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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० १० ] इन्द्रियस्थानम् १७५

अ० १० ] इन्द्रियस्थानम् १७५
पित्तमूष्मानुगं यस्य शङ्खौ प्राप्य विमूर्च्छति ।
स रोगः शङ्खको नाम्ना त्रिरात्राद्धन्ति जीवितम् ॥ २० ॥
सफेनं रुधिरं यस्य मुहुरास्यात्प्रमुच्यते ।
शूलैश्च तुद्यते कुक्षिः प्रत्याख्येयः स तादृशः ॥ २१ ॥
बलमांसक्षयस्तीव्रो रोगवृद्धिररोचकः ।
यस्याऽऽतुरस्य लक्ष्यन्ते त्रीन् पक्षान्न स जीवति ॥ २२ ॥
( १६ ) उष्मा से मिला पित्त जिस समय शंख प्रदेश ( कनपटियों ) में
आकर रुक जाता है, उस समय ‘शङ्खक’ नाम का रोग उत्पन्न होता है । इस
रोग से तीन दिन में रोगी मर जाता है । ( १७ ) जिस रोगी के मुख से झागदार
रक्त गिरता है, और पेट या पार्श्व में तीव्र वेदना रहती हो, उस रोगी को असाध्य
समझना चाहिये । ( १८ ) जिस रोगी में तीव्रता ( शीघ्रता ) से बल और मांस
का क्षय हो रहा हो, रोग में वृद्धि हो, अरुचि हो, वह रोगी तीन पक्ष से अधिक
नहीं जाता ॥ २०-२२ ॥
तत्र श्लोकौ—विज्ञानानि मनुष्याणां मरणे प्रत्युपस्थिते ।
भवन्त्येतानि सपश्येदन्यान्येवंविधानि च ॥ २३ ॥
तानि सर्वाणि लक्ष्यन्ते न तु सर्वाणि मानवम् ।
विशन्ति विनशिष्यन्तं तस्माद्बोध्यानि सर्वशः ॥ २४ ॥
मरणोन्मुख मनुष्यों में इस प्रकार के तथा अन्य इसी तरह के दूसरे नाना
प्रकार के लक्षण होते हैं । सब लक्षण होते तो अवश्य हैं, परन्तु एक ही रोगी में
सब लक्षण स्पष्ट नहीं होते । सब लक्षण एक साथ पुरुष में नहीं आते, इसलिये
इनको विशेष रूप से जानना चाहिये ॥ २३-२४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने यस्य श्याव-
निमित्तीयमिन्द्रियं नाम नवमोऽध्याय ॥ ९ ॥
दशमोऽध्यायः
अथातः सद्योमरणोयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ‘सद्यो-मरणीय इन्द्रिय’ नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

१७६ चरकसंहिता [ अ० १०

सद्यस्तितिक्षतः प्राणांल्लक्षणानि पृथक् पृथक् ।
अग्निवेश प्रवक्ष्यामि सस्पृष्टो येर्न जीवति ॥ ३ ॥
वाताष्ठीला सुसंवृत्ता तिष्ठन्ती दारुणा हृदि ।
तृष्णयाऽभिपरीतस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ४ ॥
पिण्डिके शिथिलीकृत्य जिह्मीकृत्य च नासिकाम् ।
वायुः शरीरे विचरन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ५ ॥
हे अग्निवेश ! शीघ्र प्राण छोड़ने वाले रोगी के लक्षणो को पृथक् पृथक्
कहता हू, जिनसे युक्त होने पर रोगी नहीं बचताछ । ( १ ) वाताष्ठीला कठोर
रूप से व्याप+ हाकर हृदय-प्रदेश मे आकर रुक जाये, रोगी को प्यास बहुत
लगती हो तो उस रोगी का जीवन बहुत शीघ्र हर लेती है । ( २ ) वायु
पिण्डलियों को शिथिल बना दे ओर नासिका का टेढ़ी कर दे तथा
सम्पूर्ण शरीर म वायु दौड़ता फिरे तो वह रोगी का जीवन हर लेता है ॥३-५॥
भ्रुवौ यस्य च्युते स्थानादन्तर्दाहश्च दारुणः ।
तस्य हिक्काकरो रोगः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ६ ॥
( ३ ) जिस रोगी का भोहे अपने स्थान से स्खलित हो जायें, शरीर मे
बहुत तीव्र, कष्टदायी दाह ( जलन ) हो, और उसका रोग हिचकियें पैदा कर
दे तो वह उसके प्राण को हर लेता है ॥ ६ ॥
क्षीणशोणितमांसस्य वायुरूध्वंगतिश्चरन् ।
उभे मन्ये समे यस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ७ ॥
अन्तरेण गुदं गच्छन्नाभि च सहसाऽनिलः ।
कृशस्य वंक्षणो गृह्णन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ८ ॥
वितत्य पर्शुकाग्राणि गृहीत्वोरश्च मारुतः ।
स्तिमितस्यायताक्षस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ९ ॥
हृदयं च गुदं चोभे गृहीत्वा मारुतो बली ।
दुर्बलस्य विशेषेण सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ १० ॥
वंक्षणं च गुदं चोभे गृहीत्वा मारुतो बली ।
श्वासं संजनयञ्जन्तोः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ११ ॥
नाभिं मूत्रं बस्तिशीर्षं पुरीषं चापि मारुतः ।
विबध्य जनयञ्छूलं सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ १२ ॥
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❀ 'सद्यः' शब्द से कुछ तो सात दिन गिनते हैं और कुछ आचार्य तीन
दिन मानते हैं ।