चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३६५
अ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३६५
प्रयोगात्पित्तगुल्मघ्नं सर्वपित्तविकारनुत् ।
इति द्राक्षाद्यं घृतम् ।
(४) द्राक्षाद्यघृत—मुनक्का, महुवा, पिण्डखर्जूर, विदारीकन्द, शतावरी,
फालसा, त्रिफला, इनको एक-एक पल लेकर २ आढक जल मे क्वाथ करे ।
(२ प्रस्थ) रहने पर छान ले । इसमे आवले का रस दो प्रस्थ, ईख का रस
२ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, ओर घी २ प्रस्थ मिलावे । कल्कार्थ हरड़ ८ पल ले ।
इनके द्वारा घृत पकावे । शीतल होने पर इसमे चतुर्थांश शर्करा और मधु
(मिलित) मिलाकर प्रयोग करे । यह पित्त गुल्म ओर पैत्तिक रोगो को नष्ट
करता है १ ॥ १२३-१२५- ॥
वृषं समूलमापोथ्य पचेदष्टगुणे जले ॥ १२६ ॥
शेषेऽष्टभागे तस्यैव पुष्पकल्कं प्रदापयेत् ।
तेन सिद्धं घृतं शीतं सक्षौद्रं पित्तगुल्मनुत् ॥ १२७ ॥
रक्तपित्तज्वरश्वासकासहृद्रोगनाशनम् ।
इति वासाघृतम् ।
(५) वासाघृत—जड समेत वासा (अडूसा) को लेकर इसको कुचल
कर आठ गुणे पानी म क्वाथ करे । जब अष्टमाश रह जाये तब छान कर वासा
के फूलो का कल्क मिला कर घी सिद्ध करे । घी के ठण्डा होने पर मधु मिलावे
यह घृ पित्त-गुल्म, रक्त पित्त, ज्वर, श्वास, कास और हृदय-रोग का नष्ट
करता है। [यह वासा-घृत रक्तपित्त के वासा-घृत से पृथक् है। इसलिये
उसे चतुर्गुण पानी मे सिद्ध किया है। अष्टागसग्रहकार दोनो का एक ही
माना है ] ॥ १२६-१२७ ॥
द्विपलं त्रायमाणाया जलद्विप्रस्थसाधितम् ॥ १२८ ॥
अष्टभागस्थितं पूतं कोष्ण क्षीरसमं पिबेत् ।
पिबेदुपरि तस्योष्णं क्षीरमेव यथाबलम् ॥ १२६ ॥
तेन निर्हृतदोषस्य गुल्मः शाम्यति पैत्तिकः ।
(६) त्रायमाणा का दो पल लेकर ४ प्रस्थ (६४ पल) पानी मे पकावे,
अष्टमाश रहने पर इसको छान कर कोसा होने पर इसमे समान मात्रा दूध को
मिलावे, इसको पीकर ऊपर से शक्ति-अनुसार गरम दूध पीवे । इससे विरेचन
होने पर पैत्तिक गुल्म शान्त हो जाता है ।
[अष्टागसग्रह मे त्रायमाणा से ही दूध को सिद्ध करके प्रयोग करना
लिखा है ] ॥ १२८-१२६- ॥
१. महुवे के स्थान पर मधुक पाठ मे मुलहठी अर्थ होगा ।
३६६ चरकसंहिता [ अ० ५
द्राक्षाभयारस गुल्मे पैत्तिके सगुडं पिवेत् ॥ १३० ॥
लिह्यात्कम्पिल्लकं वाऽपि विरेकार्थं मधुद्रवम् ।
(७) पित्त-गुल्म मे विरेचन के लिये द्राक्षा और हरड के क्वाथ में गुड
मिलाकर अथवा कमीले को मधु मे मिलाकर चाटे ॥ १३० ॥
दाहप्रशमनोऽभ्यङ्गः सर्पिषा पित्तगुल्मिनाम् ॥ १३१ ॥
चन्दनाद्येन तैलेन तैलेन मधुकस्य वा ।
(८) पित्त-गुल्म म अभ्यंग के लिये घी ( शतधौत या सहस्रधौत ),
चन्दनाद्य तैल, या मुल्हठी के क्वाथ ओर कल्क से सिद्ध तैल का उपयोग करे ।
इससे दाह की शान्त होती है ॥ १३१ ॥
ये च पित्तज्वरार्ताना सतिक्ताः क्षीरवस्तयः ॥ १३२ ॥
हितास्ते पित्तगुल्मिभ्यो वक्ष्यन्ते ये च सिद्धिषु ।
पित्त-गुल्म मे बस्तिया—पित्तज्वर के रागियों के लिये तिक्त द्रव्यो से सिद्ध
दूध की जो बस्तिया कही है, ओर जिन बस्तियों को सिद्धि-स्थान मे आगे कहेंगे
उनका पित्त-गुल्म मे प्रयाग करे ॥ १३२ ॥
शालयो जाङ्गल मास गव्याज्ये पयसी घृतम् ॥ १३३ ॥
खर्जूररामलकं द्राक्षा दाडिम सपरूषकम् ।
आहारार्थे प्रयोक्तव्य पानार्थं सलिलं शृतम् ॥ १३४ ॥
बलाविदारिगन्धाद्यैः पित्तगुल्मचिकित्सितम् ।
आहार के लिये शालि वान्य, जागल मास, गाय और बकरी के घी और
दूध, खजूर, आवला, द्राक्षा, अनारदाना, फालसा, इनको भोजन के लिये दे
और पीने के लिये बला और विदारीगन्वादि स्वल्प पञ्चमूल से षडंग
पानीय विधि द्वारा साधित जल पीने के लिये देवे, यह पित्तगुल्म की
चिकित्सा है ॥ १३३-१३४ ॥
आमान्वये पित्तगुल्मे सामे वा कफवातके ॥ १३५ ॥
यवागूभिः खडैर्यूषैः संधुक्ष्योऽग्निर्बिलङ्घिते ।
शमप्रकोपौ दोषाणा सर्वेषामग्निसंश्रितौ ॥ १३६ ॥
तस्मादग्नि सदा रक्षेन्निदानानि च वर्जयेत् ।
पित्तगुल्म मे यदि आम का अनुबन्ध हो, या आमयुक्त कफ अथवा
आमयुक्त वायु का ससर्ग हो तो प्रथम लघन कराके यवागुओ द्वारा और खड
यूषो से अग्नि का प्रदीपन करे । सब दोषो का शमन और प्रकोप अग्नि के ऊपर
ही निर्भर करता है । इसलिये सदा अग्नि की रक्षा करनी चाहिये और निदाना
( कारणों) का परित्याग करना चाहिये ॥ १३५-१३६- ॥