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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७५

अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७५
कारण और सम्प्राप्ति—धनुष को अधिक खींचते हुए, अति अधिक
भारी भार को उठा कर ले जाते हुए, ऊंची-नीची जगह से गिरने पर, अपने
से अधिक बलवान् व्यक्तियो से युद्ध करते हुए, दौड़ते हुए घोडे या बैल को
वा दम्य ( तरुण बैल, घोडे या भैंसे ) को रोकते हुए, शिला, काष्ठ (लकडी ),
पत्थर, निघोत ( मुद्गर ) आदि को दूर फेकते वा दूसरो पर मारते हुए, बहुत
जोर-जोर से ऊंचे स्वर से पढते हुए, दूर तक अति वेग से भागते हुए, बड़ी
भारी नदी को तैरते हुए, घोड़ों के साथ-साथ दौड़ते हुए, एक दम अचानक
कूदते हुए, बहुत तेजी के साथ नाचते हुए, तथा इसी प्रकार के अन्य क्रूर
कार्यो से अथवा दूसरे व्यक्ति से वक्षस्थल पर जोर से चोट लगने पर, स्त्रियों
मे अतिप्रसङ्ग करनेवाले के, रूखा, अल्प ( हीन मात्रा मे ), वा प्रमित अर्थात्
एक रस खानेवाले व्यक्ति के, वक्ष स्थल मे क्षत हो जाता है, इससे क्षतक्षीण
नामक बलवान् रोग उत्पन्न होता है १ ।
[जल्पकल्पतरुकार ने क्षतक्षीण को दो प्रकार का माना है। एक अति स्त्री-
प्रसग, प्रमिताशन आदि से उत्पन्न और दूसरा क्रूरकार्यो से उत्पन्न । परन्तु
परन्तु शुक्र-क्षय से क्षत-क्षय उत्पन्न नही होता, वह तो क्षयजन्य यक्ष्मा है उसको
प्रथम कह दिया है।] ॥ ४-८ ॥
उरो विरुज्यते तस्य भिद्यतेऽथ विदह्यते ।
प्रपीड्यते ततः पार्श्वे शुष्यत्यङ्गं प्रवेपते ॥ ६ ॥
क्रमाद्वीर्यं बलं वर्णो रुचिरग्निश्च हीयते ।
ज्वरो व्यथा मनोदैन्यं विड्भेदोऽग्निवधस्तथा ॥ १० ॥
दुष्टः श्यावः सदुर्गन्धिः पीतो विग्रथितो बहुः ।
कासमानस्य चाभीक्ष्णं कफः सास्रः प्रवर्तते ॥ ११ ॥
स क्षतः क्षीयतेऽत्यर्थं तथा शुक्रौजसोः क्षयात् ।
लक्षण—उर स्थल ( छाती ) मे अत्यन्त वेदना या पीडा होती है, छाती
फटती, दो टुकडे होती प्रतीत होती है, जलन सी प्रतीत होती है, पार्श्व दबते
प्रतीत होते हैं, अग शुष्क हो जाते है, अग कापते है । वीर्य ( सामर्थ्य ), बल,
वर्ण ( कान्ति ), रुचि ( भोजन मे इच्छा ) ओर अग्नि धीरे-धीरे घट जाती
है । ज्वर, पीडा, मन की दीनता ( उदासी ), अतिसार, जाठर-अग्नि का नाश
१ राजयक्ष्मा और क्षतक्षीण मे भेद करना चाहिये । क्षतक्षीण की उपेक्षा
से यक्ष्मा अनुबन्ध के रूप मे उत्पन्न हो जाता है । भेद कहा भी है—
शोषप्लीहाढ्यवाताश्च स्वरभेदं क्षत क्षयम् ॥

४७६ चरकसंहिता [ अ० ११
( भोजन का अविपाक या न पचना ), उत्पन्न हो जाता है । बार बार खासी
आती है, खासने मे दूषित, काला या पीला, दुर्गन्धयुक्त, बँधा हुआ ( ग्रथित ),
मात्रा मे बहुत तथा रक्त मिश्रित कफ बाहर आता है । शुक्र और ओज के
क्षीण होने से उर क्षत का रोगी अत्यन्त क्षीण ( दुर्बल ) हो जाता है ॥६-११॥
अव्यक्तं लक्षणं तस्य पूर्वरूपमिति स्मृतम् ॥ १२ ॥
छाती मे दर्द आदि पूर्वोक्त लक्षण जब तक अव्यक्त या थोड़े से व्यक्त
होते हैं, वही इस रोग के पूर्वरूप है ॥ १२ ॥
उरोरुक् शोणितच्छर्दिः कासो वैशेषिकः क्षते ।
क्षीणे सरक्तमूत्रत्वं पार्श्वपृष्ठकटिग्रहः ॥ १३ ॥
उरःक्षत होने पर—छाती मे दर्द, रक्त का वमन ओर कास विशेष रूप से
होता है । क्षतक्षीण अर्थात् शुक्र के क्षय से रक्तमिश्रित मूत्र तथा पार्श्व, पीठ
और कटि मे जकडाहट, वेदना अथवा स्थिरता आ जाती है ॥ १३ ॥
अल्पलिङ्गस्य दीप्ताग्ने साध्यो बलवतो नवः ।
परिसंवत्सरो याप्यः सर्वलिङ्गं तु वर्जयेत् ॥ १४ ॥
साध्य और असाध्य के रूप—यदि रोगी बलवान् हो, अग्नि भी प्रदीप्त
हो, लक्षण थोडे हों और रोग नया ( एक साल से कम का ) हो तो वह साध्य
होता है । जो रोग एक साल पुराना हो गया हो तो वह याप्य है, जिस रोगी
मे सब लक्षण विद्यमान हों वह असाध्य है । वह चिकित्सा करने योग्य
नहीं है ॥ १४ ॥
चिकित्सा—
उरो मत्वा क्षतं लाक्षां पयसा मधुसंयुताम् ।
सद्य एव पिबेज्जीर्णे पयसाऽद्यात्सशर्करम् ॥ १५ ॥
(१) जब छाती मे क्षत हुआ पता लगे तब लाख को मधु मे मिला
कर दूध के साथ पी लेवे । इसके जीर्ण होने पर दूध और शर्करा के साथ
अन्न खावे १ ॥ १५ ॥
पार्श्वबस्तिरुजश्चाल्पपित्ताग्निस्ता सुरायुताम् ।
भिन्नविट्कः समुस्तातिविषा पाठा सवत्सकाम् ॥ १६ ॥
(२) रोगी को पार्श्वशूल और बस्तिशूल हो तथा अल्पपित्त और अल्पाग्नि
१ अष्टांगसंग्रह मे कहा है—
उरस्यन्त क्षते सद्यो लाक्षा क्षौद्रयुता पिबेत् ।
क्षीरेण शालीन् जीर्णेऽद्यात् क्षीरेणैव सशर्करान् ॥