है। पं० क्षेमकरणदास जी त्रिवेदी इस
विषय में विद्वानों के हार्दिक बधाई तथा साधुवाद के पात्र हैं कि उन्होंने अपनी वृद्धावस्था
में भी एक महान् कार्य कर दिखाया। जिस कार्य को युवक भी जल्दी न कर सकें उसको
एक ढलती आयु का व्यक्ति पूरा करे, यह उनके अतिशय उत्साह तथा अध्ययन-शीलता का
ही परिणाम है।
गोपथ ब्राह्मण के इस भाष्य में विभिन्न पाठों को ऐतरेयादि से मिलान करके शुद्ध
रूप देने का भरसक प्रयास किया गया है। जो कण्डिका अन्य ब्राह्मणों से मेल रखती थी,
उसकी तुलना के लिये प्रायः सभी उद्धरण दे दिये गये हैं। इस ब्राह्मण में उद्धृत ऋचायें भी
पूरी-पूरी देकर उनका अर्थ भी कर दिया गया है।
अर्थ करते समय प्रायः यौगिक प्रक्रिया का सहारा लिया गया है। शब्दों का व्युत्पत्ति-
लभ्य अर्थ ही मान्य समझा गया है। अर्थ को विस्तृत करने हेतु उनके रूढ़ अर्थों से प्रायः
बचने की चेष्टा की गई है, प्रायः प्रत्येक शब्द का व्याकरण सम्मत धातु प्रत्यय आदि दिखाते
हुये उन्हें सिद्ध करने की पूरी चेष्टा की गई है। यह एक परिश्रम-साध्य एवं महत्त्वपूर्ण कार्य है।
इस भाष्य में यौगिक प्रक्रिया के आश्रयण से कहीं भी अनित्य इतिहास या अनुचित
वर्णन नहीं आने पाया है। विभिन्न ऋषियों के नाम भी यौगिक ही माने गये हैं।
इस भाष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें यथावसर वैदिक सिद्धान्तों को
महर्षि दयानन्द कृत ग्रन्थों के वचनों को उद्धृत करते हुये सुपुष्ट किया गया है। इसके
विपरीत किसी भी बात को स्वीकार नहीं किया गया। पशुयन्चादि शब्दों को देखकर जहाँ
अन्य ब्राह्मणों के भाष्यकारों ने उसे बूचड़खाना बना डाला है, भाष्यकार ने यहाँ ऐसा कदापि
नहीं होने दिया है। अपनी बात की पुष्टि में अन्य ऋषि कृत प्राचीन ग्रन्थों के प्रमाण भी
यथावसर पर्याप्त दिये हैं जो कि भाष्य की महत्ता को बढ़ाते हैं। इस दृष्टि से इस भाष्य
का जितना प्रचार प्रसार विशेष रूप से आर्य जगत् में होना चाहिये वह सन्तोष जनक
नहीं। आर्य जगत् में इस भाष्य के समुचित स्थान न प्राप्त कर सकने के कारण ही आज तक
अन्य इतिहासज्ञों द्वारा भी यह कम ही उद्धृत हुआ है। आज तक इसके पुनर्मुद्रण के सम्बन्ध
में शिरोमणि सभाओं द्वारा भी विचार न किया जा सका। आर्य विद्वानों के ग्रन्थों की
उनके निधन के पश्चात् ऐसी उपेक्षा होती है यह अति दुःखद है। प्रस्तुत संस्करण का
प्रकाशन व्यक्तिगत रूप से श्री त्रिवेदी जी के पौत्र करा रहे हैं, यह उनका बड़ा
साहसिक कार्य है।
उपसंहार—१६७० में श्री पं० क्षेमकरणदास जी त्रिवेदी के अथर्ववेदभाष्य के
४ काण्ड पुनः प्रकाशित किये जाने पर लोगों की मांग गोपथ ब्राह्मण के प्रकाशित करने में
अत्यधिक हुई। अतः ये प्रकाशन कार्य श्रद्धेय त्रिवेदी जी के ही पौत्र श्री डा० इन्द्रदयाल जी
सेठ जो नाइजीरिया यूनिवर्सिटी में गणित के प्राध्यापक हैं व्यक्तिगत रूप से करा रहे थे,
अतः आर्थिक दृष्टिकोण से उन्होंने भी यही सम्मति रखी कि अथर्ववेद भाष्य के प्रकाशन से
( १५ )
