चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६७
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६७
होकर स्त्रियों से अप्रतिहत रूप में ( बिना शक्ति नष्ट हुए, बिना झिझक के )
सम्भोग कर सकता है, जिसके सेवन से पुरुष स्त्रियों का अतिप्रिय बन जाता है,
जिसके सेवन से पुष्टि, बल मिलता है, जिसके सेवन से वृद्धावस्था में जीर्ण
होता हुआ भी पुरुष अक्षय शुक्र के भण्डार को प्राप्त करके पुत्रवान् हो सकता है,
जिसके सेवन से मनुष्य वृक्ष के समान अनेक शाखाँवाला ( पुत्र, पौत्र, सगे
सम्बन्धियोंवाला ) बन जाता है, जिसके सेवन से पुरुष चैत्य ( ग्राम तरु या
देवमन्दिर ) के समान बहुत प्रजावाला, बहुत मानवाला, सर्वप्रिय, पूजनीय
होता है, जिसके सेवन से पुरुष मर कर भी सन्तान के कारण होनेवाली अन-
न्तता, यश, रत्न, बल, पुष्टि को प्राप्त करता है। उस औषध को 'वाजीकरण'
कहते हैं ॥ ९-१२ ॥
स्वस्थस्यौजस्करं त्वेतद् द्विविधं प्रोक्तमौषधम् ।
यद् व्याधिनिर्घातकरं वक्ष्यते तच्चिकित्सिते ॥ १३ ॥
स्वस्थ पुरुष के लिये जो दो प्रकार के औषध ऊर्ज को उत्पन्न करते हैं
वह कह दिये हैं और जो औषध रोग का नाश करता है, उसको चिकित्सा-
धिकार में कहेंगे ॥ १३ ॥
चिकित्सितार्थ एतावान्विकाराणां यदौषधम् ।
रसायनविधिश्चाग्रे वाजीकरणमेव च ॥ १४ ॥
ज्वर आदि रोगों को शमन करनेवाले औषध का उपदेश ही चिकित्सा-
अधिकार का प्रयोजन है। वैसे रसायन और वाजीकरण भी चिकित्सा में ही
सम्मिलित हैं। ज्वर आदि रोगों की चिकित्सा से पूर्व रसायन और वाजीकरण
को कहा है ॥ १४ ॥
अभेषजमिति ज्ञेयं विपरीतं यदोषधात् ।
तदसेव्यं, निषेव्यं, तु प्रवक्ष्यामि यदौषधम् ॥ १५ ॥
अभेषज का लक्षण— जो औषध से विपरीत हो, उसका नाम अभेषज है,
यह सेवन के अयोग्य है। जो औषध सेवन करने योग्य है, उसका अब
उपदेश करते हैं ॥ १५ ॥
रसायनानां द्विविधं प्रयोगमृषयो विदुः ।
कुटीप्रावेशिकं चैव वातातापकमेव च ॥ १६ ॥
ऋषियों ने रसायनों के प्रयोग की दो प्रकार की विधि कही है। ( १ )
वातातापक और ( २ ) कुटी-प्रावेशिक । इनमें कुटी-प्रावेशिक विधि अधिक
प्रभावशाली है ॥ १६ ॥
१६८
चरकसंहिता
[ अ० १
कुटीप्रावेशिकस्याऽऽदौ विधिः समुपदेक्ष्यते ।
नृपवैद्यद्विजातीनां साधूनां पुण्यकर्मणाम् ॥ १७ ॥
निवासे निर्भये शस्ते प्राप्योपकरणे पुरे ।
दिशि पूर्वोत्तरायां तु सुभूमौ कारयेत्कुटीम् ॥ १८ ॥
विस्तारोत्सेधसंपन्नां त्रिगर्भां सूक्ष्मलोचनाम् ।
घनभित्तिमृतुसुखां सुस्पष्टां मनसः प्रियाम् ॥ १९ ॥
शब्दादीनामशस्तानागम्यां स्त्रीविवर्जिताम् ।
इष्टोपकरणोपेतां सज्जवैद्यौषधद्विजाम् ॥ २० ॥
अब कुटी प्रावेशिक विधि का उपदेश करेंगे—
कुटी प्रावेशिक विधि—जिस स्थान पर राजा, वैद्य, ब्राह्मण और पुण्य
कर्म करनेवाले साधु सन्त रहते हों, जो स्थान निर्भय, प्रशस्त हो, जहा पर सब
प्रकार के साधन मिल सके, ऐसे नगर मे अच्छी भूमि पर पूर्व या उत्तर दिशा
में कुटी बनवावे । वह कुटी पर्याप्त लम्बी, चौड़ी, ऊंची होनी चाहिये । इसमें
तीन गर्भ ऐसे हों कि एक के अन्दर दूसरा और दूसरे में तीसरा घर हो । इसमें
छोटे २ रोशनदान ( झरोखे ) हों । इस कुटी की दीवारे मोटी, ऋतु के
अनुकूल सुखदायक, खूब प्रकाशयुक्त, मन को लुभानेवाली, अशुभ शब्द
आदि की पहुंच से बाहर, स्त्री रहित, आकांक्षित साधनों से सज्जित और वैद्य,
औषध और ब्राह्मण जहा पर सदा रह सके, ऐसी कुटी बनानी चाहिये ॥१७-२०॥
अथोदगयने शुक्ले तिथिनक्षत्रपूजिते ।
मुहूर्त्तकरणोपेते प्रशस्ते कृतवापनः ॥ २१ ॥
धृतिस्मृतिबलं कृत्वा श्रद्धाधानः समाहितः ।
विधूय मानसान्दोषान्मैत्रीं भूतेषु चिन्तयन् ॥ २२ ॥
देवताः पूजयित्वाऽग्रे द्विजातींश्च प्रदक्षिणम् ।
देवगोब्राह्मणान्कृत्वा ततस्तां प्रविशेत्कुटीम् ॥ २३ ॥
जिस दिन सूर्यभगवान् उत्तरायण मे हो, शुक्ल पक्ष हो, प्रशस्त तिथि,
नक्षत्र, मुहूर्त, करण में मुण्डन करा के श्रद्धा और एकाग्र मन से धृति ( धैर्य ),
स्मृति के बल से, रज, तम, आदि मानसिक दोषों को जीत कर सब प्राणियों मे
मैत्री का चिन्तन करते हुए, प्रथम देव, ब्राह्मण की पूजा करके, देवता, गौ
और ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा करके कुटी में प्रवेश करे ॥ २१-२३ ॥
तस्यां संशोधनैः शुद्धः सुखी जातबलः पुनः ।
रसायनं प्रयुञ्जीत तत्प्रवक्ष्यामि शोधनम् ॥ २४ ॥