चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
प्र० १ ] शारीरस्थानम् १६
प्र० १ ] शारीरस्थानम् १६
कहते हैं। क्योंकि स्मृति में स्थित वस्तु का स्मरण होना ही चाहिये, उसका
स्मरण न होना ही 'स्मृतिभ्रंश' है॥ १०१ ॥
धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत्कुरुतेऽशुभम् ।
प्रज्ञापराधं तं विद्यात्सर्वदोषप्रकोपणम् ॥ १०२ ॥
प्रज्ञापराध—बुद्धि, धृति और स्मृति से भ्रष्ट हुआ पुरुष जो अशुभ, अहित
कर्म करता है, वह सब शारीरिक एव मानसिक दोषो को कुपित करने वाला
'प्रज्ञापराध' कहा जाता है ॥१०२॥
उदीरणं गतिमतामुदीर्णानां च निग्रहः।
सेवनं साहसानां च नारीणां चातिसेवनम् ॥ १०३ ॥
कर्मकालातिपातश्च मिथ्यारम्भश्च कर्मणाम् ।
विनयाचारलोपश्च पूज्यानां चाभिधर्षणम् ॥ १०४ ॥
ज्ञातानां स्वयमर्थानामहितानां निषेवणम् ।
परमोन्मादिकानां च प्रत्ययानां निषेवणम् ॥ १०५ ॥
अकालादेशसंचारौ मैत्री संक्लिष्टकर्मभिः ।
इन्द्रियोपक्रमोक्तस्य सद्-वृत्तस्य च वर्जनम् ॥ १०६ ॥
ईर्ष्यामानभयक्रोधलोभमोहमदभ्रमाः ।
तज्जं वा कर्म यत्क्लिष्टं यद्वा तद्देहकर्म च ॥ १०७॥
यच्चान्यदीदृशं कर्म रजोमोहसमुत्थितम् ।
प्रज्ञापराधं तं शिष्टा ब्रुवते व्याधिकारणम् ॥ १०८ ॥
गमनशील मूत्र पुरीष के अनुपस्थित वेगो को बलात् निकालना, उपस्थित
मल मूत्रादि के वेगों को रोकना, साहसिक कार्यों का करना, स्त्रियों का अति
सेवन, चिकित्साकाल का अतिक्रमण, मन आदि कार्यों का मिथ्या-आरम्भ,
विनय और आचार का लोप, पूज्य जनों का तिरस्कार, जाने हुए अहितकारा
पदाथो का सेवन, उन्माद रोग में कहे कारणो का सेवन करना, निषिद्ध समयों
और निषिद्ध स्थानों में जाना, पतित आचार वाले मनुष्यों के साथ मैत्री करना,
'इन्द्रियोपक्रमणीय' (सूत्र० ८) अध्याय में कहे सद्वृत्त का पालन न करना,
ईर्ष्या, मान, भय, क्रोध, लोभ, मोह, मद और भ्रम इन मानस दोषों का वा
इन से उत्पन्न निन्दित कर्मों को करना, शरीर को दुःख देने वाले कर्म का करना,
इनके अतिरिक्त और जो भी इस प्रकार रज और मोह से उत्पन्न कर्म होते हैं
उन सब रोग कारक कारणों को शिष्ट मनुष्य 'प्रज्ञापराध' ही कहते हैं ॥ १०८ ॥
२० चरकसंहिता [ अ० १
बुद्ध्या विषमविज्ञानं विषमं च प्रवर्तनम् ।
प्रज्ञापराधं जानीयान्मनसो गोचर हि तत् ॥ १०६ ॥
बुद्धि से विषम ( सम के विपरीत, अयथार्थ ) जानना, विषम रूप मे
प्रवृत्ति करना, यह प्रज्ञापराध है । यह प्रज्ञापराध मानस दोष है ॥ १०६ ॥
निर्दिष्टा कालसंप्राप्तिर्व्याधीना हेतुसंग्रहे ।
चयप्रकोपप्रशमाः पित्तादीना यथा पुरा ॥ ११० ॥
रोगों के हेतु रूप से काल को (कियन्त शिरसीय अध्याय सूत्र० १७ में)
कह चुके है । वही पर पित्तादि का जय, प्रकोप एव प्रशमन भी काल के
कारण कह दिया है ॥११०॥
मिथ्यातिहीनलिङ्गाश्च वर्षान्ता रोगहेतवः ।
जीर्णभुक्तप्रजीर्णान्नकालाकालस्थितिश्च या ॥ १११ ॥
पूर्वमध्यापराह्नाश्च रात्र्या यामाश्रयश्च ये ।
तेषु कालेषु नियता ये रोगास्ते च कालजाः ॥ ११२ ॥
कालज रोग—वर्षा के अन्त वा शरद् से प्रारम्भ होने वाली छः ऋतुए
मिथ्या, हीन और अति लक्षणों वाली होती हैं । मिथ्या लक्षण जैसे ग्रीष्म
ऋतु में शीत होना । हीनलिङ्ग जैसे—गरमी में गरमी का कम होना । अति-
लिङ्ग जैसे—ग्रीष्म में गरमी का अधिक होना इत्यादि । जो भुक्त, जीर्ण
और प्रजीर्ण काल में, जो पूर्वाह्न, मध्याह्न एव अपराह्न मे, और जो
रोग रात्रि के पूर्व प्रहर, मध्यम प्रहर और अपर प्रहर में होते है वे सब
रोग कालजन्य हैं । इन सब में काल कारण होता है । [ अन्न के खाने
पर, पूर्वाह्न में और प्रदोष में श्लेष्मा प्रकुपित होता है । अन्न की पच्यमान
अवस्था में, मध्याह्न में और रात्रि के मध्य प्रहर मे पित्त और अन्न के जीर्ण
होने पर, अपराह्न मे और तीसरे याम मे वायु कुपित होता है । इन समयों में
इन्ही दोषों के रोग होते हैं ] ॥ १११-११२ ॥
अन्येद्युष्को द्वयहग्राही तृतीयकचतुर्थकौ ।
स्वे स्वे काले प्रवर्तन्ते काले ह्येषा बलागमः ॥ ११३ ॥
एते चान्ये च ये केचित्कालजा विविधा गदाः ।
अनागते चिकित्स्यास्ते बलकालौ विजानता ॥ ११४ ॥
प्रतिदिन होने वाला, 'द्वयहग्राही' दिन में दो बार होने वाला, 'तृतीयक'
एक दिन छोड़ कर तीसरे दिन आने वाला, 'चतुर्थक' बीच में दो दिन छोड़
कर होने वाला ( ज्वर ) अपने अपने समय में होते हैं, यही इनके बल का