चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५५७
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५५७
वचाशताह्वापिण्डैर्वा सुखोष्णैः स्नेहसंयुतैः ॥ ४२ ॥
सक्तूनां पिण्डिकाभिर्वा स्निग्धाना तैलसर्पिषा ।
शुष्कमूलकपिण्डैर्वा पिण्डैर्वा कार्ष्णगन्धिकैः ॥ ४३ ॥
रास्नापिण्डैः सुखोष्णैर्वा न्स्नेहैर्हपुषेपरपि ।
इष्टकस्य खराह्वायाः शाकैर्गृञ्जनकन्य च ॥ ४४ ॥
अभ्यज्य कुष्ठतलेन स्वेदयेत्पोट्टलीकृतः ।
वृषाकैरण्डबिल्वाना पत्रोत्काथैश्च सेचयेत् ॥ ४५ ॥
( २ ) तैल और घी यमक से स्निग्ध सत्तूआ की पिण्डकाओ ( पोटलियो
से ), सूखी मूली के कल्क मे बनी पोटली से शोभाजन की छाल से बनी पोटली
से, रास्ना के पिण्ड से, हउबेर के पिण्ड से मीठा मोटा-गरम सेक करना चाहिये ।
प्रथम कूठ के तैल से मालिश करके इष्टक ( एरण्ड ) के, खराहा (अजवायन,
यवानी ) के या गृञ्जनक के शाक की पाटला बना कर मीठा-मीठा गरम सेक
करना चाहिये । इसी प्रकार बासा, आक, एरण्ड, बिल्व इनके पत्तो को पका
करके उस जल से परिशेक करना चाहिये ॥४२-४५॥
मूलकत्रिफलार्काणा वेणूना वरुणस्य च ।
अग्निमन्थस्य शिग्रोश्च पत्रान्यश्मन्तकस्य च ॥ ४६ ॥
जलेनौत्क्वाथ्य शूलार्त स्वभ्यक्तमवगाहयेत् ।
कोलोत्क्वाथेऽथवा कोष्णे सौवीरकतुषोदके ॥ ४७ ॥
बिल्वोत्क्वाथेऽथवा तक्रे दधिमण्डाम्लकाञ्जिके ।
गोमूत्रे वा सुखोष्णे तं शूलार्तमुपवेशयेत् ॥ ४८ ॥
( ३ ) अर्श-रोगी को यदि शूल हो तो प्रथम भली प्रकार से तैल की
मालिश कराके फिर त्रिफला, मूली, बास, वरुण ( वरना ), अग्निमन्थ, सहजन
और अश्मन्तक के पत्तों का कल्क करक जल मे उबालना चाहिये । रोगी को
इस क्वाथ मे अवगाहन ( बैठाना ) कराना चा हये । इसी प्रकार शुष्क बेर के
क्वाथ मे या कवोष्ण सौवीरक काजी मे या तुषादक मे, बिल्व के क्वाथ मे
छाछ मे, दधि-मस्तु मे, खट्टी काजी मे, गोमूत्र मे, (कसी एक वस्तु मे) अव-
गहन कराना चाहिये । इन वस्तुओ का सुहाता गरम रखना चाहिये ॥४६-४८॥
कृष्णसर्पवराहोष्ट्रजलौकावृषदंशजाम् ।
वसामभ्यञ्जन दद्याद् धूपनं चार्शसां हितम् ॥ ४६ ॥
नृकेशाः सर्पनिर्मोको वृषदंशस्य चर्म च ।
अर्कमूलं शमीपत्रमर्शोभ्यो धूपनं हितम् ॥ ५० ॥
५५८ चरकसंहिता [अ० १४
तुम्बुरूणि विडङ्गानि देवदार्वक्षता घृतम् ।
बृहती चाश्वगन्धा च पिप्पल्यः सुरसा घृतम् ॥ ५१ ॥
वराहवृषद्विट् चैव धूपनं शक्तवो घृतम् ।
कुञ्जरस्य पुरीषं च घृतं सर्जरसो रसः ॥ ५२ ॥
(४) धूपन—काला साप, सुअर, ऊट, जोंक, वृषदंश (बिल्ली) इनकी
वसा से अर्शों को स्निग्ध करके धूपन देना चाहिये¹ ।
(१) धूपन के लिये पुरुषो के बाल, साप की केचुली, बिल्ली की त्वचा,
आक की जड़, शमी (खेजडा) वृक्ष के पत्ते हितकारी है। इन वस्तुओ को घी
के साथ बरतना चाहिये² । (२) तुम्बरू, बायविडग, देवदारु, अक्षत और
