चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १५ ] चिकित्तिसस्थानम् ५६६
अ० १५ ] चिकित्तिसस्थानम् ५६६
तस्य लिङ्गमजीर्णस्य विष्टम्भः सदनं तथा ।
शिरसो रुक् च मूर्च्छा च भ्रमः पृष्ठकटिग्रहः ॥ ४५ ॥
जृम्भाऽङ्गमर्दस्तृष्णा च ज्वरश्छर्दिः प्रवाहणम् ।
अरोचकोऽविपाकश्च ।
सामान्य लक्षण—विष्टम्भ ( अन्नका कोष्ठ मे रुका रहना ), सदन ( शिथि-
लता ), शिर मे दर्द, मूर्च्छा, भ्रम, पीठ मे वेदना, कमर मे दर्द, जम्भाई का
आना, अङ्गों मे पीड़ा, प्यास, ज्वर, वमन, प्रवाहण ( बार-बार पतला मल
आना ), अरुचि और अविपाक ( भोजन का ठीक पाक न होना ) ये अजीर्ण
के सामान्य लक्षण है ॥ ४५-॥
घोरमन्नविषं च तत् ॥ ४६ ॥
संसृज्यमानं पित्तेन दाहं तृष्णा मुखामयान् ।
जनयत्यम्लपित्तं च पित्तजांश्चापरान् गदान् ॥ ४७ ॥
यक्ष्मपीनसमेहादीन्कफजान्कफसङ्गतः ।
करोति वातसंसृष्टं वातजांश्चापरान् गदान् १ ॥ ४८ ॥
मूत्ररोगांश्च मूत्रस्थं कुक्षिरोगान् शकृद्गतम् ।
रसादिभिश्च संसृष्टं कुर्याद्रोगान् रसादिजान् ॥ ४६ ॥
यह अन्न अब भयानक विष के समान हो जाता है। जिस समय यह अन्न-
विष पित्त के साथ मिल जाता है, तब जलन, प्यास तथा मुख के रोगों को ओर
अम्लपित्त को तथा पित्तजन्य अन्य विकारो को उत्पन्न करता है२ ।
कफ के साथ मिल कर यह अन्न-विष यक्ष्मा३, पीनस, प्रमेह आदि कफजन्य
रोगा को उत्पन्न करता है ।
यह अन्नविष वायु के साथ मिल कर विष्टम्भ आदि पूर्व कहे लक्षणो के
साथ वात से उत्पन्न शूल, अफ़ारा आदि अन्य अनेक रागों को उत्पन्न करता है ।
१. 'वातजांश्च गदान् बहून्' इति वा । २ अम्ल-पित्त के लक्षण दूसरे ग्रन्थ
मे इस प्रकार हैं—'अविपाकक्लमत्क्लेदतिक्ताम्लोद्गारगौरवैः ।
हृत्कण्ठदाहरुचिमिश्चाम्लपित्त विनिर्दिशेत् ॥'
भोजन का न पकना, क्लान्ति होना, वमन की सी इच्छा, खट्टे डकार,
भारीपन, हृदय और गले मे जलन और भोजन की अनिच्छा आदि लक्षणों से
अम्ल-पित्त को जाने ।
३. यक्ष्मा-रोग त्रिदोषज होता है तो भी स्रोतो के रुकने पर कफ ही मुख्य
उपद्रव उत्पन्न करता है इसलिये उसको कफजन्य कहा है ( चक्र० ) ।
६०० चरकसंहिता [अ० १५
यह अन्न-विष मूत्र मे स्थित होकर मूत्रसम्बन्धी रोगों को, मल मे आश्रित
होकर उदर रोगों को, रस, रक्त आदि धातुओ मे आश्रित होकर रस आदि से
उत्पन्न होने वाले रोगों को उत्पन्न करता है१ ॥ ४६-४९ ॥
विषमो धातुवैषम्यं करोति विषमं पचन्।
तीक्ष्णो मन्धेन्धनो धातून्विशोषयति पावकः॥ ५०॥
विषम अग्नि अन्न का पाक विषम रूप मे करके धातुओ मे भी विषमता
उत्पन्न कर देता है। तीक्ष्णाग्नि को यदि आहार रूप इन्धन न मिले तो वह
धातुओं को ही सुखाने लगता है ॥५०॥
युक्तं भुक्तवतो युक्तो धातुसाम्यं समं पचन्।
दुर्बलो विदहत्यान्नं तद्यात्यूर्ध्वमधोऽपि वा॥ ५१॥
युक्त अर्थात् समाग्नि, हित और मात्रा मे खाये युक्त आहार को समता से
परिपाक करके धातुओं को समानावस्था मे रखता है। दुर्बल अग्नि अन्न को
विदग्ध करता है, यह विदग्ध अन्न या तो ऊर्ध्वमार्ग से (वमन के रूप मे)
निकल जाता है या अधोमार्ग, गुदा द्वार से विरेचन के रास्ते मलरूप मे
बाहर होता है॥ ५१॥
अधस्तु पक्वमामं वा प्रवृत्तं ग्रहणीगदः।
