चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१३
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१३
सहस्रधौतसर्पिर्वा तैलं वा चन्दनादिकम् ॥ २५७ ॥
दाहज्वरप्रशमनं दद्यादभ्यञ्जनं भिषक् ।
ज्वर को शीत और उष्ण भेद से दो भागो मे विभक्त करके अभ्यग प्रदेह,
परिषेक का प्रयोग करे । शीत ज्वर हो तो उष्ण अभ्यग, परिषेक, प्रदेह करने ।
दाह ज्वर मे मालिश के लिये सहस्र वार (वा सो वार ) धाया हुआ घी, या
चन्दनादि तैल का प्रयोग करे । इससे दाह मिटता है ॥ २५६-२५७ ॥
अथ चन्दनाद्यं तैलमुपदिश्यामः-चन्दन-शैलेय-भद्राश्रय-कालानुसा-
र्य-कालीयक-पद्मा-पद्मकोशीर-सारिवा-मधुक-प्रपौण्डरीक-नागपुष्पोदी-
च्य-चव्य-पद्मोत्पल-नलिन-कुमुद-सौगन्धिक-पुण्डरोक-शतपत्र-बिस-मृणा-
ल-शालूक-शैवाल-कशेरुकानन्ता-कुश-काशेक्षु-दर्भ-शर-नल-शालि-मूल-
जम्बु-वेत्र-वेतस-वानीर-गुन्द्रा-ककुभासनाश्वकर्ण-स्यन्दन-वातपोथ-शाल-
ताल-धवाति-निश-खदिर-कदर-कदम्ब-काश्मर्य-फल-सर्ज-लक्ष-यट-कपीत-
नोदुम्बराश्वत्थ-न्यग्रोध-वातकी-दूर्वाकण्टक-शृङ्गाटक-मञ्जिष्ठा-ज्योतिष्म-
ती-पुष्करबीज-क्रौञ्चादन-बदरी-कोविदार-कदली संवर्तकारिष्ट- शतपर्वा-
श्वेतकुम्भिका-शतावरी-श्रीपर्णी-श्रावणी-महाश्रावणी-रोहिणी-शीतपाक्यौ-
दनपाकी-काला-बला-पयस्या-विदारी-जीवकर्षभक-क्षुद्रमेदा-महामेदा-म-
धुरपर्ण्याप्रोक्ता-तृणशून्य-मोचरसा-टरूपक-बबुल-कुटज-पटोल-निम्ब-शाल्म-
ली-नारिकेल-खर्जूर-मृद्वीका-प्रियाल-प्रियङ्गु-धन्वनात्मगुप्ता-मधुकानाम-
न्येषां च शीतवीर्याणां यथालाभमोषधानां कषायं कारयेत्। तेन कषा-
येण द्विगुणितपयसा तेषामेव च कल्केन कषायार्धमात्र मृद्वग्निना साध-
येत्तैलं सद्योदाह ज्वरमपनयति । एतेरेव चौषधैः सुश्लक्ष्णपिष्टैः सुशीतैः
प्रदेहं कारयेत्, एतैरेव च शृतशीत सलिलमवगाहपरिषेकार्थं प्रयुञ्जीत ।
इसके आगे चन्दनादि तेल का उपदेश करते हे-चन्दन, शैलेय (छैल-
छरीला ), भद्राश्रया ( श्वेत चन्दन ), कालानुसार्य ( तगर ), कालीयक ( पीत-
काष्ठ चन्दन ), पद्मा ( भाङ्गी ), पद्माख, खम, सारिवा, मुल्हठी, पुण्डरीक-
काष्ठ, नागकेसर, उदीच्य ( नेत्रवाला ), चविका, वन्य ( मोथा ), पद्म (कमल),
उत्पल (नील-कमल ), नलिन ( कमल भेद ), कुमुद ( श्वेत कमल भेद ),
सौगन्धिक, पुण्डरीक ( श्वेत कमल ), शतपत्र ( लाल कमल ), बिस ( कमल
नाल ), मृणाल ( कमल-दण्ड ), शालूक ( कमल आदि के कन्द ), शैवाल
( सरवाल ), कसेरू, अनन्ती ( दुरालभा ), कुश, कास, ईख, शर और दाभ
