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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पा० २] चिकित्सितस्थानम् २१५

पा० २] चिकित्सितस्थानम् २१५

ही हैं। [ अष्टांगसंग्रह में—'अभयामलाकसहस्रं' पाठ है। अभया ५००
और आंवला ५०० ] ॥ ७ ॥
आमलक-चूर्णाढकमेकविंशतिरात्रमामलक-सहस्र-स्वरस-परिपूतं
मधुघृताढकाभ्यां द्वाभ्यामेकीकृतमष्टभागपिप्पलीकं शर्करा-चूर्ण-चतुर्भाग-
संप्रयुक्तं घृतभाजनस्थं प्रावृषि भस्मराशौ निदध्यात्, तद्वर्षान्ते सात्म्य-
पथ्याशी प्रयोजयेत्। अस्य प्रयोगाद्वर्षशतमजरमायुस्तिष्ठतीति समानं
पूर्वेण ॥ ८ ॥ इत्यामलकचूर्णम् ।
आमलक चूर्ण—एक आढक आवले के चूर्ण को एक हजार आवलों के
स्वरस में इक्कीस दिन तक भावना देवे । इसमें घी और मधु प्रत्येक के दो दो
आढक मिलावे । इन सब का अष्टमांश पिप्पली चूर्ण तथा चूर्ण का चतुर्थांश
शर्करा मिला कर घी से भावित पात्र मे रख दे । इस पात्र को बरसात में भस्म
के ढेर मे गाड़ दे । वर्षा बीत जाने पर सात्म्यभोजन होने पर इसका प्रयोग
करे । इसके प्रयोग से आयु सौ बरस तक बिना वृद्धावस्था तक रहतो है । शेष
गुण पूर्व की भाति हैं ॥ ८ ॥
विडङ्ग तण्डुल-चूर्णानामाढकं पिप्पली-तण्डुलानामध्यर्द्धाढकं सिता-
पला-सर्पिस्तैल-मध्वाढकै. षड्भिरेकीकृतं घृतभाजनस्थं प्रावृषि भस्म-
राशाविति सर्वं समानं पूर्वेण यावदाशीः ॥ ६ ॥ इति विडङ्गावलेप. ।
विडंगावलेह—छिलके रहित विडंग का चूर्ण एक आढक, पिप्पलो बाज
का चूर्ण १॥ आढक, मिश्री घी, तैल और शहद इनका एक एक आढक
लेकर छ. वस्तुओं को मिला कर घी से भावित पात्र में बरसात के प्रारम्भ में भस्म
के ढेर में दाब दे, आगे सब पूर्व की भांति है ॥ ६ ॥
यथोक्तगुणानामामलकानां सहस्रमार्द्र-पलाश-द्रोण्या सपिधानायां
बाष्पमनुद्गमन्त्यामारण्यगोमयाग्निभिरुपस्वेदयेत्, तानि सुस्विन्नशीता-
न्युद्धृतकुलकान्यापाथ्याऽऽढकेन पिप्पलीचूर्णानामाढकेन च विडङ्ग-
तण्डुलचूर्णानामध्यर्धेन चाढकेन शर्कराचूर्णाना द्वाभ्या द्वाभ्यामाढकाभ्यां
तैलस्य मधुनः सर्पिषश्च समायोज्य शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे स्थापयेदे-
कविंशतिरात्रमत उर्ध्वं प्रयोगः, अस्य प्रयोगाद्वर्षशतमजरमायुस्तिष्ठ-
तीति समानं पूर्वेण ॥ १० ॥ इत्यामलकावलेहोऽपरः।
आमलकावलेह ( २ )—पूर्वोक्त गुणवाले एक हजार आवलों को लेकर
ढाक की गीली लकड़ी से बनी, ढाक के ढकनवाली नाद में भर कर ढकन
लगा कर जंगली उपलों की आग पर ऐसे गरम करे कि उसके बाष्प बाहर न

