चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६१५
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६१५
लेना चाहिये । इसमे घृत १ प्रस्थ और कल्कार्थ—चिरायता, इन्द्रजौ, वीरा
(शालपर्णी या शतावरी), मागधिका (पिप्पली) और कमलगट्टा प्रत्येक एक-
एक अक्ष लेकर इनका कल्क करना चाहिये । इन सबो को मिला कर घृत सिद्ध
करना चाहिये । यह घृत पित्तजन्य ग्रहणी रोग मे हितकारी है । कुष्ठ रोग मे जो
तिक्त घृत [दो] कहे हैं उनका भी प्रयोग करना चाहिये ॥ १२६-१२६ ॥
नागरातिविषे मुस्तं धातकीं सरसाञ्जनम् ।
वत्सकत्वक्फलं बिल्वं पाठां कटुकरोहिणीम् ॥ १३० ॥
पिवेत् समाशं तच्चूर्णं सक्षौद्रं तण्डुलाम्बुना ।
पैत्तिके ग्रहणीदोषे रक्तं यच्चोपवेश्यते ॥ १३१ ॥
अर्शांसि च गुदे शूलं जयेच्चैव प्रवाहिकाम् ।
नागराद्यमिदं चूर्णं कृष्णात्रेयेण पूजितम् ॥ १३२ ॥
इति नागराद्यं चूर्णम् ।
(२८) नागराद्य चूर्ण—सोंठ, अतीस, मोथा, धाय के फूल, रसाञ्जन
(रसौत), कूड़े की छाल और बेलगिरी, पाठा, कुटकी इन सब का समान भाग,
लेकर चूर्ण कर लेना चाहिय । इस चूर्ण को शहद मे मिला कर चावलो के धोवन
के साथ पीना चाहिये । इससे पित्तजन्य ग्रहणी रोग में तथा जब मल मे रक्त
आता है तब आराम होता है । अर्श, गुदा मे शूल और प्रवाहिका भी इससे
नष्ट होते है । यह नागराद्यचूर्ण कृष्णात्रेय से प्रशंसित है इसलिये यह सिद्ध
योग है ॥ १३०-१३२ ॥
भूनिम्बं कटुकं व्योषं मुस्तमिन्द्रयवान् समान् ।
द्वौ चित्रकाद्वत्सकत्वग्भागान् षोडश चूर्णयेत् ॥ १३३ ॥
गुडशीताम्बुना पीतं ग्रहणीदोषगुल्मनुत् ।
कामलाज्वरपाण्डुत्वमेहारुच्यतिसारनुत् ॥ १३४ ॥
इति भूनिम्बाद्यं चूर्णम् ।
(२६) भूनिम्बादि चूर्ण—भूनिम्ब (चिरायता), कटुक (कडु), सोंठ,
मरिच, पिप्पली, मोथा, इन्द्रजौ प्रत्येक वस्तु समान भाग, चित्रक दो भाग और
कूड़े की छाल १६ भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को ठण्डे पानी
मे बने गुड़ के शर्बत के साथ पीना चाहिये । गुड़ इतना डालना चाहिये जिससे
शर्बत मीठा हो जाये । इससे ग्रहणी रोग, गुल्म, कामला, ज्वर, पाण्डु प्रमेह,
अरुचि और अतिसार नष्ट होता है ॥ १३३-१३४ ॥
वचामतिविषां पाठा सप्तपर्णं रसाञ्जनम् ।
६१६ चरकसंहिता [ अ० १५
श्योनाकोदीच्यकट्वङ्गवत्सकत्वग्दुरालभाः ॥ १३५ ॥
दार्वी पर्पटकं मूर्वा१ यवानी मधुशिग्रुकम् ।
पटोलपत्रं सिद्धार्थान् यूथिकां जातिपल्लवान् ॥ १३६ ॥
जम्ब्वाम्रबिल्वमध्यानि निम्बशाकफलानि च ।
त२द्रोगशममन्विच्छन् भूनिम्बाद्येन योजयेत् ॥ १३७ ॥
( २८ ) वच, अतीस, पाठा, सतवन रसाञ्जन ( रसौत ), श्योनाक ( सोना-
पाठा ), उदीच्य, ( नेत्रवाला ), कट्त्वग ( श्योनाक ) [ दो बार पढ़ने से दो
बार लेना चाहिये ], वत्सकत्वग् ( कूडे की छाल ), दुरालभा ( धमासा ),
दार्वी ( दारूहल्दी ), पित्तपापडा, मूर्वा, अजवायन, मधु, शिग्रु ( मीठा सुहा-
जना ), पटोलपत्र, सिद्धार्थ ( श्वेत सरसो ), यूथिका ( जूई ) और चमेली के
पत्ते, जामुन, बेलगिरी, आम की गुठली और नीम तथा शाक-वृक्ष के फल
इनको कूट कर चूर्ण कर लेना चाहिये । इसको गुड़ के शर्बत के साथ पीना
चाहिये अथवा भूनिम्बादि गण की वस्तुओ से मिलाकर खाना चाहिये । इससे
उपरोक्त रोग शान्त होते है३ ॥१३५-१३७॥
किराततिक्तं षड्ग्रन्था त्रायमाणा कटुत्रिकम् ।
चन्दनं पद्मकोशीरं दार्वी त्वक् कटुरोहिणी ॥ १३८ ॥
कुटजत्वक्फलं मुस्तं यवानी देवदारु च ।
पटोलनिम्बपत्रैलासौराष्ट्रातिविषात्वचः ॥ १३९ ॥
मधुशिग्रोश्च बीजानि मूर्वापर्पटकं तथा ।
तच्चूर्णं मधुना लेह्यं पेयं मद्येर्जलेन वा ॥ १४० ॥
हृत्पाण्डुग्रहणीरोगगुल्मशूलारुचिज्वरान् ।
कामला सन्निपातं४ च मुखरोगांश्च नाशयेत् ॥ १४१ ॥
इति किराताद्यं चूर्णम् ।
( २६ ) किराताद्य चूर्ण—चिरायता, षड्ग्रन्था ( वच ), त्रायमाणा, सोठ
मरिच, पिप्पली, चन्दन, पद्माख, उशीर, ( खस ), दारूहल्दी, दालचीनी,
कुटकी, पटोल, नीम के पत्ते, इलायची, सौराष्ट्र ( सुराष्ट्री ), अतीस, त्वच ( दाल-
चीनी), मीठे सुहाजने के बीज, मूर्वा, पित्तपापड़ा इनको समान भाग लेकर
इसका चूर्ण करना चाहिये । इस चूर्ण को मधु के साथ चाटना चाहिये । अथवा
१. पाठा इति पाठान्तरम् । २ हृद्रोग इति पाठान्तरम् । ३. शाक वृक्ष के
लिये डल्हण ने लिखा है कि—'कर्कशमसृणपृष्ठोदरपत्रो वृक्षः, महाखरपत्र' ।
यह सागोन का भेद प्रतीत होता है । ४. 'पाण्डुरोग च' इति वा पाठः ।