सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८१

अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८१
न्यग्रोधशुङ्गानां खडास्तथा कोविदारपुष्पाणाम् ।
दध्नः सरेण सिद्धान्द्याद्रक्ते प्रवृत्तेऽति ॥ २०४ ॥
(५५) रक्त के अतिस्राव होने पर—गम्भारी, आवला और कर्बुदार
(कचनार का भेद) इनके फलो से गृञ्जनक (प्याज़), सिम्बल, दूधी तथा
चागेरी (चोपतिया), बरगद के कोमल पत्ता से, कोविदार (कचनार) के
फूलो से सिद्ध किये पदाथो (पेया आदि) को दही की मलाई के साथ देना
चाहिये ॥ २०३-२०४ ॥
सिद्धं पलाण्डुशाकं तक्रेणोपोदिकां सबदराम्लाम् ।
रुधिरस्रुतौ प्रदद्यान्मसूरयूषं च तक्राम्लम् ॥ २०५ ॥
(५६) तीनयोग—(१) प्याज के शाक को बेर से खट्टा करके तक्र के
साथ, (२) उपोदिका (पोई या लुणी शाक) के शाक को बेर से खट्टा करके
तक्र के साथ, (३) मसूर की दाल को तक्र से खट्टा करके रक्त स्राव मे देना
चाहिये । ये तीन योग है ॥ २०५ ॥
पयसा शृतेन यूषैर्मसूरमुद्गाढकीमकुष्ठानाम् ।
भोजनमद्यादम्लैः शालिश्यामाककोद्रवजम् ॥२०६॥
(५७) शालि धान्य, श्यामाक (सावक), कोद्रव (कोदों) धान्यों को दूध
मे सिद्ध करके मसूर, मूग, अरहर या मोठ इनको अनार, आवला, बेर आदि
द्वारा खट्टे बनाये यूषो के साथ खाना चाहिये ॥ २०६ ॥
शशहरिणलावमासैः कपिञ्जलैणेयैः सुसिद्धैश्च ।
भोजनमद्यादम्लैर्मधुरैरुपत्समरिचैर्वा ॥ २०७ ॥
(५८) अथवा शशक, हरिण, बटेर, कपिञ्जल, एण (हरिण का भेद)
इनके मास-रसो को सिद्ध करके अनार के रस से थोडा खट्टा मधुर करके थोड़ा
सा काली मरिच का चूर्ण मिला कर खाना चाहिये ॥ २०७ ॥
दक्षशिखिनित्तिररसैर्द्विककुल्लोपाकजैश्च मधुराम्लैः ।
अद्याद्रसैरतिवहेष्वर्शःस्वनिलोल्वणशरीरः ॥ २०८ ॥
(५६) दक्ष (कुक्कुट), शिखि (मोर), तीतर, द्विककुद (ऊट) और
लोपाक (शृगाल का भेद) इनके मास-रसो को मीठा खट्टा (अनार रस या
बेर द्वारा) बना कर वात-प्रधान रक्तार्शो मे खाना चाहिये ॥ २०८ ॥
रसखड्यूषयवागूसंयोगतः १ केवलोऽथवा जयति ।
रक्तमतिवर्तमानं वातं च पलाण्डुरुपयुक्तः ॥ २०६॥
१ 'संयुक्त' इति वा पाठ ।