उच्यते सर्वमेवान्नं प्रायो ह्यस्य विदह्यते॥ ५२॥
जब विदग्ध अन्न पके वा कच्चे मल के रूप मे नीचे के गुदा-मार्ग से
निकलता है, तब उसको 'ग्रहणी' रोग कहते है। इस ग्रहणी-रोग मे सब प्रकार
का अन्न प्रायः विदग्ध हो जाता है। रोगी स्निग्ध, रूक्ष, गुरु या लघु जो भी
कुछ खाता है वह सब विदग्ध हो जाता है ॥५२॥
अतिसृष्टं विबद्धं वा द्रवं तदुपवेश्यते।
तृष्णारोचकवैरस्यप्रसेकतमकान्वितः॥ ५३॥
शूनपादकरः सास्थिपर्वरुक् छर्दनं ज्वरः।
लोहाम२गन्धिस्तिक्ताम्ल उद्गारश्चास्य जायते॥ ५४॥
ग्रहणी के लक्षण—ग्रहणी के रोगी का मल बहुत पतला अथवा बंधा हुआ
या पानी के समान द्रवरूप होता है। रोगी को प्यास, अरुचि, मुख मे विरसता,
मुख मे थूक का बहुत आना और तमक-श्वास रहता है। रोगी के हाथ-पाय पर
१ रोगो के लिये देखिये चरक सूत्रस्थान अ० २८ ॥
२. 'लोहाम' इति पाठान्तरम् । 'लोहानुगन्धि' शब्द का अर्थ 'लोहे के
समान गन्ध' यह अर्थ आयुर्वेदाचार्य जयदेवजी ने किया है।
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०१
सूजन हो जाती है। अस्थियो तथा पोरुओ मे दर्द रहता है। रोगी को वमन
और ज्वर रहता है। रोगी को जो डकार (उद्गार) आते है उनमे रक्त की सी
गन्ध रहती है, ये उद्गार तिक्त (कटु) और अम्ल रससे युक्त होते हैं १॥५३-५४॥
पूर्वरूपं तु तस्येदं तृष्णाऽऽलस्यं बलक्षयः ।
विदाहोऽन्नस्य पाकश्च चिरात्कायस्य गौरवम् ॥ ५५ ॥
ग्रहणी के पूर्वरूप - प्यास, आलस्य, बल की क्षीणता, अन्न का विदाह
होना, अन्न का देर मे पचना और शरीर मे भारीपन प्रतीत होना ये ग्रहणी-रोग
के पूर्वरूप हैं ॥ ५५ ॥
अग्न्याधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणाद् ग्रहणी मता ।
नाभेरुपरि सा ह्यग्निवलोपस्तम्भवृंहिता ॥ ५६ ॥
अपक्वं धारयत्यन्नं पक्कं सृजति पार्श्वतः ।
दुर्बलाग्निबलाद् दुष्टा त्वाममेव २ विमुञ्चति ॥ ५७॥
ग्रहणी का स्थान और निरुक्ति-ग्रहणी का स्थान अग्नि का आश्रय स्थान है।
वह अन्न को ग्रहण करती है इस कारण इस को 'ग्रहणी' कहते है। यह ग्रहणी
भाग नाभि से ऊपर कोष्ठ मे स्थित है। वहा पर यह ग्रहणी अग्नि के बल की
सहायता से स्थित और पुष्ट होकर आमाशय से आये कच्चे (अपरिपक्व) अन्न
को धारण करती है और दूसरे पके हुए अन्न को (क्षुद्र आतो मे) त्याग करती
हैं। जब अग्नि दुर्बल होती है तो दुष्ट हुई ग्रहणी अपक्व अन्न को नही पचाती।
वैसे का वेसे ही न पचे हुए अन्न को वह ग्रहणी इस मार्ग से त्याग करने
लगती है ३ ॥ ५६-५७ ॥
१. सुश्रुत में कहा भी है-
एकश. सर्वशश्चैव दौषैर्व्यर्थमूर्च्छितै. ।
सा दुष्टा बहुशो भुक्तमाममेव विमुञ्चति ॥
पक्कं वा सरुज पूति मुहुर्बद्धं मुहुर्द्रवम् ।
ग्रहणीरोगमाहुस्त आयुर्वेदाविदो जना. ॥
२. 'दुर्बलाग्न्यबलाद्दुष्टादाममेव' इति च पाठः ।
३. ग्रहणी भाग पर क्लोम रस, पित्ताशय का पित्त और आतों का क्षारीय
रस आकर मिलते हैं। जिनकी सहायता से आमाशय से श्वेत रस (काईंल)
के रूप में आया-अपक्व आहार रस मिल कर पक्कावस्था मे आता है ! जिस
समय ग्रहणी भाग निर्बल हो जाता है उस समय उपरोक्त रस भोजन के साथ
नहीं मिलते, जिससे वह अपक्कावस्था मे ही आतों मे चला जाता है । ये सब