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जायें। जिस समय आवले सीज जायें और ठण्डे हो जायें तब निकाल कर, कूट
कर, गुठली बाहर कर देनी चाहिये। इनके रेशे साफ करके, इसमें पिप्पली चूर्ण
एक आढक, विडग-तण्डुल चूर्ण एक आढक, शर्करा (चीनी) शाआढक,
तैल २ आढक, मधु दो आदक और घी दो आढक (परिभाषानुसार ४ । ४
आढक), मिला कर घी से भावित स्वच्छ और दृढ पात्र में रख देना चाहिये।
इक्कीस दिन के पीछे इसका प्रयोग करना चाहिये। इसके प्रयोग से जरारहित
आयु एक सौ वरस की होती है और सब पूर्व की भाँति लाभ होते हैं॥ १०॥
धन्वनि कुशास्तीर्णे स्निग्ध-कृष्ण मधुर-मृत्तिके सुवर्ण-वर्ण-मृत्तिके
वा व्यपगत-विष-श्वापद-पवन-सलिलाग्निदोषे कर्षणा-वल्मीक श्मशान-
चैत्योषरावसथ-वर्जिते देशे यथर्तु-सुख-पवन-सलिलादित्य-सेविते जा-
तान्यनुपहतान्यनध्यारूढान्यबालान्यजीर्णान्यविगतवीर्याणि शीर्ण-पुराण-
पर्णान्यसंजातान्यपर्णानि तपसि तपस्ये वा मासे शुचिः प्रयतः कृत-
देवार्चनः स्वस्ति वाचयित्वा द्विजातीन् बले सुमुहूर्ते नागबला-
मूलान्युद्धरेत्, तेषां सुप्राक्षालितानां त्वक्पिण्डमाम्रमात्रमक्षमात्रं वा
श्लक्ष्णपिष्टमालोड्य पयसा प्रातः प्रयोजयेत्, चूर्णीकृतानि वा पिबेत्
पयसा, मधुसर्पिर्थ्या वा संयोज्य भक्षयेत्। जीर्णे च क्षीरसर्पिर्भ्यां
शालिषष्टिकमश्नीयात्। संवत्सरप्रयोगादस्य वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठ-
तीति समानं पूर्वेण ॥ ११ ॥ इति नागबलारसायनम् ।
नागबला रसायन - जागल प्रदेश में उत्पन्न, कुशा से व्याप्त भूमि में
चिकनी काली और मधुर मिट्टी में या सुवर्ण के समान रंग की मिट्टी में उत्पन्न,
विष, हिंस्र जन्तु, वायु और जल तथा अग्नि के दोषों से रहित, जहाँ पर
हल न चला हो, वल्मीक (बमीठ) श्मशान, चैत्य (देवायतन), जहा ऊषर
भूमि न हो, जो रहने की भूमि न हो, ऋतु के अनुसार जहा पर वायु, पानी,
धूप पहुचती हो, ऊचाई पर उत्पन्न, पाले आदि से न मरी, कीड़े आदि से न
खाई, समीपस्थ वृक्ष या लता से न घिरी, न तो बहुत छोटी और न बहुत
पुरानी, (अपितु तरुण), वीर्य से भरपूर, जिसके पुराने पत्ते झड़ गये हो, नये
पत्ते अभी उत्पन्न न हुए हों, ऐसी नागबला (गंगेरन) को माघ या फाल्गुन
मास में उखाड़े। उखाड़ते समय वैद्य पवित्र और सयमवाले मन से देव-
ताओं की पूजा करके, मगल पाठ पढ़ कर, ब्राह्मणो का पूजन करके उत्तम
बलवान् मुहूर्त्त में नागबला की जड़ को उखाड़े। इन जड़ों को पानी से भली
प्रकार धोकर इनकी त्वचा आम्रमात्र (एक पल भर) या अक्ष (कर्ष) मात्र