सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 112

७४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३६
वृचन ] से आचमन करके और मार्जन करके - इन्द्रजीव-अथर्व० १६ । ७० । १ । इस
मन्त्र से अपने को मन्त्र के अनुकूल बनाता है, यह ब्राह्मण है ॥ ३६ ॥
भावार्थः-व्रतधारी पुरुष आचमनादि क्रिया से स्वस्थचित्त होकर अपने शिर के
सात छिद्रों से सम्बन्ध वाले सात प्राण, सात अपान और सात व्यान वायु को वश में करके
अग्नि, वायु आदि इस सप्तक, पौर्णमासी अष्टका आदि इस सप्तक तथा पृथिवी, अन्तरिक्ष
आदि इस सप्तक, और दूसरी पदार्थ विद्याओं से उपकार लेकर संसार की भलाई करता है ।
अथर्व० १० । २ । ६ में वर्णन है-( कः सप्त खानि वि ततर्द शीर्षणि कर्णाविमौ
नासिके चक्षणी मुखम् । येषां पुरुत्रा विजयस्य मह्मनि चतुष्पादो द्विपदो यन्ति
यामम् ) कर्ता प्रजापति ने [ प्राणी के ] मस्तक में सात गोलक खोदे, यह दोनों कान,
दो नथने, दोनों आंखें और एक मुख । जिनके विजय की महिमा में चौपाये और दोपाये
जीव अनेक प्रकार से सन्मार्ग से चलते हैं ॥ ३६ ॥
विशेषः १--इस कण्डिका का मिलान अथर्ववेद का० १५ सूक्त १५, १६ और
१७ से करो वहाँ मन्त्रों और भाष्य में प्राण, अपान और व्यान तथा अग्नि आदि पदार्थों
का सविस्तार वर्णन है ॥
विशेषः २--प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ।
१--आपो वत्स॑ जनयन्ती॒र्गर्भमग्रे समै॑रयन् । तस्योत जायमानस्योल्ब
आसीद्धिरण्मयः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ अथ० ४ । २ । ८ ॠ० १० ।
१२१ । ७ । यजु० २७ । २५ । ( अग्रे ) पहिले ही पहले ( वत्सम् ) निवास स्थान
संसार को वा बालक रूप संसार को ( जनयन्तीः ) उत्पन्न करते हुए ( आपः ) जल-
धाराओं [ वा तन्मात्राओं ने ] ( गर्भम् ) बालक [ रूप संसार ] को ( समैरयन् ) यथावत्
प्रकट किया, ( उत ) और ( तस्य ) उस ( जायमानस्य ) उत्पन्न होते हुये [ बालक,
संसार ] का ( उल्बः ) जरायु [ गर्भ की झिल्ली ] ( हिरण्ययः ) तेजोमय परमात्मा
( आसीत् ) था, उस ( कस्मै ) सुखदायक प्रजापति परमेश्वर की ( देवाय ) दिव्य गुण
के लिये ( हविषा ) भक्ति के साथ ( विधेम ) हम सेवा किया करें ॥ [ ब्राह्मण के
'गर्भं' के स्थान पर वेद में 'वत्सं' है, दोनों पदों का अर्थ "बालक" है ] ॥
२--जीवा स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम् ॥ १ ॥ उपजीवा स्थोप
जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम् ॥ २ ॥ संजीवा स्थ संजीव्यासं सर्वमायुर्जी-
व्यासम् ॥ ३ ॥ जीवला स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम् ॥ ४ ॥ अथ० का० १६ ।
सू० ६६ । [ हे विद्वानों ! ] तुम ( जीवाः ) जीने वाले ( स्थ ) हो, ( जीव्यासम् )
मैं जीता रहूँ, ( सर्वम् ) सम्पूर्ण ( आयुः ) आयु ( जीव्यासम् ) मैं जीता रहूँ ॥ १ ॥
[ हे विद्वानों ! ] तुम ( उपजीवाः ) आश्रय से जीने वाले ( स्थ ) हो, ( उपजी-
( पा० ८ । २ । ५७ ) तकारस्य नत्वाभावः । राल्लोपः ( पा० ६ । ४ । २१ ) इति
ष्ठस्य लोपः । हलि च ( पा० ८ । २ ७७ ) इति उपधायाः दीर्घः । प्रतिमा (अभ्युक्ष्य)
मार्जनं कृत्वा ( अनुमन्त्रयते ) मन्त्रानुकूलं करोति ॥