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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 600 में से

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पृष्ठ 17

( ११ )
नितान्त असङ्गत हो गया है, जब कि 'वाकोवाक्यम्' उक्ति प्रत्युक्ति रूप आख्यान ग्रन्थ
की संज्ञा है ।
( २ ) दीक्षिता ( गो० पू० ५।२४ ) यहाँ इतच् ङीप् किया है, जिससे अर्थ संगत
नहीं होता है । जर्मन संस्करणानुसार हमने दीक्षिता क्तान्त पद रखा है ।
( ३ ) गो० पू० १।२२ में सहस्रकृत्वो इस अशुद्ध शब्द को सिद्ध करने के लिये
भाष्य में सहस्रकृत्वः बनाकर पुनः सहस्रकृत्वः इत्यस्य उपधादीर्घो बाहुलकात् कहकर
सहस्रकृत्वो बनाया गया है । इसी कण्डिका में सिद्धन्ति भ्रष्टपाठ को यथावस्थित रखकर
व्यत्यय से सिध्यन्ति माना है ।
(४) गो० पू० १।२३ में 'ऋगि ऋच्' ऐसा पाठ है । यह ऋगि पाठ ऋच् शब्द का
सप्तमी एकवचन का रूप है अतः ऋचि होना चाहिये । स्पष्ट है कि लेखक प्रमाद से पूर्व
हस्तलेखों में ऋगि पाठ हो गया होगा । श्री त्रिवेदी जी ने इस ऋगि को ही शुद्ध मानकर
'चस्य गः' लिखकर उसकी सिद्धि कर दी है । इस प्रकार बहुत से नमूने दिखाये जा सकते हैं ।'
कुछ ऐसे भी शब्दों के निर्वचन भाष्यकार ने किये हैं जो उस प्रक्रिया से शब्द के
निष्पन्न होने पर भी व्याकरण-प्रक्रियानुसार ठीक नहीं या कष्ट साध्य है । तद्यथा--
परिदेवयाञ्चक्रिरे ( गो० पू० १।२८ ) की सिद्धि में भाष्यकार ने परिदेवयाम् की सिद्धि
उणादि से क्यन् प्रत्यय करके की है जब कि 'परिदेवयाञ्चक्रिरे' सम्पूर्ण रूप ही लिट्
लकार बहुवचन १ का है । ऐसे स्थलों में मूल पाठ को शुद्ध करते हुये भाष्यगत उनकी सिद्धियों
एवं भाष्य को भी यथावश्यक इस संस्करण में शुद्ध करने का पूर्ण प्रयत्न किया गया है ।
पूरी संगति लगाते हुये इस कार्य को करने में हमें बड़ी ही कठिनता हुई है । वस्तुतः देखा
जाये तो गोपथ भाष्य छापने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण एवं कठिन कार्य यहाँ मूल संशोधन
का था क्योंकि भाष्य के साथ-साथ शुद्ध मूल पाठ की प्रति भी पाठकों को उपलब्ध कराना
आवश्यक था । यतः ये पाठ बहुसंख्य थे अतः अनेक स्थलों में एवं प्रारम्भ के प्रायः ७-८-६
फर्मों में टिप्पणी भी पाठ परिवर्त्तन की प्रायः नहीं दी जा सकी क्योंकि भ्रष्टपाठों की बहुलता
को सोचकर ग्रन्थ के अन्त में परिशिष्ट रूप में सभी पाठ दिखाने की इच्छा बन गई थी
किन्तु हमें दो-तीन फर्मों के पश्चात् ही यह अनुभव हुआ कि टिप्पणी पाठकों की सुविधा
की दृष्टि से तत्-तत् स्थलों में ही देनी उचित है अतः वहीं देनी प्रारम्भ कर दी । उपयुक्त
भ्रष्टपाठों के नमूने प्रायः ऐसे ही हैं जहाँ हमने टिप्पणियाँ नहीं दी है । जिन संशोधित पाठों
में हम टिप्पणी न दे सके उनकी कुछ सूची निम्न है—
अशुद्ध शुद्ध
गो० पू० २।१३ ह्यप्रश्नान् ह्वाः प्रश्नान्
,” ” २।१३ व्याचक्षीय व्याचक्षीत
” ” २।२८ प्रतिश्रुत ( प्रतिशृणु के स्थान में प्रतिश्रुतम्
प्रतिश्रुत तिङन्त माना है)
१. द्रष्टव्य गो० पू० १।२८