चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५६५
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५६५
द्रवद्रक्तात्स्थिरं मांसं कथं तज्जायते नृणाम् ॥ २३ ॥
द्रवधातोः स्थिरान् मांसान्मेदसः संभवः कथम् १।
श्लक्ष्णाभ्या मासमेदोभ्यां खरत्वं कथमस्थिषु ॥ २४ ॥
खरेष्वस्थिषु मज्जा च केन स्निग्धो मृदुस्तथा ।
मज्जश्च परिणामेन यदि शुक्रं प्रवर्तते ॥ २५ ॥
सर्वदेहगतं शुक्रं प्रवदन्ति मनीषिणः ।
तथाऽस्थिमध्ये मज्जश्च शुक्रं भवति देहिनाम् ॥ २६ ॥
छिद्रं न दृश्यतेऽस्थ्नां च तन्निःसरति वा कथम् ।
जब भगवान् आचार्य इस प्रकार से कह चुके तब शिष्य अग्निवेश ने पूछा
हे भगवन् ! इस शरीर मे रक्त के समान रस नही होता, फिर रस से रक्त
बनता है यह कैसे ? रस मे कोई रग या लालिमा नही है, फिर वह लाल कैसे हो
जाता है । द्रवरूप रक्त से कठिन मास-वस्तु किस प्रकार से पुरुषों मे बन जाती
है । स्निग्ध चिकने मास और मेद से अस्थियो मे खरता कैसे उत्पन्न हो जाती
हे ? खुरदरी अस्थियो मे स्निग्ध और कोमल मज्जा कैसे आ जाती है ? और यदि
मज्जा के परिणाम से ही शुक्र बनता है, तो बुद्धिमान लोग शुक्र को सम्पूर्ण
देह मे व्याप्त क्यो कर बतलाते है ? अस्थियो के मध्य मे और मज्जा मे भी
शुक्र रहता है, परन्तु अस्थियो मे कोई छिद्र दिखाई नही देता, फिर वह उनसे
कैसे निकलता है ॥ २२-२६- ॥
एवमुक्तस्तु शिष्येण गुरुः प्राहैदमुत्तरम् ॥ २७ ॥
तेजो रसानां सर्वेषा मनुजानां यदुच्यते ।
पित्तोष्मणः स रागेण रसो रक्तत्वमृच्छति ॥ २८ ॥
शिष्य अग्निवेश के इस प्रकार पूछने पर भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया
कि सब मनुष्यों मे जो रसों का तेज है, उससे तथा पित्त की उष्णिामा के राग
के कारण यह रस रक्तता को प्राप्त करता है ।
[ रसों का तेज ही पित्त है । क्योकि सुश्रुत मे कहा है—पित्त से अतिरिक्त
और कोई अग्नि इस शरीर मे उपलब्ध नही होती । इसलिये रस रक्त की अग्नि
से ही परिपाक होने पर रक्तवर्ण हो जाता है । जैसा कि सुश्रुत मे कहा है—
यकृत् और प्लीहा में पहुंच कर यह रस रक्तवर्ण हो जाता है ] ॥ २७-२८ ॥
वाय्वम्बु२ तेजसा रक्तमूष्मणा चाभिसंयुतम् ।
स्थिरतां प्राप्य मांसं स्यात्स्वोष्मणा पक्वमेव तत्३ ॥ २९ ॥
१. 'रसात् रक्तात् तथा मांसान्मेदस' श्चेतता कथम्' इति च । २. 'वाय्वग्नि-
तेजसा' इति च । ३ 'स्थिरतो प्राप्य शौक्ल्य च मेदो देहेऽभिजायते' इति च ।
५६६ चरकसंहिता [ अ० १५
स्वतेजोऽम्बुगुणस्निग्धोद्रिक्तं मेदोऽभिजायते ।
पृथिव्यग्न्यनिलादीनां संघातः स्वोष्मणा१ कृतः ॥ ३० ॥
खरत्वं प्रकरोत्यस्य जायतेऽस्थि ततो नृणाम् ।
करोति तत्र सौषिर्यमस्थ्नां मध्ये समीरणः ॥ ३१ ॥
मेदसस्तानि पूर्यन्ते स्नेहो मज्जा ततः स्मृतः ।
यस्मान्मज्जस्तु यः स्नेहः शुक्रं संजायते ततः ॥ ३२ ॥
यह रक्त वायु, जल, तेज और उष्णिमा से मिल कर स्थिरता को प्राप्त
करके मांस रूप हो जाता है। यही मांस अपनी उष्णिमा से पक कर अपने मांस
के तेजोगुण और जलीय गुण की स्निग्धता के बढ़ने पर मेदरूप हो जाता है।
इसी मेद की उष्णिमा से पृथिवी, अग्नि, वायु आदि का संघात होकर यह मेद
खर (कठिन) हो जाता है, जिससे मनुष्यों की अस्थियां बनती हैं। इन
अस्थियों के मध्य में वायु छिद्र उत्पन्न कर देता है। यह छिद्र-भाग मेद से
भर जाते हैं। उससे स्नेह रूप मज्जा उत्पन्न होती है। इस मज्जा का जो स्नेह-
भाग है, उससे शुक्र की उत्पत्ति होती है ॥ २६-३२ ॥
वाय्वाकाशादिभिर्भावैः सौषिर्यं जायतेऽस्थिषु ।
तेन स्रवति तच्छुक्रं नवात्कुम्भादिवोदकम् ॥ ३३ ॥
स्रोतोभिः स्यन्दते देहात्समन्ताच्छुक्रवाहिभिः ।
वायु, आकाश आदि के कारण अस्थियों में सच्छिद्रता होती है। इन छिद्रों
से शुक्र ऐसे ही टपकता है, जैसे नये घड़े से जल टपकता है ॥ ३३ ॥
हर्षोद्दारितं वेगात्सङ्कल्पाच्च मनोभवात् ॥ ३४ ॥
विलीनं घृतवद् व्यायामोष्मणा स्थानविच्युतम् ।
बस्तौ संभृत्य निर्याति स्थलान्निम्नमिवोदकम् ॥ ३५ ॥
यह उत्पन्न शुक्र इन्द्रिय की उत्तेजना और काम-संकल्प के कारण उत्पन्न
हुए प्रहर्ष (उत्तेजना) से प्रेरित होकर सम्पूर्ण शरीर से शुक्रवाही-स्रोतों द्वारा
वेग से आता है। जिस प्रकार ऊंचे स्थान से जल नीचे की ओर बहकर निकल
जाता है, उसी प्रकार (योनि सङ्घर्ष आदि रूप) व्यायाम से उत्पन्न उष्णिमा
से घी के समान द्रवीभूत होकर तथा अपने स्वाभाविक स्थान से खिसक कर
वीर्य बस्तिदेश में एकत्र होकर मूत्रमार्ग से निकल जाता है२ ॥ ३४-३५ ॥
१. 'श्लेष्मणा' इति च । २. सुश्रुत मे भी कहा है—
'जिस प्रकार दूध में घी और गन्ने के रस में गुड़ छिपा रहता है इसी प्रकार
पुरुषों के शरीर में शुक्र को समझें, वह सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है।'