चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १ ] शारीरस्थानम ५
अ० १ ] शारीरस्थानम ५
क्रिये और मन से विचारे हुए विषय मे जो निश्चयात्मक बुद्धि होती है, उसका
नाम प्रत्यक्ष है । इस निश्चयात्मक बुद्धि से ही पुरुष वैसा कहने या करने का
निश्चय करता है ॥ १८-२३ ॥
एकैकाधिकयुक्तानि खादीनामिन्द्रियाणि तु ।
पञ्चकर्मानुमेयानि येभ्यो बुद्धि प्रवर्तते ॥ २४ ॥
हस्तौ पादौ गुदोपस्थं जिह्वेन्द्रियमथापि वा ।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव, पादौ गमनकर्मणि ॥ २५ ॥
पायूपस्थौ विसर्गार्थं हस्तो ग्रहणधारणे ।
जिह्वा वागिन्द्रिय, वाक् च सत्या ज्योतिस्तमोऽनृता ॥२६॥
इन्द्रिय—श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और घ्राण ये पाच इन्द्रिया आकाश,
वायु, अग्नि, जल, पृथिवी इन पच महाभूतों से उत्पन्न होने पर भो इनमें एक
एक भूत की अधिकता रहती है । यथा—श्रोत्र में आकाश की, त्वचा में वायुकी ।
इनमे जिस भूत की अधिकता होती है इन्द्रिय उसी की ओर दौड़ती है। इन इन्द्रियों
के अतीन्द्रिय होने से इनका ज्ञान ( अनुमान रूप ) इनके कार्यों ( श्रवण, स्पर्शन,
दर्शन, रसन और घ्राण ) से किया जाता है । इन इन्द्रियों मे बुद्धि अर्थात् ज्ञान
प्रवृत्त होता है । कर्मेन्द्रिय— हाथ, पाव, गुदा, 'उपस्थ' और वाणी ये पांच कर्म-
न्द्रिय हैं । इनमें पाव चलने के लिये, पायु ( गुदा ) और उपस्थ ( लिंग )
विसर्ग अर्थात् मल, मूत्र और शुक्र के त्यागने के लिये, हाथ ग्रहण और धारण
करने के लिये, वाग्-इन्द्रिय ( जिह्वा ), बोलने के लिये है । वाणी दो प्रकार की
है--सत्य और असत्य । इनमे सच्ची वाणी--ज्योति वा प्रकाश स्वरूप ( दोनों
लोकों को प्रकाशित करनेवाली) है और अनृत वाणी अन्धकारमयी है ॥२४-२६॥
महाभूतानि खं वायुरग्निरापः क्षितिसथा ।
शब्दः स्पर्शश्च रूप च रसौ गन्धाश्च तद्गुणाः ॥ २७ ॥
तेषामेकगुणः पूर्वो, गुणवृद्धिः परे परे ।
पूर्वः पूर्वगुणश्चैव क्रमशॊ गुणिषु स्मृत ॥ २८ ॥
महाभूत--आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पाच महाभूत
हैं । इन महाभूतों के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये क्रम से पाच गुण
हैं । इन महाभूतों में प्रथम आकाश एकगुणवाला है, आगे उत्तरोत्तर गुणों
की वृद्धि होती गई है । जैसे—वायु दो गुणों वाला ( आकाश, वायु ), अग्नि
तीन गुणों वाला ( आकाश, वायु, अग्नि, ), आप ( जल ) चार गुणों
६ चरकसंहिता [अ० १
वाला (आकाश, वायु, अग्नि, जल) और पृथिवी पाच गुणों वाली है।
इस प्रकार अगले भूत का गुण क्रम से दूसरे २ भूत में आता जाता है १ ॥२८॥
खरद्रवचलोष्णत्वं भूजलानिलतेजसाम् ।
आकाशस्याप्रतीघातो दृष्टं लिङ्गं यथाक्रमम् ॥ २६ ॥
लक्षणं सर्वमेवैतत्स्पर्शनेन्द्रियगोचरम् ।
स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयः स्पर्शो हि सविपर्ययः ॥ ३० ॥
पञ्च महाभूतों के लक्षण - खरत्व, द्रवत्व, चलत्व, उष्णत्व और अप्रतिहनन
