चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५१
कुर्याद्विरेच्यः स भवेत्स्नेहैरेवानुलोमिकैः ॥ ३१ ॥
गुल्मो यद्यनिलादीनां कृते सम्यग्भिषग्जिते ।
न प्रशाम्यति रक्तस्य सोऽवसेकात् प्रशाम्यति¹ ॥ ३२ ॥
वातगुल्म रोगी म यदि पित्त बढ़कर सन्ताप को उत्पन्न कर दे, तो
अनुलोमन प्रभाव वाले स्नेहो द्वारा विरेचन करना चाहिये । [ इसके लिये
एरण्ड का तेल देना चाहिये । ] । वात आदि दोषो की चिकित्सा भली प्रकार
करने पर भी यदि गुल्म शान्त न हो तो यह समझ कर कि रक्त दूषित है,
रक्त अथात् रक्तमोक्षण करे उससे वह शान्त हो जाता है ॥ ३१-३२ ॥
स्निग्धोष्णेनोदिते गुल्मे पैत्तिके स्रंसनं हितम् ।
रूक्षोष्णेन तु संभूते सर्पिः प्रशमनं परम् ॥ ३३ ॥
पित्ते वा पित्तगुल्मे वा ज्ञात्वा पक्वाशयस्थितम् ।
कालविन्निर्हरेत्सद्यः सतिक्तैः क्षीरबस्तिभिः ॥ ३४ ॥
पयसा वा सुखोष्णेन सतिक्तेन विरेचयेत् ।
भिषगग्निवलापेक्षी सर्पिषा तैल्वकेन वा ॥ ३५ ॥
स्निग्ध, उष्ण कारणो से उत्पन्न पैत्तिक गुल्म मे स्रंसन ( मृदु विरेचन )
हितकारी है । रूक्ष और उष्ण कारणो से उत्पन्न गुल्म मे घी का पान औषध
उत्तम है । [ स्रंसन के लिये—कमीले के चूर्ण को मधु के साथ, अगूर का रस
और हरड़ का गुड के साथ पीना चाहिये । रूक्ष-उष्ण से उत्पन्न गुल्म के
लिये—तिक्तक घृत, वासा घृत, पञ्चतृण मूल से साधित घृत या दूध देना
चाहिये । ] पित्त गुल्म या पित्त यदि पक्वाशय मे स्थित हो तो समय का जानने
वाला वैद्य तिक्त द्रव्यो से साधित दूध की बस्तियो से इसको शान्त करे
अथवा अग्नि के बल को देखकर तिक्त द्रव्यो से युक्त गरम दूध पिलाकर
अथवा तैल्वक घृत से विरेचन देवे । [ तैल्वक घृत का वर्णन उदर-रोग मे
करेंगे । ] ॥ ३३-३५ ॥
तृष्णाज्वरपरीदाहशूलस्वेदाग्निमार्दवे ।
गुल्मिनामरुचौ चापि रक्तमेवावसेचयेत् ॥ ३६ ॥
छिन्नमूला विदह्यन्ते न गुल्मा यान्ति च क्षयम् ।
रक्तं हि व्यम्लतां याति तच्च नास्ति न चास्ति रुक् ॥ ३७ ॥
हृतदोषं परिम्लानं जाङ्गलैस्तर्पितं रसैः ।
समाश्वस्तं सशेषार्ति सर्पिरभ्यासयेत् पुनः² ॥ ३८ ॥
१ 'रक्तेन संस्रुतेनोपशाम्यति' इति च पाठ. । २ 'सर्पिषा पुनराचरेत्' इति च पाठः ।
३५२ चरकसंहिता [ अ० ५
रक्तपित्तातिवृद्धत्वात् क्रियामनुपलभ्य च ।
यदि गुल्मो विदह्येत शस्त्र तत्र भिषग्जितम् ॥ ३९ ॥
तृष्णा, अरुचि, ज्वर, दाह, स्वेद और अग्निमन्दता होनेपर गुल्म-रोगियो
मे ( विदाह के पूर्वरूप होने पर ही ) रक्तमोक्षण करे । रक्तमोक्षण से जड के
कट जाने पर विदाह नही होता, गुल्म नष्ट हो जाते है । चूंकि रक्त ही विदग्ध
होता हे, जब कारण ( रक्त ) ही नही रहेगा तो रोग भी नही रहेगा । रक्त
मोक्षण के कारण सुरझाये रोगी को जागल पशु-पक्षियो के मास-रस से तर्पण
करे । इसको सान्त्वना दे । शेष रोग की शान्ति के लिये बार-बार घी का सेवन
करावे । रक्त ओर पित्त अति प्रवृत्ति होने से अथवा चिकित्सा के न करने से
यदि गुल्म मे विदाह हो जाय तो शस्त्र-कर्म करे, यही औषध है ॥ ३६-३६ ॥
गुरुः कठिनसंस्थानो गूढमासोत्तराश्रयः ।
अविवर्णः स्थिरः स्निग्धो ह्यपक्को गुल्म उच्यते ॥ ४० ॥
अपक्व गुल्म के लक्षण—गुरु, कठोर आकृति वाला, गम्भीर, मास मे
छिपा, त्वचा के समान वर्ण का स्थिर, स्निग्ध ( चिकना ) होता है ॥ ४० ॥
दाहशूलार्ति १संक्षोभस्वप्ननाशारतिज्वरैः ।
विदह्यमान जानीयाद् गुल्म तमुपनाहयेत् २ ॥ ४१ ॥
विदह्यमान गुल्म के लक्षण—दाह, शूल, पीड़ा, सक्षोभ ( कीड़ियो के
चलने का सा अनुभव ), नीद का न आना, बेचैनी, ज्वर का होना, ये गुल्म
के पकते समय के लक्षण है । इस अवस्था मे उपनाह पुल्टिस आदि बाधनी
चाहिये ॥ ४१ ॥
विदाहलक्षणे गुल्मे बहिस्त्वङ्गे समुन्नते ।
श्यावे सरक्तपर्यन्ते सस्पर्शे बस्तिसन्निभे ॥ ४२ ॥
निपीड़ितोन्नते स्तब्धे सुप्ते तत्पार्श्वपीड़नात् ।
तत्रैव पिण्डिते शूने संपक गुल्ममादिशेत् ॥ ४३ ॥
तत्र धान्वन्तरीयाणामधिकारः क्रियाविधौ ।
वैद्याना कृतयोगानां व्यधशोधनरोपणे ॥ ४४ ॥
पक्व गुल्म के लक्षण—गुल्म मे पक्वव्रण के लक्षण, दर्द का न होना,
झुर्रियो का आ जाना, खाज आदि, गुल्म मास को छोड़कर त्वचा मे पृष्ठवर्ती
हो जाये, उभरा हो, बीच मे से श्यामवर्ण, किनारो से लाल, स्पर्श मे बस्ति के
समान ( एक ओर से दबाने पर तरंग दूसरी ओर अनुभव होती हो ), दबाने
से दब जाये, परन्तु दबाव हटाने पर फिर उठ जाये, सुप्त ( बढे नही ), पार्श्व
१ 'शूलानि' इति च पाठः । २ 'समुपना-' इति च पाठः ।
करे । यही इसकी चिकित्सा है ॥ ४२-४४ ॥
अ० ५ ] २३ चिकित्सितस्थानम् ३५३
के दबाने पर भी स्तब्ध रहे, गुल्मस्थान मे ही सम्पूर्ण शूल एकत्र हो जाये तब
गुल्म को पका समझना चाहिये । गुल्म के पक जाने पर जिन वैद्यो ने व्यधन,
शोधन और रोपण काया मे अभ्यास किया हो, वे ही धन्वन्तरिय वैद्य शस्त्र-कर्म
करे । यही इसकी चिकित्सा है ॥ ४२-४४ ॥
अन्तर्भागस्य चाप्येतत्पच्यमानस्य लक्षणम् ।
हृत्क्रोडशूनताऽन्तःस्थे बहिःस्थे पार्श्वनिर्गतिः ॥ ४५ ॥
पक्वः स्रोतांसि संक्लेद्य व्रजत्यूर्ध्वमधोऽपि वा ।
स्वयं प्रवृत्तं त दोषमुपेक्षेत हिताशनैः ॥ ४६ ॥
दशाहं द्वादशाहं वा रक्षन्भिषगुपद्रवान् ।
गुल्म क दो मार्ग हैं । यदि गुल्म पक कर अन्दर को मुख करता है तो
'अन्तःस्थ' और बाहर की ओर मुख करता है, तो 'बहिःस्थ' होता है अन्त.स्थ