५८२ चरकसंहिता [ अ० १४
(६०) पलाण्डु (प्याज) अकेला स्वतन्त्र रूपमे अथवा मास-रस खड, यूष वा
यवागू के साथ लेने से अति रक्तस्राव और वायु का शमन करता है ॥२०६॥
छागान्तराधितरुणं सरुधिरमुपसाधितं बहुपलाण्डु ।
व्यत्यासान्मधुराम्ल विट्शोणितसङ्क्षये देयम् ॥२१०॥
(६१) जवान बकरी के शरीर का मध्य भाग ( यकृत् भाग और फेफड़े )
रक्त सहित लेकर प्याज के साथ सिद्ध करना चाहिये । मल और रक्त का क्षय
होने पर क्रमशः मधुर तथा अम्ल रूप मे प्रयोग करना चाहिये । प्रथम मधुर
देना चाहिये, पीछे अम्ल और फिर मधुर फिर अम्ल इस प्रकार से देना चाहिये २१०
नवनीततिलाभ्यासात्केसरनवनीतशर्कराभ्यासात् ।
दधिसरमथिताभ्यासादर्शारस्यपयान्ति रक्तानि ॥२११॥
(६२) रक्तजन्य अर्शों के लिये तीन योग—( १ ) मक्खन और तिल का
चूर्ण नित्य प्रति खाना चाहिये । ( २ ) नागकेशर, मक्खन और मिश्री नित्य
खानी चाहिये । ( ३ ) दही की मलाई का मथ कर प्रतिदिन खाने से रक्तजन्य
अर्श शान्त होते है ॥ २११ ॥
नवनीतघृतं छागं मांसं सषष्टिकः शालिः ।
तरुणश्च सुरामण्डस्तरुणी च सुरा निहन्त्यस्रम् ॥२१२॥
( ६३ ) नवनीत (ताजा मक्खन ), घी ( बकरी का ), बकरी का मास,
साठी चावल, तरुण सुरामण्ड ओर तरुणसुरा ( जो पुरातन न हो ) ये रक्तस्राव
को नष्ट करते है ॥ २१२ ॥
प्रायेण वातबहुलान्यर्शांसि भवन्त्यतिस्रुते रक्ते ।
दुष्टेऽपि कफपित्ते तस्मादनिलोऽधिको ज्ञेयः॥२१३॥
कफ, पित्त, दूषित होने पर भी रक्त का अधिक स्राव होने से प्राय. अर्श
में वायु की प्रबलता हो जाती है, इसलिये वायु को मुख्य समझना चाहिये २१३
दृष्ट्वा तु रक्तपित्त प्रबल कफवातलिङ्गमल्पं च ।
शीताः क्रियाः प्रयोज्या यथेरिता वक्ष्यते चान्या ॥२१४॥
मधुकं सपञ्चवल्कं बदरीत्वगुदुम्बर धवपटोलम् ।
परिषेचने विदध्याद् वृषककुभमयवासनिम्बांश्च ॥२१५॥
यदि रक्त, पित्त प्रबल हों, वायु और कफ के लक्षण मन्द हो तो पूर्वकथित
तथा अन्य आगे कहे जाने वाली शीतल क्रियाये बरतनी चाहिये ।
( ६४ ) मुलहठी, पचवल्कल ( बरगद, गूलर, पीपल, पारस पीपल, जामुन
इनकी छाल ), बेर की छाल, गूलर, धव ( धवा ), पटोल, वासा, ककुभ

अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८३
( अर्जुन ), यवास ( जवासा ) और नीम की छाल इनका क्वाथ करके परि-
षेचन करना चाहिये ॥ २१४-२१५ ॥
रक्तेऽतिवर्तमाने दाहे क्लेदेऽवगाहयेच्चापि ।
मधुकमृणालपद्मकचन्दनकुशकाशनिःक्वाथे ॥ २१६ ॥
इक्षुरसमधुकवेतसनिर्यूहे शीतले पयसि वा तम् ।
अवगाहयेत्प्रदिग्धं पूर्वं शिशिरेण तैलेन ॥ २१७॥
( ६५ ) रोगी को जलन हो, रक्त का अतिस्राव होता हो, आर्द्रता हो तो
मुलहठी, मृणाल ( कमलनाल ), पद्माख, चन्दन, कुश और काश इनके क्वाथ
मे रोगी को अवगाहन कराना चाहिये । अथवा शरीर पर चन्दनादि शीतल
द्रव्यो से साधित शीतल तैल लगवा कर रोगी को शीतल दूध मे या जल मे
अथवा गन्ने का रस, मुलहठी और अम्लवेतस इनके शीतल क्वाथ में अवगाहन
देना चाहिये ॥ २१६-२१७ ॥
दत्त्वा घृत सशर्करमुपस्थदेशे त्रिके च गुददेशे ।
शिशिरजलस्पर्शसुखा धारा प्रस्तम्भनी योज्या ॥ २१८ ॥
( ६६ ) उपस्थ प्रदेश ( शिश्न भाग पेड़ू से सम्पूर्ण निचला प्रदेश ), गुदा
ओर त्रिक ( कूल्हा ) प्रदेश पर शर्करा मिश्रित घृत मिलाकर लेप करना चाहिये ।
फिर इन स्थानों पर ठण्डे जल की धारा जो सहन हो सके बल से गिरानी
चाहिये । इस प्रकार करने से रक्तस्राव रुक जाता है। जल-धारा बहुत तीव्र
नही गिरानी चाहिये ॥ २१८ ॥
कदलीदलरभिनवः पुष्करपत्रैश्च शीतजलसिक्तैः ।
प्रच्छादनं मुहुर्मुहुरिष्टं पद्मोत्पलदलैश्च ॥ २१६ ॥
( ६७ ) केले के नये कोमल पत्ता या कमल के पत्तों को शीतल जल से
गीला करके अथवा पद्म और उत्पल के पत्तो से उपस्थ प्रदेश, गुदा और त्रिक-
भाग पर बार बार रखना चाहिये । पुनः गरम होने पर उनका हटा कर फिर
नये पत्ते रखने चाहिये ॥ २१६ ॥
दूर्वाघृत प्रदेहः शतधौतसहस्रधोतमपि सर्पिः ।
व्यजनपवनश्च शीतो रक्तस्राव जयत्याशु ॥ २२० ॥
( ६८ ) दूर्वा के घृत का लेप, शतधौत या सहस्रधौत घृत का लेप
अर्श मे करना चाहिये । इस प्रकार से पंखे की शीतल वायु रक्तस्राव को
शान्त करती है ॥ २२० ॥
समङ्गामधुकाभ्यां तिलमधुकाभ्यां रसाञ्जनघृताभ्याम् ।
सर्जरसघृताभ्यां वा निम्बघृताभ्यां मधुघृताभ्यां च ॥२२१॥

