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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 616 में से

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पृष्ठ 384

अ० ५ ] २४ चिकित्सितस्थानम् ३६६

सर्पिरैरण्डजं तैल क्षीरं चैकत्र साधयेत् ॥ १५०॥
स सिद्धो मिश्रकस्नेहः सक्षौद्रः कफगुल्मनुत् ।
कफवातविबन्धेषु कुष्ठप्लीहोदरेषु च ॥ १५१ ॥
प्रयोज्यो मिश्रकः स्नेहो योनिशूलेषु चाधिकम् ।
इति मिश्रकः स्नेहः ।
( ६ ) मिश्रक स्नेह—निशोथ, त्रिफला, दन्तीमूल दशमूल प्रत्येक वस्तु
एक-एक पल, इनको चार गुणे जल ( ६० पल ) मे पका कर चतुर्थांश
( १५ पल ) शेष रखे । इसमे क्वाथ के समान ( १५ पल ) प्रत्येक घी, ऐरण्ड
तैल, दूध मिलाकर सिद्ध करना चाहिये । इस स्नेह को मधु के साथ मिलाकर
प्रयोग करे । कफ-गुल्म, कफ-वातजन्य विबन्ध, कुष्ठरोग, प्लीहारोग,
उदररोग और योनिरोगो मे विशेष रूप से इसका प्रयोग करे । [ श्री चक्रपाणि
दूध को क्वाथ के समान लेने को कहते है, तथा घी ओर एरण्ड तैल को इस
मिलित द्रवाश से चतुर्थांश लेने का आदेश करते है। अष्टाङ्ग-सग्रह मे
क्वाथ के लिये सोलह गुणा जल लेकर सोलहवा भाग शेष रखने का
वचन है । ] ॥१४६-१५१॥
यदुक्तं वातगुल्मघ्नं स्रंसनं नीलिनीघृतम् ॥ १५२ ॥
द्विगुण तद्विरेकार्थं प्रयोज्य कफगुल्मिनाम् ।
( ७ ) वात-गुल्म मे जा नीलिनी घृत विरेचन के लिये कहा है, उसी को
दुगुनी मात्रा मे कफ-गुल्म मे विरेचन के लिये बरते ॥१५२॥
सुधाक्षीरद्रवे चूर्ण त्रिवृतायाः सुभावितम् ॥ १५३ ॥
कार्षिकं मधुसर्पिर्भ्यां लीढ्वा साधु विरिच्यते ।
( ८ ) निसात के चूर्ण को सेहुण्ड के दूध मे भली प्रकार भावना देकर
एक कर्ष मात्रा [ आजकल ४ से ६ रत्ती ] मधु और घी के साथ खाना
चाहिये । इससे भली प्रकार विरेचन होता है ॥१५३॥
जलद्रोणे विपक्तव्या विंशतिः पञ्च चाभयाः ॥ १५४॥
दन्त्याः पलानि तावन्ति चित्रकस्य तथैव च ।
अष्टभागस्थितं तं च रस पूतमधिक्षिपेत् ॥ १५५ ॥
दन्ती समं गुडं पूतं क्षिपेत्तत्राभयाश्च ताः ।
तैलार्धकुडवं चैव त्रिवृतायाश्चतुष्पलम् ॥ १५६ ॥
चूर्णितं पलमेकं च पिप्पलीविश्वभेषजम् ।
तत्साध्यं लेहवच्छीते तस्मिंस्तैलसमं मधु ॥ १५७ ॥