चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
वातगुल्म चिकित्सा । पैत्तिक गुल्मचि-
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[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
वातगुल्म चिकित्सा । पैत्तिक गुल्मचि-
कित्सा । शमन योग । रक्तमोक्षण ।
अपक्व गुल्म के लक्षण । विद्ह्यमान
गुल्म के लक्षण, पक्व गुल्म के लक्षण,
गुल्म के दो प्रकार अन्तस्थ और
बहिस्थ । वमन के योग । कफगुल्म मे
घृत पान आदि । अरिष्ट प्रयोग के काल
त्र्यूषणादि घृत । गुल्म षट्पल घृत ।
हिंगुसौवर्चलादि घृत । हबुषाद्य घृत ।
पिप्पल्याद्यघृत । हिंग्वादि चूर्ण । हिंग्वा-
दि गुटिका । शट्यादि वटी । नागरादि
योग । लशुनक्षीर । तैलपञ्चक । शिला-
जतु प्रयोग । अन्य योग, स्वेद प्रयोग ।
गुल्मनाशक बस्तिक्रिया । गुल्मनाशक
तैल । नीलिन्याद्य घृत । वातगुल्म मे
पथ्य । रोहिण्याद्य घृत । त्रायमाणाद्य
घृत । आमलकाद्य घृत । द्राक्षाद्य घृत ।
वासा घृत । कफगुल्म की चिकित्सा ।
दशमूली घृत । भल्लातकाद्य घृत ।
पञ्चकोल घृत । मिश्रक स्नेह । वातगुल्म
और कफगुल्म मे विरेचन । दन्तिह-
रीतकी । अन्य योग । आहार । असा-
ध्यता । रक्तगुल्म की चिकित्सा । पला-
शक्षार यमक । गुल्मनाशक अनेक योग ।
वातगुल्म और कफगुल्म में सशमन-
चिकित्सा । उपसंहार ।
षष्ठोऽध्यायः ( पृ० ३७५-३८६ )
प्रमेहचिकित्सितम्—कफप्रमेह का
निदान । सम्प्राप्ति । प्रमेह के बीस भेद ।
उनके तीन कारण समक्रिया, विषम
क्रिया और महात्यय । दस प्रकार के
कफजन्य प्रमेह । पित्तजन्य छ. प्रमेह ।
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
४ प्रकार के वातिक प्रमेह । पूर्वरूप ।
प्रमेह रोगियों के दो प्रकार । उपचार ।
कफप्रमेह क दस योग । कफप्रमेह और
पित्तप्रमेह मे पथ्य । त्रिकण्टकाद्य तैल,
घृत और यमक । लोध्रासव । दन्त्या-
सव । भल्लातकासव । षडङ्गपानीय
विधि से साधित मद्य का योग । प्रमेह-
नाशक अनेक योग । साध्यासाध्य रूप
उपसंहार ।
सप्तमोऽध्यायः ( पृ० ३८६-४१५ )
कुष्ठचिकित्सितम्—कुष्ठ के हेतु,
सम्प्राप्ति । कुष्ठ का पूर्वरूप । १८ कुष्ठों
के लक्षण । सात महाकुष्ठो के लक्षण
उदुम्बर, मण्डल, ऋष्यजिह्व, पुण्डरीक,
सिध्मकुष्ठ, काकणक कुष्ठ । क्षुद्र कुष्ठ
के १६ प्रकार । दोषो की प्रधानता ।
तीनो दोषो के लक्षण । साध्य असाध्य
कुष्ठ । चिकित्सा । वमन योग । विरेचन
द्रव्य । आस्थापन योग । नस्य ।
किलासनाश । वैरेचनिक योग । मण्डल
कुष्ठो का उपचार । पटोलादि काथ ।
मुस्तादि चूर्ण । त्रिफलादि चूर्ण, लेली-
हक प्रयोग । पारद योग । हीरकादि
योग । मध्वासव । कनकबिन्द्वरिष्ट ।
वात, कफ और पित्तजन्य कुष्ठो पर
योग । पथ्यापथ्य । चित्रकादि लेप ।
मास्यादि लेप । त्रप्वादि लेप । सिद्धार्थक
