चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७६
अ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७६
( ३ ) जो प्रमेह रोगी सशोधन के योग्य न हो उसके लिये सशमनी
चिकित्सा करे । उसको प्रमेह की शान्ति के लिये—मन्थ, कषाय, जौ, चूर्ण,
अवलेह और लघु भक्ष्य पदार्थों का सेवन करावे ।
( ४ ) विष्किर, प्रतुद पक्षियो का तथा जागल पशु-पक्षियों के मन-मोहक
सुस्वादु मास-रसो के साथ, रूक्ष यवान्न, वाट्य ( जौ का मण्ड ), पुराना मद्य,
सत्तू, अपूप ( वडे ) मूग आदि का यूष, तिक्त शाक, पुराने शालियो का
भात, दन्ती तैल, इङ्गुदी ( हिंगोट ) का तैल, अलसी तथा सरसो के तैल के
साथ साठी आदि तृणधान्यो को दे । प्रमेह रोगी का खास कर जौ का भोजन
करावे । कफ-प्रमेही को मधु के साथ जौ के नाना प्रकार के पदार्थ खाने क
लिये दे ।
( ५ ) प्रमेह का रोगी त्रिफला के काथ म जौ का डालकर रात भर रख
दे । पीछे स इनको सत्तू बनाकर जल मे आलोड़ित करके मधु मिला कर तर्पण
बनावे । इन तर्पणो का सीधु के साथ मिलाकर प्रति दिन पान करे ॥१७–२२॥
ये श्लेष्ममेहे विहिताः कषायास्तैर्भाविताना च पृथग्यवानाम् ।
सक्तूनपूपान्सगुडान्सधानान्भक्ष्यांस्तथाऽन्यान्यविधान्श्चखादेत् २३
खराश्वगोहस्रपृषदूभृताना' तथा यवाना विविधाश्चभक्ष्याः ।
देयास्तथा वेणुयवा यवाना कल्पेन गोधूममयाश्च भक्ष्याः ॥२४॥
सशोधनोल्लेखनलंधनानि काले प्रयुक्तानि कफप्रमेहान् ।
जयन्ति पित्तप्रभवान्विरेकाः संतर्पणः सशमनो विधिश्च॥ २५॥
दार्वा सुराह्वां त्रिफला समुस्ता कषायमुत्क्वाथ्य पिबेत्प्रमेही ।
क्षौद्रेण युक्तामथवा हरिद्रा पिबेद्रसेनामलकीफलानाम् ॥ २६ ॥
( ६ ) कफप्रमेह मे जो कषाय कहे है, उन कषायो से पृथग् २ रूप मे जौ
को भावित करके सत्तू, अपूप, धाना ( भुने जौ ) और अन्य भक्ष्य पदार्थों का
बनाकर गुड के साथ खावे ।
( ७ ) गदहा, घोडा, गाय, हस, पृषत् ( हरिण ) इनके द्वारा खाये हुए
जौ जो उनके मल मे बाहर आवे उनसे नाना प्रकार के भक्ष्य बना कर देवे ।
इसी प्रकार वेणुयव ( बास के जो, वशफल ) और गेहूँ के बने भक्ष्य पदार्थ
सेवन करने के लिये देवे ।
( ८ ) उचित समय मे दिये गये सशोधन, उल्लेखन (वमन), लघन कफप्रमेह
को नष्ट करते है, सतर्पण, सशमन और विरेचन पित्तजन्य प्रमेहो को जीतते है ।
१ 'खराश्वगोधेणुकसभृताना' इति च पाठः ।
३८० चरकसंहिता [ अ० ६
(६) दारु हरिद्रा, हरड, बहेडा, आवला और मोथा इनके क्वाथ पीवे, अथवा
हल्दी के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर आवले के रस के साथ पीवे ॥२३-२६॥
हरीतकीकट्फलमुस्तलोध्र पाठाविडङ्गाजु॑नधन्वनाश्च ।
उभे हरिद्रे तगर विडङ्ग कदम्बशालार्जुनदीप्यकाश्च ॥ २७ ॥
दार्वी विडङ्ग खदिरो धवश्च सुराह्वकुष्ठागुरुचन्दनानि ।
दार्व्यग्निमन्थौ त्रिफला सपाठा पाठा च मूर्वा च तथा श्वदंष्ट्रा ॥२८॥
यवान्युशीरान्यभया गुडूची चव्याभयाचित्रकसप्तपर्णाः ।
पादैः कषायाः कफमेहिना ते दशोपदिष्टा मधुसंप्रयुक्ताः ॥ २६ ॥
कफप्रमेह के दस योग—(१) हरड, कायफल, मोथा और लोध,
(२) पाठा, वायविडंग, अर्जुन, धन्वन (धावन की छाल), (३) हल्दी,
दारुहल्दी, तगर, वायविडग, (४) कदम्ब, शाल, अर्जुन, अजवायन,
(५) दारुहल्दी, वायविडंग खैर और धव की छाल, (६) देवदारु, कूठ,
अगरु और लालचन्दन, (७) दारुहल्दी, अग्निमन्थ, त्रिफला और पाठा,
(८) पाठा, मूवा और गाखरू, (६) अजवायन, खस और हरड़ तथा
गिलोय, (१०) चविका, हरड, चीतामूल, सतवन की छाल, ये दस कषाय
श्लोका के चतुर्थ भागो मे कहे गये है । इनका मधु के साथ मिलाकर कफ-प्रमेह
मे बरते ॥ २७-२६ ॥
उशीरलोध्राञ्जनचन्दनानामुशीरमुस्तामलकाभयानाम् ।
पटोलनिम्बामलकामृताना मुस्ताभयापद्मकवृक्षकाणाम् ॥ ३० ॥
लोध्राम्बुकालीय कधातकीना निम्बार्जुनाम्रातनिशोत्पलानाम् ।
शिरीषसर्जार्जुनकेशराणि प्रियङ्गुपद्मोत्पर्लाकशुकानाम् ॥ ३१ ॥
अश्वत्थपाठासनवेतसाना कटङ्कटेड्युत्पलमुस्तकानाम् ।
पैत्तेषु मेहेषु दशैव दृष्टाः पादैः कषायाः मधुसंप्रयुक्ताः ॥ ३२ ॥
पैत्तिक प्रमेह मे दस प्रयोग—(१) खस, लाध, अंजन (रसांजन) लाल
चन्दन, (२) खस, मोथा, आवला ओर हरड, (३) परवल, नीम की छाल,
आवला, गिलाय, (४) मोथा, हरड, पद्माख और इन्द्रजो (कूडे की छाल),
(५) लोध, गन्धबाला, कालीयक (पीतकाष्ठ चन्दन) धान के फूल, (६)
नीम की छाल, अर्जुन की छाल, अम्बाडा, हल्दी, नीला कमल, (७) सिरस
की छाल, सर्जत्वक्, अर्जुन की छाल, नाग केसर, (८) फूलप्रियगु, श्वेतकमल,
नीलोत्पल, ढाक के फूल, (६) अश्वत्थ, पाठा, असन (पीतशाल) की छाल,
वेतस की छाल, (१०) कटकटेरी, (दारुहल्दी), नीलोत्पल, मोथा, ये दस