चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३५
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३५
(४) कबूतर, कपोत, बटेर, रक्ताक्ष (चकोर), वर्त्तक, शशक, कपिञ्जल,
एण, हरिण, कालपुच्छ, इनके मास को स्विन्न करके (भाप से सिझाकर)
अथवा घी मे भूनकर या यूष के समान पकाकर (अनार आदि के रस से खट्टा
बनाकर) मास रस देवे। ये रक्तपित्त रोग मे हितकारी है। इनको खट्टा करके
अथवा बिना खट्टा बनाये घी से भूनकर शक्कर के साथ प्रयोग करे।
(५) यदि रक्तपित्त मे कफ का मिश्रण हो तो यूष शाक देवे और यदि
वायु का अनुबन्ध हो तो मास-रस देवे ॥३६-४२॥
रक्तपित्ते यवागूनामतः कल्पः प्रवक्ष्यते ॥ ४३ ॥
पद्मोत्पलाना किञ्जल्क-पृश्निपर्णी-प्रियङ्गुकाः ।
जले साध्या रसे तस्मिन् पेया स्याद्रक्तपित्तिनाम् ॥ ४४ ॥
चन्दनोशीरलोध्राणा रसे तद्वत्सनागरे ।
किराततिक्तकोशीरमुस्ताना तद्वदेव च ॥ ४५ ॥
धातकीधन्वयासाम्बुबिल्वाना वा रसे शृताः ।
मसूरपृश्निपर्ण्योर्वा स्थिरा मुद्गरसेऽथवा ॥ ४६ ॥
रसे हरेणुकाना वा सघृते सबलारसे ।
सिद्धाः पारावतादीना रसे वा स्युः पृथक्पृथक् ॥ ४७ ॥
इत्युक्ता रक्तपित्तघ्न्यः शीताः समधुशर्कराः ।
यवाग्वः, कल्पना चैषा कार्या मांसरसेष्वपि ॥ ४८॥
शशः सवास्तुकः शस्तो विबन्धे रक्तपित्तिनाम् ।
वातोल्बणे तित्तिरिः स्यादुदुम्बररसे शृतः ॥ ४९ ॥
मयूरः प्लक्षनिर्य्यूहे न्यग्रोधस्य च कुक्कुटः ।
रसे बिल्वोत्पलादीना वर्तकक्रकरौ हितौ ॥ ५० ॥
रक्तपित्त मे यवागू कल्प—इसके आगे रक्तपित्त रोग मे यवागुओ का कल्प
कहते है—
(१) पद्मोत्पलादि रस से साधित पेया—कमल, नीला कमल, केशर,
पृश्निपर्णी, प्रियगु, इनको षडगपानीय विधि से पकाकर जलक्वाथ सिद्ध करे।
इस क्वाथ मे पेया बनावे। यह पेया रक्तपित्त मे हितकारी है। (२) चन्दनादि
साधित पेया—लाल चन्दन, खस, लोध, साठ, इनके क्वाथ मे साधित पेया
रक्तपित्त मे हितकर है। (३) किराततिक्तादि साधित पेया—चिरायता, मोथा
और खस इनके क्वाथ मे साधित पेया रक्तपित्त मे हितकर है। (४) धात-
क्यादि जल से साधित पेया—धाय के फूल, धमासा, गन्धबला और बेलगिरी
इनके रस मे साधित पेया रक्तपित्त मे हितकर है। (५) मसूरादि जल से साधित
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पेया—मसूर, पृश्निपर्णी से सिद्ध पेया अथवा (६) स्थिरा (शालपर्णी) और
मूग से साधित पेया रक्तपित्त मे हितकारी है । (७) रेणुका के रस मे (८)
घृतयुक्त बला रस मे या (६) पारावत आदि के मास-रस मे साधित पेया
रक्तपित्त मे हितकारी है । पेया के लिये शालि, साठी, नीवार आदि धान्या का
उपयोग करे । इन यवागू, पेयाअं को ठण्डा करके मधु और शर्करा से मीठा
बनाकर देवे । जिस प्रकार से उपरोक्त रसों मे यवागू तैयार की जाती है, उसी
प्रकार इन रसा मे मास-रस भी सिद्ध करके देवे । रक्तपित्त रोग मे यदि विवन्ध
(कब्ज) हो तो बथुए के साथ खरगोश का मास सिद्ध करके देवे । यदि रक्त-
पित्त म वायु का जार हा तो गूलर के रस मे तीतर का मासरस सिद्ध करके
देवे । मोर को पिलखन के रस मे, सुगे को बरगद के रस मे, बेलगिरी और
कमल के रस से बर्त्तक और कुक्कुर के मासरस को सिद्ध करके देवे । उष्णवीर्य
होने पर भी प्रतिनियत सावक द्रव्य के संयोग से ही ये वस्तुए रक्तपित्त मे
हितकारी है ॥ ४३-५० ॥
तृष्यते तिक्तकैः सिद्धं तृष्णाघ्नं वा फलोदकम् ।
सिद्धं विदारिगन्धाद्यैरथवा शृतशीतलम् ॥ ५१ ॥
ज्ञात्वा दोषावनुबलौ बलमाहारमेव च ।
जलं पिपासवे दद्याद्विसर्गादल्पशोऽपि वा ॥ ५२ ॥
निदानं रक्तपित्तस्य यत्किंचित्संप्रकाशितम् ।
जीवितारोग्यकामैस्तन्न सेव्यं रक्तपित्तिभिः ॥ ५३ ॥
इत्यन्नपानं निर्दिष्टं क्रमशः रक्तपित्तिषु ।
रोगी को प्यास लगे तो तिक्त द्रव्यों से सिद्ध जल, तृष्णानाशक फालसा
आदि फलो का पानी या विदारीगन्धादि (स्वल्प पञ्चमूल) गण से सिद्ध जल
अथवा गरम करके ठण्डा बनाया पानी देवे । रक्तपित्त रोग मे दोष (कफ
और वायु) का तथा रोगी के बल और आहार का पहिचान कर प्यास की
शान्ति के लिये यथेच्छ अथवा थोड़ा थोड़ा पानी देवे । यदि अग्नि बलवान् हो
और शरीर महान् हो तो यथेच्छ पानी देवे, वैसे थोडा २ देवे । रक्तपित्त के
जिन रोगियो को जीवन और आरोग्य की चाह हो, रक्तपित्त रोग के जो
कारण बतलाये है वे उनका सेवन न करे, वे उनसे परहेज करते रहे । इस
प्रकार रक्तपित्त रोगियों की यथाक्रम चिकित्सा कह दी है ॥ ५१-५३ ॥
वक्ष्यते बहुदोषाणां कार्यं बलवता च यत् ॥ ५४ ॥
अक्षीणबलमांसस्य यस्य संतर्पणोत्थितम् ।