चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १४ । चिकित्सितस्थानम् ५५३
अ० १४ । चिकित्सितस्थानम् ५५३
कफप्रधान-अर्शों के लक्षण—जो अर्श बहुत बडे प्रमाण के ( बढे हुए ),
चिकने, स्पर्श को सहने वाले, स्निग्ध, श्वेत, पाण्डु और चिक्कन ( पिच्छिल ),
स्तब्ध ( जड़ी भूत ), भारी, स्तिमित ( गीले वस्त्र से ढपे हुए के समान ),
अति सुप्त ( स्पर्श ज्ञान से रहित ), स्थिर, शाथयुक्त जिनमे बहुत खाज हो,
जिनमे स्राव मात्रा मे अधिक तथा निरन्तर आये, स्राव, धूमर, श्वेत, लाल,
शुक्र, पिच्छा ( सीम्बल के गाद के समान ) जैसा हो, मल और मूत्र, भारी,
पिच्छिल और श्वेतवर्ण हो, रुक्ष और उष्णक्रिया से जिनमे शान्ति होती हो,
प्रवाहिका बार-बार उठ कर बैठना ( थोडा मल बाहर आये ), वक्षणो मे
आनाह हो, परिकर्त्तिका, जी मचलाना, निष्ठीवन ( थूक का आना ), कास,
अरुचि, प्रतिश्याय, भारीपन, छर्दि, मूत्रकृच्छ्र, शोष, शोथ, पाण्डुरोग, शीत
ज्वर, अश्मरी, शर्करा, हृदय-उपलेप, इन्द्रिय उपलेप ( कफाधिकता ), मुख मे
मधुर रस, प्रमेह-रोग का होना, दीर्घ काल तक रहने वाली अग्नि की अति-
मन्दता, क्लीबता को करने वाले, आमजन्य प्रा उठ रोगो को पैदा करने वाले,
नख, नयन, मुख, त्वचा, मूत्र और मल का वर्ण श्वेत होता है, इन अर्शों को
कफप्रधान-अर्श समझना चाहिये ॥ १८ ॥
भवन्ति चात्र-मधुरस्निग्धशीतानि लवणाम्लगुरूणि च ।
अव्यायामो दिवास्वप्नः शय्यासनसुखे रतिः ॥ १६ ॥
प्राग्वातसेवा शीतो च देशकालावचिन्तनम् ।
श्लैष्मिकाणां समुद्दिष्टमेतत्कारणमर्शसाम् ॥ २० ॥
कारण—मधुर, स्निग्ध, शीतल, लवण, अम्ल, गुरु भोजनो के सेवन से,
व्यायाम न करने से, दिन मे सोने से, शय्या-सुख, आसन-सुख की प्रवृत्ति, जोर
की सीधी वायु का सेवन, शीतल देश, शीतल काल, चिन्ता न करना ये
कफजन्य अर्शरोग के कारण है ॥ १६-२० ॥
हेतुलक्षणसंसर्गाद्विद्याद् द्वन्द्वोल्बणानि च ।
सर्वो हेतुस्त्रिदोषाणां सहजैर्लक्षणं समम्१ ॥ २१ ॥
उपरोक्त दो कारण ओर लक्षणो के मिलने से द्वन्द्वज-अर्श ( वात, पित्तो-
ल्बण, वात, श्लेष्मोल्बण, पित्तश्लेष्मोल्बण ) उत्पन्न होते है । तीनों दोषो के
मिलने से सन्निपातजन्य अर्श-रोग उत्पन्न होते है, इसके लक्षण सहज ( गर्भ
शरीर के साथ उत्पन्न ) अर्श के समान होते है ॥ २१ ॥
१ 'लक्षणैः समम्' इति वा पाठः ।
५५४ चरकसंहिता [ अ० १४
विष्टम्भोऽन्नस्य दौर्बल्यं कुक्षेराटोप एव च ।
कार्श्यमुद्गारबाहुल्यं सक्थिसादोऽल्पविट्कता ॥ २२ ॥
ग्रहणीदोषपाण्ड्वर्तेराशङ्का चोदरस्य च ।
पूर्वरूपाणि निर्दिष्टान्यर्शसामभिवृद्धये ॥ २३ ॥
पूर्वरूप—अन्न का विष्टम्भ, दुर्बलता, कुक्षि मे वेदनायुक्त गुड़-गुड़ शब्द,
शरीर मे कृशता, डकार का अधिक आना, टागो मे दर्द, मल का थोड़ा
आना, ग्रहणी-रोग या पाण्डु-रोग की शका ( सम्भावना ), अथवा उदररोग
की आशका होना ये अर्शरोग की उत्पत्ति के पूर्वरूप है ॥ २२-२३ ॥
अशांसि खलु जायन्ते नासन्निपतितैस्त्रिभिः ।
