चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३५६ चरकसंहिता [ अ० ५
सिद्धानतः प्रवक्ष्यामि योगान् गुल्मनिबर्हणान् ॥ ६५ ॥
त्र्यूषणत्रिफलाधान्यबिडङ्गचव्यचित्रकैः ।
कल्कीकृतैर्घृतं सिद्धं सक्षीरं वातगुल्मनुत् ॥ ६६ ॥
इति त्र्यूषणादिघृतम् ।
इसके आगे गुल्मनाशक सिद्ध प्रयोगो का वर्णन करते है।
( १ ) त्र्यूषणादि घृत—सोंठ, कालीमिर्च, पिप्पली, हरड, बहेड़ा, आंवला,
धनिया, वायविडंग, चविका, चीतामूल इनके कल्क से और दूध द्वारा साधित
घृत वात-गुल्म को नष्ट करता है । [ मात्रा आधा तोला ] ॥ ६५-६६ ॥
एत एव च कल्काः स्युः कषायः पाञ्चमूलिकः ।
द्विपञ्चमूलिको वाऽपि तद् घृत गुल्मनुत्परम् ॥ ६७ ॥
इति त्र्यूषणादिघृतमपरम् ।
( २ ) त्र्यूषणादि घृत—काली मरिच आदि वस्तुओ के कल्क के साथ
बृहत्पञ्चमूल क्वाथ मे घृत सिद्ध करे । अथवा पञ्चमूल के स्थान पर दशमूल का
क्वाथ लेकर इन्ही कल्को से ( त्र्यूषणादि ) घृत सिद्ध करे । [ घृत २ प्रस्थ,
क्वाथ ८ प्रस्थ, कल्क १ शराव हो ] यह घृत गुल्मनाशक है ॥ ६७ ॥
षट्पलं वा पिबेत्सर्पिर्यदुक्तं राजयक्ष्मणि ।
प्रसन्नया वा क्षीरोत्थ सुरया दाडिमेन वा ॥ ६८ ॥
दध्नः सरेण वा कार्य घृत मारुतगुल्मनुत् १।
इति गुल्मषट्पलघृतम् ॥
( ३ ) गुल्मषट्पल घृत—राजयक्ष्मा मे कहे ‘षट्-पल’ घृत का पान करावे ।
दूध से निकले घी को प्रसन्ना ( सुरा के ऊपर के स्वच्छ भाग ) के साथ, सुरा
से, अनार के रस से, दही की मलाई के साथ ले । यह घृत वात-गुल्म को नष्ट
करता है । [ प्रसन्ना आदि को दूध के साथ मिला कर मथने से घृत को पृथक्
करके बरते यह श्री गगाधरसेन का मत है । ] ॥६८॥
हिङ्गुसौवर्चलाजाजीबिडदाडिमदीप्यकैः ॥ ६६ ॥
पुष्करव्योषधान्याम्ल २वेतसक्षारचित्रकैः ।
शटीवचाजगन्धैलासुरसैश्च विपाचितम् ॥ ७० ॥
शूलानाहहरं सर्पिर्दध्ना चानिलगुल्मिनाम् ।
इति हिङ्गुसौवर्चलाद्यं घृतम् ।
( ४ ) हिङ्गुसौवर्चलादि घृत—हींग, सौचर नमक, अजाजी ( जीरा ),
विडनमक ( काला नमक ), अनारदाना, अजवायन, पोहकरमूल, त्रिकटु,
१ 'मारुतगुल्मिनाम्' इति वा पाठः । २ 'धान्याक' इति च पाठः ।