भाग वाले गुल्म के पकने पर भी उपरोक्त लक्षण होते हैं, साथ ही हृदय और
क्रोड़ ( कुक्षि और उदर ) मे शूनता ( सूजन ) आती है । बहिःस्थिति मे सूजन
पार्श्वो की ओर आ जाती है । गुल्म पक कर स्रोतों का क्लिन्न बना कर ऊपर
वमन द्वारा अथवा नीचे की ओर मल के साथ प्रवृत्त होता है । अपने आप
प्रवृत्त हुए दोष की पथ्याहार द्वारा दस या बारह दिनो तक उपद्रवो से रक्षा
करते हुए उपेक्षा करनी चाहिये, दोषो को बहने देना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥
अत ऊर्ध्वं हितं पानं सर्पिषः सविशोधनम् ॥ ४७ ॥
शुद्धस्य १ तिक्तं सक्षौद्रं प्रयोगे सर्पिरिष्यते ।
अन्तर्विद्रधिवच्चास्य कार्यं शोधनरोपणे २ ॥ ४८ ॥
इसके पश्चात् विशोधनयुक्त द्रव्यो से साधित घृत का पान करावे । पूय
आदि का शोधन हो जाने पर तिक्त द्रव्यो से साधित घृत को मधु के साथ देवे
पीछे से अन्तर्विद्रधि के समान शोधन और रोपण कार्य करे ॥ ४७-४८ ॥
शीतलैर्गुरुभिः स्निग्धैर्गुल्मे जाते कफात्मके ।
अवम्यस्याल्पकायाग्नेः कुर्याल्लङ्घनमादितः ॥ ४६ ॥
मन्दोऽग्निर्वेदना मन्दा गुरुस्तिमितकोष्ठता ।
सात्क्लेशा चारुचिर्यस्य स गुल्मी वमनोपगः ॥ ५० ॥
उष्णैरेवोपचर्यश्च कृते वमनलङ्घने ।
योज्याश्चाहारसंसर्गा भेषजैः कटुतिक्तकैः ॥ ५१ ॥
सानाहं सबिबन्धं च गुल्मं कठिनमुन्नतम् ।
१ ' शुद्ध सतिक्त' इति च पाठः । २ इद श्लोकार्धं क्वचिन्नास्ति ।
३५४ चरकसंहिता [ अ० ५
दृष्ट्वाऽऽदौ स्वेदयेद्युक्त्या स्विन्नं च विलये१ द्भिषक् ॥ ५२ ॥
कफजन्य गुल्म यदि शीतल, गुरु, स्निग्ध आहारों के कारण उत्पन्न हुआ हो
और रोगी वमन के अयोग्य तथा मन्दाग्निवाला हो तो प्रथम लङ्घन करावे ।
वमन योग्य—जिसकी अग्नि मन्द हो, वेदना भी कम हो, कोष्ठ भारी
और जकडा हो, वमन की अभिरुचि (प्रवृत्ति) होती हो अरुचि रहती हो तो
गुल्म रोगी को वमन के योग्य समझे । वमन और लङ्घन हो चुकने पर रोगी की
उष्ण परिचर्य्या करे । कटु और तिक्त ओषधियो से सिद्ध आहार करावे । यदि
गुल्म मे आनाह, मल, वायु का विबन्ध हो और गुल्म कठिन तथा ऊपर को
उठा हुआ हो तो प्रथम स्वेदन दे शून्य होनेपर अगुली आदि से दबा कर या
मर्दन कर इसको विलीन करे ॥ ४६-५२ ॥
लङ्घनोल्लेखने स्वेदे कृतेऽग्नौ संप्रधुक्षिते ।
कफगुल्मे पिबेत्काले सक्षारकटुकं घृतम् ॥ ५३ ॥
स्थानादपसृतं ज्ञात्वा कफगुल्मं विरेचनैः ।
सस्नेहैर्बस्तिभिर्वाऽपि शोधयेद्दशमूलकैः ॥ ५४ ॥
वृद्धेऽग्नावानिलेऽमूढे२ ज्ञात्वा सस्नेहमाशयम् ।
गुटिकाश्चूर्णनिर्यूहाः प्रयोज्याः कफगुल्मिनाम् ॥ ५५ ॥
कफ गुल्म मे—लङ्घन से, वमन से, स्वेदन से अग्नि को प्रदीप्त करने पर
भोजन-काल मे क्षार और कटु-द्रव्य से युक्त घृत पिलावे । यदि कफ-गुल्म
अपने स्थान से चलायमान हो जाये तो विरेचन द्वारा अथवा स्नेह युक्त दश-
मूल की बस्तियो से सशोधन कर । अग्नि के प्रवृद्ध होने पर, वायु के अनुलोम
होने पर, आमाशय (कोष्ठ) को स्निग्ध हुआ समझ कर, कफ-गुल्म रोगी को
गुटिका, चूर्ण और क्वाथो का सेवन करावे ॥ ५३-५५ ॥
कृतमूलं महावास्तुं कठिनं स्तिमितं गुरुम् ।
जयेत्कफकृतं गुल्मं क्षारारिष्टाग्निकर्मभिः ॥ ५६ ॥
दोषः प्रकृतिगुल्मं तु योगं बुद्ध्वा कफोल्बणे ।
बलदोषप्रमाणज्ञः क्षार गुल्मे प्रयोजयेत् ॥ ५७ ॥
एकान्तरं द्वयन्तरं वा त्र्यहं विश्रम्य वा पुनः ।
शरीरबलदोषाणां वृद्धिक्षपणकोविदः ॥ ५८ ॥
श्लेष्माणं मधुरं स्निग्धं मासक्षीरघृताशिनः ।
भित्त्वा भित्त्वाऽऽशयात्क्षारः३ क्षरत्वात्क्षारयत्यधः ॥ ५९ ॥
१ 'विनयेद्' इति । २ 'मन्दाग्नावानिले मूढे' इति च ।
३. 'ऽऽशयान् क्षार' इति च पाठः ।
अ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३५५
अ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३५५
कफजन्य गुल्म यदि जड़ बनाले, बहुत अधिक फैला हो, कठिन हो, जड़
हो और गुरु हो तो क्षार, अरिष्ट-पान और अग्नि-कर्म द्वारा शान्त करे । कफजन्य
गुल्म मे दोष ( कफ दोष ), प्रकृति ( रोगी की कफ प्रकृति ), गुल्म ( स्थिर,
महावास्तु आदि लक्षणो से युक्त ), ऋतु ( वसन्त या हेमन्त ) के अनुसार
रोगी के बल, दोष के प्रमाण को समझने वाला वैद्य क्षार का प्रयोग करे ।
शरीर के बल, दोषो की वृद्धि तथा क्षय को समझने वाला वैद्य एक दिन, दो
दिन या तीन दिन की बाधा देकर पुन. दूसरी बार क्षार का प्रयोग करे ।
मास, दूध, घी को खानेवाले पुरुष के मधुर और स्निग्ध कफ को कोष्ठ से तोड़-
तोड़ कर क्षार नीचे की ओर क्षरित करते है । क्योकि क्षार की प्रकृति ही क्षरण
करने की है ॥ ५६-५६ ॥
मन्देऽग्नावरुचौ सात्म्ये मद्ये सस्नेहमश्नताम् ।
प्रयोज्या मार्गशुद्ध्यर्थमरिष्टाः कफगुल्मिनाम् ॥ ६० ॥
लङ्घनोल्लेखनैः स्वेदैः सर्पिष्पानैर्विरेचनैः ।
बस्तिभिर्गुटिकाचूर्णक्षारारिष्टगणैरपि ॥ ६१ ॥
श्लैष्मिकः कृतमूलत्वायस्य गुल्मो न शाम्यति ।
तस्य दाहो हृते रक्ते शरलोहादिभिर्हितः ॥ ६२ ॥
औष्ण्यात्तैक्ष्ण्याच्च शमयेदग्निगुल्मे कफानिलौ ।
तयोः शमाच्च सघातो गुल्मस्य विनिवर्तते ॥ ६३ ॥
दाहे धान्वन्तरीयाणामत्रापि भिषजां बलम् ।
क्षारप्रयोगे भिषजा क्षारतन्त्रविदा बलम् ॥ ६४ ॥
व्यामिश्रदोषैर्व्यामित्र एष एव क्रियाक्रमः ।
अरिष्ट प्रयोग के काल—जो रोगी स्निग्ध आहार करते हों, अग्नि मन्द हो,
अरुचि हो और उनको मद्य का सात्म्य हो तो मार्ग की शुद्धि के लिये अरिष्टो
का प्रयोग करे । लङ्घन से, वमन से, स्वेदन से, घृतपान से, विरेचन से,
