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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

कण्डिका ३९ ॥ आचमन के विधान और लाभ ॥

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३६ ६६
यत्तृतीयमाचामति संस्थितहोमांस्तेनास्मिन्नवरुन्धे, स यद् द्विः परिशुम्भति तत्स-
मित्संबर्हिः, स यत्सर्वाणि खानि सर्वं देहमाप्याययति यच्चान्यदातारं मन्त्रकार्थ्यं
यज्ञे स्कन्दति सर्वं तेनास्मिन्नवरुन्धे, स यदोंपूर्वान् मन्त्रान् प्रयुङ्क्त आसर्वमेधा-
देते क्रतव एत एवास्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु देवेषु सर्वेषु वेदेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेषु
सत्त्वेषु कामचारः कामविमोचनं भवत्यद्धं च न प्रमीयते य एवं वेद ।
तदप्येतद् ऋचोक्तम् । आपो भृग्वङ्गिरो रूपमापो भृग्वङ्गिरोमयं । सर्वं-
मापॊमयं भूतं सर्वं भृग्वङ्गिरोमयं । अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसोऽनुगाः ।
अपां पुष्पं मूर्तिराकाशं पवित्रमुत्तममित्याचम्याभ्युक्ष्यात्मानमनुमन्त्रयत
इन्द्र जोवेति ब्राह्मणम् ॥ ३९ ॥
इति अथर्ववेदे गोपथब्राह्मणपूर्वभागे प्रथमः प्रपाठकः ॥ १ ॥
कण्डिका ३९ ॥ आचमन के विधान और लाभ ॥
( आपो गर्भं जनयन्तीः इति-अथ० ४ । २ । ८ ) गर्भ [ अर्थात् बालक रूप
संसार ] को उत्पन्न करते हुये जल [ इस मन्त्र से सिद्ध होता है कि ] ( अपां गर्भः
पुरुषः सः यज्ञः ) जल का गर्भ [ अन्तर्यामी ] पुरुष [ ब्रह्म ] है वही यज्ञ है । ( अद्भिः
प्र णीयमानः यज्ञः प्राङ्तायते तस्मात् आचमनीयम् पूर्वम् आहारयति ) जल के
साथ चलाया हुआ यज्ञ पहिले विस्तृत किया जाता है इसलिये आचमन योग्य जल वह
[ व्रतधारी ] पहिले विधि के साथ पीता है । ( सः यत् आचामति त्रिः आचामति )
वह जब आचमन करता है, तीन बार आचमन करता है, (द्विः परिशुम्भति ) दो बार
सजाता है [ आगे देखो ], ( आयुः अवरुह्य पाप्मानं निर्णुदति ) आयु पर चढ़कर
[ बढ़ाकर ] पाप को निकाल देता है । ( यजुषा उपसाद्य मन्त्रान् उद्धृत्य प्रयुज्य
अवसाय, प्राचीः शाखाः सन्धाय निरंगुष्ठे पाणौ-अमृतम् असि, अमृत !
