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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० १४ ] ३७ चिकित्सितस्थानम् ५७७

अ० १४ ] ३७ चिकित्सितस्थानम् ५७७
जैसे—रक्तपित्त, ज्वर, तृष्णा, अग्निमान्द्य, अरोचक, कामला, श्वयथु, गुदा मे
शूल, वक्षण ( कोख ) मे शूल, कण्डू, कोठ, पिडकाये, कुष्ठ, पाण्डुरोग, वायु,
मूत्र, मल की विबन्धता, शिरोवेदना, स्तिमितता, शरीर मे भारीपन, अन्य रक्त-
जन्य रोगो को उत्पन्न कर देता है । इसलिये दूषित रक्त के निकल जाने पर ही
रक्त का रोकना हितकारी है । प्रारम्भ मे नही रोकना चाहिये ॥ १७८-१८१ ॥
हेतुलक्षणकालज्ञो बलशोणितवर्णवित् ।
कालं तावदुपेक्षेत यावन्नात्ययमाप्नुयात् ॥ १८२ ॥
हेतु, लक्षण और काल को समझने वाले तथा बल और शुद्ध एव अशुद्ध
रक्त के वर्ण की पहिचान करने वाले वैद्य को चाहिये कि रक्तस्राव की उपेक्षा
उस समय तक करता रहे जब तक कि भयानक रूप धारण न करले, अथवा
काई घातक रूप पैदा न करे १ ॥ १८२ ॥
अग्निसन्दीपनार्थं च रक्तसङ्ग्रहणाय च ।
दोषाणा पाचनार्थं च परं तिक्तेरुपाचरेत् ॥ १८३ ॥
( ४२ ) अग्नि को बढ़ाने के लिये और रक्त को रोकने के लिये तथा दोषा
के पाचन के लिये तिक्त क्वाथों से या तिक्त घृतो से चिकित्सा करना श्रेष्ठ है॥१८३॥
यत्तु प्रक्षीणदोषस्य रक्त वातोल्बणस्य च ।
वर्तते स्नेहसाध्य तत्पानाभ्यङ्गातुवासनैः ॥ १८४ ॥
यत्तु पित्तोल्बण रक्तं घर्मकाले प्रवर्त्तते ।
स्तम्भनीय तदेकान्तान्न चेद्वातकफानुगम् ॥ १८५ ॥
जिस व्यक्ति के दोष क्षीण हो गये हो और रक्त मे वायु की प्रधानता हो,
उसके लिये पान, अभ्यग और अनुवासन मे स्नेह क्रिया का उपयोग करना
चाहिये । वह रोगी स्नेहसाध्य है और जिस रक्त मे पित्त की प्रधानता हो तथा
ग्रीष्म काल मे रक्त स्रवित होता है, उसके लिये स्तम्भन-चिकित्सा करनी चाहिये,
इस रक्त का रोकना ही उत्तम है । परन्तु स्तम्भन क्रिया मे यह देख लेना
चाहिये कि इस रक्त मे वायु और कफ का ससर्ग न हो । यदि कफ का अनुबल
हो तो उपेक्षा अथवा लघन करना चाहिये ॥१८४-१८५॥
कुटजत्वङ्निर्यूहः सनागरः स्निग्धरक्तसंग्रहणः ।
त्वग्दाडिमस्य तद्वत्सनागरश्चन्दनरसश्च ॥ १८६ ॥
१ शुद्ध रक्त की परीक्षा—तपनेन्द्रगोपप्रतिम पद्माक्तकसन्निभम् ।
गुञ्जाफलसवर्णं च विशुद्धं विद्धि शोणितम् ॥च०सू०२४॥
अशुद्ध रक्त के लिये देखिये चरक०सूत्रस्थान अ०२४और सुश्रुतसूत्रस्थान अ०१२॥

५७८ चरकसंहिता [ अ० १४
( ४३ ) कूड़े की छाल के क्वाथ के साथ थोडा सा सोठ चूर्ण मिला कर
लेने से स्निग्ध रक्त (कफ मिश्रित रक्त का) अवरोध होता है । इसी प्रकार
से अनार की छाल और चन्दन के क्वाथ को सोंठ के चूर्ण के साथ देने से
स्निग्ध रक्त का अवरोध होता है ॥ १८६ ॥
चन्दनकिराततिक्तकधन्वयवासाः सनागराः कथिताः ।
रक्तार्शासां प्रशमना दार्बीत्वगुशीरनिम्बाश्च ॥ १८७ ॥
(४४) चन्दन, चिरायता, धमासा, बासा और सोंठ, दारुहल्दी की छाल,