घी इनका धूपन देना चाहिये । (३) बड़ी कटेरी का फल, असगन्ध, पिप्पली,
तुलसी और घी इनका धूपन देना चाहिये । (४) सुअर की विष्ठा, बिल्ली की
विष्ठा, सत्तू और घी इनका धूप देना चाहिये । (५) हाथी की विष्ठा, घी और
राल इनका धूप देना चाहिये । धूपन के लिये पाच याग है ॥४६-५२॥
हरिद्राचूर्णसंयुक्तं सुधाक्षीरं प्रलेपनम् ।
गोपित्तपिष्टाः पिप्पल्यः सहरिद्राः प्रलेपनम् ॥ ५३ ॥
शिरीषबीजं कुष्ठं च पिप्पल्यः सैन्धवं गुडः ।
अर्कक्षीरं सुधाक्षीरं त्रिफला च प्रलेपनम् ॥ ५४ ॥
पिप्पल्यश्चित्रकः श्यामा किण्वं मदनतण्डुलाः ।
प्रलेपः कुक्कुटशकृद्धरिद्रागुडसंयुतः ॥ ५५ ॥
निकुम्भः सामृतासङ्गः पारावतशकृद्गुडः ।
प्रलेपः स्याद् गजास्थीनि निम्बो भल्लातकानि च ॥ ५६ ॥
प्रलेपः स्यादलर्केण वासन्तकवसायुतः ।
शूलश्वयथुहृद्युक्तश्शुलुकीवसायाऽथवा ॥ ५७ ॥
आर्कं पयः सुधाकाण्ड कटुकालाबुपल्लवाः ।
करञ्जो बस्तमूत्रं च लेपनं श्रेष्ठमर्शसाम् ॥ ५८॥
(५) आठ प्रलेप—(१) हल्दी के चूर्ण को थोर के दूध मे मिला कर
१ कहीं २ पर 'जलौका' के स्थान पर 'जतुका' पाठ है जिससे मकड़ी
लेना । वाग्भट मे 'जलौका' पाठ है । यथा—'कृष्णाहिबिडालोष्ट्रजलौकाशूकर-
वसाभिर्वा अभ्यज्य।'
२ वाग्भट मे यह योग इस प्रकार से पढ़ा है—'धूपयेच्च सघृतशमीपत्रार्क-
मूलमानुषकेशाहिनिर्मोकबिडालचर्मभिः इससे घी लेना चाहिये ।
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५५६
अर्श पर लेप करना चाहिये । ( २ ) पिप्पली और हल्दी को गाय के पित्त मे
पीस कर लेप करना चाहिये । ( ३ ) सिरस के बीज, कूठ, पिप्पली, सैन्धा नमक
गुड़ और त्रिफला समान भाग लेकर इनको आक के दूध और थोर के दूध मे
मिला कर लेप करना चाहिये । ( ४ ) पिप्पली, चीता, निशोथ, किण्व ( सुरा-
बीज ), मैनफल के बीज, मुर्गे की विष्ठा, हल्दी इनको गुड़ मे मिला कर लेप
करना चाहिये । ( ५ ) दन्ती, निशोथ, अमृतासङ्ग ( तुत्थ ), कबूतर की विष्ठा,
गुड़, हाथी की अस्थिया ( इनकी भस्म ), निमोली और भिलावा सब को पीस
कर लेप करना चाहिये । ( ६ ) आल ( हरिताल ) को वासन्तक ( ऊट ) की
वसा मे मिला कर सुहाता हुआ गरम लेप करना चाहिये । ( ७ ) चुलुकी
( शिशुमार ) की वसा के साथ मिला कर हरिताल का लेप करने से शूल ओर
सूजन मिटती है । ( ८ ) आक के पत्ते, थोर का दण्डा, कडुवी तुम्बी के पत्त
करज इनको बकरी के मूत्र मे पीस कर लेप करना चाहिये ॥ ५३-५८ ॥
अभ्यङ्गाद्याः प्रदेहान्ता य एते परिकीर्तिताः ।
स्तम्भश्वयथुकण्डूर्त्तिशमनास्तेऽशेषा मताः ॥ ५६ ॥
प्रदेहान्तैरुपक्रान्तान्यर्शांसि प्रस्रवन्ति हि ।
संचितं दुष्टरुधिरं ततः संपद्यते सुखम् ॥ ६० ॥
अभ्यङ्ग से लेकर प्रदेह तक जितने भी योग कहे है, ये सब स्तम्भता, सूजन
कण्डू को शान्त करते है, इसलिये अर्श-रोगियो के लिये हितकारी है ।
