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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ९ ] २६ चिकित्सितस्थानम् ४४६

अ० ९ ] २६ चिकित्सितस्थानम् ४४६
दार-गन्ध-माल्य-प्रियं शोचाचारं द्वादश्या चतुर्थ्यां च, सत्त्व-बल-रूप-
गर्व-शौर्य-युक्तं माल्यानुलेपनं हास्यप्रियमतिवाक्करणं प्रायः शुक्लैकादश्यां
सप्तम्यां च यक्षाः, स्वाध्याय-तपो-नियमोपवास-व्रतचर्या-देव-यति-गुरु-पू-
जारति नष्टशौचं ब्रह्मवादिनं शूरमानिनं देवतागार-सलिल-क्रीडनरति प्रायः
शुक्लपञ्चम्यां पूर्णचन्द्रदर्शने च ब्रह्मराक्षसाः, रक्षःपिशाचास्तु हीन-सत्त्व-
पिशुन-क्रौण-लुब्धं प्रायो द्वितीयातृतीयाष्टमीषु पुरुषं छिद्रमवेक्ष्याभिधर्ष-
यन्ति१ । इत्यपरिसंख्येयानां ग्रहाणामाविष्कृततमा ह्यष्टावेते व्या-
ख्याताः ॥ २८ ॥
आगमन काल—इनमे शौच ( शुचि, पवित्र ) आचार वाले, तप और
वेदाध्ययन मे पण्डित पुरुष के छिद्र ( त्रुटि अवकाश ) को ढूंढकर प्रायः शुक्ल-
पक्ष की प्रतिपदा या त्रयोदशी के दिन उसको देवग्रह आक्रान्त करते हैं। ऋषि-
ग्रह—स्नान, पवित्र द्रव्य, एकान्तस्थान सेवी, धर्मशास्त्र, वेद मे कुशल व्यक्ति
को प्राय करके छठी या नवी तिथि के-दिन आक्रान्त करते है। पितृग्रह-प्रायः
माता, पिता, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और आचार्य की सेवा करने वाले में
त्रुटि देखकर दशमी या अमावस्या-तिथि मे आक्रमण करते है। गन्धर्वग्रह—
स्तुति, गाने-बजाने मे रत, परस्त्री, गन्ध और माला के प्रिय, पवित्र आचार
वाले व्यक्ति मे छिद्र देखकर प्राय बारहवी या चौदहवी तिथि मे आक्रमण
करते है। यक्षग्रह—सत्त्व, बल, रूप, अहकार, शौर्य से युक्त माला, अगराग
और हास्य के प्रिय, अतिवाक्पटु व्यक्ति मे छिद्र पाकर प्रायः करके शुक्लपक्ष की
एकादशी या सतमी मे आक्रमण करते है। ब्रह्मराक्षस-स्वाध्याय, तप, नियम
उपवास, ब्रह्मचर्य, देवता, सन्यासी और गुरुओ की पूजा न करने वाले, भ्रष्टा-
चार, अपवित्र, अपने को ब्राह्मण और अब्राह्मण कहने वाले अर्थात् अब्राह्मण
होने पर ब्राह्मण और ब्राह्मण होने पर अब्राह्मण कहने वाले, अपने को शूर
गिनने वाले, मन्दिर और पानी मे क्रीडा करने वाले मे छिद्र देखकर पञ्चमी या
पौर्णमासी के दिन आक्रमण करते है। राक्षस और पिशाच—प्रायः दुर्बल,
छली स्वभाववाले, चोर, लोभी, धूर्त्त पुरुष मे छिद्र पाकर द्वितीया, तृतीया
और अष्टमी के दिन आक्रमण करते है।
[ सुश्रुत मे कहा है—देवग्रह पौर्णमासी मे, असुर सन्ध्याकालो मे, गन्धर्व
