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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० २ ] इन्द्रियस्थानम् १४३

अ० २ ] इन्द्रियस्थानम् १४३
अपवाद—ऐसे पुष्प भी होते हैं जिनमें फल उत्पन्न नहीं होता और कई
ऐसे फल होते हैं जिनमें पहिले फूल नहीं आता [ जैसे बेंत मे बिना फूल आए
ही शाखा से ही फल पैदा होता है, इसी प्रकार गूलर में भी फूल नहीं होता ],
परन्तु अरिष्ट लक्षणों में ऐसा नहीं होता । ऐसा मरण नही जिसके पूर्व अरिष्ट
लक्षण उत्पन्न नहीं होते और अरिष्ट लक्षण उत्पन्न होने के बाद मरण हुए बिना
नही रहता । [ अरिष्ट लक्षण दो प्रकार के हैं। (१) नियत और (२) अनि-
यत । नियत अरिष्ट वे हैं जिनसे मृत्यु का होना निश्चित ही है, अनियत (अनि-
श्चित) वे हैं जिनसे मरण संदेह में होता है। रसायन और तप द्वारा इन
लक्षणो को दूर भी किया जा सकता है। ] ॥ ३-५ ॥
मिथ्यादृष्टमरिष्टाभमनरिष्टमजानता ।
अरिष्टं चाप्यसबुद्धमेतत्प्रज्ञापराधजम् ॥ ६ ॥
अरिष्ट लक्षणो को यथार्थ न समझना, न उत्पन्न हुए अरिष्ट लक्षणों को
बुद्धि दोष से अरिष्ट लक्षण समझ लेना, अथवा उत्पन्न हुए अरिष्ट लक्षणो को
न पहिचान सकना, ये सब बुद्धिदोष से होता है ॥ ६ ॥
ज्ञानसंबोधनार्थं तु लिङ्गैरमरणपूर्वजैः ।
पुष्पितानुपदेक्ष्यामो नरान् बहुविधेर्बहून् ॥ ७ ॥
नानापुष्पोपमो गन्धो यस्य वाति दिवानिशम् ।
पुष्पितस्य वनस्येव नानाद्रुमलतावतः ॥ ८ ॥
तमाहुःपुष्पितं धीरा नरं मरणलक्षणे ।
स ना संवत्सराद्देहं जहातीति विनिश्चयः ॥ ९ ॥
पुष्पित का लक्षण—
ज्ञान कराने के लिये मृत्यु से पूर्व होने वाले लक्षणों द्वारा 'पुष्पित' अरिष्ट
युक्त नानाप्रकार के रोगियो का वर्णन करते है । (१) जिस पुरुष के शरीर
से नाना प्रकार के वृक्ष लताओं से भरे वन की भाति नाना प्रकार के फूलो की
गन्ध के तुल्य गन्ध रात दिन बहती है, उस पुरुष को बुद्धिमान् पुरुष 'पुष्पित'
कहते हैं, ये मृत्यु के लक्षण हैं। इन लक्षणो से मनुष्य एक साल के भीतर ही
प्राणों को छोड़ता है ॥ ७-९ ॥
एवमेकैकश पुष्पैर्यस्य गन्धः समो भवेत् ।
इष्टैर्वा यदि वाऽनिष्टैः स च पुष्पित उच्यते ॥ १० ॥
समासेनाशुभान् गन्धानेकत्वेनाथ वा पुमान् ।
आजिघ्रेद्यस्य गात्रेषु तं विद्यात्पुष्पितं भिषक् ॥ ११ ॥

१४४ चरकसंहिता [ अ० २
आप्लुतानाप्लुते काये यस्य गन्धाः शुभाशुभाः ।
व्यत्यासेनानिमित्ताः स्युः स च पुष्पित उच्यते ॥ १२ ॥
( २ ) इसी प्रकार जिस मनुष्य के शरीर से अच्छी या बुरी, किसी एक
फूल की गन्ध के समान गन्ध आये, इसको भी ‘पुष्पित’ कहा जाता है । संक्षेप
से, ( ३ ) जिस पुरुष के शरीर से नाना प्रकार की अशुभ गन्धों को वैद्य सूँघ
ले उसे भी 'पुष्पित' ही जाने । ( ४ ) स्नान किये अथवा बिना ही स्नान
किये जिसके शरीर से सुगन्ध या दुर्गन्ध आये, वह पुष्पित' कहा जाता
है [ अर्थात् स्नान करने पर अशुभ और स्नान न करने पर शुभ गन्ध आये
तो 'पुष्पित' समझना चाहिये ] ॥ १२ ॥
तद्यथा चन्दनं कुष्ठं तगरागुरूणी मधु ।
माल्यं मूत्रपुरीषे च मृतानि कुणपानि च ॥ १३ ॥
ये चान्ये विविधात्मानो गन्धा विविधयोनयः ।
तेऽप्येनेनानुमानेन विज्ञेया विकृतिं गताः ॥ १४ ॥
इदं चाप्यतिदेशार्थं लक्षणं गन्धसंश्रयम् ।
वक्ष्यामो यदभिज्ञाय भिषङ् मरणमादिशेत् ॥ १५ ॥
वियोनिर्विदुरो यस्य गन्धो गात्रेषु दृश्यते ।
इष्टो वा यदि वाऽनिष्टो न स जीवति ता समाम् ॥ १६ ॥
एतावद् गन्धविज्ञानम् ।
चन्दन, कूठ, तगर, मधु, फूल, मूत्र, मल, मुर्दे या दूसरे सड़े गन्ध अथवा
नाना प्रकार के जो अन्य नाना पदार्थों से उत्पन्न होते हैं उन गन्धों को भी
अनुमान से विकारजन्य जानना चाहिये । गन्ध के आश्रित लक्षणों को भी
विस्तार से कहेगे; जिनको जान कर वैद्य रोगी के मरण को बतला सके । जिस
रोगी के शरीर से बिना कारण के स्थिर गन्ध अथवा अच्छी या बुरी गन्ध आती
हो, वह एक सालमें अवश्य मर जाता है । गन्ध-विज्ञान प्रकरण इतना ही है ॥१६॥
रसज्ञानमतः परम् ।
आतुराणां शरीरेषु वक्ष्यामो विधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥
यो रसः प्रकृतिस्थानां नराणां देहसंभवः ।
स एषा चरमे काले विकारान् भजते द्वयम् ॥ १८ ॥
कश्चिदेवास्य वैरस्यमत्यर्थमुपपद्यते ।
स्वादुत्वमपरश्चापि विपुलं भजते रसः ॥ १९ ॥