उपस्तरणम् असि, अमृताय त्वा उपस्तृणामि इति [ ब्राह्मणवचनानि ] पाणौ
उदकम् आनीय-जीवाः स्थ इति सूक्तेन [ अथ० १९ । ६६ । १-४ ] त्रिः
आचामति ) देवपूजा के साथ पास आकर, मन्त्रों को निकाल कर, प्रयोग में ला कर ओर
निश्चय करके, और पुरानी शाखाओं [ वेदव्याख्याओं ] को मिला कर, अगूंठा छोड़ कर
हाथ में-तू अमृत [ मृत्यु से बचाने वाला जल ] है, हे अमृत ! तू बहुत फैलाने वाला
है, अमरपन के लिये तुझे फैलाता हूँ [ पीता हूँ-इन तीन ब्राह्मण वचनों से ] हाथ में
३६-(जनयन्तीः) जनयतेः शतृः । जसि पूर्वसवर्णदीर्घः । जनयन्त्य । उत्पा-
दयन्त्यः (प्रणीयमानः) प्रवर्त्तमानः ( प्राङ्तायते ) प्र+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्,
तनु विस्तारे कर्मणि लट् । तनोतेर्यकि (पा० ६ । ४ । ४४) इति आत्वम् । प्राङ् पूर्वे
तायते । विस्तार्यते ( आचमनीयम् ) आचमनयोग्यं जलम् ( आहारयति ) विधि-
पूर्वकं पिबति ( परिशुम्भति ) शुम्भ शोभायाम्-णिजर्थे । परिशुम्भयति । सर्वतः
शोभयति ( अवरुह्य ) आरुह्य । दीर्घं कृत्वा ( यजुषा ) देवपूजनेन ( उद्धृत्य )
उत् +धृञ् धारणे वा हृञ् हरणे-ल्यप् । पृथक् कृत्वा ( प्रयुज्य ) प्रयोगे नीत्वा

७० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३६
जल लेकर—तुम जीव वाले हो—इस सूक्त से [ चार मन्त्रों से ] तीन बार आचमन करता
है। (सः यत् पूर्वम् आचामति सप्त तान् प्राणान् एतेन अस्मिन् आप्याययति
[ताः च अपि ], याः हि शरीरात् बाह्याः एताः मात्राः, तत् यथा एतत्. अग्निं
वायुम् आदित्यं चन्द्रमसम् अपः अन्यान् पशून् च प्रजाः तान् एतेन अस्मिन्
आप्याययति—आपः अमृतम् ) वह जो पहिला आचमन करता है उन सात प्राणों
[ शरीर में भीतर जाने वाले जीवनवर्धक श्वासों ] को इस [ विधि ] से इस [ शरीर ]
में पुष्ट करता है [ और उन मात्राओं को भी पुष्ट करता है ] जो यह शरीर से बाहर
चलती हुई मात्रावें हैं, सो जैसे यह हैं--अग्नि १ [ अर्थात् शारीरिक, पार्थिव, समुद्रीय,
गुप्त प्रकट बिजुली आदि अग्नि विद्या ] वायु २ [ अर्थात् पवन विद्या जैसे पवन क्या है
और उसका प्रभाव सब जीवों, सब पृथिवी सूर्य आदि लोकों पर क्या है ], सूर्य ३ [ अर्थात्
सूर्य विद्या, जैसे सूर्य का पृथिवी आदि लोकों और उनके पदार्थों से और उन सबका
सूर्य लोक से क्या सम्बन्ध है ], चन्द्रमा ४ [ अर्थात् चन्द्र विद्या, जैसे उपग्रह चन्द्रमा
अपने ग्रह पृथिवी पर किस सम्बन्ध से क्या प्रभाव करता है और अन्य चन्द्रमाओं का
अन्य ग्रहों से क्या सम्बन्ध है ], जल ५ [ अर्थात् जल विद्या, जैसे जल क्या है और वह
भूमण्डल, मेघमण्डल, सूर्यमण्डल आदि लोकों से क्या सम्बन्ध रखता है ], जीव वाले
पशु ६ [ अर्थात् पशु विद्या, जैसे गौ घोड़ा आदि जीव पृथिवी लोक और दूसरे लोकों में
कैसे उपकारी होते हैं ], और प्रजाओं ७ [ अर्थात् प्रजा की विद्या कि परमात्मा की
सृष्टि में भूलोक, चन्द्रलोक, सूर्यलोक आदि के मनुष्य और जीवजन्तुओं का सम्बन्ध