ये पृथिवी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के क्रमशः लक्षण समझने चाहिये ।
ये सब लक्षण स्पर्शनेन्द्रिय (त्वचा) से ग्रहण करने योग्य है । इनमें आकाश
का अप्रतिहनन (रोक न करना) भी स्पर्श के विपरीत अस्पर्श होने से ही
त्वचा से ग्रहण करने योग्य है। [क्योंकि जो द्रव्य जिस इन्द्रिय से ग्रहण किया
जाता है, उस द्रव्य के अभाव का भी उसी इन्द्रिय से ग्रहण होता है ।
इसलिये आकाश का अप्रतिघात गुण भी स्पर्शनेन्द्रिय से ही ग्रहण करने
योग्य है ] ॥ २९-३० ॥
गुणाः शरीरे गुणिनां निर्दिष्टाश्चिह्नमेव च ।
अर्थाः शब्दादयो ज्ञेया गोचरा विषया गुणाः ॥ ३१ ॥
ग्राह्य-विषय- शरीर में गुणियों के गुण चिह्न रूप ही कहे हैं। इसलिये
खरत्व आदि गुणों का लक्षण शब्द से ही कह दिया है। शब्द आदि पाच
भूतों के गुण हैं, वे ही अर्थ हैं। इनको इन्द्रियगोचर या विषय अथवा गुण
करके जानना चाहिये ॥ ३१ ॥
या यदिन्द्रियमाश्रित्य जन्तोर्बुद्धिः प्रवर्तते ।
याति सा तेन निर्देशं मनसा च मनोभवा ॥ ३२ ॥
प्राणी की जो बुद्धि (ज्ञान) जिस इन्द्रिय की सहायता से उत्पन्न होती
है, वह बुद्धि उसी इन्द्रिय से कही जाती है। जैसे आख से प्रवृत्त होने वाली
बुद्धि चक्षुर्बुद्धि कही जाती है। इसी प्रकार मन से उत्पन्न होने वाली बुद्धि
मनोभवा बुद्धि कहाती है ॥ ३२ ॥
भेदात्कार्येन्द्रियार्थानां बह्व्यो वै बुद्धयः स्मृताः ।
आत्मेन्द्रियमनोर्थानामेकैकसंनिकर्षजा ॥ ३३ ॥
१ आकाशपवनदहनतोयभूमिषु यथासङ्ख्यमेकोत्तरपरिवृद्धा शब्दस्पर्शरूप-
रसगन्धाः । (सुश्रुतसूत्र ४२ अ०)
अ० १ ] शारीरस्थानम् ७
अंगुल्यंगुष्ठतलजस्तंत्रीवीणानखोद्भवः ।
दृष्टः शब्दो यथा बुद्धिर्दृष्टा संयोगजा तथा ॥ ३४ ॥
कार्य, इन्द्रिय और विषयों के बहुत भेद होने से बुद्धिया भी बहुत प्रकार
की हैं। इनमें एक एक बुद्धि आत्मा का मन से, मन का इन्द्रियों से और
इन्द्रियों का विषय के साथ सयोग होने से उत्पन्न होती हैं। जिस प्रकार शब्द
मध्यमांगुलि, अगुष्ठ, हथेली तन्त्री (तात), वीणा और नख के सयोग से
उत्पन्न होता है, उसी प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान भी आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषय
के सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है ॥ ३३-३४ ॥
बुद्धीन्द्रियमनोर्थाना विद्याद्योगधरं परम् ।
चतुर्विंशक इत्येष राशिः पुरुषसंज्ञकः ॥ ३५ ॥
बुद्धि, इन्द्रिय, मन और विषय इन के संयोग को शरीर रूप से धारण
करने वाला इनसे पृथक् 'अव्यक्त' आत्मा है। पाच महाभूत, पाच विषय,
दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहकार और महान् इन चौबीस तत्त्वों का राशि
समूह को 'पुरुष' कहते है ॥ ३५ ॥
रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोऽयमनन्तवान् ।
ताभ्यां निराकृताभ्यां तु सत्त्ववृद्ध्या निवर्तते ॥ ३६ ॥
रज और तम से युक्त पुरुष का यह सयोग अन्त वाला नही होता,
लगातार चलता ही रहता है। सत्त्व के प्रबल होने पर संसार बन्धन के