स्नान । आठ कषाय । त्रिफलादि कषाय,
कुष्ठाद्य तैल । श्वेतकरवीराद्य तैल ।
श्वेतकरवीरपत्राद्य तैल । तिक्तैक्ष्वाकु
तैल । कनकक्षीरी तैल । सिध्म लेप ।
विपादिकाहर घृत-तैल । मण्डल कुष्ठ-
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[बायाँ स्तम्भ]
हर लेप । ऐडगजादि लेप । सिद्ध कुष्ठ-
हर लेप । कुष्ठ में स्नान पान, अनेक
योग । अभ्यंग । रक्त-पित्त प्रधान कुष्ठों
मे अनेक घृत । त्रैफल योग , तिक्तप-
ट्पल घृत । महातिक्तक घृत , महाखा-
दिर घृत । कृमि-कुष्ठ पर अनेक लेप ।
श्वित्र चिकित्सा । पलाश क्षार, खदिरो-
दक पान । मन शिलादि लेप, त्रिक पर
अनेक लेप । असाध्य रोग । किलास
के तीन भेद । किलास के कारण ।
उपसहार ।
अष्टमोऽध्यायः ( पृ० ४१५-४४२ )
राजयक्ष्मचिकित्सितम्—यक्ष्मा
की उत्पत्ति का उपाख्यान । यक्ष्मा के
चार कारण । राजयक्ष्मा के लक्षण ।
शक्ति से अधिक कार्य करने से उत्पन्न
क्षय । वेगोंके संधारण से उत्पन्न यक्ष्मा
धातुक्षय से उत्पन्न यक्ष्मा । विषमाश्रन
से उत्पन्न यक्ष्मा,राजयक्ष्मा का पूर्वरूप ।
यक्ष्मा के रूप और औषध । यक्ष्मा के
ग्यारह रूप । राजयक्ष्मा का लक्षण-स्वर
भेद आदि । प्रतिश्यायादि लक्षणों पर
चिकित्सा । स्वेदन । प्रदेह । बस्ति, नलों
का शिरावेध आदि । सद्यमनी क्रिया ।
संशमन चिकित्सा । यक्ष्म रोगी की मल
स्रसन से मृत्यु । दशमूलाद्य घृत । कास,
श्वासादि लक्षणों पर स्नेह और लेह ।
पञ्च पञ्चमूल घृत । चार लेह । सितो-
पलादि लेह-वासा घृत-शतावरी घृत ।
गोक्षुरादि घृत । जीवन्त्यादि घृत ।
बलादि क्षीर । अन्य उपयोगी योग ।
यवानी षाडव । तालीशाद्य चूर्ण । पथ्य,
[दायाँ स्तम्भ]
घृत-सेवन । दशमूलादि घृत । पञ्चको-
लादि । रास्नादि घृत । सेवन विधि ।
उत्सादनयोग, स्नानीय जल । पथ्य
खाद्य । अभ्यंग । उपसहार ।
नवमोऽध्यायः ( पृ० ४४२–४६२ )
उन्मादचिकित्सितम्—उन्माद के
कारण और सामान्य लक्षण,सम्प्राप्ति-
लक्षण । कारणभेद से उन्माद के दो
भेद-निज और आगन्तुज । आगन्तुज के
पाच प्रकार । वातजन्य उन्माद,
लक्षण । पित्तजन्य उन्माद के पूर्वरूप
और लक्षण-कफज उन्माद, पूर्वरूप और
लक्षण । सन्निपातजन्य उन्माद-आग-
न्तुज उन्माद-लक्षण-ग्रहोन्माद के लक्षण
देव, सिद्ध, पितृ, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस,
ब्रह्मराक्षस, पिशाच आदि से उत्पन्न
ग्रहोन्माद । उनके आगमन काल ।
असंख्य ग्रहों मे मुख्य आठ ग्रह । निज
आगन्तुज भेद से उन्माद के दो प्रकार ।
उपचार कल्याणक घृत । महाकल्याणक
घृत । महापैशाचिक घृत । लशुनाद्य
घृत । हिग्वादि पुरातन घृत योग ।
नस्य और अञ्जन । उन्माद पर प्रायो-
गिक धूम । उन्माद पर अन्य उपचार,
दैवव्यपाश्रय चिकित्सा, उपसहार ।
दशमोऽध्यायः ( पृ० ४६२–४७४ )
अपस्मारचिकित्सितम्—अपस्मार
का लक्षण,निदानपूर्वक सम्प्राप्ति । सामा-