आपस में और दूसरे लोक वालों से क्या है ]--इन सबको इस [ विधि ] से इस
[ शरीर ] में पुष्ट करता है, [ क्योंकि ] जल अमृत है। (सः यत् द्वितीयम् आचा-
मति सप्त तान् अपानान् एतेन अस्मिन् आप्याययति [ ताः च अपि ], याः हि
शरीरात् बाह्याः एताः मात्राः, तत् यथा एतत्, पौर्णमासीम् अष्टकाम् अमावास्यां
श्रद्धां दीक्षां यज्ञं दक्षिणाः. तान् एतेन अस्मिन् आप्याययति--आपः अमृतम् )
वह जो दूसरा आचमन करता है, उन सात अपानों [ शरीर से बाहर निकलने वाले
( अवसाय ) अव+षो अन्तकर्मणि-ल्यप् । निश्चित्य ( प्राचीः ) पूर्वस्मिन् काले
भवाः ( शाखाः ) वेदव्याख्याः ( संधाय ) सम्+दधातेः---ल्यप् । संयुज्य ।
( अमृतम् ) नास्ति मृतं मरणं यस्मात् तत् । जलम् ( उपस्तरणम् ) उप +
स्तृञ् विस्तारे आच्छादने च--ल्युट् । बहुविस्तारकम् ( अमृताय ) अमरणाय ।
( उपस्तृणामि ) अधिकं विस्तारयामि । आचामामि । ( एतेन ) अनेन विधिना
( अस्मिन् ) दृश्यमाने शरीरे ( एताः ) एतेस्तुट् च ( उ० १ । १३३ ) इण् गतौ--
अदिः प्रत्ययः, तस्य च तुडागमः । गमनशीलाः (अग्निम्) अग्निविद्याप्रकाशम् (वायुम्)
पवनविद्याम् ( आदित्यम् ) आदीद्यमानसूर्यविद्याम् ( चन्द्रमसम् ) आह्ला-
दकचन्द्रविद्याम् ( अपः ) व्यापकजलविद्याम् ( पशून् ) गवाश्वादिजीवान् ।
( अन्यान् ) माछाणसिभ्यो यः ( उ० ४ । १०९ ) अन प्राणने--षप्रत्ययः । प्राणिन. ।
( आप्याययति ) आ+प्यैङ् वृद्धौ-णिच् । समन्तात् वर्धयति । पोषयति (अपानान्)

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३६ · ७१
प्रभासों ] को इस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पुष्ट करता है [ और उन मात्राओं
को भी पुष्ट करता है ] जो शरीर से बाहर चलती हुई मात्रा यें हैं, सो जैसे यह हैं--
पौर्णमासी १, [ अर्थात् पूर्णमासेष्टि, जिसमें विचारा जाता है कि उस दिन चन्द्रमा पूरा
क्यों दीखता है, पृथिवी, समुद्र आदि पर उसका क्या प्रभाव होता है ], अष्टका २,
[ अष्टमी आदि तिथि का यज्ञ, जिसमें विद्वान् पित्तर लोग विचारते हैं कि ज्योतिष
शास्त्र की मर्यादा से इन तिथियों में सूर्य और चन्द्र आदि लोकों का क्या प्रभाव पड़ता है].
अमावास्या ३, [ अर्थात् दर्शष्टि जिसमें विचार होता है कि अमावस को सूर्य और
चन्द्रमा एक राशि में आकर क्या प्रभाव डालते हैं ], श्रद्धा ४, [ अर्थात् ईश्वर और वेदों
में विश्वास ], दीक्षा ५, [ नियम और व्रत पालन की शिक्षा ]. यज्ञ ६, [ परमेश्वर और
विद्वानों का सत्कार. परस्पर संयोग और विद्या आदि का दान ]. और दक्षिणायें ७, [ यज्ञ
समाप्ति पर विद्वानों के सत्कार के लिये द्रव्य ] - इन सब को इस [ विधि ] से इस
[ शरीर ] में पुष्ट करता है, [ क्योंकि ] जल अमृत है। ( सः यत् तृतीयम् आचामति
सप्त तान् व्यानान् एतेन अस्मिन् आप्याययति [ ताः च अपि ] याः हि शरीरात्
बाह्याः एताः मात्राः, तत् यथा एतत्, पृथिवीम् अन्तरिक्षं दिवं नक्षत्राणि ऋतून्
