चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] ४ शारीरस्थानम् ४९
अ० ३ ] ४ शारीरस्थानम् ४९
आत्मा से उत्पन्न होता है, सात्म्य से उत्पन्न होता है, रस से उत्पन्न होता है
और सत्त्व भी गर्भ की उत्पत्ति मे एक घटक है ॥ २१ ॥
भरद्वाज उवाच—यद्ययमेषां नानाविधाना गर्भकराणां भावानां
समुदायादभिनिर्वर्तते गर्भः, कथमयं सधीयते, यदि चापि संधीयते
कस्मात् समुदायप्रभवः सन् गर्भो मनुष्यविग्रहेण जायते, मनुष्यश्च
मनुष्यप्रभव उच्यते। तत्र चेदिष्टमेतद्यस्मान्मनुष्यो मनुष्यप्रभवस्तस्मा-
देव मनुष्यविग्रहेण जायते, यथा—गोर्गोप्रभवः, यथा-चाश्वादश्वप्रभवः
इत्येवं सति यदुक्तमग्रे समुदायात्मक इति तदयुक्त, यदि च मनुष्यो
मनुष्यप्रभव , कस्माज्जडान्ध-कुब्ज-मूक-वामन-मिन्मिन-व्यङ्गोन्मत्त-कुष्ठ-
किलासिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा न भवन्ति । अथाऽत्रापि बुद्धिरेवं
स्यात्—स्वेनैवायमात्मा चक्षुषा रूपाणि वेत्ति, श्रोत्रेण शब्दान्, घ्राणेन
गन्धान् ,रसनेन रसान्, स्पर्शनेन स्पर्शान्, बुद्ध्या बोद्धव्यमित्यनेन हेतुना
न जडादिभ्यो जाताःपितृसदृशा भवन्ति।अत्रापि प्रतिज्ञाहानिदोषः स्यात्,
एवमुक्ते ह्यात्मा सत्त्विन्द्रियेषु ज्ञः स्यादसत्त्वज्ञः। यत्र चैतदुभयं सभ-
वति ज्ञत्वमज्ञत्व च, सविकारश्चात्मा। यदि च दर्शनादिभिरात्मा
विषयान्वेत्ति, निरिन्द्रियो दर्शनादिविरहादज्ञः स्यात्, अज्ञत्वादकारणं,
अकारणत्वाच्च नात्मेति वाग्वस्तुमात्रमेतद्वचनमनर्थक स्यादिति होवाच
भरद्वाजः ॥ २२ ॥
इस पर भरद्वाज मुनि फिर शका करते है—यदि इन गर्भकारक भिन्न २
अनेक प्रकार के पदार्थो के समुदाय से गर्भ बनता है, तो यह गर्भ (शुक्र-
शोणित ) जीव रूप से किस प्रकार से सम्बन्धित होता है। यह भी मान ले कि
सम्बन्धित हो जाता है, तो समुदाय के कारण उत्पन्न होने वाला गर्भ किस
प्रकार से मनुष्य रूप में हो जाता है ? यदि यह भी मान लिया जाय कि मनुष्य
मनुष्य से उत्पन्न हुआ है इसलिये वह मनुष्य रूप से उत्पन्न होता कहा जाता
है ? जिस प्रकार गाय मे गाय उत्पन्न होता है और घोड़े से घोड़ा उत्पन्न होता
है, तो पहिले जो यह कहा है कि माता आदि क समुदाय से गर्भ उत्पन्न होता
है, यह ठीक नही । ओर यदि मनुष्य से मनुष्य की उत्पत्ति मानोगे तो जड़बुद्धि
अन्धे, कुबड़े, गूंगे, नाटे, मिन्मिने, श्याममण्डल, पागल, कोढ़ी, किलास आदि के
रोगी मनुष्यों से उत्पन्न सन्तान पिता के समान क्यों नही होतो ? अन्धे से अन्धा
जड़ से जड़बुद्धि होना चाहिये । परन्तु ऐसा सर्वत्र नहीं होता। इस पर भी यदि
इस प्रकार से मानें कि आत्मा अपने आप चक्षु से रूपो को जानता है, अपने
