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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अब हम गुल्म की चिकित्सा का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने

३४६ चरकसंहिता [ अ० ५
पञ्चमोऽध्यायः
अथातो गुल्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम गुल्म की चिकित्सा का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
सर्वप्रजानां पितृवच्छरण्यः पुनर्वसुर्भूतभविष्यदीशः ।
चिकित्सितं गुल्मनिबर्हणार्थं प्रोवाच सिद्धं वदतां वरिष्ठः ॥ ३ ॥
विट्श्लेष्मपित्तातिपरिस्रवाद्वा तैरैव वृद्धैरतिपीडनाद्वा ।
वेगैरुदीर्णैर्विहितैरधो वा बाह्याभिघातैरतिपीडनैर्वा ॥ ४ ॥
रूक्षान्नपानैरतिरोचितैर्वा शोकेन मिथ्याप्रतिकर्मणा वा ।
विचेष्टितैर्वा विषमातिमात्रैः कोष्ठे प्रकोपं समुपैति वायुः ॥ ५ ॥
कफं च पित्तं च स दूषयित्वा प्रोद्धूय मार्गान्विनिबद्ध्य ताभ्याम् ।
हृन्नाभिपार्श्वोदरबस्तिशूलं करोत्यधो याति न बद्धमार्गः ॥ ६ ॥
सब प्राणियों के लिये पिता के समान मंगलकारी भूत और भविष्य के
स्वामी, वाग्मियों में श्रेष्ठ, पुनर्वसु ने गुल्म के नाश के लिये खूब सुपरीक्षित
चिकित्सा का उपदेश किया ।
कोष्ठ मे वायु के कुपित होने के कारण—( १ ) पुरीष, कफ और पित्त
इनके अतिस्राव से, अथवा ( २ ) इनके अधिक बढ़कर रुकावट पैदा करने
से, ( ३ ) मलमूत्र के उपस्थित वेगों को रोकने से, ( ४ ) चोट लगने से,
( ५ ) अति दबाव पड़ने से, ( ६ ) रूक्ष, खान-पान के अति सेवन से, ( ७ )
शोक से, ( ८ ) वमन-विरेचन के मिथ्याचरण से और ( ९ ) विषम चेष्टाओ
से कोष्ठ में वायु प्रकुपित हो जाता है। यह कुपित वायु कफ और पित्त को
दूषित और अपने स्थान से विचलित करके मागों को रोक लेता है। इससे
हृदय, नाभि, पार्श्व, उदर तथा बस्ति में शूल उत्पन्न होता है। मार्ग के रुकने
से वायु नीचे गुदा की ओर नही जा सकता ॥ ३-६ ॥
पक्वाशये पित्तकफाशये वा स्थितः स्वतन्त्रः परसंश्रयो वा ।
स्पर्शोपलभ्यः परिपिण्डितत्वाद् गुल्मो यथादोषमुपैति नाम ॥ ७ ॥
पक्वाशय में, पित्ताशय में, कफाशय में स्वतन्त्र या परतन्त्र रूप से जब वायु
स्पर्श से जानने योग्य पिण्डाकार रूप मे हो जाता है तब दोषानुसार इसके
वात-गुल्म आदि नाम होते हैं।

३४६ चरकसंहिता [ अ० ५
पञ्चमोऽध्यायः
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अथातो गुल्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम 'गुल्म की चिकित्सा' का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
सर्वप्रजानां पितृवच्छरण्यः पुनर्वसुर्भूतभविष्यदीक्षः ।
चिकित्सितं गुल्मनिबर्हणार्थं प्रोवाच सिद्धं वदतां वरिष्ठः ॥ ३ ॥
विट्श्लेष्मपित्तातिपरिस्रवाद्वा तैरैव वृद्धैरतिपीडनाद्वा ।
वेगैरुदीर्णैर्विहतैरधो वा बाह्याभिघातैरतिपीडनैर्वा ॥ ४ ॥
रूक्षान्नपानैरतिसेवितैर्वा शोकेन मिथ्याप्रतिकर्मणा वा ।
विचेष्टितैर्वा विषमातिमात्रैः कोष्ठे प्रकोपं समुपैति वायुः ॥ ५ ॥