आर्त्तवान् संवत्सरान् तान् एतेन अस्मिन् आप्याययति - आपः अमृतम् ) वह जो
तीसरा आचमन करता है उन सात व्यानों [ शरीर में फैले हुए पवनों ] को इस [ विधि ]
से इस [ शरीर ] में पुष्ट करता है [ और उन मात्राओं को भी पुष्ट करता है ] जो शरीर
से बाहर चलती हुई मात्रायें हैं, सो जैसे यह हैं पृथिवी १, [ भूगर्भ विद्या, राज्य
पालनादि विद्या ], अन्तरिक्ष २, [ वायुमण्डल, मेघमण्डल, आदि की विद्या ]
प्रकाश ३, [ प्रकाश के ताप, आकर्षण और फैलाव आदि की विद्या ]; नक्षत्रों ४
प्रश्वासान् । शरीरबहिर्गामिनो दोषनाशकान् वायून् (पौर्णमासीम् १) पूर्ण-
मास-अण्, ङीप् । पूर्णमासेष्टिम् । पूर्णचन्द्रसम्बन्धिनीं विद्याम् (अष्ट-
कास्) इष्यशिभ्यां तकन् ( उ० ३ । १४८) अशूङ् व्याप्तौ अश भोजने वा-तकन्,
टाप् । अष्टका पितृदैवत्ये (वा० पा० ७ । ३ । ४५) इत्वाभावः । अष्टम्यादितिथौ
पितॄणां समागमेन ज्योतिषविद्याविचारम् (अमावास्याम्) अमा सह वसतः
चन्द्राकौँ यत्र । अमावस्यदन्यतरस्याम् (पा० ३ । १ । १२२) अमा + वस
निवासे-ण्यत्, टाप् । कृष्णपक्षशेषतिथिम्, तद्दिने चन्द्राकैकराशिस्थौ भवतः ।
दर्शष्टिम् (श्रद्धाम् ) ईश्वरवेदयोर्निश्चयम् (दीक्षाम्) नियमव्रतयोः शिक्षाम् ।
(यज्ञम्) यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु-नङ् । परमेश्वरविद्वत्सत्कारपरस्परसंयोग-
विद्यादिदानव्यवहारम् (दक्षिणाः) यज्ञसमाप्तौ विद्वद्भ्यः सत्कारद्रव्याणि ।
(व्यानान्) सर्वशरीरव्यापकान् वायून् (पृथिवीम्) भूगर्भविद्यां राज्यपालनादि-
विद्यां च (अन्तरिक्षम्) मध्यलोकस्थवायुमण्डलमेघमण्डलादिविद्याम् (दिवम्)
सूर्यतापाकर्षणविस्तारादिविद्याम् (नक्षत्राणि) णक्ष गतौ-अत्रन् । गतिशीलानां
१. पूर्णमासोऽस्यां वर्त्ततं इति पौर्णमासी तिथिः, इत्यत्र पूर्णमासाद्ण् (वा० ४ । २ । ३५)
इति अण् ॥ सम्पा० ॥

७२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३६
[ तारागणों के परस्पर आकर्षण रखने, अपने अपने मार्ग पर चलने उछलने
डूबने आदि की विद्या ], ऋतुओं ५, [ वसन्त आदि ऋतुओं के क्रम और कारण
आदि की विद्या ], आर्त्तवों ६, [ ऋतुओं में उत्पन्न पदार्थों, फूल फल आदि की उत्पत्ति
और उपकार की विद्या ], और संवत्सरों ७, [ वर्ष में ऋतु महीने आदि कैसे बसते हैं
और सब मनुष्य आदि प्राणी कैसे उसका उपभोग करते हैं, इसकी विद्या ] - इन सबको
इस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पुष्ट करता है, [ क्योंकि ] जल अमृत है। ( पुरुषः
ब्रह्म, अथ आप्रियनिंगमः भवति ) पुरुष ब्रह्म है और यह सब प्रकार प्रिय निगम [ वैदिक
सिद्धान्त ] है, ( तस्मात् वै विद्वान् पुरुषम् इदम् पुण्डरीकम् इति ) [ आचष्टे ] इस-
लिए ही विद्वान् मनुष्य पुरुष को ऐश्वर्यवान् शुद्धस्वरूप ब्रह्म [ कहता है ] ( एषः सः
प्राणः पुरि शेते सः पुरि शेते इति ) यही प्राण शरीर में रहता है, यही शरीर में रहता
है। (पुरिशयं सन्तं प्राणं पुरुषः इति आचक्षते ) शरीर में वर्त्तमान रहते हुये प्राण
