चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३३
पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३३
शिलाजीत के प्रयोग के समय विदाही और गुरु पदार्थों का तथा कुलत्थी
का एक साल तक ( अथवा जब तक शिलाजतु के गुण शरीर में हों तब तक )
सेवन नहीं करना चाहिये । क्योकि लोक में हम यह स्पष्ट देखते हैं कि पत्थरों
से अत्यन्त विरोध रखने के कारण कुलत्थ पत्थरों तक को फोड़ कर निकलते
हैं। बंजर भूमि में, रोहाड़ों में ही कुलत्थी होती है। [ व्यायाम, धूप, वायु,
ताप, काकमाची और कपोता ये भी वर्जनीय हैं और वर्षा का, कुएं का या
झरने का जल पथ्य है। अष्टागसंग्रह ] ॥ ६२-६३ ॥
पयांसि शुक्तानि¹ रसाः सयूषा-
स्तोयं समूत्रं विविधाः कषायाः ।
आलोडनार्थं गिरिजस्य शस्ता-
स्ते ते प्रयोज्याः प्रसमीक्ष्य कार्यम् ॥ ६४ ॥
शिलाजतु के आलोडन द्रव्य - दूध शुक्त, (सिरका), मास रस, यूष,
जल, गोमूत्र आदि मूत्र, नाना प्रकार के क्वाथ, दोष आदि की विवेचना करके,
शिलाजतु के आलोडन में इनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ६४ ॥
न सोऽस्ति रोगो भुवि साध्यरूपः
शिलाह्वयं य न जयेत् प्रसह्य ।
तत्कालयौगैविधिभिः प्रयुक्त
स्वस्थस्य चोर्जां विपुलां ददाति ॥ ६५ ॥
इति शिलाजतुरसायनम् ।
इस पृथ्वी पर ऐसा कोई भी साध्य रोग नहीं है जिसको शिलाजतु उन
उन अवस्थाओं के योग्य यागों के साथ विधिपूर्वक प्रयुक्त होने से बलपूर्वक नष्ट
नहीं कर देता । वह स्वस्थ पुरुषों को भी पर्याप्त बल देता है ॥ ६५ ॥
तत्र श्लोकः - करप्रचितिके पादे दश षट् च महर्षिणा ।
रसायनानां सिद्धानां संयोगाः समुदाहृताः ॥ ६६ ॥
इस करप्रचितीय रसायन पाद में महर्षि ने सोलह सिद्ध रसायनों के प्रयोग
कहे हैं ॥ ६६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
करप्रचितीयो नाम रसायनपादस्तृतीयः ।
________________________________________
१ 'तक्राणि' इति च पाठः ।
२३४ | चरकसंहिता | [ अ० १
( चतुर्थः पादः )
अथात आयुर्वेदसमुत्थानीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम 'आयुर्वेद समुत्थानीय रसायन पाद' की व्याख्या करते हैं, भग-
वान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
ऋषयः खलु कदाचिच्छालीना यायावराश्च ग्राम्यौषध्याहाराः सन्तः
सांपन्निका मन्दचेष्टाश्च नातिकल्याणाः प्रायेण बभूवुः । ते सर्वासामि-
तिकर्तव्यतानामसमर्थाः सन्तो ग्राम्यवासकृतमात्मदोषं मत्वा पूर्वनि-
वास-समपगत-ग्राम्य-दोषं मत्वा शिव पुण्यमुदारं मेध्यमगम्यमसुकृतिभि-
र्गङ्गाप्रभवममर-गन्धर्व यक्ष-किन्नरानु चरितमनेकरत्ननिचयमचिन्त्या-
द्भुतप्रभावं ब्रह्मर्षि-सिद्ध-चारणानुचरित दिव्य-तीर्थौषधि प्रभवमतिश-
रण्यं हिमवन्तममराधिपाभिगुप्तं जग्मुर्भृग्वङ्गिरोऽत्रि-वशिष्ठ-कश्यपा-
गस्त्य-पुलस्त्य-वामदेवासित-गौतम-प्रभृतयो महर्षयः ॥ ३ ॥
पहिले किसी समय में शालीन ( घर बना कर रहनेवाले ) सुसम्पन्न और
यायावर ( यज्ञशील ) ऋषि नागरिक जनों के आहार के सेवन करने से ऐश्वर्य-
शाली पुरुषों के समान मन्द-क्रियाशील हो गये और प्रायः स्वस्थ न रहने लगे ।
उस समय वसिष्ठ, भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, कश्यप, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव,
असित, गौतम आदि महर्षि तपश्चर्या आदि कर्मों में असमर्थ हो गये। तब उनको
पता चला कि ग्राम्य ( नगर ) निवास के कारण ही यह दोष उत्पन्न हुआ है।
इसलिये वे अपने पुराने स्थान हिमालय में चले गये। यह हिमालय का स्थान
ग्राम्य-सम्बन्धी दोषों से रहित, कल्याणकारी, पवित्र, उदार, पुण्य, पापियों से
अगम्य, गङ्गा का उत्पत्तिस्थान, अमर ( देव ) गन्धव, यक्ष, किन्नर और
चरणों से सेवित, अनेक रत्नों का खज़ाना, अचिन्त्य और आश्चर्यमय प्रभाव
से युक्त, ब्रह्मर्षि, सिद्ध, चारणों की संचार भूमि, दिव्य-तीर्थ और दिव्य औषधियों
का उत्पत्ति स्थान, अतिशरण्य देवराज इन्द्र से सुरक्षित था ॥ ३ ॥
तानिन्र्दः सहस्रदृगम रगुरूवरोऽब्रवीत्—स्वागतं, ब्रह्मविदां ज्ञानत-
पोधनानां ब्रह्मर्षीणामस्ति मनोग्लानिरप्रभावत्व वैस्वर्यं वैवर्ण्यं च ग्राम्य-
वासकृतमसुखमसुखानुबन्धं च। ग्राम्यो हि वासो मूलमशस्तानाम् ।
तत्कृतः पुण्यकृद्भिरनुग्रहः प्रजानां स्वशरीरमरक्षिभिः । कालश्चायमायु-
र्वेदोपदेशस्य । ब्रह्मर्षीणामात्मनः प्रजानां चानुग्रहार्थमायुर्वेदमश्विनौ
मह्यं प्रायच्छतां, प्रजापतिरश्विभ्यां च, प्रजापतये ब्रह्मा, प्रजानामल्प-