चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १५ ] ४० चिकित्सितस्थानम् ६२५
अ० १५ ] ४० चिकित्सितस्थानम् ६२५
त्रिदोषे विधिविद्वैद्यः पञ्च कर्माणि कारयेत् ॥ १६५ ॥
घृतक्षारासवारिष्टान्दद्याच्चाग्निविवर्धनान् ।
क्रिया या चानिलादीना निर्दिष्टा ग्रहणी प्रति ॥ १६६ ॥
व्यत्यासात्तां समस्तां च कुर्याद्दोषविशेषवित् ।
( ५० ) त्रिदोषजन्य ग्रहणी-रोग मे वैद्य को चाहिये कि विधिपूर्वक पञ्च
कर्मों को करावे । अग्नि को बढाने वाले क्षार, घृत, आसव, अरिष्ट आदि देने
चाहिये । वात, पित्त, कफजन्य ग्रहणी रोग की जो चिकित्सा पृथक् २ कही है
उन सबको सम्मिलित रूप मे दोषो को समझने वाला वैद्य प्रयोग करे ॥१६५-१६६॥
स्नेहनं स्वेदनं शुद्धिर्लङ्घनं दीपनं च यत् ॥ १६७ ॥
चूर्णानि लवणक्षारमध्वरिष्टसुरासवाः ।
विविधास्तक्रयोगाश्च दीपनानां च सर्पिषाम् ॥ १६८ ॥
ग्रहणीरोगिभिः सेव्याः—
ग्रहणी के रोगिश्रो को चाहिये कि ये स्नेहन, स्वेदन, शुद्धि (वमन विरेचन),
उपवास, अग्निदीपक, चूर्ण, लवण, क्षार, मध्वरिष्ट, सुरा, आसव नाना प्रकार
के तक्र और अग्निवर्धक घृतो का सेवन करे ॥ १६७-१६८ ॥
क्रियां चावस्थिकीं शृणु ।
ष्ठीवनं श्लैष्मिके रूक्षं दीपनं तिक्तसंयुतम् ॥ १६६ ॥
सकूद्रूक्षं सकृत्स्निग्धं कृशे बहुकफे हितम् ।
परीक्ष्याऽऽमं शरीरस्य दीपनं स्नेहसंयुक्तम् ॥ २०० ॥
दीपनं बहुपित्तस्य तिक्तं मधुरसंयुतम् ।
बहुवातस्य तु स्नेह लवणाम्लयुतं हितम् ॥ २०१ ॥
सन्धुक्षति यथा वह्निरेषां विविधदिन्धनैः ।
स्नेहमेव परं विद्याद् दुर्बलानलदीपनम् ॥ २०२ ॥
नालं स्नेहसमिद्धस्य शमायान्नं सुगुर्वपि ।
अवस्था विशेष के अनुसार चिकित्सा विधि को सुनो—
(५१) कफ प्रबलावस्था मे—रूक्ष, दीपक ( अग्निवर्धक ) और तिक्त
वस्तुओं से मिश्रित वमन देना चाहिये । यदि रोगी कृश हो और उसमें कफ
की प्रबलता हो तो कभी रूक्ष और कभी स्निग्ध-क्रिया अदल-बदल के करनी
चाहिये । शरीर मे आमदोष की परीक्षा करके स्नेहयुक्त अग्निदीपक प्रयोग
देने चाहिये । यदि पित्त की प्रबलता हो तो मधुर वस्तुओं से युक्त तिक्त, अग्नि-
दीपक प्रयोग देने चाहिये और यदि वायु प्रबल हो तो लवण और अम्ल से
युक्त स्नेह हितकारी है । इन विधियों से अग्नि अतिशय दीप्त हो जाती है ।
६२६ चरकसंहिता [ अ० १५
निर्बल अग्नि को दीप्त करने के लिये स्नेह ही सबसे उत्तम वस्तु है। स्नेह से
बढे हुए अग्नि को शान्त करने के लिये भारी अन्न भी समर्थ नही होता। स्नेह
से दीप्त अग्नि गुरु अन्न से भी नही बुझता ॥ २००-२०२ ॥
मन्दाग्निरपि पक्वं तु पुरीषं योऽतिसार्यते ॥ २०३ ॥
दीपनीयौषधैर्युक्ता घृतमात्रां पिबेत्तु सः ।
यया समानः पवनः प्रसन्नो मार्गमाश्रितः ॥ २०४ ॥
अग्नेः समीपचारित्वादाशु प्रकुरुते बलम् ।
काठिन्याद्यः पुरीषं तु कृच्छ्रान्मुञ्चति मानवः ॥ २०५ ॥
सघृतं लवणैर्युक्तं नरोऽन्नावग्रहं पिबेत् ।
रौक्ष्यान्मन्दे पिबेत्सर्पिस्तैलं वा दीपनैर्युतम् ॥ २०६ ॥
अतिस्नेहात्तु मन्देऽग्नौ चूर्णारिष्टासवा हिताः ।
(५२) जिस मन्दाग्निवाले पुरुष का मल पक्व होता है, उसको भी
चाहिये कि वह दीपनीय ओषधियों से साधित घृत का पान करे। इस घृतपान
से समानवायु अपने स्वाभाविक मार्ग मे आश्रित होकर जाठराग्नि के समीप
विचरने लगता है, जिससे कि अग्नि को शीघ्र बल मिल जाता है। जो पुरुष
कठिनाई से कठोर मल थोड़ा-थोड़ा करके बाहर करता है, उसको चाहिये कि
भोजन के मध्य मे लवणों से युक्त घृत का पान करे। यदि रूक्षता के कारण अग्नि-
मान्द्य हो तो दीपनीय ओषधियों से युक्त घृत या तैल पीना चाहिये। अतिस्नेह
के कारण अग्निमान्द्य हो तो चूर्ण, अरिष्ट और आसव पीने हितकारी है ॥२०३-२०६॥
भिन्ने गुदोपलेपात्तु मले तैलसुरासवाः ॥ २०७ ॥
उदावर्तात्तु मन्देऽग्नौ निरूहाः स्नेहबस्तयः ।
दोषवृद्ध्या तु मन्देऽग्नौ शुद्धो दोषविधि चरेत् ॥ २०८ ॥
व्याधियुक्तस्य मन्दे तु सर्पिरेवाग्निदीपनम् ।
उपवासाच्च मन्देऽग्नौ यवागूभिः पिबेद् घृतम् ॥ २०९ ॥
अन्नावपीडिते चालं दीपनं बृंहणं च तत् ।
दीर्घकालप्रसङ्गात्तु कामक्षीणकृशान्नरान् ॥ २१० ॥
प्रसहानां रसैः साम्लैर्भोजयेत्पिशिताशिनाम् ।
लघुतीक्ष्णोष्णशोधित्वादीपयन्त्याशु तेऽनलम् ॥ २११ ॥
मांसोपचितमांसत्वात्तथाऽऽशुतरबृंहणाः ।
नाभोजनेन कायाग्निर्दीप्यते नातिभोजनात् ॥ २१२ ॥
(५३) गुदा के भिन्न (अतीसार) होने पर अवलेह, गुड़, तैल, सुरा
और आसव देने चाहियें। उदावर्त्त के कारण अग्नि के मन्द होने पर निरूह