प्राय अष्टमी मे यक्ष प्रतिपदा मे, पितृ-जन कृष्णपक्ष मे, सर्प पञ्चमी मे, राक्षस
रात्रि मे और पिशाच चतुर्दशी मे आक्रमण करते हैं। ]
१ प्रतिवाक्य ‘धर्षयन्ति’ इति क्रियापद च पठ्यते क्वचित् ।

४५० चरकसंहिता [ अ० ६
ग्रह असंख्य हैं, उनमें ये ही आठ ग्रह अधिक दीखने से मुख्य हैं, इसलिये
इन्हीं आठ ग्रहो की व्याख्या की है ॥ २८ ॥
सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु यो हस्तावुद्यम्य रोषसंरम्भात्रिःसङ्गमन्वेष्वा-
त्मनि वा पातयेत् स ह्यसाध्यो ज्ञेयः, तथा यः साश्रुनेत्रो मेढ्रप्रवृत्तरक्तः
क्षतजिह्वः प्रस्रुतनासिकश्छिद्यमानमर्मा प्रतिहन्यमानपाणिः सततं विक्कू-
जन् दुर्वर्णस्तृषार्तः पूतिगन्धिश्च हिंसार्थमुन्मत्तो ज्ञेयस्तं परिवर्जयेत् ॥२६॥
इन सब भूतोन्मादों मे जो पुरुष क्रोध के वेग के कारण हाथों को ऊंचा
उठा कर बिना किसी शंका या संकोच के, बिना ज्ञान के अपने या पराये पर
मारने के लिये पटके तो उसे असाध्य समझना चाहिये । इसी प्रकार से जिस
रोगी की आंखो से आंसू बहे, लिंग-इन्द्रिय से रक्त आता हो, जीभ कट जाये,
नासिका से पानी बहता हो, त्वचा फट जाये, मारने के लिये दोनो हाथ उठा
रक्खे हों, निरन्तर कराहता ( अव्यक्त शब्द करता ) रहता हो, देखने मे भद्दा
कुरूप, प्यासा, शरीर से दुर्गन्ध आती हो, उसे हिंसार्थी उन्माद रोगी ( पागल )
समझे, वह रोगी असाध्य है ।
[ चरकोषस्कार मे साध्य-असाध्य के विषय मे लिखा है कि—इन सब
भूतोन्मादो मे उन्माद का प्रयोजन हिंसा, रति और पूजा है । इनमे से हिंसार्थी
उन्माद असाध्य है और रति और पूजा के निमित्त हुए उन्माद साध्य है।]॥२६॥
रत्यर्चनकामोन्मादिनौ तु भिषगभिचाराभिशापाभ्यां बुद्ध्वा तद-
ज्ञोपहारबलिमिश्रेण मन्त्रभैषज्यविधिनोपक्रमेत् ॥ ३० ॥
रति और पूजन के लिए उत्पन्न उन्माद मे वैद्य को चाहिये कि अभिचार
और अभिशाप को समझ कर इनके अग भूत जो उपहार ( बलि आदि ) हो,
उसके साथ मन्त्र विधि और भैषज्य विधि (घृतपान आदि) द्वारा चिकित्सा करे॥३०॥
तत्र द्वयोरपि निजागन्तुनिमित्तयोरुन्मादयोः समासविस्तराभ्यां
भेषजविधि व्याख्यास्यामः ॥ ३१ ॥
इसके आगे निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादो का सक्षेप और
व स्तार से चिकित्सा का उपदेश करेगे ॥ ३१ ॥
उन्मादे वातजे पूर्वं स्नेहपानं विशेषवित् ।
कुर्यादावृतमार्गे तु सस्नेहं मृदु शोधनम् ॥ ३२ ॥
कफपित्तभवेऽप्यादौ वमनं सविरेचनम् ।
स्निग्धस्विन्नस्य कर्तव्यं शुद्धे संसर्जनक्रमः ॥ ३३ ॥
वात आदि दोषों के भेदों को जाननेवाले वैद्य वातजन्य उन्माद की