चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १३ ] ३४ चिकित्सितस्थानम् ५२६
अ० १३ ] ३४ चिकित्सितस्थानम् ५२६
और भोजन घट जाये, श्वास रोग, शूल तथा इन्द्रिया निर्बल हो जाये तो असाध्य
समझना चाहिये ऐसे रोगी की चिकित्सा न करे ॥१६-॥
अपां दोषे हरण्यादौ विदध्यादुदकोदरे ॥ ९२ ॥
मूत्रयुक्तानि तीक्ष्णानि विविधक्षारवन्ति च ।
दीपनीयैः कफघ्नैश्च तमाहारैरुपाचरेत् ॥ ९३ ॥
द्रव्येभ्यश्चोदकादिभ्यो नियच्छेदनुपूर्वशः ।
सर्वमेवोदर प्रायो दोषसंघातजं मतम् ॥ ९४ ॥
तस्मात्त्रिदोषशमनी क्रिया स-ेषु कारयेत् ।
( ८ ) उदकोदर की चिकित्सा—उदकोदर मे प्रथम जलीय दोषों को
निकालने क लिये मूत्र और क्षीरयुक्त तीक्ष्ण ओषधिया देनी चाहिये। भोजन मे
अग्नि-दीपक और कफनाशक भाजन देने चाहिये। धीरे-धीरे पानो आदि द्रव
वस्तुओ से रोगी का हटाना चाहिये ।
प्राय सब उदर रोगो मे वातादि तोना दोषो का मिश्रण रहता है। इसलिये
सब उदरो मे तीनों दोषो की सक्षमनो-क्रिया करनी चाहिये ॥६२-६४॥
दोषैः कुक्षौ हि संपूर्गे वह्निर्मन्दत्वमृच्छति ॥ ९५ ॥
तस्माद्भोज्यानि योज्यानि दीपनानि लघूनि च ।
रक्तशालीन्यवान्मुद्गाञ्जाङ्गलांश्च मृगद्विजान् ॥ ९६ ॥
पयोमूत्रासवारिष्टान्मधुशीधूंस्तथा सुराम् ।
यवागूमोदनं वापि यूषैरद्याद्रसैरपि ॥ ९७ ॥
मन्दाम्लस्नेहकटुभिः पञ्च १ मूलोपसाधितैः।
उदर मे दापो के भर जाने से अग्नि मन्द पड़ जाती है। इसलिये दीपनीय
और लघु भोजन रोगी को देने चाहिये। इसके लिये लाल चावल, जौ, मूग,
जागल पशु पक्षियों का मास, दूध, मूत्र, आसव-अरिष्ट, मधु, सीधु (गन्ने के
रस को पका कर बनाया ), सुरा (मद्य ), यवागू, ओदन को अल्प स्नेह तथा
अल्प खटाई वाले, कटु रस तथा पचमूल क्वाथ से साधित मूग आदि के यूष
तथा मास-रस के साथ देना चाहिये ॥६५-६७॥
औदकानूपजं मांसं शाकं पिष्टकृतं तिलान् ॥ ९८ ॥
व्यायामाध्वदिवास्वप्नं यानयानं च वर्जयेत् ।
तथोष्णलवणाम्लानि विदाहीनि गुरूणि च ॥ ९९ ॥
नाद्यादन्नानि जठरी तोयपानं च वर्जयेत् ।
१. 'यच्च' इति च पाठः ।
५३० चरकसंहिता [अ० १३
इसमें अपथ-जलचर तथा जलमय प्रदेश के जन्तुओं का मास, शाक
(पत्ते आदि), पिष्ठी से बने पदार्थ, तिल, व्यायाम, पैदल, यात्रा, दिन मे
सोना, सवारी पर चढ़ कर यात्रा करना इन सब बातों को छोड़ दे। इसी प्रकार
से उदर-रोगी उष्ण, खट्टे, लवणयुक्त, विदाही और भारी पदार्थों का सेवन
तथा पानी का पीना त्याग कर दे ॥६८-६६॥
नातिसान्द्रं मतं पाने स्वादु तक्रमपेलवम् ॥ १०० ॥
त्र्यूषणक्षारलवणैर्युक्तं तु निचयोदरी ।
वातोदरी पिबेत्तक्रं पिप्पलीलवणान्वितम् ॥ १०१ ॥
शर्करामधुकोपेतं स्वादु पित्तोदरी पिबेत् ।
यवानीसैन्धवाजाजीव्योषयुक्तं कफोदरी ॥ १०२ ॥
पिबेन्मधुयुतं तक्रं व्यक्ताम्लं नातिपेलवम् ।
मधुतैलवचाशुण्ठीशताह्वाकुष्ठसैन्धवैः ॥ १०३ ॥
युक्तं प्लीहोदरी जातं सव्योपं तूदकोदरी ।
यवानी हपुषाजाजीसैन्धवैर्ग्रथितोदरी ॥ १०४ ॥
पिबेच्छिद्रोदरी तक्रं पिप्पलीक्षौद्रसंयुतम् ।
उदर रोगी को चाहिये कि पीने के लिये न तो बहुत घना (थोड़ा गाढ़ा),
मधुर, तुरन्त का तैय्यार किया, अपेलव अर्थात् मक्खन निकाला तक्र पीये ।
सन्निपातोदरी-रोगी को चाहिये कि तक्र मे सोठ, मरिच, पिप्पली, क्षार और
नमक मिलाकर पीये । वातोदरी-रोगी तक्र मे पिप्पली और लवण मिलाकर
पीये । पित्तोदरी-रोगी शर्करा और मरिच से युक्त तक्र पीये । कफोदरी-रोगी
यवानी (अजवायन), सैन्धव और जीरा तथा सोठ, मरिच, पिप्पली से युक्त
तक्र पिये । प्लीहोदर रोगी को चाहिये कि मधु युक्त, अम्ल रस बहुत मक्खन
वाला नहीं (साधारण चिकास वाला) तक्र पिये । इस तक्र में मधु, तैल, वच,
सोंठ, सौफ, कूठ, सैन्धा नमक मिलाकर पीये । दकोदर-रोगी सोंठ, मरिच,
पिप्पली से युक्त छाछ पीये । ग्रथितोदर-रोगी यवानी (अजवायन), हऊबेर,
जीरा और नमक से मिश्रित तक्र पिये । छिद्रोदर-रोगी पिप्पली और मधु से
मिश्रित छाछ पीये ॥ १००-१०४ ॥
गौरवारोचकार्तानां समन्दाग्न्यतिसारिणाम् ॥ १०५ ॥
तक्रं वातकफार्तानाममृतत्वाय कल्पते ।
भारीपन तथा अरुचि के साथ जिन लोगों को मन्दाग्नि रहती हो, अतिसार
हो तथा वातजन्य, कफजन्य उदर-रोग मे तक्र अमृत के समान गुणकारी है ॥१०५॥