न्य लक्षण । अपस्मार के चार प्रकार ।
वातिक अपस्मार के लक्षण । पैत्तिक
अपस्मार के लक्षण । कफजन्य अपस्मार
के लक्षण । चिकित्सा । पञ्चगव्य घृत ।
[ ११ ]
महापञ्चगव्य घृत, ब्राह्मी घृत। अपस्मार
नाशक अनेक योग, अपस्मार नाशक
नस्य । तीन योग अञ्जन । धूपन । अत-
त्त्वाभिनिवेश नामक महारोग । चिकि-
त्सा । उपसहार ।
एकादशोऽध्यायः (पृ० ४७४-४८६)
क्षतक्षीणचिकित्सितम्—कारण और
सम्प्राप्ति । लक्षण । चिकित्सा । अनेक
योग । अमृतप्राश घृत । श्वदंष्ट्रादि घृत ।
सक्तु प्रयोग । सर्पिर्गुड के चार योग ।
सर्पिर्मोदक । सैन्धवादि चूर्ण । षाडव ।
उपसहार ।
द्वादशोऽध्यायः (पृ० ४८६-५१२)
श्वयथुचिकित्सितम्—कारण । दो
भेद-निज और आगन्तुज । निज शोथ के
भेद । सम्प्राप्ति, पूर्वरूप सामान्य
लक्षण । पैत्तिक शोथ कफजन्य शोथ
असाध्य शोथ । शोथ के उपद्रव । साध्य
शोथ । आमजन्य शोथ की चिकित्सा ।
अपथ्य । चिकित्सा । अनेक योग ।
गण्डीराद्यरिष्ट । अष्टशतारिष्ट । पुनर्न-
वाद्यरिष्ट । फलत्रिकाद्यरिष्ट । क्षार
गुडिका, गुडार्द्रक प्रयोग । शिलाजतु
प्रयोग । कसहरीतकी । पटोलमूलाद्य
घृत । चित्रकाद्य घृत, चित्रक घृत ।
जीवन्त्यादि यवागू । अन्य पथ्य, शाक-
शैलेयादि तैल, प्रदेह । पैत्तिक शोथ
चिकित्सा । कफजन्य शोथ चिकित्सा ।
शोफ रोगी को उबटन । बिडालिका
का लक्षण-तालु विद्रधि । उपजिह्विका,
उपकुश । गलगण्ड-गण्डमाला चिकित्सा,
ग्रन्थि । चिकित्सा—असाध्यग्रन्थि ।
बिदारिका-विस्फोटक-कक्षा । रोमान्तिका-
मसूरिका-वृद्धिगेग । भगन्दर-चिकित्सा,
श्लीपद-जालगर्दभ-चिकित्सा । उप-
सहार-आगन्तुज शोथ । उपसहार ।
त्रयोदशोऽध्यायः (पृ० ५१२-५४५)
उदरचिकित्सितम्—अग्निवेश का
निवेदन-आत्रेय ऋषि का उपदेश ।
उदर रोग के सामान्य कारण । उदर
रोग के पूर्व रूप । रूप । वातोदर के
कारण और लक्षण । पित्तोदर के कारण-
लक्षण । कफोदर के कारण-लक्षण ।
सन्निपातोदर के कारण और लक्षण ।
प्लीहोदर । यकृत्प्लीहोदर । बद्धगुदोदर
लक्षण । छिद्रोदर-लक्षण । उदकोदर-
लक्षण । असाध्य रोगी । वातोदर की
चिकित्सा । पित्तोदर की चिकित्सा ।
कफोदर की चिकित्सा । अनेक योग ।
रोहितक घृत । बद्धगुदोदर की चिकित्सा,
छिद्रोदर की चिकित्सा । उदकोदर की
चिकित्सा । अपथ्य । उदर रोग पर तक्र
का प्रयोग । दुग्धयोग लेप-परिषेचन,
अवसेचन, अष्टमूत्र प्रयोग । दीपनीय
घृत । पञ्चकोल घृत । नागराद्य घृत ।
चित्रक घृत । यवाद्य घृत । पटोलमूला-
दिचूर्ण । गवाक्ष्यादि चूर्ण । नारायण
चूर्ण । हबुषाद्य चूर्ण, नीलिन्याद्य चूर्ण ।
अन्य अनेक योग । वर्धमान-पिप्पली
विधि से हरड़ का सेवन । दूष्योदर
(सन्निपातोदर) में दन्त्यादि तैल ।
वातोदर में सरलादि तैलाभ्यंग । अरिष्टों
के प्रयोग । उदकोदर पर अज्ञकरीषादि
क्षार योग । अन्य अनेक योग-उदर-