चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ६ ] \hspace{150pt} चिकित्सितस्थानम् \hspace{150pt} ३७७
अ० ६ ] \hspace{150pt} चिकित्सितस्थानम् \hspace{150pt} ३७७
\hspace{100pt} क्षारोपमं कालमथापि नीलम् ।
हारिद्रमाञ्जिष्ठमथापि रक्तमेतान्प्रमेहान्षडुशन्ति पैत्तान् ॥ १० ॥
\hspace{20pt} पित्तजन्य छ प्रमेह—( १ ) क्षार के समान 'क्षारमेह', ( २ ) काले वर्ण
का मूत्र 'कालमेह', ( ३ ) नीलेवर्ण का मूत्र 'नीलमेह', ( ४ ) हल्दी के समान
वर्ण का मूत्र 'हारिद्रमेह', ( ५ ) मजीठ के वर्ण का 'माञ्जिष्ठमेह', ( ६ )
लालवर्ण का 'रक्तमेह', ये छ. पित्तजन्य प्रमेह है ॥ १० ॥
मज्जौजसा वा वसयाऽन्वित वा लसीकया वा सतन विबद्धम् ।
चतुर्विधं मूत्रयतीह वाताच्छ्लेषेषु धातुष्वपकर्षितेषु ॥ ११ ॥
वर्णं रस स्पर्शमथापि गन्ध यथास्वदोष भजते प्रमेहः ।
श्यावारुणो वातकृतः सशूलो मज्जादिसाद्गुण्यमुपैत्यसाध्यः ॥ १२ ॥
\hspace{20pt} चार प्रकार के वातिक प्रमेह—( १ ) मजामेह, ( २ ) ओजामेह, ( ३ )
वसामेह ओर ( ४ ) लसीकामेह ( जिसमे लसीका की तारे निकलती है ) ये
चार प्रमेह आरम्भक धातुओ ( मज्जा, ओज आदि ) के क्षीण होने पर होते
है । अथवा पित्त और कफ की अपेक्षाकृत न्यूनता होने से प्रमेह होते है ।
\hspace{20pt} प्रमेह मे अपने वात आदि दोषो के अनुसार वर्ण, रस, स्पर्श अथवा गन्ध
होता है । असाध्य वातजन्य प्रमेह मे श्याव, अरुण, शूलयुक्त तथा मज्जा,
वसा, लसीका या ओज के समान गुण होता है ॥११-१२॥
स्वेदोऽङ्गगन्धः शिथिलाङ्गता तु शय्यासनस्वप्नसुख रतिश्च ।
हृन्नेत्रजिह्वाश्रवणोपदेहा घनाङ्गता केशनखातिवृद्धिः ॥ १३ ॥
शीतप्रियत्व गलतालुशोषो माधुर्यमास्ये करपाददाहः ।
भविष्यतो मेहगदस्य रूपं मूत्रेऽभिधावन्ति पिपीलिकाश्च ॥ १४ ॥
\hspace{20pt} पूर्वरूप—पसीना, शरीर से गन्ध का आना, अगा मे शिथिलता, लेटने,
बैठने और सोने मे प्रीति, हृदय, नेत्र, जीभ और कान मे मैल का आना,
शरीर मे मोटापा, केश, नखो का अधिक बढना, शीत की चाह, गला और
तालु का शुष्क होना, मुख मे मधुरता, हाथ और पाव के तलुवे मे जलन, मूत्र
पर ( मधुरता से ) चिउटियो का आना, ये प्रमेह के पूर्वरूप है ॥ १३-१४ ॥
स्थूलः प्रमेही बलवानिहैंकः कृशस्तथैकः परिदुर्बलश्च ।
संबृंहणं तत्र कृशस्य कार्यं संशोधनं दोषबलाधिकस्य ॥ १५ ॥
\hspace{20pt} प्रमेह रोगी दो प्रकार के हैं। जैसे एक स्थूल और बलवान्, दूसरा कृश