[ जीवन साधन ] को पुरुष [ आत्मा वा परमात्मा ] कहते हैं। (परोक्षेण) परोक्ष [ आँख
ओट प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म ] के द्वारा (परोक्षप्रियाः इव हि ) परोक्षप्रिय [ आँख ओट
भविष्य के प्रेमी ] लोगों के समान ही ( देवाः ) देवता [ विद्वान् लोग ] ( प्रत्यक्षद्विषः)
प्रत्यक्ष [ वर्त्तमान अवस्था ] के द्वेषी (भवन्ति) होते हैं [ देखो कण्डिका १ तथा ७ ]।
[वही प्रकरण दूसरे प्रकार कहा जाता है] (सः यत् पूर्वम् आचामति पुरस्ताद्धो-
मान् तेन अस्मिन् अवरुन्धे ) वह जो पहिला आचमन करता है पुरस्तात् होमों [ पहिले
होम विशेषों के फलों ] को उस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पाता है। (सः यत्
द्वितीयम् आचामति आज्यभागौ तेन अस्मिन् अवरुन्धे ) वह जो दूसरा आचमन
करता है दो आज्य भागों [ अग्नि के उत्तर और दक्षिण भाग में घी की दो आहुति विशेष
के फल ] को उस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पाता है। ( सः यत् तृतीयम् आचा-
मति संस्थितहोमान् तेन अस्मिन् अवरुन्धे ) वह जो तीसरा आचमन करता है
संस्थितहोमों [ अन्तिम होम विशेषों के फल ] को उस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में
पाता है। ( सः यत् द्विः परिशुम्भति तत् समित्संबर्हिः ) वह जो दो बार सजाता है
वह समिधा [ काष्ठ ] और विधिपूर्वक अग्नि है, ( सः यत् सर्वाणि खानि सर्वं देहम्
तारागणानां परस्पराकर्षणविज्ञानम् (ऋतून् ) वसन्तादीनां क्रमकारणादिबोधम् ।
( आर्त्तवान् ) ऋतु-अण् । ऋतुभवानां पुष्पफलादिपदार्थानां ज्ञानम् (संवत्सरान् )
संपूर्वाच्चित् ( उ० ३ । ७२ ) सम् + वस निवासे-सरन् । संवसन्ति वसन्तादयो
यत्र । कालोपभोगविद्याः ( पुरुषः ) पुरः कुषन् ( उ० ४ । ७४ ) पुर अग्रगमने -
कुषन् । पुरुषः पुरिखादः पुरिशयः पूरयतेर्वा पूरयन्त्यन्तरित्यन्तरपुरुषमभिप्रेत्य - निरु० २ ।
३ । अग्रगामी परमात्मा ( इदम् ) इन्देः कमिञ्लोपश्च ( उ० ४ । १५७) इदि
परमैश्वर्ये-कमिन्, नलोपः । परमैश्वर्ययुक्तम् (पुण्डरीकम् ) फर्फरीकादयश्च ( उ०
४ । २० ) पुण शुद्धौ धर्मकृत्यकरणे च-ईकन्, पृषोदरादित्वात् साधुः । शुद्धस्वरूपं
ब्रह्म । (पुरिशयम्) पुरि + शीङ् स्वप्ने - अच् । पुरि शरीरे वर्त्तमानम् (पुरस्ताद्धोमान्)
होमविशेषान्, तेषां फलम् ( अवरुन्धे ) प्राप्नोति ( आज्यभागौ ) अग्नेरुत्तर-
दक्षिणभागयोर्घाहुतिद्वयम् (संस्थितहोमान् ) यज्ञविशेषान् (समित्संबर्हिः)

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ क० ३६ ७५
·आप्याययति, यत् च अन्यत् आतार मन्त्रकार्यं यज्ञे स्कन्दति सर्वं तेन· अस्मिन्
·अवरुन्धे ) वह जो सब इन्द्रियों और सब देह को पुष्ट करता है और जो कोई दूसरा सब
प्रकार तराने वाला मन्त्र कार्यं यज्ञ में आ जाता है, उस सबको उस [ विधि ] से इस
[ शरीर ] में पाता है । ( सः यत् ओं पूर्वान् मन्त्रान् प्रयुङ्क्ते आसर्वमेधात् अस्य
