चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३५५
कफजन्य गुल्म यदि जड़ बनाले, बहुत अधिक फैला हो, कठिन हो, जड़
हो और गुरु हो तो क्षार, अरिष्ट-पान और अग्नि-कर्म द्वारा शान्त करे । कफजन्य
गुल्म मे दोष ( कफ दोष ), प्रकृति ( रोगी की कफ प्रकृति ), गुल्म ( स्थिर,
महावास्तु आदि लक्षणो से युक्त ), ऋतु ( वसन्त या हेमन्त ) के अनुसार
रोगी के बल, दोष के प्रमाण को समझने वाला वैद्य क्षार का प्रयोग करे ।
शरीर के बल, दोषो की वृद्धि तथा क्षय को समझने वाला वैद्य एक दिन, दो
दिन या तीन दिन की बाधा देकर पुन. दूसरी बार क्षार का प्रयोग करे ।
मास, दूध, घी को खानेवाले पुरुष के मधुर और स्निग्ध कफ को कोष्ठ से तोड़-
तोड़ कर क्षार नीचे की ओर क्षरित करते है । क्योकि क्षार की प्रकृति ही क्षरण
करने की है ॥ ५६-५६ ॥
मन्देऽग्नावरुचौ सात्म्ये मद्ये सस्नेहमश्नताम् ।
प्रयोज्या मार्गशुद्ध्यर्थमरिष्टाः कफगुल्मिनाम् ॥ ६० ॥
लङ्घनोल्लेखनैः स्वेदैः सर्पिष्पानैर्विरेचनैः ।
बस्तिभिर्गुटिकाचूर्णक्षारारिष्टगणैरपि ॥ ६१ ॥
श्लैष्मिकः कृतमूलत्वायस्य गुल्मो न शाम्यति ।
तस्य दाहो हृते रक्ते शरलोहादिभिर्हितः ॥ ६२ ॥
औष्ण्यात्तैक्ष्ण्याच्च शमयेदग्निगुल्मे कफानिलौ ।
तयोः शमाच्च सघातो गुल्मस्य विनिवर्तते ॥ ६३ ॥
दाहे धान्वन्तरीयाणामत्रापि भिषजां बलम् ।
क्षारप्रयोगे भिषजा क्षारतन्त्रविदा बलम् ॥ ६४ ॥
व्यामिश्रदोषैर्व्यामित्र एष एव क्रियाक्रमः ।
अरिष्ट प्रयोग के काल—जो रोगी स्निग्ध आहार करते हों, अग्नि मन्द हो,
अरुचि हो और उनको मद्य का सात्म्य हो तो मार्ग की शुद्धि के लिये अरिष्टो
का प्रयोग करे । लङ्घन से, वमन से, स्वेदन से, घृतपान से, विरेचन से,
बस्तियो से, गुटिका, चूर्ण, क्षार और अरिष्ट के प्रयोगो से भी कफजन्य गुल्म,
जड़ पकड़ लेने के कारण शान्त नही होता, उस गुल्म को रक्त-मोक्षण करने
पर शरलोह ( बाण का लोह ) आदि से दाह करे । गुल्म मे अग्नि उष्ण होने
से, तीक्ष्ण गुण होने से कफ और वायु दोनो को शान्त कर देती है । इन
दोनो के शान्त होने पर गुल्म का सघात ( एकत्र होना ) भी टूट जाता है ।
इस दाह-कर्म के प्रयोग मे भी धान्वन्तरीय शस्त्र-चिकित्सको का ही अधिकार
है, क्षार-प्रयोग मे क्षार-तन्त्र को जानने वालो से कर्म करावे । मिश्रित दोषो मे
दोषों की मिश्रित चिकित्सा करे ॥ ६०-६४ ॥