चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६३
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६३
निदानपूर्वक सम्प्राप्ति—अपथ्यसेवी और अपवित्र भोजन करने वालो मे
तथा जिन पुरुषो मे शरीर दोष अस्थिर तथा बहुत होते है, उनमे सत्त्वगुण
वाले मन मे रज और तम के बढने से तथा चिन्ता, काम, भय, क्रोध, शोक,
उद्वेग आदि मानसिक विकारो से मन पर आघात होने पर (इन मानसिक
कारणो से रज और तम बढते है ) और चेतना स्थान हृदय के शारीरिक
वातादि दोषो से व्याप्त हो जाने पर अपस्मार रोग उत्पन्न होता है ॥ ४-५ ॥
धमनीभिः श्रिता' दोषाहृदय पीडयन्ति हि ।
सपीज्यमानो व्यथते मूढो भ्रान्तेन चेतसा ॥ ६ ॥
जिस समय आश्रित (वात आदि शारीरिक) दोष वेग को उत्पन्न करके
हृदयमूल वाली धमनियो द्वारा हृदय मे पहुच जाते है, उस समय चेतना-स्थान
हृदय के पीडित होने से पुरुष भ्रान्तचित्त और मोह को प्राप्त होकर
दुःखी होता है ॥ ६ ॥
पश्यत्यसन्ति रूपाणि पतति प्रस्फुरत्यपि ।
जिह्माक्षिभ्रूः स्रवल्लालो हस्तौ पादौ च विक्षिपन् ॥ ७॥
दोषवेगे च विगते सुप्तवत्प्रतिबुद्ध्यते ।
सामान्य लक्षण—अपस्मार रोगी असत् (अविद्यमान) रूपो को भी देखता
है, भूमि पर गिरता है, कापता है। आख और भौहे टेढी (कुटिल) हो जाती
हैं, मुख से लार बहती है, हाथ और पाव को इधर-उधर फेकता है, इस प्रकार
से बीभत्स चेष्टाए करता है। दोष के वेग के शान्त होने पर रोगी सो कर
उठने के समान जागता है ॥ ७-॥
पृथग्दोषैः समस्तैश्च वक्ष्यते स चतुर्विधः ॥ ८ ॥
दोषो के पृथक् पृथक् तथा समस्त होने से अपस्मार चार प्रकार का
है। (१) वातिक, (२) पैत्तिक, (३) श्लैष्मिक और (४) सन्निपातजन्य,
चारों के लक्षण कहते है ॥ ८ ॥
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१ 'धमनीभिश्चिता' इति वा पाठः ।
२ सुश्रुत मे भी कहा है—
सञ्ज्ञावहेषु स्रोतस्सु दोषव्याप्तेषु मानवः ।
रजस्तम परीतेषु मूढो भ्रान्तेन चेतसा ॥
विक्षिपन् हस्तपादौ च विजिह्मभ्रूविलोचनः ।
दन्तान् खादन् वमन्फेन विवृताक्षः पतेत् क्षितौ ॥
४६४ चरकसंहिता [ अ० १०
कम्पते प्रदशेद्दन्तान्१ फेनोद्वामी श्वसित्यपि ।
परुषाणि च कृष्णानि पश्येद्रूपाणि चानिलात् ॥ ६ ॥
(१) वातिक-अपस्मार के लक्षण—वायु के कारण उत्पन्न अपस्मार का
रोगी कापता हे, दाता का काटता है, मुख से झाग उगलता है, जोर जोर से
सास लेता है, कठोर तथा काले रग के रूपो को देखता है। [ इसमे बार बार
प्रबोध ओर बार बार अपस्मार होता है ] ॥ ६ ॥
पीतफेनाङ्गवक्त्राक्षः पीतासृग्रूपदर्शनः ।
सतृष्णोष्णानलव्याप्तलोकदर्शी च पैत्तिकः ॥ १० ॥
(२) पैत्तिक अपस्मार के लक्षण—रोगी के मुख से निकला झाग, नख
आदि अग, मुख और आखे पीली होती है, पोले, लाल रूपों को देखता है,
रोगी को प्यास और गरमी अनुभव होती है, शरीर गरम रहता है, सब जगत्
को आग से व्याप्त अर्थात् चारो ओर आग ही आग देखता है ॥ १० ॥
शुक्लफेनाङ्गवक्त्राक्षः शीतहृष्टाङ्गजो गुरुः ।
पश्यञ्छुक्लानि रूपाणि श्लैष्मिको मुच्यते चिरात् ॥ ११ ॥
(३) कफजन्य अपस्मार के लक्षण—रोगी के मुख से निकली झाग, नख
आदि अग, मुख और आखे श्वेत होती है, शरीर ठण्डा, रोमाञ्चित और भारी
होता है, रोगी श्वेत रूपो को देखता है, यह रोगी देर मे सञ्ज्ञा ( चेतना )
प्राप्त करता है ॥ ११ ॥
सर्वैरेतैः समस्तैस्तु लिङ्गैर्ज्ञेयस्त्रिदोषजः ।
अपस्मारः स चासाध्यो यः क्षीणस्यानवश्च यः ॥ १२ ॥
(४) त्रिदोषजन्य अपस्मार मे इन तीनो दोषो के लक्षण मिले रहते हैं।
यह सन्निपातजन्य अपस्मार असाध्य हाता है, इसी प्रकार क्षीण पुरुष मे हुआ
तथा पुराना अपस्मार असाध्य होता है ॥ १२ ॥
पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः ।
अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिदथान्तरम् ॥ १३ ॥
मल (अपस्मार के प्रारम्भिक दोष) बारह दिन, पन्द्रह दिन या एक
मास मे अथवा कुछ कम या अधिक समय मे [ जब काल, प्रकृति, दूष्य आदि
से ] बलवान् हो जाते है। तब अपस्मार रोग को उत्पन्न करते है ॥ १३ ॥
तैरावृताना हृत्स्रोतोमनसां संप्रबोधनम् ।
तीक्ष्णैरादौ भिषक् कुर्यात्कर्मभिर्वमनादिभिः ॥ १४ ॥
१. ‘दशते दन्तान्’ इति वा पाठः।