एते एते एव क्रतव ) वह जो ओम् को पहिले कह के मन्त्रों को प्रयोग में लाता है सर्वमेध
यज्ञ [ सब पदार्थों पर धारणावती बुद्धि वाले यज्ञ ] तक उसके यही यही सब कर्म होते
हैं, ( सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु देवेषु सर्वेषु वेदेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेषु सत्त्वेषु [ अस्य ]
कामचारः कामविमोचनं भवति अद्धे॑ च न प्रमीयते, यः ·एवं वेद ) और सब
लोकों में, सब देवों [ दिव्य पदार्थों ] में, सब वेदों में, सब तत्त्वों में, और सब जीवों में
[ इसका ] सुकामना से विचरना और कुकामना का परित्याग होता है, और वह खण्डिन
आयु में नहीं मरता है, जो ऐसा जानता है ।
( तत् अपि एतत् ऋचा उक्तम् ) यह भी इस ऋचा [ ब्राह्मण वचन ] करके
कहा गया है । ( आपः भृग्वाङ्गिरोरूपम् आपः भृग्वङ्गिरोमयम् । सर्वम् आपोमयं
सर्वं भूतं भृग्वङ्गिरोमयंम् एते त्रयः वेदाः भृगून् अङ्गिरसः अन्तरा अनुगाः )
व्यापक जल प्रकाशमान ज्ञान वाले परमात्मा का रूप है, व्यापक जल प्रकाशमान परमात्मा
से परिपूर्ण हैं । सब जगत् जलमय [ जल से परिपूर्ण ] है और सब प्राणीमात्र प्रकाशमान
ज्ञानवाले परमात्मा से परिपूर्ण हैं । और यह तीनों वेद [ अर्थात कर्म उपासना ज्ञान ]
प्रकाशमान ज्ञान वाले [ चारों वेदों ] के भीतर साथ साथ चलने वाले हैं । [ यह षट्पदा
अनुष्टुप् छन्द ब्राह्मण है, इसके पिछले चार पाद कण्डिका २६ में आये हैं, ( अनुगाः ) के
स्थान पर वहां ( श्रिताः ) पद है ॥
( अपां पुष्पं मूर्तिः आकाशम् पवित्रम् उत्तमम् इति आचम्य अभ्युक्ष्य
इन्द्रजीव आत्मानम् अनुमन्त्रयते इति ब्राह्मणम् ) व्यापक जल का विकाश
और वृद्धि, आकाश [ के समान व्यापक ] पवित्र और उत्तम [ ब्रह्म ] है - इस [ ब्राह्मण
यज्ञकाष्ठं विधानपूर्वंकोऽग्निश्च ( खानि ) इन्द्रियाणि ( आतारम् ) आ + तृ
संतारणे - घञ् । समन्तात् तारकमुपकारकम् ( स्कन्दति ) स्कन्दिर् गतिशोष-
णयोः । गच्छति ( आसर्वमेधात् ) आङ् मर्य्यादायाम् । सर्वपदार्थेषु मेधा धार-
णावती बुद्धिर्यस्मिन् स सर्वमेधो यज्ञः । तस्य समाप्तिपर्य्यन्तम् ( क्रतवः ) कृञः
क्रतु. ( उ० १ । ७६ ) करोतेः—क्रतुः । क्रतुः कर्मनाम—निघ० २ । १ । प्रजानाम
निघ० ३ । ६ । कर्माणि । ( एते एते ) अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते--निरु० १० ।
४२ । इति द्वित्वम् ( देवेषु ) दिव्यपदार्थेषु ( भूतेषु ) तत्त्वेषु ( सत्त्वेषु )
जीवेषु ( कामचारः ) स्वकामेन विचरणम् ( कामविमोचनम् ) कुकामपरि-
त्यागः ( अद्धे॑ ) ऋधु वृद्धौ--घञ् । खण्डिते जीवने ( प्रमीयते ) मीङ्
प्राणवियोगे = मरणे म्रियते ( पुष्यम् ) पुष पुष्टौ, क्यप् । विकाशः ।
विशिष्टप्रकाशः ( मूर्तिः ) मुर्च्छा मोहवृद्ध्योः--क्तिन् । न ध्याख्यापृमूर्च्छिमदाम्

७४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३६
वृचन ] से आचमन करके और मार्जन करके - इन्द्रजीव-अथर्व० १६ । ७० । १ । इस