पूर्वं गोपथ ब्राह्मण भाष्य का सम्पादन हो फलतः कार्य प्रारम्भ कर दिया गया किन्तु मेरे
बार-बार बाहिर जाने एवं विद्यालयीय कार्यों में अनिवार्यतया संलग्न होने के कारण यह
कार्य बड़ी मन्थर गति से चलता रहा । कई प्रतियों के मिलानादि के कारण इसमें पर्याप्त
समय लगाने की आवश्यकता पड़ती थी, ऐसा न होने पर कार्य रुक रुककर ही चलता रहा
पर जैसा कि लक्ष्य प्राप्ति के लिये निरन्तर गति की अनिवार्यता अपेक्षित है मन्दता
तीव्रता तो साधन की शक्ति पर निर्भर है, हम गतिशील रहे अतः परमेश की महती
अनुकम्पा से यह कार्य आज अपने आप में पूर्ण होकर सुधीजनों के समक्ष है। मेरे बाहिर
आदि जाने के कारण प्रकाशन की त्रुटियां रह गई होंगी और हैं इसके लिये मैं सहृदय
पाठकों से यही कहूँगी वे समय-समय पर मेरा ध्यान इस ओर आकृष्ट करते रहें जिन्हें अगले
संस्करण में ठीक किया जा सकेगा। संस्था को चलाते हुये ऐसे समयापेक्षित कार्य करने
कितने कठिन हैं यह कोई भुक्तभोगी ही जान सकते हैं, पुनरपि कार्य भी इसी झपेट में ही
हुआ करते हैं, जीवन में कोई भी महत्त्वाकांक्षी-जन कार्य के लिये सर्वथा शान्ति एवं
अपेक्षित समय नहीं उपलब्ध कर पाते होंगे, ऐसे ही चलता होगा।
प्रकाशन के इस कार्य में श्रद्धेय त्रिवेदी जी के पौत्र डॉ० इन्द्रदयाल जी सेठ एवं
उनकी धर्मनिष्ठा पत्नी डॉ० कीर्त्ति सेठ डी० फिल प्राध्यापिका शिक्षाशास्त्र प्रयाग विश्व-
विद्यालय, पौत्री श्रीमती सुशीला देवी जी जौहरी मू० पू० प्राचार्या भगवानदीन आर्य-
कन्या महाविद्यालय लखीमपुर खीरी तथा प्रदोहित्र श्री अजय कुमार जी जौहरी आदि सभी
का अत्यन्त ही उत्साह रहा है। श्री त्रिवेदी की वंशपरम्परा में तीसरी एवं चौथी पीढ़ी में
भी वैदिक कार्यों के प्रति वही अनुराग वही निष्ठा समाई हुई है यह सौभाग्य की बात है।
श्री त्रिवेदी जी के गहन तप और निष्ठा का ही यह परिणाम है। वस्तुतः आप सभी लोग
इस विषय में कोटिशः बधाई के पात्र हैं।
इस सम्पादन कार्य में यथावसर पाठों के विवेचन एवं कहीं-कहीं कण्डिकाओं के
याज्ञिक अर्थों की सङ्गति में श्री डॉ० युगल किशोर जी मिश्र वेदाचार्य एम० ए०, पी-
एच० डी० ने उदारता पूर्वक समय लगाया है, अतः वे बहुशः धन्यवाद के भागी हैं। मेरे
लघुभ्राता श्री सुद्युम्न एम० ए०, व्याकरणाचार्य, पी एच० डी० प्राध्यापक मु० म०
टाउन डिग्री कॉलेज बलिया ने मेरा कई महत्त्वपूर्ण उपयोगी स्थलों की ओर ध्यान दिलाया
है तदर्थ मैं उनकी आभारी हूँ। ईश्वर करे वे सदैव सुयश के भागी हों। अपनी अनुजा
बहिन मेधा देवी व्याकरणाचार्या के सम्बन्ध में क्या कहूँ कार्य तो सब हमारा मिला-जुला ही
होता है, तथापि वे "नींव की ईंट" बने रहना ही अधिक पसन्द करती हैं अतः बहुत विरोध
( १६ )
के अनन्तर सम्पादक में उनका नाम प्रविष्ट कर पाई हूँ । उन्हें भय था कि इस प्रक्रिया से
भूमिका में उल्लिखित आशीः राशि से वे वञ्चित रहेंगी पर यह तो असम्भव है । उनकी
कर्म-निष्ठा, त्याग एवं निष्काम-भावना सामान्य स्थिति से ऊपर है इसे देख कौन पुलकित
न होगा ?
