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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १११

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १११
की चार तोला मात्रा चाहिये । अथवा केवल दूध से निकाले घी का सेवन
करावे । पद्म (कमल) उत्पल, कुमुद इनका पराग मधु और शर्करा के साथ
मिला कर चाटने के लिये देना चाहिये । सिंघाड़ा, कमलगट्टा, कसेरू ये पदार्थ
खाने के लिये देना चाहिये । गन्ध प्रियंगु, मिश्री, शालूक कन्द, गूलर के कच्चे
फल और वट के शुंग (फुनगी) इनको पीसकर बकरी के दूध के साथ पिलाना
चाहिये । बला, अतिबला, शालि, साठी धान्य, गन्ने की जड़ और काकोली द्वारा
सस्कार कर दूध के साथ लाल चावलों के मृदु मधुर और शीतल भात को मधु
और शर्करा के साथ खिलाना चाहिये । बटेर, कपिञ्जल, करज, शम्बर (हरिण
भेद), खरगोश, हरिण, ऐणक, कालपुच्छ इनके मास-रस के साथ अथवा पानी
में सिद्ध किये घी के साथ, सुखदायक, शीतल वायु वाले स्थान मे बिठा कर
भोजन करना चाहिये । क्रोध, शोक, मेहनत, मैथुन और व्यायाम आदि से
बचाना चाहिये । मन के अनुकूल प्रिय कथाओं से इसका मन बहलाना
चाहिये । इस प्रकार करने से गर्भ स्थिर हो जाता है ॥ २३ ॥
यस्याः पुनरामान्वयात्पुष्पदर्शनं स्यात्, प्रायस्तत्तस्या गर्भबाधकं
भवति, विरुद्धोपक्रमत्वात्तयोः । यस्याः पुनरुष्णतीक्ष्णोपयोगाद् गर्भि-
ण्या महति सजातसारे गर्भे पुष्पदर्शनं स्यादन्यो वा योनिस्रावः,
तस्या गर्भो वृद्धिं न प्राप्नोति निःस्रुतत्वात् । स कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रं,
तमुपविष्टकमित्याचक्षते केचित् । उपवास-व्रत-कर्म-परायाः पुनः कदाहा-
रायाः स्नेहद्वेषिण्याः वातप्रकोपणोक्तान्यासेवमानाया गर्भो न वृद्धिं
प्राप्नोति परिशुष्कत्वात्। स चापि कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रं, अस्पन्दनश्च १
भवति, तं तु नागोदरमित्याचक्षते ॥ २४ ॥
जिस गर्भिणी मे आम को उत्पन्न करने वाले कारण से पुष्प दर्शन होता है
उसका गर्भ नष्ट ही हो जाता है। क्योकि इनकी चिकित्सा परस्पर विरोधी पड़ती
है। गर्भस्राव मे स्तम्भन औषध बरती जाती है। स्तम्भन औषध शीत, मृदु
और मधुर होती है और इधर शीत, मृदु और मधुर औषध आम दोष को
उत्पन्न करती है। इसलिये असाध्य है। जिस गर्भिणी मे उष्ण, तीक्ष्ण वस्तुओं
के सेवन से, गर्भ के अन्दर सार उत्पन्न होने पर पुष्पदर्शन अथवा आर्तव के
अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का योनि-स्राव होने लगे, तब गर्भ की वृद्धि रुक
जाती है। क्योंकि बहने से पोषक पदार्थ के बाहर आ जाने से यह गर्भ बहुत
१ अतिमात्रस्पन्दश्च भवति, यह भी पाठ है, परन्तु सुश्रुत मे मन्द स्पन्दते
दिया है, इसलिये अस्पन्दनश्च भवति ठीक है ।

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समय तक रुक जाता है। इसको 'उपविष्टक' कहते हैं। और जो गर्भिणी
प्राय. उपवास करती है या कुत्सित आहार का सेवन करती है, घी आदि
स्नेह से द्वेष करती है, वात-प्रकोपक कारणो का सेवन करती है, उसका भी
गर्भ वृद्धि को प्राप्त नही होता, क्योंकि वह गर्भ शुष्क हो जाता है ! वह गर्भ
बहुत समय तक गर्भाशय में रुका रहता है। इसके अन्दर हरकते नहीं होती।
इसको 'नागोदर' कहते है ॥ २४ ॥
नार्‍योस्तयोरुभयोरपि चिकित्सितविशेषमुपदेक्ष्यामः-भौतिक-जीवनी-
य-बृहणीय-मधुर-वातहर-सिद्धाना सर्पिषामुपयोगः, नागोदरे तु योनिव्या-
पन्निद्दिष्टपयसामामगर्भाणा गर्भद्वद्धिकराणा च, सम्भोजनमेतैरेव सिद्धैश्च
घृतादिभिः सुभिक्षायाः, अभीक्ष्ण यान-वाहनावमार्जनावजृम्भणैरुपपा-
दनमिति ॥ २५ ॥
उपरोक्त दोनों प्रकार की स्त्रियो की विशेष चिकित्सा का उपदेश करते है -
भूतों (सूक्ष्म जन्तुओं को दूर करन) के लिये उपयोगी गुग्गुलु सरसों आदि
अथवा महापैशाचादि घृत, जीवनीय, बृहणीय, मधुर और वातहर ओषधियों से
सिद्ध घृत का उपयोग करना चाहिये। नागोदर गर्भ को अवस्था मे योनि व्यापत्
अधिकार में कहे घृता का तथा आम-गर्भ और गर्भ को वृद्धि करने वाले भोजनों
का उपयोग और इनसे ही सिद्ध वृतों का उपयोग करना चाहिये । यान, वाहन,
शरीर शुद्धि, जृम्भण आदि कर्मों को बार बार करना चाहिये ॥ २५ ॥
यस्याः पुनर्गर्भः प्रसुप्तो न स्पन्दते ता श्येन-मत्स्य-गवय तित्तिर-ताम्र-
चूड-शिखिनामन्पतमस्य सर्पिष्मता रसेन माषयूषेण वा प्रभूतसर्पिषा
मूलकयूषेण वा रक्तशालीनामोदन मृदु-मधुर-शीतल भोजयेत्, तैलाभ्य-
क्तेन चास्या अभीक्ष्णमुदरवक्षणोरु-कटी-पार्श्व-पृष्ठ-प्रदेशानीषदुष्णे
नोपाचरेत् ॥ २६ ॥
जिस गर्भिणी मे सोया हुआ गर्भ गति न करे उस स्त्री को श्येन, मछली,
गवय, मोर कुक्कुट या तीतर इनके मास रस के साथ घी अथवा माषयूष के
साथ पर्याप्त घी, मूली के यूष के साथ लाल चावलो का मधुर, मृदु, शीतल
भात खिलाना चाहिये । इस स्त्री के शरीर पर तैल की मालिश करके हलके गरम
पानी से उदर, पेट, जाघ, कटी, पीठ और पार्श्व का बार बार स्नान कराना
चाहिये ॥ २६ ॥
यस्याः पुनरुदावर्त्त-विवन्धः स्यादष्टमे मासे न चानुवासनसाध्यं
मन्येत, ततस्तस्यास्तद्विकारप्रशमनमुपकल्पयेन्निरूहम् । उदावर्तो ह्युपे-