चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३५
अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३५
सुरामाध्वीकसीधूना तैलस्य मधुसर्पिषोः ।
कवलान्धारयेदिष्टान्क्षीरस्येक्षुरसस्य च ॥ १४० ॥
( १७) मुख की विरसता को नष्ट करने वाली और रुचिकारक ओषधियो
की सुनो—
( १) दोनो समय प्रात साय ( भोजन से पूर्व प्रात और सायं भोजन
के पीछे, सोते समय ) मुख को साफ करने के लिये दातुन करे ; ( २ ) कषायो
से मुख का प्रक्षालन करे, ( ३ ) मुख मे कवल धारण करे । पीछे से प्रायोगिक
धूम पान करे । दीपक-पाचक औषध और हितकारी, मन लुभाता खान-पान खावे ।
( ४ ) पाच योग—( १ ) दालचीनी, मोथा, इलायची, धनिया, ( २ )
मोथा, आवला, दालचीनी, ( ३ ) दारुहल्दी, दालचीनी, अजवायन, ( ४ )
पिप्पली, तेजवल, ( ५ ) अजवायन और तिन्तिडीक ( वृक्षाम्ल या इमली ) ये
पाच योग श्लोक के एक २ चरण मे कहे हैं, ये रोचक और मुख को शोधन
करते है । इनकी गोलिया बना कर मुख मे रक्खे, इनके चूर्णों से मुख को
साफ करे । इनको पानी मे घोल कर ( या छाछ आदि मे भी ) मुख मे कवल
धारण करे । ( ५ ) सुरा, माध्वीक, सीधु, तेल, घी, मधु, दूध और गन्ने का रस
इनमे से जो अभीष्ट हो, उसका कवल मुख मे धारण करे ॥ १३४-१४० ॥
यवानी तिन्तिडीकं च नागरं साम्लवेतसम् ।
दाडिम बदर चाम्लं कार्षिकं चोपकल्पयेत् ॥ १४१ ॥
धान्यसौवर्चलाजाजीत्वराङ्गं चार्धकार्षिकम् ।
पिप्पलीना शतं चैकं द्वे शते मरिचस्य च ॥ १४२ ॥
शर्करायाश्च चत्वारि पलान्येकत्र चूर्णयेत् ।
जिह्वाविशोधनं हृद्यं तच्चूर्णं भक्तरोचनम् ॥ १४३ ॥
हृत्प्लीहपार्श्वशूलघ्नं विबन्धानाहनाशनम् ।
कासश्वासहरं ग्राहि ग्रहण्यर्शोविकारनुत् ॥ १४४ ॥
इति यवानीषाडवम् ।
( १८ ) यवानीषाडव—अजवायन, तिन्तिडीक, सोठ, अम्लवेतस, अनार-
दाना, खट्टे बेर प्रत्येक एक कर्ष, धनिया, सचल नमक, जीरा, दालचीनी
प्रत्येक आधा कर्ष, पिप्पली १०० ( सख्या मे ), मरिच काली २००, खाण्ड ४
पल लेकर मिलावे । यह चूर्ण जिह्वा का विशोधक, भोजन मे रुचि करने वाला
हृदयशूल, प्लीहा, पार्श्वशूल विबन्ध, आनाह, कास, श्वास, ग्रहणी और अर्शरोग
को नष्ट करता और संग्राहक है ॥१४१-१४४॥
४३६ चरकसंहिता [ अ० ८
तालीशपत्रं मारचं नागरं पिप्पली शुभा ।
यथोत्तरं भागवृद्ध्या त्वगेले चार्धभागिके ॥ १४५ ॥
पिप्पल्याष्टगुणा चात्र प्रदेया सितशर्करा ।
कासश्वासारुचिहरं तच्चूर्णं दीपनं परम् ॥ १४६ ॥
हृत्पाण्डुग्रहणीदोषशोषप्लीहज्वरापहम् ।
वम्यतीसारशूलघ्न मूर्ध्ववातानुलोमनम् ॥ १४७ ॥
कल्पयेद् गुटिका चैव चूर्णं पक्त्वा सितोपलेः ।
गुटिका ह्यग्निसंयोगाच्चूर्णाल्लघुतराः स्मृताः ॥ १४८ ॥
इति तालीशाद्यं चूर्णं गुटिकाश्च ।
( १७ ) तालीशाद्य चूर्ण—तालीशपत्र १ भाग, काली मिरिच २ भाग, सोंठ
३ भाग, पिप्पली ४ भाग, वंशलोचन ५ भाग, दालचीनी ॥ भाग, छोटी इला
यची ॥ भाग, खाण्ड पिप्पलो से आठगुणा (३२ भाग) मिलावे, यह चूर्ण कास,
श्वास, अरुचि को नष्ट करता है, अग्निदीपक है। हृदय रोग, पाण्डु, ग्रहणी, शोष,
प्लीहा, ज्वर, वमन, अतिसार और शूल को नष्ट करता है और ऊर्ध्ववात का
अनुलोमन करता है। खाड की चासनी करके उसमे ये वस्तुये मिला कर
गुटिकायें भी बना सकते है। ये गुटिकायें चूर्ण की अपेक्षा अधिक लघु है,
क्योकि इनका पाक आग पर होता है ॥ १४५-१४८ ॥
शुष्यते क्षीणमांसस्य कल्पितानि विधानवित् ।
दद्यान्मासादमांसानि बृंहणानि विशेषतः ॥ १४६ ॥
शोषिणे बर्हिणं दद्याद् बर्हिशब्देन चापरान् ।
गृध्रानुलूकांश्चाषांश्च विधिवत्सूपकल्पितान् ॥ १५० ॥
काकांस्तित्तिरिशब्देन वर्तकशब्देन चोरगान् ।
भृष्टान्मत्स्यान्त्रशब्देन दद्याद् गण्डूपदानपि ॥ १५१ ॥
लोमशान्स्थूलनकुलान्बिडालान्त्रोपकल्पितान् ।
शृगालशावांश्च । भषक् शशशब्देन दापयेत् ॥ १५२ ॥
सिंहानृक्षास्तरक्षूंश्च व्याघ्रान्न-विधस्तथा ।
मामादान् मृगशब्देन दद्यान्मासाभिवृद्धये ॥ १५३ ॥
गजखङ्गितुरङ्गाणा वेशवारीकृत' १ भिषक् ।
दद्यान्महिषशब्देन मांसं मांसाभिवृद्धये ॥ १५४ ॥
पथ्य-कल्पना प्रकार को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि जो यक्ष्मा क
१ 'वेशवारकृतान्' इति पाठ. ।