कफं च पित्तं च स दूषयित्वा प्रोद्धूय मार्गान्विनिबद्धय ताभ्याम् ।
हृन्नाभिपार्श्वोदरबस्तिशूलं करोत्यधो याति न बद्धमार्गः ॥ ६ ॥
सब प्राणियों के लिये पिता के समान मगलकारी, भूत और भविष्य के
स्वामी, वाग्मियों में श्रेष्ठ, पुनर्वसु ने गुल्म के नाश के लिये खूब सुपरिक्षित
चिकित्सा का उपदेश किया ।
कोष्ठ में वायु के कुपित होने के कारण—( १ ) पुरीष, कफ और पित्त
इनके अतिस्राव से, अथवा ( २ ) इनके अधिक बढ़कर रुकावट पैदा करने
से, ( ३ ) मल-मूत्र के उपस्थित वेगा का रोकने से, ( ४ ) चोट लगने से,
( ५ ) अति दबाव पड़ने से, ( ६ ) रूक्ष, खान-पान के अति सेवन से, ( ७ )
शोक से, ( ८ ) वमन-विरेचन के मिथ्याचरण से ओर ( ६ ) विषम चेष्टाओ
से कोष्ठ में वायु प्रकुपित हा जाता है । यह कुपित वायु कफ ओर पित्त को
दूषित और अपने स्थान से विचलित करके मार्गों को रोक लेता है । इससे
हृदय, नाभि, पार्श्व, उदर तथा बस्ति में शूल उत्पन्न होता है । मार्ग के रुकने
से वायु नीचे गुदा की ओर नही जा सकता ॥ ३-६ ॥
पक्वाशये पित्तकफाशये वा स्थितः स्वतन्त्रः परसंश्रयो वा ।
स्पर्शोपलभ्यः परिपिण्डितत्वाद् गुल्मो यथादोषमुपैति नाम ॥ ७ ॥
पक्वाशय में, पित्ताशय में, कफाशय में स्वतन्त्र या परतन्त्र रूप से जब वायु
स्पर्श से जानने योग्य पिण्डाकार रूप में हो जाता है तब दोषानुसार इसके
वात-गुल्म आदि नाम होते हैं।

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३४७
मे परतन्त्र रहता है। यही वायु जब पित्ताशय मे पित्ताश्रित होकर रहे तब
पित्त-गुल्म होता है। पक्वाशय मे स्वतन्त्र रूप से रहने पर वात-गुल्म, कफाशय
मे कफ के आश्रित रहने पर कफ-गुल्म होता है ] ॥ ७ ॥
बस्तौ हि नाभ्या हृदि पार्श्वयोर्वा स्थानानि गुल्मस्य भवन्ति पञ्च ।
पञ्चात्मकस्य प्रभव तु तस्य वक्ष्यामि लिङ्गानि चिकित्सितं च ॥ ८ ॥
पाँच प्रकार के (वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य सन्निपातिक और रक्त-
जन्य) गुल्मों के पाँच स्थान हैं। जैसे—बस्ति, नाभि, हृदय और दोनों
पार्श्व । इन पाँचों प्रकार के गुल्मों का निदान, लक्षण और चिकित्सा आगे
कहेंगे ॥ ८ ॥
रूक्षान्नपानं विषमातिमात्रं विचेष्टितं वेगविनिग्रहश्च ।
शोकोऽभिघातोऽतिबलक्षयश्च १ निरन्नता चानिलगुल्महेतुः ॥ ९ ॥
यः स्थानसंस्थानरुजा विकल्पं विड्वातसङ्गं गळवक्त्रशोषम् ।
श्यावारुणत्वं शिशिरज्वरं च हृत्कुक्षिपार्श्वांसशिरोरुजं च ॥ १० ॥
करोति जीर्णेऽभ्यधिकं प्रकोपं भुक्ते मृदुत्वं समुपैति यश्च ।
वातात्स गुल्मो न च तत्र रूक्षं कषायतिक्तं कटु चोपशेते ॥ ११ ॥
वात-गुल्म के कारण—रूखा खानपान, अति अधिक विषम चेष्टाओं का
करना, मल मूत्र के उपस्थित वेगो का रोकना, शोक, चिन्ता, मल का अतिशय
क्षीण होना, भोजन का न करना (उपवास), वात-गुल्म का कारण है।
वात-गुल्म के लक्षण—वात-गुल्म का कोई स्थान निश्चित नहीं रहता, कभी
ऊपर, कभी उधर, न इसका कोई आकार निश्चित होता है, कभी छोटा और
कभी बड़ा, न इसमें वेदना ही निश्चित रहती है, कभी अधिक वेदना होती है
