चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० ४] १= चिकित्सितस्थानम् २७३
पा० ४] १= चिकित्सितस्थानम् २७३
चरतो विश्वरूपस्य रूपद्रव्यं यदुच्यते ॥ ४९ ॥
मनुष्य, पशु, पक्षी आदि नाना योनियों में विचरने वाले विश्वरूप आत्मा
के रूप को प्रकट करने वाला यही द्रव्यरूपी वीर्य है। इसी वीर्य के कारण
आत्मा का अव्यक्त रूप स्पष्ट होता है ॥४६॥
बहलं मधुरं स्निग्धमविस्रं गुरु पिच्छिलम् ।
शुक्लं बहु च यच्छुक्रं फलवत्तदसंशयम् ॥ ५० ॥
येन नारीषु सामर्थ्यं वाजीवल्लभते नरः ।
व्रजेच्चाभ्यधिकं येन वाजीकरणमेव तत् ॥ ५१ ॥
प्रशस्त शुक्र—बहल ( घना ), मधुर ( गन्ध में, प्रतिक्रिया में मधुर, उदा-
सीन ), स्निग्ध, अविस्त्र ( दुर्गन्धरहित ), गुरु, पिच्छिल ( चिक्कास से युक्त ),
श्वेत वर्ण, मात्रा मे अधिक जो शुक्र होता है, वह अवश्य सन्तानोत्पत्ति मे कारण
बनता है। शुक्र की प्रतिक्रिया मृदु क्षारीय है ओर यह क्षारीय ( मृदु ) माध्यम
को ही पसन्द करता है। जिन औषध या आहार-विहार के कारण पुरुष घोड़े के
समान स्त्रियों में रमण करने के लिये सामर्थ्यवान् बनता है, जिनके द्वारा अधिक
समय तक मैथुन कर सकता है, उनको वाजीकरण कहते हैं ॥५०-५१॥
तत्र श्लोकौ—हेतुयोगापदेशस्य यागा द्वादश चोत्तमाः ।
यत्पूर्व मैथुनात्सेव्यं सेव्यं यन्मैथुनादनु ॥ ५२ ॥
यदा न सेव्याः प्रमदाः कृत्स्नः शुक्रांज्ञानसंशयः ।
निरुक्तं चेह निर्दिष्टं पुमाञ्जातबलादिके ॥ ५३ ॥
इस पाद में वाजीकरण योगों के उपदेश का कारण, बारह उत्तम प्रयोग,
मैथुन से पूर्व तथा पीछे जिन वस्तुओ का सेवन करना चाहिये उनको, जब
मैथुन नहीं करना चाहिये, वीर्य का सम्पूर्ण ज्ञान, वाजीकरण की निरुक्ति इस
‘पुमाञ्जातबलादिक’ पाद में कह दी है ॥ ५२-५३ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने पुमाञ्जातबलादिको
नाम वाजीकरणपादश्चतुर्थः ।
समाप्तश्चायं द्वितीयो वाजीकरणाऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः
अथातो ज्वरचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ‘ज्वर-चिकित्सा’ की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
२७४ चरकसंहिता [ अ० ३
विज्वरं ज्वरसंदेहं पर्यपृच्छत्पुनर्वसुम् ।
विविक्ते शान्तमासीनमग्निवेशः कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥
देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वरोगाग्रजो बली ।
ज्वरः प्रधानं रोगाणामुक्तो भगवता पुरा ॥ ४ ॥
तस्य प्राणिसपत्नस्य ध्रुवस्य प्रलयोदये ।
प्रकृतिं च प्रवृत्तिं च प्रभावं कारणानि च ॥ ५ ॥
पूर्वरूपमधिष्ठानं बलकालात्मलक्षणम् ।
व्यासतो विधिभेदांश्च पृथग्भिन्नस्य चाकृतिम् ॥ ६ ॥
लिङ्गमामस्य जीर्णस्य सौषधं च क्रियाक्रमम् ।
विमुञ्चतः प्रशान्तस्य चिह्नं यच्च पृथक् पृथक् ॥ ७ ॥
ज्वरावशिष्टो रक्ष्यश्च यावत्कालं यतो यतः ।
प्रशान्तः कारणैर्येिश्च पुनरावर्तते ज्वरः ॥ ८ ॥
याश्चापि पुनरावृत्ति क्रियाः प्रशमयन्ति तम् ।
जगद्धितार्थं तत्सर्वं भगवन् ! वक्तुमर्हसि ॥ ६ ॥
ज्वर (सन्ताप, बाधा) रहित, नीरोग शान्तरूप में एकान्त स्थान में बैठे
हुए पुनर्वसु से हाथ जोड़कर अग्निवेश ने अपने ज्वरसम्बन्धी सन्देह को पूछा।
हे भगवन् ! आपने निदानस्थान में देह और इन्द्रिय तथा मन को तपाने
वाला, सब रोगों में प्रथम, बलवान् तथा सब रोगों में प्रधान ज्वर को बतलाया
था। प्राणिमात्र के शत्रु, जन्म और मृत्यु के समय अवश्यम्भावी इस ज्वर की
प्रकृति, प्रवृत्ति (उत्पत्ति), कारण, पूर्वरूप, अधिष्ठान (आश्रय), बल, काल,
आत्मलक्षण (ज्वर के अपने लक्षण), विस्तार रूप में भिन्न हुए ज्वर के लक्षण,
आमज्वर के लक्षण, जीर्ण ज्वर के लक्षण, इनकी औषध, चिकित्सा क्रम, छोड़ते
हुए तथा शान्त ज्वर के पृथक् २ लक्षण, ज्वर से मुक्त व्यक्ति को कितने समय
तक किन बातों से बचना उचित है, शान्त होने पर भी किन किन कारणों से
ज्वर पुनः आ जाता है, दुबारा लौटे हुए ज्वर की चिकित्सा क्रम, जिनसे कि
यह शान्त होता है, इन सब बातों को आप जगत् की भलाई के लिये
उपदेश करे ॥ ३-९ ॥
तदग्निवेशस्य वचो निशम्य गुरुरब्रवीत् ।
ज्वराधिकारे यद्वाच्यं तत्सौम्य ! निखिलं शृणु ॥ १० ॥
ज्वरो विकारो रोगश्च व्याधिरातङ्क एव च ।
एकोऽर्थो नामपर्यायैर्विविधैरभिधीयते ॥ ११ ॥