दोषैर्दोषविशेषान्तु विशेषः कल्प्यतेऽर्शसाम् ॥ २४ ॥
अर्श-रोग तीनो दोषो क सन्निपात से ही उत्पन्न होते है । सब अर्श त्रिदोष-
जन्य ही है । किन्तु दोष विशेष की प्रधानता से ही इनको वातजन्य, पित्तजन्य
या कफजन्य कहा जाता है ॥ २४ ॥
पञ्चात्मा मारुतः पित्तं कफो गुदवलित्रयम् ।
सर्वे एव प्रकुप्यन्ति गुदजाना समुद्भवे ॥ २५ ॥
तस्मादर्शासि दुःखानि बहुव्याधिकराणि च ।
सर्वदेहोपतापानि प्रायः कृच्छ्रतमानि च ॥ २६ ॥
प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान पाच प्रकार की वायु, पित्त,
कफ और गुदा की तीनों वलिया अर्श-रोग की उत्पत्ति मे कुपित हो जाती
हैं । इसी कारण से अर्श-रोग अतिदु ख देने वाला, नाना रोगो को उत्पन्न
करने वाला, सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करने के साथ-साथ अतिकृच्छ्रसाध्य
होता है ॥ २५-२६ ॥
हस्ते पादे मुखे नाभ्या गुदे वृषणयोस्तथा ।
शोथो हृत्पार्श्वशूलं च यस्यासाध्योऽर्शसो हि सः ॥ २७ ॥
हृत्पार्श्वशूलं संमोहश्छर्दिरङ्गस्य रुग्ज्वरः ।
तृष्णा गुदस्य पाकश्च निहन्युर्गुदजातुरम् ॥ २८ ॥
सहजानि त्रिदोषाणि यानि चाभ्यन्तरा वलिम् ।
जायन्तेऽशांसि संश्रित्य तान्यासाध्यानि निर्दिशेत् ॥ २९ ॥
असाध्यता—जिस व्यक्ति के हाथ, पाव, मुख, नाभि, गुदा, अण्डकोश
मे शोथ हो जाये, रोगी को हृदयशूल, पार्श्वशूल हो वह अर्श-रोगी असाध्य है ।
हृदयशूल, पार्श्वशूल, मूर्च्छा, वमन, अगों मे दर्द, ज्वर, तृष्णा और गुदा का
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५५५
पाक ये अर्श रोगी को मार देते हैं, इन लक्षणों वाला रोगी असाध्य है । जो
अर्श सहज (गर्भ-शरीर के साथ उत्पन्न हुए), सन्निपातजन्य तथा भीतर की
वलि मे आश्रित होते है, वे सब असाध्य होते है ॥ २७-२६ ॥
शेषत्वादायुषस्तानि चतुष्पादसमन्विते ।
याप्यन्ते दीप्तकायाग्नेः प्रत्याख्येयान्यतोऽन्यथा ॥ ३० ॥
द्वन्द्वजानि द्वितीयायां वलो यान्याश्रितानि च ।
कृच्छ्रसाध्यानि तान्याहुः परिसंवत्सराणि च ॥ ३१ ॥
असाध्य दो प्रकार के हैं, याप्य और प्रत्याख्येय । यदि रोगी की आयु शेष
हो, भिषक्, औषध, रोगी ओर उपचारक ये चारो पाद मिल जाये, रोगी की
अग्नि प्रदीप्त हो तो सहज आदि अर्श याप्य है और यदि आयु शेष न हो,
चारो पाद न मिले तथा अग्नि मन्द हो तो, 'प्रत्याख्येय' असाध्य हैं ॥३०-३१॥
बाह्याया तु वलौ जातान्येकदोषोल्बणानि च।
अर्शांसि सुखसाध्यानि न विरोत्पतितानि च ॥ ३२ ॥
साध्य भी दो प्रकार के है। सुखसाध्य और कष्टसाध्य । जो अर्श द्वन्द्वज
तथा दूसरी वलि मे आश्रित हो ओर एक साल पुराने हो जाते है, वे कष्टसाध्य
हैं। जो अर्श बाह्य-वलि मे उत्पन्न हो, जिनमे एक दोष की प्रबलता हा और
नूतन ही उत्पन्न हुए हो तो वे सुखसाध्य होते है ॥ ३२ ॥
तेषां प्रशमने यत्नमाशु कुर्याद्विचक्षणः ।
तान्याशु हि गुदं बद्ध्वा कुर्युर्बद्धगुदोदरम् ॥ ३३ ॥
इन अर्शो की शान्ति के लिये वैद्य को शीघ्र ही यत्न करना चाहिये ।