( इनकी जड ), नलसर, शालि धान्य की जड, जामुन, बेत, अम्लवेतस, वानीर
(जल बेतस ), गुन्द्रा ( तृण भेद ), अर्जुन, असन ( पीत साल ), अश्वकर्ण
३१४ चरकसंहिता [अ० ३
(साल का भेद), स्यन्दन (सादन), वातपोथ (ढाक), शाल, ताड, धव,
तिनिश (जिससे रथ बनता है वह वृक्ष), खैर, कदर (श्वेत खैर), कदम्ब,
गम्भारी का फल, सर्ज (राल जिससे निकलती है वह वृक्ष), प्लक्ष (पिलखन),
वट (बरगद), कपीतन (गिरीस या पारस पीपल), गूलर, पीपल, बरगद
(जिसमे जटाये लटकती है), वाय के फूल, दूब, इत्कट (तृण विशेष),
सिंघाडा, मजीठ, मालकंगनी, कमल बीज, क्रोञ्चादन (खिरनी), बेर, कोवि-
दार (श्वेत कचनार), वेतस, मवर्त्तक (बहेडा), नीम, शतपर्वा (श्वेत दूब),
शीत कुम्भिका (काठ पाटला, जिससे फूल नहीं आता वह पाटला), शतावरी,
श्रीपर्णी (गम्भारी), श्रावणी (मुण्डी), महाश्रावणी (मुण्डी भेद), रोहिणी
(कुटकी), शीतपाकी (गन्धदूर्वा या शिखण्डिका), ओदनपाकी (नील झिण्टी),
काला (सारिवा या मजीठ), खरैंटी, पयस्या (क्षीरकाकोली या क्षीरविदारी),
विदारीकन्द, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, मधुरा (काकोली या मूर्वा),
क्षुद्रसहा (मूगपर्णी), ऋष्यप्रोक्ता (अतिबला), तृणशून्य (केतकी, केवडा),
मोचरस (सेमलकी गोद), अडूसा, मौलसरी, वूड़ा, पटोलपत्र, नीम, सेमल
की जड़, नारियल, खजूर, अगूर, पियाल, फूल प्रियगु, धन्वन, क्रौंच और
मुलहठी । इन्हें तथा अन्य जो शीतल द्रव्य प्राप्त हो सके उनको लेकर क्वाथ
करे। इस क्वाथ से दुगुना दूध, इन्ही द्रव्यो का कल्क और कषाय से आधा
तैल मिलाकर तैल सिद्ध करे। यह तैल शीघ्र दाह ज्वर को नष्ट करता है। इन्ही
ओषधियो को अत्यन्त बारीक पीस कर पतला लेप करे। इनके क्वाथ मे अव-
गाहन या परिषेचन करे। [बारीक लेप करना चाहिये गाढा लेप उष्णता
करता है ] ॥ २५८ ॥
मद्यारनाल-क्षीर-सौवीर-दधि-घृत-सलिल-सेकावगाहाश्च सद्योदाह-
ज्वरमपनयन्ति शीतस्पर्शत्वादिति ॥ २५६ ॥
मद्य, आरनाल (काँजी), दूध, सौवीर (धान्यासव), दही, घी और जल
का परिषेक और अवगाहन बहुत जल्दी दाहज्वर को नष्ट करता है। क्योकि
ये वस्तुएँ शीत स्पर्शवाली है ॥ २५६ ॥
भवन्ति चात्र-पौष्करेषु सुशीतेषु पद्मोत्पलदलेषु च।
कह्लाराणां च पत्रेषु क्षौमेषु विमलेषु च ॥ २६० ॥
चन्दनोदकशीतेषु सुप्याद्दाहादितः सुखम् ।
हिमाम्बुसिक्ते सदने शीते धारागृहेऽपि वा ॥ २६१ ॥
हेमशङ्खप्रवालानां मणीनां मौक्तिकस्य च ।