बस्तियो से, गुटिका, चूर्ण, क्षार और अरिष्ट के प्रयोगो से भी कफजन्य गुल्म,
जड़ पकड़ लेने के कारण शान्त नही होता, उस गुल्म को रक्त-मोक्षण करने
पर शरलोह ( बाण का लोह ) आदि से दाह करे । गुल्म मे अग्नि उष्ण होने
से, तीक्ष्ण गुण होने से कफ और वायु दोनो को शान्त कर देती है । इन
दोनो के शान्त होने पर गुल्म का सघात ( एकत्र होना ) भी टूट जाता है ।
इस दाह-कर्म के प्रयोग मे भी धान्वन्तरीय शस्त्र-चिकित्सको का ही अधिकार
है, क्षार-प्रयोग मे क्षार-तन्त्र को जानने वालो से कर्म करावे । मिश्रित दोषो मे
दोषों की मिश्रित चिकित्सा करे ॥ ६०-६४ ॥
३५६ चरकसंहिता [ अ० ५
सिद्धानतः प्रवक्ष्यामि योगान् गुल्मनिबर्हणान् ॥ ६५ ॥
त्र्यूषणत्रिफलाधान्यबिडङ्गचव्यचित्रकैः ।
कल्कीकृतैर्घृतं सिद्धं सक्षीरं वातगुल्मनुत् ॥ ६६ ॥
इति त्र्यूषणादिघृतम् ।
इसके आगे गुल्मनाशक सिद्ध प्रयोगो का वर्णन करते है।
( १ ) त्र्यूषणादि घृत—सोंठ, कालीमिर्च, पिप्पली, हरड, बहेड़ा, आंवला,
धनिया, वायविडंग, चविका, चीतामूल इनके कल्क से और दूध द्वारा साधित
घृत वात-गुल्म को नष्ट करता है । [ मात्रा आधा तोला ] ॥ ६५-६६ ॥
एत एव च कल्काः स्युः कषायः पाञ्चमूलिकः ।
द्विपञ्चमूलिको वाऽपि तद् घृत गुल्मनुत्परम् ॥ ६७ ॥
इति त्र्यूषणादिघृतमपरम् ।
( २ ) त्र्यूषणादि घृत—काली मरिच आदि वस्तुओ के कल्क के साथ
बृहत्पञ्चमूल क्वाथ मे घृत सिद्ध करे । अथवा पञ्चमूल के स्थान पर दशमूल का
क्वाथ लेकर इन्ही कल्को से ( त्र्यूषणादि ) घृत सिद्ध करे । [ घृत २ प्रस्थ,
क्वाथ ८ प्रस्थ, कल्क १ शराव हो ] यह घृत गुल्मनाशक है ॥ ६७ ॥
षट्पलं वा पिबेत्सर्पिर्यदुक्तं राजयक्ष्मणि ।
प्रसन्नया वा क्षीरोत्थ सुरया दाडिमेन वा ॥ ६८ ॥
दध्नः सरेण वा कार्य घृत मारुतगुल्मनुत् १।
इति गुल्मषट्पलघृतम् ॥
( ३ ) गुल्मषट्पल घृत—राजयक्ष्मा मे कहे ‘षट्-पल’ घृत का पान करावे ।
दूध से निकले घी को प्रसन्ना ( सुरा के ऊपर के स्वच्छ भाग ) के साथ, सुरा
से, अनार के रस से, दही की मलाई के साथ ले । यह घृत वात-गुल्म को नष्ट
करता है । [ प्रसन्ना आदि को दूध के साथ मिला कर मथने से घृत को पृथक्
करके बरते यह श्री गगाधरसेन का मत है । ] ॥६८॥
हिङ्गुसौवर्चलाजाजीबिडदाडिमदीप्यकैः ॥ ६६ ॥
पुष्करव्योषधान्याम्ल २वेतसक्षारचित्रकैः ।
शटीवचाजगन्धैलासुरसैश्च विपाचितम् ॥ ७० ॥
शूलानाहहरं सर्पिर्दध्ना चानिलगुल्मिनाम् ।
इति हिङ्गुसौवर्चलाद्यं घृतम् ।
( ४ ) हिङ्गुसौवर्चलादि घृत—हींग, सौचर नमक, अजाजी ( जीरा ),
विडनमक ( काला नमक ), अनारदाना, अजवायन, पोहकरमूल, त्रिकटु,
१ 'मारुतगुल्मिनाम्' इति वा पाठः । २ 'धान्याक' इति च पाठः ।
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५७
धनिया, अम्लवेतस, यवक्षार, चीता, कचूर, वचा, अजगन्धा, छोटी इलायची,
तुलसी, इनका कल्क मिलित १ शराव, दही ८ प्रस्थ और घृत २ प्रस्थ लेकर
यथाविधि पाक करना चाहिये । यह घृत वात-गुल्म रोगियो के शूल और आनाह
को नष्ट करता है ॥ ६६-७० ॥
हबुषाव्योषपृथ्वीकाचव्यचित्रकसन्धवैः ॥ ७१ ॥
साजाजीपिप्पलीमूलदीप्यकैर्विपचेद् घृतम् ।
मातुलुङ्गदधिक्षीरकोलमूलकदाडिमैः ॥ ७२ ॥
रसैस्तद्वातगुल्मघ्न शूलानाहविमोक्षणम् ।
योन्यर्शोग्रहणीदोषश्वासकासारुचिज्वरान् ॥ ७३ ॥
बस्ति-हृत्पार्श्वशूल च घृतमेतद् व्यपोहति ।
इति हबुषाद्य घृतम् ॥
( ५ ) हबुषाद्य घृत—हबुषा ( हाऊबेर ), त्रिकटु ( सोंठ, काली
मिर्च, पिप्पली ), पृथ्वीका ( हिंगुपत्री या मोटा जीरा ), चविका, चीता,
सैन्धव नमक, अजाजी ( जीरा ), पिप्पली मूल, अजवायन मिलित इनका
कल्क १ शराव, बिजोरे का रस, दधि, दूध, बेर का क्वाथ, मूली का क्वाथ
और अनार का रस प्रत्येक २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ इन से घृत सिद्ध करना
चाहिये । यह घृत वात-गुल्म को नष्ट करता है, शूल, आनाह को मिटाता है ।
योनिरोग, अर्श, ग्रहणी, श्वास, कास, अरुचि, ज्वर, बस्तिशूल, हृदयशूल,
पार्श्वशूल को यह घृत नष्ट करता है ॥ ७१-७३-॥
पिप्पल्याः१ पिचुरध्यक्षो दाडिमाद् द्विपलं पलम् ॥ ७४ ॥
धान्यात्पञ्च२ घृताच्छुण्ठ्याः कर्षः क्षीरं चतुर्गुणम् ।
सिद्धमेतैर्धृतं सद्यो वातगुल्म चिकित्सति ॥ ७५ ॥
योनिशूलं शिरःशूलमर्शसि विषमज्वरम् ।
इति पिप्पल्याद्यं घृतम् ।
घृतानामौषधगणा य एते परिकीर्तिताः ॥ ७४ ॥
ते चूर्णयोगा वर्त्त्यस्ताः कषायास्ते च गुल्मिनाम् ।
( ६ ) पिप्पल्याद्य घृत—घी ५ पल, गाय का दूध २० पल, पिप्पली
१॥ पिच्चु, अनारदाना २ पल, धनिया १ पल, सोंठ १ कर्ष इनसे सिद्ध घृत
वात-गुल्म, योनिशूल, शिरोवेदना, अर्श और विषम ज्वर को नष्ट करता है ।
[ चक्रदत्त मे इस घृत का नाम 'पञ्चपल घृत' दिया है । अष्टागसग्रह मे—
१ 'पिप्पल्यः पिचु' इति च । २ गगाधर सेन ने 'प्रस्थ घृतात्' पाठ माना है ।
३५८ चरकसंहिता [ अ० ५
शुण्ठी १ पल, पिप्पली १॥ पल, धान्य १ कुडव, दाडिम २ कुडव, घृत २०
पल और दूध एक साथ पकावे ] । घृतसाधन के लिये जिन आषधियो के गुण
कहे है, उनका चूर्ण, वर्त्ति और कषाय के रूप मे भी गुल्म रोगियो पर
प्रयोग करे ॥ ७४-७६ ॥
कोलदाडिमघर्माम्बुसुरामण्डाम्लकाञ्जिकैः ॥ ७७ ॥
शूलानाहनुदः पेया बीजपूररसेन वा ।
चूर्णानि मातुलुङ्गस्य भावितानि रसेन वा ॥ ७८ ॥
कुर्याद्वर्तीः सगुडिका गुल्मानाहातिशान्तये ।
इन औषधि गणो के चूर्णो को बेर का रस, अनार का रस, गरम पानी,
