सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 383

३६८ चरकसंहिता [ अ० ५
( ३ ) दशमूली घृत—दशमूली के क्वाथ से और त्रिकटु, यवक्षार, सैन्धा
नमक, हींग, बिड नमक, और अनारदाना इनके कल्क से साधित घी के प्रयोग
से कफगुल्म शान्त होता है । कोई २ वैद्य दशमूल का कल्क भी डालते हे ।
[ श्री गगाधर सेन ने अनार का छिलका डालना लिखा है । ] ॥ १४२- ॥
भल्लातकाना द्विपलं पञ्चमूलं पलोन्मितम् ॥ १४३ ॥
साध्यं विदारिगन्धाद्यमापोथ्य सलिलाढके ।
पादशेषे रसे तस्मिन् पिप्पली नागरं वचाम् ॥ १४४ ॥
विडङ्ग सैन्धवं हिङ्गु यावशूकं बिड यटीम् ।
चित्रक मधुकं रास्त्रा पिष्ट्वा कर्षसम भिषक् ॥ १४५ ॥
प्रस्थ च पयसः कृत्वा घृतप्रस्थ विपाचयेत् ।
एतद्भल्लातकघृत कफगुल्महर परम् ॥ १४६ ॥
प्लीहापाण्ड्वामयश्वासग्रहणीरोगकासनुत् ।
इतिभल्लातकाद्यं घृतम् ।
( ४ ) भल्लातकाद्यघृत—भिलावा १ पल, विदारीगन्धादि स्वल्प पचमूल
( शालिपर्णी, पृश्निपर्णी गोखरू, कटेरी, बडी कटेरी ), एक पल, पानी दो
आढक, हींग, यवक्षार बिड नमक, कचूर, चीता, मुलहठी, रास्त्रा प्रत्येक एक
कर्ष लेकर इनका कल्क बनाये, घी २ प्रस्थ मिलाकर घृत-पाक करे । यह भल्ला-
तक घृत कफ-गुल्म नाशक, प्लीहा, पाण्डुरोग, श्वासरोग, ग्रहणी राग, और का ·
को नष्ट करता है । [ मात्रा २ मासे से ४ मासा । ] ॥ १४३-१४६ ॥
पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ॥ १४७ ॥
पलिकैः सयवक्षारैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
क्षारप्रस्थेन १ तत्सर्पिर्हन्ति गुल्म कफात्मकम् ॥ १४८ ॥
ग्रहणीपाण्डुरोगघ्न प्लीहकासज्वरापहम् ।
इति पञ्चकोलघृतम् ।
( ५ ) पञ्चकाल घृत—पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चित्रक, सोठ ओर
यवक्षार प्रत्येक एक पल, घी २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ इनसे यथाविवि घृत पाक
करे । यह घृत कफ-गुल्म ग्रहणी रोग, पाण्डु रोग, प्लीहा, कास, और ज्वर को
नष्ट करता ह । [ इसका 'क्षीरषट्पल घृत' भी कहते हे । ] ॥१४७-१४८॥
त्रिवृता त्रिफला दन्ती दशमूलं पलोन्मितम् ॥ १४६ ॥
जले चतुर्गुणे पक्त्वा चतुर्भांगस्थितं रसम् ।
१ 'क्षीरप्रस्थ च' इति वा पाठः ।