क्योकि प्रदेह तक वर्णित चिकित्सा द्वारा अर्शों मे संचित दुष्ट रक्त बहने
लग जाता है, इसलिये रोगी को आराम मिलता है ॥ ५६-६० ॥
शीतोष्णस्निग्धरूक्षैर्हि न व्याधिरुपशाम्यति ।
रक्ते दुष्टे भिषक् तस्माद्रक्तमेवावसेचयेत् ॥ ६१ ॥
रक्त के दूषित होने पर शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्षकिया से अर्श रोग शान्त
नहीं होता । इसलिये रक्त का निःसारण ही करना चाहिये १ । इसके लिये रक्त
और पित्त के प्रकोप कारण समान है, पित्त प्रकोप से ही रक्त का प्रकोप
समझना चाहिये ॥ ६१ ॥
जलौकाभिस्तथा शस्त्रैः सूचीभिर्वा पुनः पुनः ।
आवर्तमानं रुधिरं रक्ताशौभ्यः प्रवाहयेत् ॥ ६२ ॥
१ सुश्रुत ने रक्तज अर्श को भी माना है यथा—
‘षडर्शांसि भवन्ति वात-पित्त-कफ-शोणित-सन्निपातैः, सहजानि च ।’
५६० चरकसंहिता [ अ० १४
( ६ ) जोक द्वारा, शस्त्र द्वारा अथवा सूई द्वारा बार बार रक्त को जो कि
रक्त अभ्यगादि क्रिया से नहा निकलता निकालना चाहिये ॥ ६२ ॥
गुदश्वयथुशूलात्ते मन्दाग्नि पाययेत्तु तम् ।
त्र्यूषणं पिप्पलीमूलं पाठा हिङ्गु शचीत्रकम् ॥ ६३ ॥
सौवर्चलं पुष्कराख्यमजाजीं विल्वपेशिकाम् ।
बिडं यवानी हपुषा विडङ्गं संव्यचं वचाम् ॥ ६४ ॥
तिन्तिडीकं च मण्डेन मद्येनोष्णोदकेन च ।
तथाऽर्शोग्रहणीदोषशूलानोहादिगुच्यते ॥ ६५ ॥
( ७ ) जिस अर्श रोगी का गुदा मे शोथ, गुदा मे शूल, मन्दाग्नि हो उसको
सोठ, मरिच, पिप्पली, पिप्पलीमूल, पाठा, हींग, नीता, संचल पुष्करमूल,
जीरा, बिल्व की गिरी, बिड् नमक, अजवाइन, हपुवेर, बायविडग, सैन्धा
नमक, वच और इमली इन अठारह वस्तुओ का समान भाग लेकर चूर्ण कर
लेना चाहिये । इस चूर्ण को मण्ड ( दधि वस्तु ), मद्य या गरम पानी के साथ
देना चाहिये । इससे अर्श, ग्रहणीरोग, शूल, आनाह शान्त होते है ॥६३-६५॥
कुर्याद्वा पाचनं तस्य यदुक्तं ह्यतिसारिके ।
सगुदामभया वाऽथ प्राशयेत्तोऽन्नभक्तीकीम् ॥ ६६ ॥
पाययेत् त्रिवृच्चूर्णं त्रिफलाया रसेन वा ।
हृते गुदाश्रये दोषे गच्छन्त्यर्शासि संक्षयम् ॥ ६७ ॥
( ८ ) जिन पाचनों को अतिसार-चिकित्सा मे कहगे उनको पिलाना
चाहिये । भोजन से पूर्व हरड को गुड़ के समान भाग मे खाना चाहिये ।
अथवा त्रिफला क्वाथ के साथ निशाथ का चूर्ण देना चाहिये । गुदाश्रित दोष
के नष्ट होने पर अर्श स्वय नष्ट हो जाते ह ॥ ६६-६७ ॥
गोमूत्राध्युषिता दद्यात्सगुडा वा हरीतकीम् ।
हरीतकी तक्रयुता त्रिफला वा प्रयोजयेत् ॥ ६८ ॥
सनागरं चित्रकं वा शीधुयुक्तं प्रयोजयेत् ।
दापयेच्चव्ययुक्तं१ वा सीधु साजाजिचित्रकम् ॥ ६९ ॥
सुरा वा हपुषापाठा२युक्ता सौवर्चलायुताम् ।
दधित्थं बिल्वसंयुक्तं युक्तं वा चव्यचित्रकम् ॥ ७० ॥
भल्लातकयुतं वाऽथ प्रदद्यात्तत्र तर्पणम् ।
१. 'चव्य वा शीधुसंयुक्तमजाजीदीप्यक पिबेत्' इति ।
२. 'हपुषा पाठा युक्ता' इति च पाठः ।