सुरा, मण्ड, खट्टी काजी या बिजौरे के रस के साथ पीवे । इससे शूल और
आनाह नष्ट होते है । उपरोक्त चूर्णो को बिजौरे के रस से भावना देकर वर्त्तिया
और गुटिकाये बनावे । ये वर्त्तिया गुल्म और आनाह (अफारा) को
नष्ट करती है ॥ ७७-७८ ॥
हिंगु त्रिकटुकं पाठा हबुषामभया शटीम् ॥ ७९ ॥
अजमोदाजगन्धे च तिन्तिडीकाम्लवेतसौ ।
दाडिमं पुष्करं धान्यमजाजी चित्रकं वचाम् ॥ ८० ॥
द्वौ क्षारौ लवणे द्वे च चव्यं चैकत्र चूर्णयेत् ।
चूर्णमेतत्प्रयोक्तव्यमनुपानेष्वनत्ययम् ॥ ८१ ॥
प्राग्भक्तमथवा पेयं मद्येनोष्णोदकेन वा ।
पार्श्वहृद्-बस्तिशूलेषु गुल्मे वातकफात्मके ॥ ८२ ॥
आनाहे मूत्रकृच्छ्रे च शूले च गुदयोनिजे ।
ग्रहण्यर्शोविकारेषु प्लीहि पाण्ड्वामयेऽरुचौ ॥ ८३ ॥
उरोविबन्धे कासे च हिक्काश्वासे गलग्रहे ।
(७) हिग्वादि चूर्ण—हीग, त्रिकटु, पाठा, हाऊबेर, हरड़, कचूर,
अजवायन, अजगन्धा ( अजवायन का भेद ), तिन्तिडीक ( इमली ), अम्ल-
वेतस, अनारदाना, पोहकरमूल, धनिया, श्वेत जीरा, चीता, वच, यवक्षार,
सर्जिक्षार, सेन्धा नमक, सचलनमक और चविका इनको समान भाग मे लेकर
चूर्ण करना चाहिये । [ मात्रा १ मासे से ३ मासे तक । ] इस चूर्ण को
भोजन से पूर्व [ यदि पेट मे अम्ल अधिक हो तो ] मद्य या गरम पानी से
पीवे । भोजन के तत्काल पीछे [ यदि क्षार अधिक हो तो ] उष्ण जल
या तक्र से ले । यह चूर्ण पार्श्वशूल, बस्तिशूल, कफजन्य और वातजन्य
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५६
गुल्म, आनाह, मूत्रकृच्छ्र, गुदाशूल, योनिशूल, ग्रहणी, अर्शारोग, प्लीहा,
पाण्डु रोग, अरुचि, छाती मे रुकावट ( कफावरोध- ), कास, हिचकी,
श्वास और गलग्रह मे उपयोगी है। [ चिकित्सा-कलिका मे पिप्पली मूल
और विड नमक का भी मिश्रेन किया है। अन्त. प्रयोगो मे अजमोदा से
यमानिका ( अजवायन ) लेनी चाहिये । बाह्य प्रयोग मे अजमोदा से अजमोद
लेनी चाहिये । ] ॥ ७६-८३ ॥
भावित मातुलुङ्गस्य चूर्णमेतद्रसेन वा ॥ ८४ ॥
बहुशो गुड़िकाः कार्याः कार्मुकाः स्युस्ततोऽधिकम् ।
इति हिग्वादिचूर्णं गुटिका च ।
मातुलुङ्गरसो हिगु दाडिमं विडसैन्धवे ॥ ८५ ॥
सुरामण्डेन पातव्य वातगुल्मरुजापहम् ।
( ८ ) हिग्वादि गुटिका—इस हिग्वादि चूर्ण का बिजौरे के रस से [ सात
बार या जब तक चूर्ण खट्टा न हो जाय तब तक ] भावना देकर गोलिया
बनावे । य गोलिया चूर्ण से आवक काम करती है । ( ९ ) वात-गुल्म की
पीड़ा को शान्त करने के लिये बिजोर का रस, हींग, अनारदाना और बिड
नमक इनको सुरा मण्ड के साथ पीवे ॥ ८४-८५ ॥
शटीपुष्करहिग्वम्लवेतसक्षारचित्रकान् ॥ ८६ ॥
धान्याकं च यवानीं च विडङ्गं सैन्धवं वचाम् ।
सचव्यपिप्पलीमूलमजगन्धा सदाडिमाम् ॥ ८७ ॥
अजाजीं चाजमोदां च चूर्ण कृत्वा प्रयोजयेत् ।
रसेन मातुलुङ्गस्य मधुयुक्तेन वा पुनः ॥ ८८ ॥
भावत गुाडका कृत्वा सुपिष्टा कोलसंमिताम् ।
गुल्मं प्लीहानमानाहं श्वासं कासमरोचकम् ॥ ८६ ॥
हिक्कां हृद्रोगमर्शांसि विविधा शिरसो रुजाम् ।
पाण्ड्वामयं कफोल्क्लेशं सर्वजां च प्रवाहिकाम् ॥ ९० ॥
पार्श्वहृद्बस्तिशूलं च गुटिकैषा व्यपोहति ।
( १० ) शट्यादि वटी—कचूर, पुष्करमूल, हींग, अम्लवेतस, चीता,
यवाखार, धनिया, अजवायन, वायविडंग, सेन्धा नमक, वच, चविका, पिप्पली-
मूल, अजगन्धा, अनारदाना, जीरा, अजमोदा [ वन-यमानी ], इनके चूर्ण
को बिजौरे के रस की अथवा मधु-शुक्त की भावना देकर बेर के समान आकार
की गोलिया बना लेनी चाहियें। यह गुल्म, प्लीहा, आनाह, श्वास, कास,
३६० चरकसंहिता [ अ० ५
अरुचि, हिचकी, हृदय-रोग, अर्श नाना प्रकार की शिरोवेदना, पाण्डु-रोग, कफ
का उत्क्लेश [ जी मचलाना ], त्रिदोषजन्य प्रवाहिका, पार्श्व-शूल, हृदयशूल,
बस्तिशूल को नष्ट करता है। [ मधु-शुक्त बनाने के लिये मधु के बर्त्तन मे
जम्बीर (नीम्बू) का रस और पिप्पली-मूल की कल्क डाल कर सन्धान कर
देना चाहिये । ] ॥ ८६-६०- ॥
नागरार्धपलं पिष्ट्वा द्वे पले लुञ्चितस्य च ॥ ६१ ॥
तिलस्यैकं गुडपलं क्षीरेणोष्णेन वा पिबेत् ।
वातगुल्ममुदावर्त्तं योनिशूलं च नाशयेत् ॥ ६२ ॥
पिबेदेरण्डतैलं१ वा वारुणीमण्डमिश्रितम् ।
तदेव तैलं पयसा वातगुल्मी पिबेन्नरः ॥ ६३ ॥
श्लेष्मण्यनुबले पूर्वं हितं पित्तानुगे परम् ।
( ११ ) नागरादि योग—सोठ आधा पल ( ३ कर्ष ), साफ किये तिल २
पल, गुड़ एक पल इनको कूट कर मात्रा मे गरम दूध से पीना चाहिये । यह
वात-गुल्म, उदावर्त्त और योनिरोग को नष्ट करता है। अथवा एरण्ड तैल को
वारुणी-मण्ड मे मिलाकर पीवे । इससे वातगुल्म का आराम होता है। जब
कफ का अनुबन्ध हो तो पूर्वयोग और पित्त का अनुबन्ध हो तो पिछला योग
बरते ॥ ६१-६३ ॥
साधयेत् शुद्धशुष्कस्य२ लशुनस्य चतुष्पलम् ॥ ६४ ॥
क्षीरे जलाष्टगुणिते क्षीरशेषं च ना पिबेत् ।
वातगुल्ममुदावर्त्त गृध्रसी विषमज्वरम् ॥ ६५ ॥
हृद्रोग विद्रधिं शोथ सावयत्याशु तत्पयः ।
इति लशुनक्षीरम् ।
( १२ ) लशुन-क्षीर—सूखे और छिलके उतार कर साफकिये लशुन की
गिरिया ४ पल लेकर इनको जल मिश्रित आठ गुने दूध ( ३२ पल ) मे सिद्ध
करे, केवल दूध रह जाने पर इसको पीवे । इससे वातगुल्म, उदावर्त्त गृध्रसी,
विषम ज्वर, हृदय रोग, विद्रधि और शोथ शीघ्र शान्त होते है। [ यद्यपि दूध
और लशुन विरोधी है, परन्तु तो भी रोग की महत्ता के कारण तथा आर्ष शास्त्र
के प्रयोगवश उपयोग करना चाहिये । ] ॥ ६४-६५ ॥