कारणरूप रज और तम के हटने पर यह सयोग भी समाप्त हो जाता है। यही
पुरुष का मोक्ष है ॥ ३६ ॥
अत्र कर्मफलं चात्र ज्ञानं चात्र प्रतिष्ठितम् ।
अत्र मोहः सुखं दुःख जीवितं मरणं स्वता ॥ ३७ ॥
एवं यो वेद तत्त्वेन स वेद प्रलयोदयौ ।
पारम्पर्यं चिकित्सा च ज्ञातव्य यच्च किंचन ॥ ३८ ॥
पुरुष आत्मा — अदृष्ट (कर्म), कर्मफल, ज्ञान, अज्ञान, अनुकूल एवं प्रति-
कूल वेदनायें, जन्म, मरण, मेरी स्त्री, मेरा पुत्र आदि ममत्व ये सब बाते इसी
राशिसंज्ञक शरीरपुरुष में प्रतिष्ठित हैं। जो पुरुष इन सब बातों को यथार्थ रूप
से जानता है, वह प्रलय (प्रकृति का महत् आदि में लय) एव उदय (उत्पत्ति)
इन दोनों को जानता है। वह वेदनाओं के पारम्पर्य सम्बन्ध और चिकित्सा को
भी जानता है। इसके अतिरिक्त इस पुरुष में और भी जो कुछ जानने योग्य
होता है वह उस सब को जानता है ॥३७-३८॥
८ चरकसंहिता [ अ० १
भास्तमः सत्यमनृतं वेदाः कर्म शुभाशुभम् ।
न स्यात्कर्ता वेदिता च पुरुषो न भवेद्यदि ॥ ३९ ॥
नाशयो न सुखं नार्तिर्न गतिर्नागतिर्न वाक् ।
न विज्ञानं न शास्त्राणि न जन्म मरणं न च ॥ ४० ॥
न बन्धो न च मोक्षः स्यात्पुरुषो न भवेद्यदि ।
कारणं पुरुषस्तस्मात्कारणज्ञैरुदाहृतः ॥ ४१ ॥
न चेत्कारणमात्मा स्याद्भा'दयः स्युरहेतुकाः ।
न चैषु संभवेज्ज्ञानं न च तैः स्यात्प्रयोजनम् ॥ ४२ ॥
कृतं मृद्दण्डचक्रैश्च कुम्भकारादृते घटम् ।
कृतं मृत्तृणकाष्ठैश्च गृहकाराद्विना गृहम् ॥ ४३ ॥
यो वदेत्स वदेद्देहं संभूय करणैः कृतम् ।
विना कर्तारमज्ञानाद्युक्त्यागमबहिष्कृतः ॥ ४४ ॥
आत्मा—यदि कर्ता, वेदिता (ज्ञाता) पुरुष न हो तो प्रकाश, अन्धकार
सत्य, झूठ, स्वर्गादि के प्रतिपादक वेद, शुभाशुभ कर्म ये सब निष्प्रयोजन हो
जाय । यदि कर्त्ता, बोद्धा पुरुष न हो तो धर्म और अधर्म का कोई आश्रय न
रहे, धर्म और अधर्म निराश्रय हो जाए । सुख, दुःख, जाना, आना, सत्य वाणी,
शास्त्रज्ञान, शास्त्र, जन्म, मरण, बन्ध और मोक्ष कुछ भी न रहे। क्योंकि पुरुष के
लिये ही ये सब हैं । इसलिये कारण को जानने वालो ने पुरुष को कारण कहा
है। यदि आत्मा कारण न हो तो दीप्ति आदि बिना कारण के हो जाय । पुरुष
के न होने पर शरीर की सृष्टि बिना कारण की हो जाय । इतना ही नहीं, इन
भूतों से बने शरीर में ज्ञान (चैतन्य) भी संभव नहीं। (क्योंकि भूतों मे ज्ञान
(चैतन्य) का अभाव है), ज्ञान और चेतना का कारण आत्मा है। आत्मा के
न होने पर ये सब निष्प्रयोजन हो जाते हैं । जिस प्रकार कोई कहे कि 'बिना
कुम्हार के मिट्टी, दण्डे और चक्र ने मिल कर घड़ा बना दिया, अथवा बिना
घर बनाने वाले के मिट्टी तिनके और काष्ठ से घर बन गया, उसी प्रकार कर्ता
रूप आत्मा के बिना ही कारणरूप पञ्चमहाभूतों ने मिल कर स्वय इस शरीर को
बनाया है, यह कहना अज्ञान से पूर्ण और युक्ति आदि प्रमाण से रहित है ॥४४॥
कारणं पुरुषः सर्वैः प्रमाणैरुपलभ्यते ।
येभ्यः प्रमेयं सर्वेभ्यः आगमेभ्य प्रमीयते ॥ ४५ ॥
१ खादय.-यो०