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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६६

अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६६
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रस को तथा दक्ष ( कुक्कुट ) और वर्त्तको ( बतख ) के मासरस को घी से
सस्कृत करके बेर, आवले आदि फलों से खट्टा बना कर देना चाहिये ॥१२२॥
त्रिवृद्दन्तीपलाशानां चाङ्गेर्याश्चित्रकस्य च ।
सुभृष्टं यमके दद्याच्छाकं दधिसमन्वितम् ॥ १२३ ॥
उपोदिकां तण्डुलीय वीरा वास्तुकपल्लवाम् ।
सुवर्चलां सलोणीकां यवशाकमवल्गुजम् ॥ १२४ ॥
काकमाचीं रुहापत्र महापत्रो तथाऽम्लिकाम् ।
जीवन्तींशटिशाक च शाकं गृञ्जनकस्य च ॥ १२५ ॥
दधिदाडिमसिद्धानि यमके भर्जितानि च ।
धान्यनागरयुक्तानि शाकान्येतानि दापयेत् ॥ १२६ ॥
( २६ ) शाक—निशोथ, दन्ती, पलाश, चागेरी, चीता इनके शाको को
घी और तैल मे भून कर दधि के साथ मिला कर देना चाहिये । इसी प्रकार
से उपोदिका ( चौलाई ), तण्डुलीय, वीरा ( पृश्निपर्णी ), बथुआ, सुवर्चला
( हुलहुल ), लोणि, यवशाक, अवल्गुजा ( बावची ), काकमाची ( मकोय ),
रूहापत्र, महापत्री ( जामुन ), अम्लिका, जीवन्ती, कचूर का शाक, गृञ्जनक
( शलजम ) का शाक इनको घी और तैल यमक मे भूनकर दही तथा अनार
के रस से खट्टा करके धनिया और सोठ मिलाकर देना चाहिये ॥ १२३-१२६ ॥
गोधाश्वावित्सलोपाकमार्जारोष्ट्रगवामपि ।
कूर्मशल्लकयोश्चैव साधयेच्छाकवद्रसान् ॥ १२७ ॥
( ३० ) गोह, लोपक ( शृगाल भेद ), बिल्ली, श्वावित् , ऊट, गाय,
कछुआ और शल्लकी इनके मास-रसों को भी शाक की भाति दही और अनार
रस में सिद्ध करके घी और तैल मे भून कर धनिया और सोठ मिला कर
देना चाहिये ॥ १२७ ॥
रक्तशाल्योदनं दद्याद्रसैस्तैर्वातशान्तये ।
( ३१ ) यदि रोगी मे वायु की प्रधानता है, रोगी रूक्ष हो, अग्नि मन्द हो
तो वायु की शान्ति के लिये मासरसो के साथ लाल चावल देने चाहिये ।
ज्ञात्वा वातोल्बणं रूक्षं मन्दाग्नि गुदजातुरम् ॥ १२८ ॥
मदिरां शार्करं जातं शीधुं तक्रं तुषोदकम् ।
अरिष्टं दधिमण्डं वा शृतं वा शिशिरं जलम् ॥ १२६ ॥
कण्टकार्या शृतं वाऽपि शृतं नागरधान्यकैः ।
अनुपानं भिषग्दद्याद्वातवर्चोऽनुलोमनम् ॥ १३० ॥

५७० चरकसंहिता [ अ० १४
(३२) वैद्य को चाहिये कि वायु और मल का अनुलोमन करने के लिये
शर्करा से उत्पन्न मदिरा, मीधु, तक्र, तुषोदक, अरष्टि, दधि मस्तु, पका कर
ठण्डा किया जल, कण्टकारी (छोटी कटेरी) का पका कषाय, सोंठ और धनिया
का पका कषाय अनुपान रूप मे देवे ॥ १२८-१३० ॥
उदावर्तपरीता ये ये चात्यर्थं विरूक्षिताः ।
विलोमवाताः शूलार्तास्तेष्विष्टमनुवासनम् ॥ १३१ ॥
(३३) जो अर्श रोगी उदावर्त्त रोग से पीड़ित हो, जो अत्यन्त रूक्ष हो,
जिनका वायु विलोम हो, शूल से पीड़ित हो उन रोगियों को अनुवासन
देना चाहिये ॥ १३१ ॥
पिप्पली मदनं बिल्वं शताह्वा मधुकं वचाम् ।
कुष्ठं शटी पुष्कराख्यं चित्रकं देवदारु च ॥ १३२ ॥
पिष्ट्वा तैल विपक्तव्य पयसा द्विगुणेन च ।
अर्शसा मूढवाताना तच्छ्रेष्ठमनुवासनम् ॥ १३३ ॥
गुदनिःसरणं शूलं मूत्रकृच्छ्रं प्रवाहिकाम् ।
कट्यूरुपृष्ठदौर्बल्यमानाहं वंक्षणाश्रयम् ॥ १३४ ॥
पिच्छास्राव गुदे शोफ वातवर्चोविनिग्रहम् ।
उत्थान बहुशो यच्च जयेत्तच्चानुवासनात् ॥ १३५ ॥
अनुवासन द्रव्य—पिप्पली, मैनफल, बेलगिरी, सौंफ, मुलहठी, वच, कूठ,
कचूर, पोहकर मूल, चित्रक, देवदारु प्रत्येक समान भाग लेकर कल्क रूप मे
पीस लेना चाहिये । यह कल्क २० तोला, दूध २ सेर, तैल १ सेर लेकर तैल
सिद्ध करना चाहिये । यह तैल मूढ-वात (जिनमे वायु न ऊपर जाये न नीचे
जाती हो) रोगिया के लिये उत्तम अनुवासन है। गुदा का बाहर निकलना,
शूल, मूत्रकृच्छ्र, प्रवाहिका, कटि, पीठ, जाघो की निर्बलता, काखो का फूलना,
पिच्छा स्राव, गुदा की सूजन, वायु और मल का अवरोध, बार-बार थोड़ा-
थोड़ा मल आता हो तो वह भी इससे शान्त होता है ॥ १३२-१३५ ॥
आनुवासनिकैः पिष्टैः सुखोष्णैः स्नेहसंयुतैः ।
दर्व्या तैरौषधैर्देह्याः स्तब्धाः शूना गुदेरुहाः१ ॥ १३६ ॥
दिग्धास्तैः प्रस्रवन्त्याशु श्लेष्मपिच्छां सशोणिताम्२ ।
कण्डूः स्तम्भः सरुक् शोफः स्रुतानां विनिवर्तते ॥ १३७ ॥
१. 'दार्वन्तै स्तब्धशूलानि गुदजानि प्रलेपयेत्' इति च ।
२ श्लेष्मपिच्छासशोणिताः इति च पाठः ।