तैलं प्रसन्ना गोमूत्रमारनालं यवाग्रजम् ॥ ६६ ॥
१, 'पिबेदैरण्डक तैल' इति वा । २, 'सिद्धशुष्कस्य' इति च पाठः ॥
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६१
गुल्मं जठरमानाहं पीतमेकत्र साधयेत् ।
इति तैलपञ्चकम् ।
( १३ ) तैल-पञ्चक—एरण्ड तैल, प्रसन्ना, गोमूत्र, काजी और यवक्षार
इनको उचित मात्रा में पीने से गुल्म, जठर और आनाह रोग नष्ट होते हैं ।
पञ्चमूलीकषायेण सक्षीरेण शिलाजतु ॥ ९७ ॥
पिबेत्तस्य प्रयोगेण वातगुल्मात्प्रमुच्यते ।
इति शिलाजतुप्रयोगः ।
( १४ ) शिलाजतु-प्रयोग—पञ्चमूल क्वाथ में दूध मिलाकर इसके साथ
शिलाजतुका प्रयोग करने से वातगुल्म नष्ट होता है। [ यहा पर बृहत्पञ्चमूल
लेना चाहिये । ] ॥ ९७ ॥
वाट्यं यूषेण पिप्पल्या मूलकानां रसेन वा ॥ ९८ ॥
भुक्त्वा स्निग्धमुदावर्ताद्वातगुल्माद्विमुच्यते ।
शूलानाहविबन्धार्त्तं स्वेदयेद्वातगुल्मिनम् ॥ ९९ ॥
स्वेदैः स्वेदविधावुक्तैर्नाडीप्रस्तरसङ्करैः ।
( १५ ) स्नेहयुक्त जौ के अन्न को मूंग आदि के यूष के साथ, अथवा
पिप्पली प्रधान यूष के साथ, अथवा मूली के रस के साथ खाने से उदावर्त्त
और वातगुल्म रोग शान्त होते हैं ।
( १६ ) वातगुल्म में यदि शूल, आनाह और विबन्ध हो तो स्वेदाध्यायमे
कहे नाड़ी-स्वेद, प्रस्तर-स्वेद और संकर स्वेद देने चाहिये ॥ ९८-९९ ॥
बस्तिकर्म परं विद्याद् गुल्मघ्नं तद्धि मारुतम् ॥ १०० ॥
स्वे स्थाने प्रथमं जित्वा सद्यो गुल्ममपोहति ।
तस्मादभीक्ष्णशो गुल्मी निरूहैः सानुवासनैः ॥ १०१ ॥
प्रयुज्यमानैः शाम्यन्ति वातपित्तकफात्मकाः ।
गुल्मघ्ना विविधा दृष्टाः सिद्धाः सिद्धिषु वस्तयः ॥ १०२ ॥
इति बस्तिक्रिया ।
गुल्म को नष्ट करने के लिये बस्तिकर्म अतिशय उत्कृष्ट है । चूंकि यह कर्म
पक्वाशय में वायु का शमन करके गुल्म को नष्ट करता है । इसलिये बारबार
निरूह और अनुवासन बस्तियों के प्रयोग से वात-पित्त-कफजन्य गुल्म शान्त हो
जाते हैं । सिद्धिस्थान में फलप्रद गुल्मनाशक बस्तियों का उपदेश
किया है ॥ १००-१०२ ॥
गुल्मघ्नानि च तैलानि वक्ष्यन्ते वातरोगिके ।
तानि मारुतगुल्मेषु पानाभ्यङ्गाऽनुवासनैः ॥ १०३ ॥
३६२ चरकसंहिता [ अ० ५
प्रयुक्तान्याशु सिध्यन्ति तैल ह्यनिलजित् परम् ।
वात-व्याधि चिकित्सा मे गुल्मनाशक तैलो को कहेगे । यह तैल वातगुल्मों
मे पान अभ्यग और अनुवासन के रूप मे प्रयोग करने से फलदायक होते है ।
क्योंकि वात के शमन के लिये तैल श्रेष्ठ औषध है ॥ १०३-॥
नीलिनीचूर्णसंयुक्तं पूर्वोक्तं घृतमेव च ॥ १०४ ॥
समलाय प्रदेयं स्याच्छोधनं वातगुल्मिने ।
नीलिनीत्रिवृतादन्तीपथ्याकम्पिल्लकैः सह ॥ १०५ ॥
शोधनार्थं घृतं देयं सबिडक्षारनागरम् ।
नीलिनी त्रिफला रास्त्रा बला कटुकरोहिणीम् ॥ १०६ ॥
पचेद्विडङ्गं व्याघ्रीं च पलिकानि जलाढके ।
तेन पादावशेषेण घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ १०७॥
दघ्नः प्रस्थेन संयोज्य सुधाक्षीरपलेन च ।
ततो घृतपलं दद्याद् यवागूमण्डसंश्रितम् ॥ १०८ ॥
जीर्णे सम्यग्विरिक्तं च भोजयेद् रसभोजनम् ।
गुल्मकुष्ठोदरव्यङ्गशोफपाण्ड्वामयज्वरान् ॥ १०९ ॥
श्वित्रं प्लीहानमुन्मादं घृतमेतद् व्यपोहति ।
इति नीलिन्याद्यं घृतम् ।
(१७) वातगुल्म रोगी के पेट मे मल हो तो शोधन के लिये पूर्व कथित
त्र्यूषणादि-घृत मे नीलिनी का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । (१८) नीलि-
न्याद्य घृत—नीलिनीमूल, निशोथ, दन्तीमूल, हरड, कमीला इनसे साधित घी मे
[ घृत की अपेक्षा चौगुना पानी मिला कर ] बिड नमक, यवक्षार और सोठ
मिला कर विरेचन के लिये देना चाहिये । अथवा त्र्यूषणादि घृत मे इनका चूर्ण
मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । (१६) नीलिन्याद्य घृत (२)—गाय का घी
१ प्रस्थ, नीलिनी मूल, त्रिफला, रास्ना, खरैटी, कुटकी, वायविडंग, कटेरी
इनको एक एक पल लेकर १ आढक पानी मे पकाना चाहिये । चतुर्थांश शेष
रहने पर घी और दही १ प्रस्थ, सेहुण्ड का दूध १ पल मिला कर घी पकाना
चाहिये । इस घी की एक पल मात्रा (आज कल १ तोला) को यवागू के मण्ड
मे मिला कर देवे । इसके जीर्ण हो जाने पर और रोगी को विरेचन हो जाने
पर मास रस का भोजन देवे । इस घी से गुल्म, कुष्ठ, उदर-रोग, व्यङ्ग, शोफ,
पाण्डु रोग, ज्वर, श्वित्र, प्लीहा और उन्माद रोग नष्ट होते हैं ॥१०४-१०६॥
कुक्कुटाश्च मयूराश्च तित्तिरिक्रौञ्चवर्तकाः ॥ ११० ॥
शालयो मदिरा सर्पिर्वातगुल्मभिषग्जितम् ।
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६३
हितमुष्णं द्रवं स्निग्धं भोजनं वातगुल्मिनाम् ॥ १११ ॥
समण्डवारुणीपानं पक्वं वा धान्यकैर्जलम् ।
मन्देऽग्नौ वर्धते गुल्मो दीप्ते चाग्नौ प्रशाम्यति ॥ ११२ ॥
तस्मान्ना नातिसौहित्यं कुर्यान्नातिविलङ्घनम् १ ।
सर्वत्र गुल्मे प्रथमं स्नेहस्वेदोपपादिते ॥ ११३ ॥
या क्रिया क्रियते सिद्धिं सा याति न विरूक्षिते ।
वातगुल्म में पथ्य—मुर्गा, मोर, तीतर, कौंच, वत्तक, ( बटेर ), शालि
चावल, मदिरा, घी ये सब वस्तुयें वातगुल्म में औषध है। वातगुल्म के रोगी
के लिये उष्ण द्रव और स्निग्ध भोजन हितकारी है। अथवा मण्डयुक्त वारुणी
का पीना या धनेने से ( षडङ्गपानीय विधि से ) पकाये जल का उपयोग
उत्तम है। अग्नि के मन्द होने पर गुल्म बढ़ता है, अग्नि के बढ़ जाने पर
गुल्म शान्त हो जाता है। इसलिये पुरुष को चाहिये कि न तो बहुत तृप्त होकर