मैं इस प्रकरण को अपूर्ण ही समझूँगी यदि अपनी शास्त्री द्वितीय वर्ष की छात्राओं
कु० प्रियम्वदा, कु० माधुरी रानी, कु० सूर्या के नामों का उल्लेख न करूँ । ये पुत्रियाँ
हस्तलेख मिलान प्रूफ़ संशोधनादि कार्यों में मेरे साथ बड़ी जिज्ञासा, तत्परता एवं मनोयोग से
समय लगाती थीं । उनकी ये प्रवृत्ति कार्यदक्षता के लिये नितान्त उचित है । परमात्मा करे
वे सदैव स्वस्थ चिरायु रहते हुये वैदिक कार्यों के प्रति निष्ठावान् तथा ऋषि भक्त हों ।
अन्त में विष्णु मुद्रणालय के सञ्चालक श्री कालीनाथ जी का भी मैं हार्दिक
धन्यवाद करती हूँ कि जिन्होंने अनेक विघ्नों के रहते हुये भी इस कार्य को सम्पन्न किया ।
विनीता—
३१ जु० गुरुपूर्णिमा } प्रज्ञा देवी
सं० २०३४ वि० } पाणिनि कन्या महाविद्यालय
दयानन्दाब्द १५३ } तुलसीपुर, वाराणसी-५
सन् १९७७ }
॥ ओ३म् ॥
गोपथ ब्राह्मण भाष्य भूमिका ॥
१—ईश्वर प्रार्थना ॥
त्वं न इन्द्रा भरँ ओजो नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे ।
आ वीरं पृतनाषहम् ॥ १ ॥
मन्त्र १-३ अथर्व० २० । १०८ । १-३, ऋग्० ८ । ६८ [ सायणाभाष्य ८७ ] ।
१०-१२, साम० उ० ४ । २ । तृच १३ ॥
( शतक्रतो ) हे सैकड़ों कर्म करने वाले ! ( विचर्षणे ) हे विविध प्रकार देखने
वाले ! ( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले जगदीश्वर ] ( त्वम् ) तू ( नः ) हमारे
लिये ( ओजः ) पराक्रम, ( नृम्णम् ) धन ( आ ) और ( पृतनासहम् ) सङ्ग्राम जीतने
वाले ( वीरम् ) वीर को ( आ ) भले प्रकार ( भर ) पुष्ट कर ॥ १ ॥
हे परमात्मन् ! आपके अनुग्रह से हम सैकड़ों शुभ कर्म करते हुये बलवान्,
धनवान् और वीर पुरुषों वाले होवें ॥ १ ॥
त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ ।
अधा ते सुम्नमीमहे ॥ २ ॥
( वसो ) हे बसाने वाले ! ( शतक्रतो ) हे सैकड़ों कर्मों वाले ! [ परमेश्वर ]
( त्वम् ) तू ( हि ) ही ( नः ) हमारा ( पिता ) पिता और ( त्वम् ) तू ही ( माता )
माता ( बभूविथ ) हुआ है, ( अध ) इसलिये ( ते ) तेरे ( सुम्नम् ) सुख को ( ईमहे )
हम माँगते हैं ॥ २ ॥
हे परमेश्वर ! आप सदा से सब सृष्टि के पालन और पोषण करने वाले हैं,
हम आप से प्रार्थना करते हुये सैकड़ों उपकार करके सदा सुखी होवें ॥ २ ॥
त्वां शुष्मिन् पुरुहूत वाजयन्तमुप ब्रुवे शतक्रतो ।
स नो रास्व सुवीर्य्यम् ॥ ३ ॥
( शुष्मिन् ) हे महाबली ! ( पुरुहूत ) हे बहुत प्रकार से बुलाये गये !
( शतक्रतो ) हे सैकड़ों कर्मों वाले ! [ परमेश्वर ] ( वाजयन्तम् ) बलवान् बनाने
वाले ( त्वाम् ) तुझको ( उप ) आदर से ( ब्रुवे ) मैं बुलाता हूं, ( सः ) सो तू ( नः )
हमें ( सुवीर्य्यम् ) बड़ा वीरपन ( रास्व ) दे ॥ ३ ॥
हे अनन्त बल जगदीश्वर ! आप कृपा करें । जिससे हम महापराक्रमी और
महापुरुषार्थी होकर सदा आनन्द पावें ॥ ३॥