चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १५ ] ३८ चिकित्सितस्थानम् ५६३
अ० १५ ] ३८ चिकित्सितस्थानम् ५६३
किट्टमन्नस्य विण्मूत्रं रसस्य तु कफोऽसृजः ।
पित्तं मांसस्य खमला मलः स्वेदस्तु मेदसः ॥ १८ ॥
स्यात्किट्टं केशलोमाऽस्थ्नो मज्ज्ञः स्नेहोऽक्षिविट्त्वचाम् ।
प्रसादकिट्टे धातूनां पाकादेवं द्विधच्छतः १ ॥ १६ ॥
भुक्त अन्न का किट्ट (मल) मल और मूत्र है। रस का किट्ट कफ, रक्त
का किट्ट पित्त, मास का किट्ट कान आदि इन्द्रियो का मैल, मेद का किट्ट स्वेद,
अस्थियो का किट्ट केश ओर लोम, मज्जा का किट्ट त्वचा का स्नेह भाग और
आखों का मैल । शुक्र से मलिन भाग नही बनता ।
इस प्रकार धातुओ का पाक दो प्रकार का होता है एक प्रसाद रूप में
और दूसरा किट्ट रूप मे ॥१८-१९॥
परस्परोपसंस्तम्भा धातुस्नेहपरम्परा ।
वृष्यादीना प्रभावस्तु पुष्णाति बलमाशु हि ॥ २० ॥
प्रसाद और किट्ट ये दोना परस्पर एक दूसर के स्तम्भक हैं, इसी लिये
धातु-समता को परम्परा चलती जाती है वृष्य आदि पदार्थों का प्रभाव तो शीघ्र
ही शरीर मे बल का पोषण करता है २ ॥२०॥
षडभिः केचिदहोरात्रैरिच्छन्ति परिवर्तनम् ।
संतत्या भोज्यधातूनां परिवृत्तिस्तु चक्रवत् ३ ॥ २१ ॥
कई आचार्य छः अहोरात्र (२४ x ६ = १४४ घण्टों) मे धातुओं का परि-
वर्त्तन मानते है। अर्थात् रस-धातु छ• दिन मे वीर्य रूप में बदलता है। पोष्य
रस आदि धातुओ का चक्र के समान निरन्तर परिवर्त्तन होता रहता है ४ ।
१. 'पाकादेव विधः स्मृतः' इति वा पाठः ।
२ देखिये सूत्रस्थान अ० २८ मे—"ते सर्व एव धातवो मलाख्याः प्रसा-
दाख्याश्च रसमलाभ्या पुष्यन्तः स्वमानमनुवर्त्तन्ते इत्यादि ।" (क) वृष्य वाजी-
करण द्रव्य अपने प्रभाव से शीघ्र बल, ध्वज-प्रहर्ष उत्पन्न करते हैं। जैसे कि
कहा भी है—"वाजीकरणास्त्वोषधयः स्वबलगुणोत्कर्षाद् विरेचनवदुपयुक्ताः शुक्रं
शीघ्रं विरेचयन्ति ॥ ३ अतः पर क्वचित् पुस्तकेषु २२-३५ श्लोकाः पठ्यन्ते ।
४. कई आचार्य ( पराशर आदि ) आठवे दिन शुक्र की उत्पत्ति मानते
हैं । यथा—आहारोपभोगदिनात् श्वः रसत्वं, तृतीयेऽह्नि रक्तत्वं, चतुर्थेऽह्नि
मांसता, मेदस्त्वं पञ्चमे, षष्ठे त्वस्थित्वं, सप्तमे मज्जता, अष्टमे शुक्रता नियमेन
भवति । (क) सुश्रुत में एक मास के अन्दर शुक्नोत्पत्ति मानी है। यथा—
'तत्र रसगतो धातु अहरहन्नृच्छतीयतो रसः । स खलु त्रीणि त्रीणि कला-
५६४ चरकसंहिता [ अ० १५
[ चक्रपाणि की मान्यता है कि धातुओ के परिवर्त्तन का कोई समय
निश्चित नही है। जिस प्रकार एक बलवान् पुरुष यदि जल-चक्र को घुमाये
तो पानी जल्दी निकल आता है और कमजोर घुमावे तो देर मे निकलता है।
इसी प्रकार से तीव्र अग्नि दूध आदि वृष्य पदार्थ शीघ्रता से बल को उत्पन्न कर
देते है। मन्दाग्नि हो तो देर मे शुक्रादि बनते है। सुश्रुत ने भी शब्द-सन्तान,
अर्चिः सन्तान और जल सन्तान का उदाहरण देकर इसको स्पष्ट किया है¹।
जिस प्रकार शब्द-परम्परा, जल परम्परा और अर्चि (प्रभा) परम्परा क्रमश
मध्य, मन्द, तीक्ष्ण रूप मे बहती है, इसी प्रकार से धातु परिवर्त्तन भी न्यूना-
धिक काल मे होता रहता है। जल-सन्तान के दृष्टान्त से कभी एक मास तक
भी रस का शुक्र बनना कहा है। शब्द के दृष्टान्त से न अतिशीघ्र और न अति-
विलम्ब से शुक्रोत्पत्ति होती है। ये सब दृष्टान्त चक्रदृष्टान्त से ही गतार्थ
हो जाते है² ]॥२१॥
इत्युक्तवन्तमाचार्य शिष्यस्त्विदमचोदयत् ।
रसाद्रक्तं विसदृशात्कथं देहेऽभिजायते ॥ २२ ॥
रसस्य च न रागो³ऽस्ति स कथं याति रक्तताम् ।
सहस्राणि पञ्चदश च कला एकैकस्मिन् धाताववतिष्ठन्ते, एवं मासेन रसः शुक्री-
भवति, स्त्रीणा चार्त्तवम्।'
इसलिये किसी ने कहा है—
'केचिदाहुरहोरात्रात् षड्रात्रादपरे परे।
मासेन याति शुक्रत्वमन्न पाक्रमादिति ॥'
१. सुश्रुत मे—स शब्दार्त्तिर्जेलसन्तानवदणुना विशेषेणानुधावत्येव शरीरं
केवलम् ।
२ तत्र दृष्टान्तेन तु परिवृत्तिः कालानियम दर्शयति। तथा चक्र पानीयोद्ध-
रणार्थं नियुक्त वाह्यमान बाहुबलप्रकर्षात् कदाचिद् आश्वेव प्रवर्त्तते कदाचिद्
बाहुबलप्रकर्षात् चिरेण । एव धातवोऽपि अग्न्यादिसौष्ठवात् शीघ्रमेव परिवर्त्तन्ते ।
अग्न्यादिवैगुण्ये चिरेण वर्त्तन्ते इति । एव सुश्रुतेनापि 'स शब्दार्त्तिर्जेलसतान-
वदणुविशेषेणानुधावत्येव शरीर केवलम्।' इत्यत्र कृष्णात्रेयेण रसपरिणामोऽपि
अग्न्यादिभेदेन प्रकृष्टाप्रकृष्टकालज उक्त एव । तत्रहि जलसतानदृष्टान्तेन चिरेण
मासपर्यन्तेन शुक्रतापत्ती रसस्योक्त। । शब्दसतानदृष्टान्तेन तु नातिशीघ्र नाति-
चिराच्च शुक्रोत्पत्तिरुक्ता। अर्चिःसतानदृष्टान्तेन तु नातिशीघ्रं नचिराच्च शुक्रोत्पत्ति-
र्भवति । तदेतत् सकलं चक्रदृष्टान्तेन गृहीतं ज्ञेयम् ॥ ] ३. 'रगोऽस्ति 'इति वा ।