( पेट भरकर ) भोजन करे और न लङ्घन ही करे। मात्रा में थोडा खावे ।
सब गुल्म में प्रथम स्नेहन और स्वेदन करने पर फिर जो भी क्रिया की जाती
है, वह अवश्य सफल होती है। रूक्ष ( वात-प्रकोप की ) अवस्था में की हुई
क्रिया फलवती नहीं होती ॥११०-११३॥
भिषगात्ययिकं बुद्ध्वा पित्तगुल्ममुपाचरेत् ॥ ११४ ॥
वैरेचनिकसिद्धेन पयसा सर्पिषाऽपि वा ।
वैद्य को चाहिये कि पित्तगुल्म को घातक समझकर शीघ्र उपचार करे।
इसके लिये विरेचक वस्तुओं से सिद्ध हुए दूध या घी का प्रयोग करे ॥११४-॥
रोहिणीकटुकानिम्बमधुकं त्रिफलात्वचः ॥ ११५ ॥
कार्षिका त्रायमाणा च पटोलत्रिवृतोः पले ।
द्विपलं च मसूराणां साध्यमष्टगुणेऽम्भसि ॥ ११६ ॥
शृताच्छेषं घृतसमं सर्पिषश्च चतुष्पलम् ।
पिबेत्सन्मूर्च्छितं तेन गुल्मः शाम्यति पैत्तिकः ॥ ११७ ॥
ज्वरस्तृष्णा च शूलं च भ्रमो मूर्च्छाऽरुचिस्तथा ।
इति रोहिण्याद्यं घृतम् ॥
(१) रोहिण्याद्य घृत—कुटकी, नीम की छाल, मुलहठी, हरड़, बहेड़ा,
आंवला की बकली, त्रायमाणा प्रत्येक १ कर्ष, पटोल और निशोथ एक-एक
पल, मसूर २ पल इनको घी से आठ गुणे जल में पकावे। अष्टमांश ( ४ पल )
१ 'तस्मादन्नातिसौहित्यं कुर्यान्नातिविलङ्घितम्' इति च पाठः ।
३६४ चरकसंहिता [अ० ५
शेष रहने पर छान ले । इसको चार पल घी के साथ रोगी को दे । इससे
पैत्तिक गुल्म शान्त होता है, और ज्वर, प्यास, शूल, श्रम, मूर्च्छा और अरुचि
नष्ट होती है । [आजकल २ पल क्वाथ और २ पल घी वरते ।] ॥११५-११७॥
जले दशगुणे साध्यं त्रायमाणाचतुष्पलम् ॥ ११८॥
पञ्चभागस्थितं पूतं कल्कैः संयोज्य कार्षिकैः ।
रोहिणी कटुका मुस्ता त्रायमाणा दुरालभा ॥ ११९ ॥
कल्कैस्तामलकीवीराजीवन्तीचन्दनोत्पलैः ।
रसस्यामलकाना च क्षीरस्य च घृतस्य च ॥ १२०॥
पलानि पृथगष्टाष्टौ दत्त्वा सम्यग्विपाचयेत् ।
पित्तरक्तभवं गुल्मं विसर्पं पैत्तिक ज्वरम् ॥ १२१ ॥
हृद्रोग कामला कुष्ठ हन्यादेतद् घृतोत्तमम् ।
इति त्रायमाणाद्य घृतम् ।
( २ ) त्रायमाणाद्यघृत—त्रायमाणा ४ पल, पानी दस गुना ( चालीस
पल ) लेकर पकाना चाहिये । पञ्चमांश ( ८ पल ) रहने पर छान लेना चाहिये ।
इसमे कुटकी, मोथा, त्रायमाणा, दुरालभा, तामलकी ( भूई आंवला ), वीरा
( क्षीरकाकोली, शतावरी या शालिपर्णी ), जीवन्ती, चन्दन, नीला कमल प्रत्येक
एक एक कर्ष लेकर इनका कल्क, आवले का रस ८ पल, दूध ८ पल, घी ८ पल
लेकर सब से घृत सिद्ध करे । यह घृत पित्त-रक्तजन्य गुल्म, वीसर्प, पित्तजन्य
ज्वर, हृदय रोग, कामला और कुष्ठ को नष्ट करता है ॥ ११८-१२१ ॥
रसेनामलकेक्षूणां घृतप्रस्थं १ विपाचयेत् ॥ १२२ ॥
पथ्यापादं पिबेत्सर्पिस्तत्सिद्धं पित्तगुल्मनुत् ।
इत्यामलकाद्यं घृतम् ।
( ३ ) आमलकाद्यघृत—आवले का रस या क्वाथ ८ प्रस्थ, गन्ने का रस
८ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ, और हरड का कल्क १ शराव ( ८ पल ) लेकर घृत
पकाना चाहिये । यह घी पित्त गुल्म को नष्ट करता है ॥ १२२- ॥
द्राक्षा मधूकं खर्जूरं विदारी सशतावरीम् ॥ १२३ ॥
परूषकाणि त्रिफला साधयेत्पलसंमिताम् ।
जलाढके पादशेष रसमामलकस्य च ॥ १२४ ॥
घृतमिक्षुरसं क्षीरमभयाकल्कपादिकम् ।
साधयेत्तद् घृत सिद्धं शर्कराक्षौद्रपादिकम् ॥ १२५ ॥
१ 'घृतपादं' इति च पाठः ।
अ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३६५
अ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३६५
प्रयोगात्पित्तगुल्मघ्नं सर्वपित्तविकारनुत् ।
इति द्राक्षाद्यं घृतम् ।
(४) द्राक्षाद्यघृत—मुनक्का, महुवा, पिण्डखर्जूर, विदारीकन्द, शतावरी,
फालसा, त्रिफला, इनको एक-एक पल लेकर २ आढक जल मे क्वाथ करे ।
(२ प्रस्थ) रहने पर छान ले । इसमे आवले का रस दो प्रस्थ, ईख का रस
२ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, ओर घी २ प्रस्थ मिलावे । कल्कार्थ हरड़ ८ पल ले ।
इनके द्वारा घृत पकावे । शीतल होने पर इसमे चतुर्थांश शर्करा और मधु
(मिलित) मिलाकर प्रयोग करे । यह पित्त गुल्म ओर पैत्तिक रोगो को नष्ट
करता है १ ॥ १२३-१२५- ॥
वृषं समूलमापोथ्य पचेदष्टगुणे जले ॥ १२६ ॥
शेषेऽष्टभागे तस्यैव पुष्पकल्कं प्रदापयेत् ।
तेन सिद्धं घृतं शीतं सक्षौद्रं पित्तगुल्मनुत् ॥ १२७ ॥
रक्तपित्तज्वरश्वासकासहृद्रोगनाशनम् ।
इति वासाघृतम् ।
(५) वासाघृत—जड समेत वासा (अडूसा) को लेकर इसको कुचल
कर आठ गुणे पानी म क्वाथ करे । जब अष्टमाश रह जाये तब छान कर वासा
के फूलो का कल्क मिला कर घी सिद्ध करे । घी के ठण्डा होने पर मधु मिलावे
यह घृ पित्त-गुल्म, रक्त पित्त, ज्वर, श्वास, कास और हृदय-रोग का नष्ट
करता है। [यह वासा-घृत रक्तपित्त के वासा-घृत से पृथक् है। इसलिये
उसे चतुर्गुण पानी मे सिद्ध किया है। अष्टागसग्रहकार दोनो का एक ही
माना है ] ॥ १२६-१२७ ॥
द्विपलं त्रायमाणाया जलद्विप्रस्थसाधितम् ॥ १२८ ॥
अष्टभागस्थितं पूतं कोष्ण क्षीरसमं पिबेत् ।
पिबेदुपरि तस्योष्णं क्षीरमेव यथाबलम् ॥ १२६ ॥
तेन निर्हृतदोषस्य गुल्मः शाम्यति पैत्तिकः ।
(६) त्रायमाणा का दो पल लेकर ४ प्रस्थ (६४ पल) पानी मे पकावे,
अष्टमाश रहने पर इसको छान कर कोसा होने पर इसमे समान मात्रा दूध को
मिलावे, इसको पीकर ऊपर से शक्ति-अनुसार गरम दूध पीवे । इससे विरेचन
होने पर पैत्तिक गुल्म शान्त हो जाता है ।
[अष्टागसग्रह मे त्रायमाणा से ही दूध को सिद्ध करके प्रयोग करना
लिखा है ] ॥ १२८-१२६- ॥
