चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१७
पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१७
उतार ले । इस छाल को खूब बारीक पीस कर दूध में मिला कर पीवे, अथवा
इस छाल का चूर्ण करके दूध के साथ पीवे, अथवा घी और शहद में मिला
कर चाटे। जीर्ण होने पर दूध और घी के साथ शालि या साठी का भात
खावे। एक साल तक इस प्रकार प्रयोग करने पर एक सौ बरस की जरा
( बुढापा ) से रहित आयु होती है और सब गुण पूर्व की भाति होते है ॥११॥
बलातिबला-चन्दनागुरु-धव-तिनिश-खदिर-शिंशपासन स्वरसाः
पुनर्नवान्ताश्चौषधयो दश नागबलया व्याख्याताः। स्वरसानामलाभे
त्वयं स्वरसविधिः—चूर्णानामाढकमाढकमुदस्याहोरात्रस्थितं मृदितपूतं
स्वरसवत्प्रयोज्यम् ॥ १२ ॥
बला ( खरैंटी ), अतिबला, चन्दन, अगरु, धव, तिनिश ( सादन, स्यन्दन
वृक्ष जिसका रथ बनता था ), खदिर, शिशपा ( शीशम ), असन इनके
स्वरस तथा पुनर्नवा तक गिनी हुई अमृता, गिलोय, अभया, हरड, धात्री,
आवला, मुक्ता, रास्ना ( जीवन्ती ), श्वेता ( दूर्वा अपराजिता ), जीवन्ती,
अतिरसा ( शतावरी ), दस औषधियो का प्रयोग भी नागबला से बतला
दिया है । अर्थात् जिस प्रकार नागबला का स्वरस प्रयुक्त होना है,
उसी प्रकार से इनका स्वरस प्रयोग करना चाहिये । यदि स्वरस प्राप्त न हो
सके तो इनका स्वरस तैयार करने का यह प्रकार है कि औषध का
चूर्ण एक आढक और पानी एक आढक ( परिभाषा से दुगुना )
लेकर चौबीस घन्टे इसमें भिंगो कर रखना चाहिये । फिर इसको मथ कर, छान
कर स्वरस के समान प्रयोग करना चाहिये । [ स्वरस के न मिलने पर यह भी
विधि है कि शुष्क द्रव्य को आठ गुणे जल में काथ करना चाहिये । चतुर्थांश
रहने पर छान कर प्रयोग करना चाहिये । बला आदि के स्वरस का ही ऐसा
प्रयोग करना चाहिये । भोजन विधि नागबला के ही समान जाने ] ॥ १२ ॥
भल्लातकान्यनुपहतान्यनामयान्यापूर्णरसप्रमाणवीर्याणि पक्व-जा-
म्बव-प्रकाशानि शुचौ शुक्रे वा मासे संगृह्य यवपल्ले माषपल्ले वा निधा-
पयेत्, तांन चतुर्मासस्थितानि सहसि सहस्ये वा मासे प्रयोक्तुमारभेत
शीत-स्निग्ध-मधुरोपस्कृत-शरीरः, पूर्वं दश भल्लतकान्यापोथ्याष्टगुनेना-
म्भसा साधु साधयेत्, तेषा रसमष्टभागावशिष्टं पूतं सपयस्कं पिबेत्
सर्पिषाऽन्तर्मुखमभ्यज्य । तान्येकैकभल्लातकोत्कर्षापकर्षेण दश भल्लात-
कान्यात्रिंशतः प्रयोज्यानि, नातः परमुत्कर्षः प्रयोगविधानेन, सहस्रपर
एव भल्लातकप्रयोगः । जीर्णे च ससर्पिषा पयसा शालिषष्टिकाशनमुप-
२१८ चरकसंहिता [ अ० १
चारः, प्रयोगान्ते च द्विस्तावत् पयसैवोपचारः । तत्प्रयोगाद्वर्षशतमजरं
वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ १३ ॥ इति भल्लातकक्षीरम् ।
भल्लातक क्षीर—जिन पर किसी प्रकार की चोट न लगी हो, जिनमें किसी
प्रकार का रोग ( कृमि आदि ) न हो, जो रस और वीर्य से भरपूर हों, अच्छे
परिपुष्ट हों, तथा जा पके हुए जामुन के समान काले रंग के हों, ऐसे भिलावों
को ज्येष्ठ ओर आषाढ मास में एकत्रित करके जौ से भरे कोठे में या उड़द के
ढेर में रख देवे । चार मास के पीछे अगहन या पौष मास मे इनका सेवन
आरम्भ करे। [ जौ आदि में से निकाल कर तुरन्त इनका सेवन न करे, बल्कि
शीत काल मे शीत गुण युक्त शरीरावस्था मे ही इनका उपयोग करे ] । अर्थात्
खाने से पूर्व शरीर को शीतल, स्नग्ध तथा मधुर वस्तुओं से संस्कृत करे ।
इनको सेवन करने का प्रकार यह है कि पहिले दस भिलावो को कुचल कर
आठ गुण पानी मे पकावे । जब आठवा भाग रस रह जाये तब इसको छान
कर इसमे दूध मिला कर पीवे और पीने से पूर्व मुख मे घी का लेप लगा लेव
जिससे मुख के भीतर का सारी त्वचा चिकनी हो जाय । इस प्रकार से प्रति
दिन एक एक भिलावे को बढाते हुए तीस भिलावे तक बढावे । तीस से ऊपर
भिलावे की मात्रा नहीं बढावे और फिर उसी प्रकार से घटा कर दस तक ले
आवे । इस प्रकार से एक हजार भिलावों का प्रयोग करे। भिलावों के जीर्ण
होने पर घी और दूध के साथ शालि या साठी के चावल खावे । प्रयोग के
उपरान्त [ जितने दिन भिलावों को प्रयोग किया उसमे दुगुने दिनों तक ] दूध
का ही उपयोग करे अर्थात् दोनों समय दूध पीवे । इस प्रकार करने से एक सौ
बरस की बिना वृद्धावस्था के आयु होता है। शेष पूर्व की भाति गुण हैं ।
[ अष्टाग सग्रह के टीकाकार इन्दु ने निम्न प्रकार से खाने की विधि बताई है ।
प्रथम दिन १० भिलावें, दूसरे दिन ११, तीसरे दिन १२ इस प्रकार से बढ़ाते
हुए बीसवें दिन २६, इक्कीसवे दिन ३०, बाईस से लेकर २७ वे दिन तक तीस
तीस ही ले, आगे न बढ़ाये । २८ वे दिन २६, २९ वें दिन २८, तीसवें दिन
२७, इस प्रकार से घटा कर सैनालिसवें दिन १० पर ले आवे, ४८ वें दिन भी
दस ही देवे । इस प्रकार से एक हजार पूरे हो जायेगे । यह एक हज़ार संख्या
आवश्यकतानुसार कम भी हो सकती है। प्रकृति की अपेक्षा से कम में भी परि-
त्याग किया जा सकता है। अष्टागसग्रह के अनुसार जितने दिन भिलावे का
प्रयोग किया हो उससे तिगुने दिनों तक दूध चावल खाना चाहिये ] ॥ १३ ॥
भल्लातकानां जर्जरीकृतानां पिष्टस्वेदनं पूरयित्वा भूमावाकण्ठं