क्योकि ये अर्श गुदा को रोक कर शीघ्र ही बद्धगुदोदर-रोग को उत्पन्न
कर देते है ॥ ३३ ॥
तत्राऽऽहुरेके शस्त्रेण कर्तनं हितमर्शसाम् ।
दाहं क्षारेण चाप्येके'दाहमेके तथाऽग्निना ॥ ३४ ॥
अस्त्येतद् भूरितन्त्रेण धीमता दृष्टकर्मणा ।
क्रियते त्रिविधं कर्म भ्रंशस्तस्य सुदारुणः ॥ ३५ ॥
पुंस्त्वोपघातः श्वयथुर्गुदे वेगविनिग्रहः ।
आध्मानं दारुणं शूलं व्यथा रक्तातिवर्तनम् ॥ ३६ ॥
पुनर्विरोहो रूढानां छेदो भ्रंशो गुदस्य च ।
करणं वा भवेच्छिद्रं शस्त्रक्षाराग्निविभ्रमात् ॥ ३७ ॥
चिकित्सा—अर्श की शान्ति के लिये एक वैद्य का कथन है कि शस्त्र से
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काटना अर्श मे हितकारी है। दूसरे का कथन है कि क्षार से जलाना चाहिये
ओर तीसरे का कथन है कि अग्नि से जलाना चाहिये ।
ये सब बातें सत्य हैं, परन्तु बहुत शास्त्र-ज्ञान से सम्पन्न, शस्त्र-कर्म के
अनुभवी, बुद्धिमान् वैद्य ही ये कार्य कर सकते हैं और यदि कदाचित् इन
कर्मो मे चूक हो जाये तो अति भयानक फल होता है । जैसे—
शस्त्र, क्षार और अग्नि के अयुक्त प्रयोग से—पुरुषत्व का नाश, गुदा मे
शोथ, मल का अवरोध, आध्मान ( अफारा ), तीव्र शूल, पीड़ा, अति रक्त
स्राव, शस्त्र, क्षार, अग्नि से कट जाने पर भी पुनः उत्पत्ति, भर जाने पर क्लेद,
गुद भ्रश अथवा शीघ्र मृत्यु हो जाती है ॥ ३४-३७ ॥
यत्तु कर्म सुखोपायमल्पभ्रंशमदारुणम् ।
तदर्शासां प्रवक्ष्यामि समूलानां निवृत्तये ॥ ३८ ॥
इसलिये जो कर्म सुखपूर्वक हो सकता है, जिसमे थोड़ी सी भूल होने पर
भी भयानक फल नही होता, अर्श रोग का मूल नाश करने के लिये इस प्रकार
के कर्म का उपदेश करता हू ॥ ३८ ॥
वातश्लेष्मोल्बणान्याहुः शुष्काण्यर्शासि तद्विदः ।
प्रस्रावीणि तथाऽऽर्द्राणि रक्तपित्तोल्बणानि च ॥ ३६ ॥
तत्र शुष्कार्र्शासा पूर्व प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् ।
अर्श-रोग को जानने वालो का कहना है कि वातप्रधान या कफप्रधान
अर्श शुष्क होते है। पित्तप्रधान या रक्तप्रधान अर्श स्रावयुक्त और आर्द्र होते हैं।
[सुश्रुत ने रक्तजन्य अर्श को माना है, चरकमे पित्तजन्य अर्श मे ही इसका अन्त-
र्भाव किया है ]। इसलिये प्रथम शुष्क अर्शो की चिकित्सा को कहता हूँ ॥३६॥
स्तब्धानि स्वेदयेत्पूर्व शोफशूलान्वितानि च ॥ ४० ॥
चित्रकक्षारबिल्वानां तैलेनाभ्यज्य स्वेदयेत् १ ।
यवमाषपुलाकानां कुलत्थानां च पोट्टलैः ॥ ४१ ॥
गोखराश्वशकृत्पिण्डैस्तिलकल्कैस्तुपेस्तथा ।
(१) इसके लिये बुद्धिमान् वैद्य का चाहिये कि शोथ और शूल से युक्त
कठोर अर्शों को प्रथम चित्रक क्षार, बिल्व के कल्क से साधित तेल से चिकने
करके, जौ, माष, कुलत्थि, पुलाक (जिनसे चावल नही निकाले ऐसे धान्यो )
की पोटलियो से, गाय, घोड़ा, गधा इनके लीद के पिण्डा से, तिल कल्क से
और तुष से और वच, सौफ इनके कल्क को पिण्डाकार करके, स्नेह से युक्त
करके मन्द २ गरम स्वेद देना चाहिये ॥ ४०-४२- ॥
१. 'बुद्धिमान्' इति वा पाठः ।