१. महुवे के स्थान पर मधुक पाठ मे मुलहठी अर्थ होगा ।
३६६ चरकसंहिता [ अ० ५
द्राक्षाभयारस गुल्मे पैत्तिके सगुडं पिवेत् ॥ १३० ॥
लिह्यात्कम्पिल्लकं वाऽपि विरेकार्थं मधुद्रवम् ।
(७) पित्त-गुल्म मे विरेचन के लिये द्राक्षा और हरड के क्वाथ में गुड
मिलाकर अथवा कमीले को मधु मे मिलाकर चाटे ॥ १३० ॥
दाहप्रशमनोऽभ्यङ्गः सर्पिषा पित्तगुल्मिनाम् ॥ १३१ ॥
चन्दनाद्येन तैलेन तैलेन मधुकस्य वा ।
(८) पित्त-गुल्म म अभ्यंग के लिये घी ( शतधौत या सहस्रधौत ),
चन्दनाद्य तैल, या मुल्हठी के क्वाथ ओर कल्क से सिद्ध तैल का उपयोग करे ।
इससे दाह की शान्त होती है ॥ १३१ ॥
ये च पित्तज्वरार्ताना सतिक्ताः क्षीरवस्तयः ॥ १३२ ॥
हितास्ते पित्तगुल्मिभ्यो वक्ष्यन्ते ये च सिद्धिषु ।
पित्त-गुल्म मे बस्तिया—पित्तज्वर के रागियों के लिये तिक्त द्रव्यो से सिद्ध
दूध की जो बस्तिया कही है, ओर जिन बस्तियों को सिद्धि-स्थान मे आगे कहेंगे
उनका पित्त-गुल्म मे प्रयाग करे ॥ १३२ ॥
शालयो जाङ्गल मास गव्याज्ये पयसी घृतम् ॥ १३३ ॥
खर्जूररामलकं द्राक्षा दाडिम सपरूषकम् ।
आहारार्थे प्रयोक्तव्य पानार्थं सलिलं शृतम् ॥ १३४ ॥
बलाविदारिगन्धाद्यैः पित्तगुल्मचिकित्सितम् ।
आहार के लिये शालि वान्य, जागल मास, गाय और बकरी के घी और
दूध, खजूर, आवला, द्राक्षा, अनारदाना, फालसा, इनको भोजन के लिये दे
और पीने के लिये बला और विदारीगन्वादि स्वल्प पञ्चमूल से षडंग
पानीय विधि द्वारा साधित जल पीने के लिये देवे, यह पित्तगुल्म की
चिकित्सा है ॥ १३३-१३४ ॥
आमान्वये पित्तगुल्मे सामे वा कफवातके ॥ १३५ ॥
यवागूभिः खडैर्यूषैः संधुक्ष्योऽग्निर्बिलङ्घिते ।
शमप्रकोपौ दोषाणा सर्वेषामग्निसंश्रितौ ॥ १३६ ॥
तस्मादग्नि सदा रक्षेन्निदानानि च वर्जयेत् ।
पित्तगुल्म मे यदि आम का अनुबन्ध हो, या आमयुक्त कफ अथवा
आमयुक्त वायु का ससर्ग हो तो प्रथम लघन कराके यवागुओ द्वारा और खड
यूषो से अग्नि का प्रदीपन करे । सब दोषो का शमन और प्रकोप अग्नि के ऊपर
ही निर्भर करता है । इसलिये सदा अग्नि की रक्षा करनी चाहिये और निदाना
( कारणों) का परित्याग करना चाहिये ॥ १३५-१३६- ॥
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६७
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६७
वमनार्हाय वमनं प्रदद्यात्कफगुल्मिने ॥ १३७ ॥
स्निग्धस्विन्नशरीराय ल्मे शैथिल्यमागते ।
परिवेष्ट्य प्रदीप्तांस्तु बल्वजानथवा कुशान् ॥ १३८ ॥
भिषक्कुम्भे समावाप्य गुल्मं घटमुखे क्षिपेत् ।
सगृहीतो यदा गुल्मस्तदा घटमथोद्धरेत् ॥ १३६ ॥
वस्त्रान्तरं ततः कृत्वा भिन्द्याद् गुल्मं प्रमाणवित् ।
विमार्गार्जं यदा पश्येद्यथालाभं प्रपीडयेत् ॥ १४० ॥
मृद्नीयाद् गुल्ममेवैकं न त्वत्र हृदयं स्पृशेत् ।
कफ-गुल्म की चिकित्सा— ( १ ) कफ-गुल्म का रोगी यदि वमन के
योग्य हो तो उसको वमन देवे । स्नेहन और स्वेदन क्रिया से गुल्म को शिथिल
बना कर इसको वस्त्र से लपेट देवे । फिर एक घड़े ( घटीयन्त्र) में जलते हुए
बल्वज ( तृणविशेष ) और कुशाओं को डाल देवे और घड़े के मुख को गुल्म
पर लगा देवे, उससे गुल्म घड़े के मुख की ओर खींचा जाकर पकड़ा जाता है
[ वायु के निकल जाने से शून्य स्थान बनने से यन्त्र गुल्म को खींच लेता है,
यन्त्र में से वायु निकालने के लिये जलती घास यन्त्र में रक्खी जाती है । आग के
बुझने पर परन्तु गरम रहने पर यन्त्र को लगावे ] । जिस समय गुल्म पकड़ा
जाये, उस समय घटीयन्त्र को उतार ले । इस गुल्म को वस्त्र से दाबकर प्रमाण
का समझने वाला वैद्य चीर देवे, अब विमार्ग, अजपद और आदर्श इनमें से
जो भी मिले उस से इसको दबावे जिससे दोष निकल जाय, गुल्म का ही मर्दन
पीड़न करे । हृदय पर किसी प्रकार का आघात ( रक्तक्षय से या भय से ) नहीं
आने देवे । [ आज कल यह कार्य कपिंग से किया जाता है । घास के
स्थान पर स्पिरिट का उपयोग किया जाता है 'विमार्ग' चमारों का यन्त्र है ।
इसमें वे चमडे को सीधा काटते हैं । इसको राफडी कहते हैं । 'अजपद'
बकरी के पैर के समान लकडी का बना यन्त्र होता है । ] ॥ १३७-१४०-॥
तिलैरण्डातसीबीजसर्षपैः परिलिप्य च ॥ १४१ ॥
श्लेष्मगुल्ममयःपात्रैः सुखोष्णैः स्वेदयेद्भिषक् ।
( २ ) कफज गुल्म पर तिल, एरण्डबीज, अलसी, सरसो इन का लेप करके
सुहाते हुए गरम लोहे के पात्रों से सेक करे ॥ १४१ ॥
सव्योषक्षारलवणं दशमूलीशृतं घृतम् ॥ १४२ ॥
कफगुल्मं जयत्याशु सहिङ्गुबिडदाडिमम् ।
इति दशमूलीघृतम् ।
३६८ चरकसंहिता [ अ० ५
( ३ ) दशमूली घृत—दशमूली के क्वाथ से और त्रिकटु, यवक्षार, सैन्धा
नमक, हींग, बिड नमक, और अनारदाना इनके कल्क से साधित घी के प्रयोग
से कफगुल्म शान्त होता है । कोई २ वैद्य दशमूल का कल्क भी डालते हे ।
[ श्री गगाधर सेन ने अनार का छिलका डालना लिखा है । ] ॥ १४२- ॥
भल्लातकाना द्विपलं पञ्चमूलं पलोन्मितम् ॥ १४३ ॥
साध्यं विदारिगन्धाद्यमापोथ्य सलिलाढके ।
पादशेषे रसे तस्मिन् पिप्पली नागरं वचाम् ॥ १४४ ॥
विडङ्ग सैन्धवं हिङ्गु यावशूकं बिड यटीम् ।
चित्रक मधुकं रास्त्रा पिष्ट्वा कर्षसम भिषक् ॥ १४५ ॥
प्रस्थ च पयसः कृत्वा घृतप्रस्थ विपाचयेत् ।
एतद्भल्लातकघृत कफगुल्महर परम् ॥ १४६ ॥
प्लीहापाण्ड्वामयश्वासग्रहणीरोगकासनुत् ।
इतिभल्लातकाद्यं घृतम् ।
( ४ ) भल्लातकाद्यघृत—भिलावा १ पल, विदारीगन्धादि स्वल्प पचमूल