५८४ चरकसंहिता [ अ० १४

दार्वीत्वक्सर्पिर्भ्यां सचन्दनाभ्याम्थोत्पलघृताभ्याम् ।
दाहे क्लेदे च गुदभ्रंशे गुदजाः प्रतिसारणीयाः स्युः ॥२२२॥
( ६६ ) अर्श के मस्सो पर प्रतिसारण करने के लिये नौ योग—(१) लाज-
वन्ती और मुलहठी का चूर्ण, ( २ ) तिल और मुलहठी का चूर्ण, ( ३ ) रसोत
और घी का लेप, ( ४ ) राल और घी का लेप, ( ५ ) नीम की छाल ओर घी,
( ८ ) चन्दन और घी के साथ, ( ६ ) मल और घी को दाह मे, क्लेद मे,
गुदभ्रंश मे ओर अर्श-रोग मे मस्सो पर प्रतिसारण करना चाहिये ॥२२१-२२२॥
आभिः क्रियाभिरथवा शीताभिर्यस्य तिष्ठति न रक्तम् ।
तं काले स्निग्धोष्णैर्मांसरसैस्तर्पयेन्मतिमान् ॥ २२३ ॥
अवपीडकसर्पिर्भिः कोष्णैर्घृततैलिकैस्तथाऽभ्यङ्गैः ।
क्षीरघृततैलसेकैः कोष्णैः समुपाचरेदाशु ॥ २२४ ॥
( ७० ) उपरोक्त प्रतिसारण से अथवा शीतल क्रियाओं द्वारा भी जिस
रोगी का रक्त बन्द न हो उसके लिये बृंहण-विधि बरतनी चाहिये ।
बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि भोजन काल मे रोगी को स्निग्ध, उष्ण मास-
रसों से तर्पण करे । इसके लिये अवपीड़क-घृत ( भोजन के ऊपर अथवा
अधिक मात्रा में घृतपान ) का प्रयोग करना चाहिये । थोड़े गरम सुहाते हुए
गरम तैल और घृत से मालिश करनी चाहिये । कवोष्ण दूध या घी अथवा
तैल से सेक करना चाहिये ॥ २२३-२२४ ॥
कोष्णेन वातप्रबले घृतमण्डेनानुवासयेच्छीघ्रम् ।
पिच्छाबस्तिं दद्याद् बस्ति काले तस्याथवा सिद्धम् ॥ २२५ ॥
( ७१ ) वायु की प्रधानता होने पर कवोष्ण घृत-मण्ड से अनुवासन-बस्ति
देनी चाहिये । अथवा रोगी को समय २ पर सिद्ध पिच्छा की बस्तिया
देनी चाहिये ॥ २२५ ॥
यवासकुशकाशानां मूलं पुष्पं च शाल्मलम् ।
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थशुङ्गांश्च द्विपलोन्मिताः ॥ २२६ ॥
त्रिप्रस्थं सलिलस्यैतत्क्षीरप्रस्थं च साधयेत् ।
क्षीरशेषं कषायं च पूतं कल्कैर्विमिश्रयेत् ॥ २२७ ॥
कल्काः शाल्मलिर्नियाससमङ्गाचन्दनोत्पलम् ।
वत्सकस्य च बीजानि प्रियङ्गु पद्मकेशरम् ॥ २२८ ॥
पिच्छाबस्तिरयं सिद्धः सघृतक्षौद्रशर्करः ।
प्रवाहिकागुदभ्रंशरक्तस्रावज्वरापहः ॥ २२६ ॥
इति पिच्छाबस्तिः ।