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कानों से ही शब्दों को सुनता है, अपनी नासिका से गन्धों को पहिचानता है,
अपनी ही रसना से रसों को पहिचानता है, अपनी ही त्वचा से स्पर्श करता है,
अपनी बुद्धि से जानने योग्य बातों को जानता है, इस कारण से जड़ आदि
माता पिता से उत्पन्न सन्तान पूर्ण रूप से पिता के समान नहीं होती तो प्रतिज्ञा-
हानि दोष आता है । क्योंकि ऐसा मानने से आत्मा इन्द्रियो के रहते ज्ञानी और
न रहते अज्ञानी हो जाता है । इस प्रकार आत्मा में ज्ञानी और अज्ञानी ये
दोनों गुण होने सम्भव हों वह आत्मा विकार-प्रकृतिवाला हो जायेगा, परन्तु
आत्मा ‘निर्विकार’ कहा जाता है । यदि चक्षु आदि इन्द्रियों से युक्त होने पर
आत्मा विषयों को जानता है, तो वह निरिन्द्रिय अवस्था में ( चक्षु आदि के
अभाव में ) अज्ञानी बनेगा । अज्ञ होने से अपने उत्पत्ति का कारण भी नहीं हो
सकेगा । कारण न होने से आत्मा की सत्ता भी नहीं रही । इसलिये ‘आत्मा’
यह वचन कहना अर्थरहित शब्दमात्र ही रह जाता है ॥ २२ ॥
आत्रेय उवाच—पुरस्तादेतत्प्रतिज्ञातं—सत्त्वं जीवस्पृक् शरीरेणा-
भिसंबध्नातीति, तस्मात्तु समुदायात्मकः सन् गर्भो मनुष्यविग्रहेण
जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते । तद्वक्ष्यामः-॥ २३ ॥
भगवान् आत्रेय ने कहा—प्रथम यह कहा है कि सत्त्वसंज्ञक मन जीव
आत्मा को स्पृक्शरीर के साथ का सम्बन्ध कराता है, क्योंकि समुदाय द्वारा
उत्पन्न गर्भ मनुष्य रूप से बनता है, मनुष्य से मनुष्य ही उत्पन्न होता कहा
जाता है, उसकी व्याख्या करते हैं ॥ २३ ॥
भूताना चतुर्विधा योनिर्भवति—जरायुवाण्डस्वेदोद्भिदः । तासा
खलु चतसृणामपि योनीनामेकैका योनिरपरिसंख्येयभेदा भवति, भूता-
नामाकृतिविशेषापरिसंख्येयत्वात् । तत्र जरायुजानामण्डजाना च प्राणि-
नामेते गर्भकरा भावा यां या योनिमापद्यन्ते तस्यां तस्यां योनौ तथा-
तथारूपा भवन्ति, तद्यथा कनक-रजत-ताम्र-त्रपु-सीसकान्यासिच्यमा-
नानि तेषु तेषु मधूच्छिष्टविग्रहेषु। ते यदा मनुष्यबिम्बमापद्यन्ते तदा
मनुष्यविग्रहेण जायन्ते, तस्मात्समुदायात्मकः सन् गर्भो मनुष्यविग्र-
हेण जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते, तयोनित्वात् ॥ २४ ॥
प्राणियों की योनि चार प्रकार की है । जरायु, अण्ड, स्वेद और उद्भिद्
इन चारों प्रकार की योनियों में एक एक योनि के असख्य भेद हैं, क्योंकि प्राणी
की आकृतियों के भेद असख्य हैं ।
इन में जरायुज तथा अण्डज प्राणियों के गर्भोत्पादक शुक्र, शोणित आदि
पदार्थ जिस जिस योनि में पहुचते हैं, उसी उसी योनि में उसी उसी रूप के हो