( शालिपर्णी, पृश्निपर्णी गोखरू, कटेरी, बडी कटेरी ), एक पल, पानी दो
आढक, हींग, यवक्षार बिड नमक, कचूर, चीता, मुलहठी, रास्त्रा प्रत्येक एक
कर्ष लेकर इनका कल्क बनाये, घी २ प्रस्थ मिलाकर घृत-पाक करे । यह भल्ला-
तक घृत कफ-गुल्म नाशक, प्लीहा, पाण्डुरोग, श्वासरोग, ग्रहणी राग, और का ·
को नष्ट करता है । [ मात्रा २ मासे से ४ मासा । ] ॥ १४३-१४६ ॥
पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ॥ १४७ ॥
पलिकैः सयवक्षारैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
क्षारप्रस्थेन १ तत्सर्पिर्हन्ति गुल्म कफात्मकम् ॥ १४८ ॥
ग्रहणीपाण्डुरोगघ्न प्लीहकासज्वरापहम् ।
इति पञ्चकोलघृतम् ।
( ५ ) पञ्चकाल घृत—पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चित्रक, सोठ ओर
यवक्षार प्रत्येक एक पल, घी २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ इनसे यथाविवि घृत पाक
करे । यह घृत कफ-गुल्म ग्रहणी रोग, पाण्डु रोग, प्लीहा, कास, और ज्वर को
नष्ट करता ह । [ इसका 'क्षीरषट्पल घृत' भी कहते हे । ] ॥१४७-१४८॥
त्रिवृता त्रिफला दन्ती दशमूलं पलोन्मितम् ॥ १४६ ॥
जले चतुर्गुणे पक्त्वा चतुर्भांगस्थितं रसम् ।
१ 'क्षीरप्रस्थ च' इति वा पाठः ।
अ० ५ ] २४ चिकित्सितस्थानम् ३६६
अ० ५ ] २४ चिकित्सितस्थानम् ३६६
सर्पिरैरण्डजं तैल क्षीरं चैकत्र साधयेत् ॥ १५०॥
स सिद्धो मिश्रकस्नेहः सक्षौद्रः कफगुल्मनुत् ।
कफवातविबन्धेषु कुष्ठप्लीहोदरेषु च ॥ १५१ ॥
प्रयोज्यो मिश्रकः स्नेहो योनिशूलेषु चाधिकम् ।
इति मिश्रकः स्नेहः ।
( ६ ) मिश्रक स्नेह—निशोथ, त्रिफला, दन्तीमूल दशमूल प्रत्येक वस्तु
एक-एक पल, इनको चार गुणे जल ( ६० पल ) मे पका कर चतुर्थांश
( १५ पल ) शेष रखे । इसमे क्वाथ के समान ( १५ पल ) प्रत्येक घी, ऐरण्ड
तैल, दूध मिलाकर सिद्ध करना चाहिये । इस स्नेह को मधु के साथ मिलाकर
प्रयोग करे । कफ-गुल्म, कफ-वातजन्य विबन्ध, कुष्ठरोग, प्लीहारोग,
उदररोग और योनिरोगो मे विशेष रूप से इसका प्रयोग करे । [ श्री चक्रपाणि
दूध को क्वाथ के समान लेने को कहते है, तथा घी ओर एरण्ड तैल को इस
मिलित द्रवाश से चतुर्थांश लेने का आदेश करते है। अष्टाङ्ग-सग्रह मे
क्वाथ के लिये सोलह गुणा जल लेकर सोलहवा भाग शेष रखने का
वचन है । ] ॥१४६-१५१॥
यदुक्तं वातगुल्मघ्नं स्रंसनं नीलिनीघृतम् ॥ १५२ ॥
द्विगुण तद्विरेकार्थं प्रयोज्य कफगुल्मिनाम् ।
( ७ ) वात-गुल्म मे जा नीलिनी घृत विरेचन के लिये कहा है, उसी को
दुगुनी मात्रा मे कफ-गुल्म मे विरेचन के लिये बरते ॥१५२॥
सुधाक्षीरद्रवे चूर्ण त्रिवृतायाः सुभावितम् ॥ १५३ ॥
कार्षिकं मधुसर्पिर्भ्यां लीढ्वा साधु विरिच्यते ।
( ८ ) निसात के चूर्ण को सेहुण्ड के दूध मे भली प्रकार भावना देकर
एक कर्ष मात्रा [ आजकल ४ से ६ रत्ती ] मधु और घी के साथ खाना
चाहिये । इससे भली प्रकार विरेचन होता है ॥१५३॥
जलद्रोणे विपक्तव्या विंशतिः पञ्च चाभयाः ॥ १५४॥
दन्त्याः पलानि तावन्ति चित्रकस्य तथैव च ।
अष्टभागस्थितं तं च रस पूतमधिक्षिपेत् ॥ १५५ ॥
दन्ती समं गुडं पूतं क्षिपेत्तत्राभयाश्च ताः ।
तैलार्धकुडवं चैव त्रिवृतायाश्चतुष्पलम् ॥ १५६ ॥
चूर्णितं पलमेकं च पिप्पलीविश्वभेषजम् ।
तत्साध्यं लेहवच्छीते तस्मिंस्तैलसमं मधु ॥ १५७ ॥
३७० चरकसंहिता [ अ० ५
क्षिपेच्चूर्णपलं चैकं त्वगेलापत्रकेशरात् ।
ततो लेहपलं लीढ्वा जग्ध्वा चैकां हरीतकीम् ॥ १५८ ॥
सुखं विरिच्यते स्निग्धो दोषप्रस्थमनामयः ।
गुल्मं श्वयथुमर्शांसि पाण्डुरोगमरोचकम् ॥ १५६ ॥
हृद्रोगं ग्रहणीदोषं कामलां विषमज्वरम् ।
कुष्ठं प्लीहानमानाहमेषा हन्त्युपयोजिता ॥ १६० ॥
निरत्ययः क्रमश्चास्या द्रवो मांसरसौदनः ।
इति दन्तीहरीतकी ।
(८) दन्ती-हरीतकी—२५ हरडो को एक पोटली मे ढीला बाघकर,
दन्तीमूल २५ पल लेकर दो द्रोण पानी मे पकावे । जब अष्टमाश (४ प्रस्थ)
शेष रह जाय तब छान लेवे इसमे २५ पल गुड मिलाकर छान ले । इसमे अब
हरड़ो को छोड़ दे फिर हरड़ो को निकाल कर गुठली निकाल दे । इन हरडो
को ४ पल तिल तैल मे भून कर गुड मिश्रित क्वाथ मे मिला दे। इसमे निशोथ
का चूर्ण ४ पल, पिप्पली और सोठ एक पल मिलाकर मन्द २ आच पर पकावे ।
जब लेह तय्यार हो जाय तब नीचे उतार कर तैल के समान शहद (४ पल),
दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपात और नागकेसर का मिलित चूर्ण १ पल
मिलावे । इसमे से एक पल अवलेह चाट कर और एक हरड को खाने से
सुखपूर्वक विरेचन होता है । नीरोग और स्निग्ध पुरुष मे एक प्रस्थ दोष
बाहर आता है । गुल्म, सूजन, अर्श, पाण्डुरोग, अरुचि, हृदयरोग, ग्रहणी-
रोग, कामल', विषम ज्वर, कुष्ठ, प्लीहा, आनाह इससे नष्ट होते है । इसका
सेवन निर्दोष है । इसका पथ्य मास रस और भात है । मास रस इतना हो
जिससे भात पतला बन जाये । [ यहा पर प्रस्थ १३।। पल का समझे ।
वमन, विरेचन और शोणित-मोक्षण मे १३३ पल का एक प्रस्थ बतलाया
गया है ] ॥ १५४-१६० ॥
सिद्धाः सिद्धिषु वक्ष्यन्ते निरूहाः कफगुल्मिनाम् ॥ १६१ ॥
अरिष्टयोगाः सिद्धाश्च ग्रहण्यार्शश्चिकित्सिते ।
यच्चूर्णं गुटिका याश्च विहिता वातगुल्मिनाम् ॥ १६२ ॥
द्विगुणक्षारहिङ्ग्वम्लवेतसास्ताः कफे मताः ।
य एव ग्रहणीदोषे क्षारास्ते कफगुल्मिनाम् ॥ १६३ ॥
सिद्धा निरत्ययाः शस्ता दाहस्त्वन्ते प्रशस्यते ।
कफ गुल्म मे प्रयोग करने योग्य निरूह बस्तियो का सिद्धि-स्थान मे कहेगे ।