खस तथा नीम की छाल इनका क्वाथ रक्तजन्य अर्श मे शान्ति करता है ।
दारुहल्दी की छाल, खस और नीम की छाल इनको पृथक् भी प्रयोग करने से
रक्त रुकता है ॥ १८७ ॥
सातिविषा कुटजत्वक् फलं च सरसाञ्जनं मधुयुतानि ।
रक्तापहानि दद्यात्पिपासवे तण्डुलजलेन ॥ १८८ ॥
(४५) अतीस, कूड़े की छाल, इन्द्रजौ, रसौत इनके चूर्ण को मधु मे
मिला कर प्यास लगने पर तण्डुलोदक के साथ देना चाहिये । यह योग
रक्तनाशक है ॥ १८८ ॥
कुटजत्वचो विपाच्यं पलशतमाद्रं महेन्द्रसलिलेन १ ।
यावत्स्याद् गतरसं तद्द्रव्यं पूतो रसस्ततो ग्राह्यः ॥ १८९ ॥
मोचरसः समङ्गा फलिनी च पलांशिकै २ स्त्रिभिस्तैश्च ।
वत्सकबीजं तुल्यं चूर्णीकृतमत्र प्रदातव्यम् ॥ १९० ॥
पूतोत्कथितः सान्द्रः स रसोऽदार्वाप्रलेपनो ग्राह्यः ।
मात्राकालोपहिता रसक्रियैषा जयत्यसृक्स्रावम् ३ ॥ १९१ ॥
छागलिपयसा युक्ता ४ पेया मण्डेन वा यथाग्निबलम् ।
जीर्णौषधश्च शालीन् पयसा छागेन भुञ्जीत ॥ १९२ ॥
रक्तार्शांस्यतिसारं रक्तं सासृग्रुजो निहन्त्याशु ।
बलवच्च रक्तपित्तं रसक्रियैषा जयत्युभयभागम् ॥ १९३ ॥
इति कुटजादिरसक्रिया ।
(४६) कुटजादि-रस-क्रिया—कूडे की गीली छाल १०० पल लेकर बरसात
का पानी एक द्रोण लेकर इसमे क्वाथ करना चाहिये । जब सब रस निकल जाये
और अष्टमाश रह जाये तब छान लेना चाहिये । इसमें मोचरस (सीम्बल का
१ 'तु मेघसलिलेन' इति, २ 'समांशिकै' इति,
३ 'जयति रक्तम्' इति, ४ 'पीता' इति च पाठान्तराणि ।

अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७६
गोंद ), समंगा ( मजीठ या लाजवन्ती ) और फलिनी ( प्रियंगु ) प्रत्येक द्रव्य
समान भाग ( १, १ पल ) और तीनो के बराबर इन्द्रजौ का चूर्ण ( ३ पल )
इस क्वाथ मे मिलाना चाहिये । इसको अग्नि पर गरम करना चाहिये । जिस
समय पकते-पकते यह अवलेह के समान हो जाये तथा कड़छी के साथ उठने
लगे तो इसको उतार लेना चाहिये । इसमे से अग्नि बल के अनुसार रस-क्रिया
की मात्रा खानी चाहिये । यह अवलेह रक्त को शान्त करता है ।
औषध के जीर्ण होने पर पेया को बकरी के दूध के साथ अथवा मण्ड के
साथ पीना चाहिये । अथवा बकरी के दूध के साथ चावलो को खाना चाहिये ।
यह रस-क्रिया, रक्तजन्य अर्शोग को, रक्तातिसार को, रक्त सहित वेदना को
( रक्त-स्राव से उत्पन्न रोगो को ) बलवान् रक्तपित्त को चाहे वह किसी भी
मार्ग से प्रवृत्त होता है, सब को शान्त करता है । ऊर्ध्वग रक्तपित्त साध्य है,
अधोगामी याप्य है ॥ १८६-१६३ ॥
नीलोत्पलं समङ्गा मोचरसश्चन्दनं तिला लोध्रम् ।
पीत्वा छागलिपयसा भोज्यं पयसैव शाल्यन्नम् ॥ १६४ ॥
( ४७ ) नीला कमल, समगा ( लाजवन्ती ), मोचरस (सीम्बल की गोद),
तिल, पठानी लोध इनको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इसको
( ६ माशे लेकर ) बकरी के दूध के साथ पीना चाहिये । जीर्ण होने पर बकरी
के दूध के साथ चावल ( हेमन्त ऋतु मे पके ) खाने चाहिये ॥ १६४ ॥