और कभी नहीं होती। मल और वायु का अवरोध रहता है, गला और मुख
शुष्क हो जाता है। शरीर का रंग काला-लाल हो जाता है, शीत-ज्वर सा प्रतीत
होता है। हृदय, कुक्षि, पार्श्व और कन्धा मे दर्द रहती है, भोजन के जीर्ण
होने पर बहुत अधिक बढता है, परन्तु भोजन करने पर कम हो जाता है, ये
वात गुल्म के लक्षण हैं, इस गुल्म में कषाय, तिक्त और कटु रस लाभ नहीं
करते ॥ ९-११ ॥
कट्वम्लतीक्ष्णोष्णविदाहिरूक्षक्रोधातिमद्यार्कहुताशसेवा ।
आमाभिघातो रुधिरं च दुष्टं पैत्तस्य गुल्मस्य निमित्तमुक्तम् ॥ १२ ॥
ज्वरः पिपासा वदनाङ्गरागः शूलं महज्जीर्यति भोजने च ।
१ 'ऽतिबलक्षयश्च' इति च पाठः ।

३४८ चरकसंहिता [ अ० ५
स्वेदो विदाहो व्रणवच्च गुल्मः स्पर्शासहः पैत्तिकगुल्मरूपम् ॥ १३ ॥
पित्त-गुल्म का कारण—कटु, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण, विदाहि, रूक्ष भोजनो
से, क्रोध, अति मद्य, सूर्य और अग्नि के सेवन से, आमाभिघात (विदग्धाजीर्ण)
से और दूषित रक्त से पित्त-गुल्म उत्पन्न होता है।
पित्त-गुल्म के लक्षण—ज्वर, प्यास का लगना, शरीर का लाल वर्ण, भोजन
के जीर्ण होने के समय तीव्र शूल, पसीना, विदाह, व्रण के समान गुल्म मे हाथ
के स्पर्श का सहन न करना ये पैत्तिक गुल्म के लक्षण हैं ॥ १२-१३ ॥
शीत गुरु स्निग्धमचेष्टनं च सम्पूरणं प्रस्वपनं दिवा च ।
गुल्मस्य हेतुः कफसंभवस्य, सर्वैस्तु दुष्टै र्निचयात्मकस्य ॥ १४ ॥
स्तैमित्यशीतज्वरगात्रसाद्धल्लासकासारुचिगौरवाणि ।
शैत्यं रुगल्पा कठिनोन्नतत्वं गुल्मस्य रूपाणि कफात्मकस्य ॥ १५ ॥
कफ-गुल्म का कारण—शीतल, गुरु, स्निग्ध खानपान, चेष्टा या श्रम न
करना, तृप्तिपूर्वक आहार, दिन मे सोना कफ गुल्म के कारण है। तीनो दोषों
को दूषित करने वाले आहार विहार सान्निपातिक गुल्म को उत्पन्न करते है ।
कफ-गुल्म के लक्षण—स्तिमितता (गीले वस्त्र से आच्छादित की भांति
अनुभव ), शीत ज्वर, अंगो मे पीडा या भारीपन, वमन की इच्छा, जी मच-
लना, कास, अरुचि, भारीपन, शीत प्रतीति, थोडा थोडा दर्द, गुल्म का कठिन
तथा ऊपर को उठा होना ये कफजन्य गुल्म के लक्षण हैं ॥१४-१५॥
निमित्तलिङ्गान्युपलभ्य गुल्मे द्विदोषजे दोषबलाबलं च ।
व्यामिश्रलिङ्गानपरांस्तु गुल्मांस्त्रीनादिशेदौषधकल्पनार्थम् ॥ १६ ॥
द्विदोषजन्य गुल्म मे निदान, लक्षण ओर दोषों के बलाबल को देख कर
शेष तीन द्विदोषजन्य ( वातपित्तज, पित्तकफज, वातकफज ) गुल्मों को औषध-
क्रिया (चिकित्सा कार्य) मे जानना चाहिये ॥ १६ ॥
महारुजं दाहपरीतमुश्मवद्घनोन्नतं शीघ्रविदाहि दारुणम् ।
मनःशरीराग्निबलापहारिणं त्रिदोषजं गुल्ममसाध्यमादिशेत् ॥ १७ ॥
सन्निपातजन्य गुल्म के लक्षण—अतिशय वेदनायुक्त, दाह से युक्त,
पत्थर की भांति कठोर और उठा हुआ, शीघ्र विदाह को प्राप्त होने वाला
(शीघ्रपाकी ), मन, शरीर और अग्नि के बल को हरने वाला त्रिदोषजन्य गुल्म
है, यह असाध्य है ॥१७॥
ऋतावुनाहारतया भयेन विरूक्षणैर्वेगविनिग्रहैश्च ।
संस्तम्भनोल्लेखनयोनिदोषैर्गुल्मः स्त्रियं रक्तभवोऽभ्युपैति ॥ १८ ॥