तथा दुर्बल शरीर का। इनमे से कृश व्यक्ति का बृं हण करना चाहिये और
प्रबल दोष ओर अधिक बलवान् पुरुष मे सशोधन करना चाहिये । चिकित्सा
३७८ चरकसंहिता [ अ० ६
दो प्रकार की है, सशोधन और सशमनी। इनमे जिन पुरुषो की माता-पिता
के द्वारा जन्म से प्रमेह होता है वे कृश होते है और जिन को अधिक खाने से
वा स्निग्ध भोजन से होता है, वे बलवान् होते है।
[ दो प्रकार के प्रमेह होते है (१) सहज, और (२) अपथ्य से उत्पन्न।
माता-पिता के बीजदोष से उत्पन्न 'सहज' है, प्रतिकूल आहार से उत्पन्न
'अपथ्यज' होता है। प्रथम प्रकार का प्रमेही कृश, अल्पभोजी और प्यास
बहुत अनुभव करता है। दूसरे प्रकार का प्रमेही स्थूल, बहुत खानेवाला,
सेज पर पडे रहने वाला, आलसी होता है। [ सुश्रुत।]॥ १५॥
स्निग्धस्य योगा विविधाः प्रयोज्याः कल्पोपदिष्टा मलशोधनाय।
ऊर्ध्वं तथाऽधश्च मलेऽपनीते मेहेषु सन्तर्पणमेव कार्यम् ॥ १६॥
उपचार—(१) स्निग्ध रोगी के मल के सशावन के लिये कल्पस्थान ने
वर्णित नाना प्रकार के यागा का प्रयाग करे। इसके लिये वमन और विरेचन
का प्रयाग करे। वमन और विरेचन द्वारा मल निकल जाने पर प्रमेह मे
सन्तर्पण ही कर। स्नेहन के लिये सरसा, अलसी, इगुदी आदि के तैल हो या
प्रियग्वादि गण से सिद्ध घृत आदि से स्नेहन कर ॥ १६ ॥
गुल्मः क्षयो मेहनबस्तिशूलं मूत्रग्रहश्चाप्यपतर्पणेन ।
प्रमेहिणः स्युः परिबृंहणानि १ कार्याणि तस्य प्रसमीक्ष्य वह्निम् ॥१७॥
संशोधनं नार्हति यः प्रमेही तस्य क्रिया सशमनी प्रयोज्या ।
मन्थाः कषाया यवचूर्णलेहाः प्रमेहशान्त्यै लघवश्च भक्ष्याः ॥ १८ ॥
ये विष्किरा ये प्रतुदा विहङ्गास्तेषा रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः ।
यवौदनं रूक्षमथापि वाट्यं मद्यात्ससक्तूनपि चायपूपान् ॥ १६ ॥
मुद्गादियूषैरथ तिक्तशाकैः पुराणशाल्योदनमाददीत ।
दन्तीङ्गुदीतैलयुत प्रमेही तथाऽतसीसर्षपतैलयुक्तम् ॥ २० ॥
सषष्टिकं स्यात्तृणधान्यमन्न यवप्रधानस्तु भवेत्प्रमेही ।
यवस्य भक्ष्यान्विविधास्तथाऽद्यात्कफप्रमेही मधुसप्रयुक्तान् ॥२१॥
निशिस्थिताना त्रिफलाकषायैः स्युस्तर्पणाः क्षौद्रयुता यवानाम् ।
तान्सीधुयुक्तान्पिबेत्प्रमेही प्रायोगिकान्मेहवधार्थमेव ॥ २२॥
(२) प्रमेह-रोगी को अपतर्पण कराने से गुल्म, क्षय, मूत्रेन्द्रिय वा बस्ति
मे शूल, मूत्रग्रह (मूत्र का कम आना) हो जाता है। इसके लिये रोगी की
अग्नि देखकर बृंहण चिकित्सा करे।
१ 'परितर्पणानि' इति च पाठ ।