मन्त्र से अपने को मन्त्र के अनुकूल बनाता है, यह ब्राह्मण है ॥ ३६ ॥
भावार्थः-व्रतधारी पुरुष आचमनादि क्रिया से स्वस्थचित्त होकर अपने शिर के
सात छिद्रों से सम्बन्ध वाले सात प्राण, सात अपान और सात व्यान वायु को वश में करके
अग्नि, वायु आदि इस सप्तक, पौर्णमासी अष्टका आदि इस सप्तक तथा पृथिवी, अन्तरिक्ष
आदि इस सप्तक, और दूसरी पदार्थ विद्याओं से उपकार लेकर संसार की भलाई करता है ।
अथर्व० १० । २ । ६ में वर्णन है-( कः सप्त खानि वि ततर्द शीर्षणि कर्णाविमौ
नासिके चक्षणी मुखम् । येषां पुरुत्रा विजयस्य मह्मनि चतुष्पादो द्विपदो यन्ति
यामम् ) कर्ता प्रजापति ने [ प्राणी के ] मस्तक में सात गोलक खोदे, यह दोनों कान,
दो नथने, दोनों आंखें और एक मुख । जिनके विजय की महिमा में चौपाये और दोपाये
जीव अनेक प्रकार से सन्मार्ग से चलते हैं ॥ ३६ ॥
विशेषः १--इस कण्डिका का मिलान अथर्ववेद का० १५ सूक्त १५, १६ और
१७ से करो वहाँ मन्त्रों और भाष्य में प्राण, अपान और व्यान तथा अग्नि आदि पदार्थों
का सविस्तार वर्णन है ॥
विशेषः २--प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ।
१--आपो वत्स॑ जनयन्ती॒र्गर्भमग्रे समै॑रयन् । तस्योत जायमानस्योल्ब
आसीद्धिरण्मयः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ अथ० ४ । २ । ८ ॠ० १० ।
१२१ । ७ । यजु० २७ । २५ । ( अग्रे ) पहिले ही पहले ( वत्सम् ) निवास स्थान
संसार को वा बालक रूप संसार को ( जनयन्तीः ) उत्पन्न करते हुए ( आपः ) जल-
धाराओं [ वा तन्मात्राओं ने ] ( गर्भम् ) बालक [ रूप संसार ] को ( समैरयन् ) यथावत्
प्रकट किया, ( उत ) और ( तस्य ) उस ( जायमानस्य ) उत्पन्न होते हुये [ बालक,
संसार ] का ( उल्बः ) जरायु [ गर्भ की झिल्ली ] ( हिरण्ययः ) तेजोमय परमात्मा
( आसीत् ) था, उस ( कस्मै ) सुखदायक प्रजापति परमेश्वर की ( देवाय ) दिव्य गुण
के लिये ( हविषा ) भक्ति के साथ ( विधेम ) हम सेवा किया करें ॥ [ ब्राह्मण के
'गर्भं' के स्थान पर वेद में 'वत्सं' है, दोनों पदों का अर्थ "बालक" है ] ॥
२--जीवा स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम् ॥ १ ॥ उपजीवा स्थोप
जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम् ॥ २ ॥ संजीवा स्थ संजीव्यासं सर्वमायुर्जी-
व्यासम् ॥ ३ ॥ जीवला स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम् ॥ ४ ॥ अथ० का० १६ ।
सू० ६६ । [ हे विद्वानों ! ] तुम ( जीवाः ) जीने वाले ( स्थ ) हो, ( जीव्यासम् )
मैं जीता रहूँ, ( सर्वम् ) सम्पूर्ण ( आयुः ) आयु ( जीव्यासम् ) मैं जीता रहूँ ॥ १ ॥
[ हे विद्वानों ! ] तुम ( उपजीवाः ) आश्रय से जीने वाले ( स्थ ) हो, ( उपजी-
( पा० ८ । २ । ५७ ) तकारस्य नत्वाभावः । राल्लोपः ( पा० ६ । ४ । २१ ) इति
ष्ठस्य लोपः । हलि च ( पा० ८ । २ ७७ ) इति उपधायाः दीर्घः । प्रतिमा (अभ्युक्ष्य)
मार्जनं कृत्वा ( अनुमन्त्रयते ) मन्त्रानुकूलं करोति ॥