छागलिपयः प्रयुक्तं निहन्ति रक्तं सवास्तुकंरसं च ।
धन्वविहङ्गमृगाणां रसो निरम्लः कदम्लो वा ॥ १६५ ॥
( ४८ ) बथुए के रस मे बकरी का दूध मिलाकर पीने से रक्तस्राव रुकता
है । इसी प्रकार जागल पशु-पक्षियो के मास-रस को अनार के रस
आदि से थोड़ा खट्टा बना कर अथवा बिना खट्टा किये पीने से रक्त-स्राव
रुकता ॥ १६५ ॥
पाठा वत्सकबीजं रसाञ्जनं नागरं यवान्यश्च ।
बिल्वमिति चार्शसैश्र्चूर्णितानि पेयानि सशूलेषु ॥ १६६ ॥
( ४६ ) पाठा, इन्द्रजौ, रसौत, सोंठ, अजवायन और बेलगिरी इनको
परस्पर समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को ( ६ माशा
मात्रा में ) पानी के साथ पीने से शूलयुक्त अर्श-रोग शान्त होते हैं ॥ १६६ ॥
दार्वी किरातातिक्तं मुस्तं दुःस्पर्शकश्च रुधिरघ्नम् ।
रक्तेऽतिवर्तमाने शूले च घृतं विधातव्यम् ॥ १६७ ॥

५८० चरकसंहिता [ अ० १४
(५०) दारूहल्दी, चिरायता, नागरमोथा और कौंच इनका चूर्ण या क्वाथ
रक्तनाशक है । परन्तु यदि रक्त बहुत होता हो और शूल हो तो इनके क्वाथ में
इन्हीं के कल्क से घृत सिद्ध करके प्रयोग करना चाहिये ॥ १६७ ॥
कुटजफलवल्ककेशरनीलोत्पललोध्रधातकीकल्कैः ।
सिद्धं घृतं विधेयं शूले रक्तार्शसां भिषजा ॥ १६८ ॥
(५१) वैद्य को चाहिये कि रक्तार्श में यदि शूल भी हो तो कुड़े की छाल
और इन्द्रजो, नागकेशर, नीला कमल, पठानी लोध, धाय के फूल इनका कल्क
मिलित १ पाव, पानी ४ सेर और घृत १ सेर लेकर घृत सिद्ध करना चाहिये ।
यह घृत रक्तार्श में उत्तम है ॥ १६८ ॥
सर्पिः सदाडिमरसं सयावशूकं जयत्याशु ।
रक्तं सशूलमथवा निदिग्धिकादुग्धिकासिद्धम् ॥ १६६ ॥
(५२) अनार के रस में और यावशूक (जवासे) के रस में घी सिद्ध
करके लेने से अथवा छोटी कटेरी और दधि के रस में सिद्ध किया घृत शूलयुक्त
रक्त-स्राव को शान्त करता है ॥ १६६ ॥
लाजापेया पीता चुक्रिका केशरोत्पलैः सिद्धा ।
हन्त्याश्वस्रक्स्रावं तथा बलापृश्निपर्णीभ्याम् ॥ २०० ॥
(५३) चुक्रिका (चांगेरी), केशर (नागकेशर) और कमलगट्टे से
सिद्ध की हुई लाजा से बनी पेया पीने से रक्तस्राव रुकता है । अथवा बला
और पृश्निपर्णी द्वारा लाजा से बनी पेया को सिद्ध करके पीना चाहिये ॥ २०० ॥
ह्रीबेरबिल्वनागरनिर्यूहे साधिता सनवनीताम् ।
वृक्षाम्लदाडिमाम्लामम्लीकाम्ला सकोलाम्लाम् ॥ २०१ ॥
गृञ्जनकसुरासिद्धां भृष्टा यमकेन वा पिबेत्पेयाम् ।
रक्तातिसारशूलप्रवाहिकाशोथनिग्रहणीम् ॥ २०२ ॥
(५४) ह्रीवेर (नेत्रबाला), बेलगिरी, सोंठ इनके क्वाथ में पेया को
सिद्ध करे । इस पेया को वृक्षाम्ल (समगदाना), अनारदाना, इमली, खट्टे
बेर इनसे खट्टा बना कर मक्खन मिला कर पीना चाहिये । अथवा गृञ्जनक
(शलजम या प्याज) के रस में सिद्ध पेया को घी और तैल यमक में भून कर
पीना चाहिये। ये पेया रक्तातिसार, शूल, प्रवाहिका और शोथ को हटाती है ॥२०२॥
काश्मर्यामलकानां सकर्बुदारफलाम्लानाम् ।
गृञ्जनकशाल्मलीनां क्षीरिण्याश्चुक्रिकायाश्च ॥ २०३ ॥