चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३६२ चरकसंहिता [ अ० ५
प्रयुक्तान्याशु सिध्यन्ति तैल ह्यनिलजित् परम् ।
वात-व्याधि चिकित्सा मे गुल्मनाशक तैलो को कहेगे । यह तैल वातगुल्मों
मे पान अभ्यग और अनुवासन के रूप मे प्रयोग करने से फलदायक होते है ।
क्योंकि वात के शमन के लिये तैल श्रेष्ठ औषध है ॥ १०३-॥
नीलिनीचूर्णसंयुक्तं पूर्वोक्तं घृतमेव च ॥ १०४ ॥
समलाय प्रदेयं स्याच्छोधनं वातगुल्मिने ।
नीलिनीत्रिवृतादन्तीपथ्याकम्पिल्लकैः सह ॥ १०५ ॥
शोधनार्थं घृतं देयं सबिडक्षारनागरम् ।
नीलिनी त्रिफला रास्त्रा बला कटुकरोहिणीम् ॥ १०६ ॥
पचेद्विडङ्गं व्याघ्रीं च पलिकानि जलाढके ।
तेन पादावशेषेण घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ १०७॥
दघ्नः प्रस्थेन संयोज्य सुधाक्षीरपलेन च ।
ततो घृतपलं दद्याद् यवागूमण्डसंश्रितम् ॥ १०८ ॥
जीर्णे सम्यग्विरिक्तं च भोजयेद् रसभोजनम् ।
गुल्मकुष्ठोदरव्यङ्गशोफपाण्ड्वामयज्वरान् ॥ १०९ ॥
श्वित्रं प्लीहानमुन्मादं घृतमेतद् व्यपोहति ।
इति नीलिन्याद्यं घृतम् ।
(१७) वातगुल्म रोगी के पेट मे मल हो तो शोधन के लिये पूर्व कथित
त्र्यूषणादि-घृत मे नीलिनी का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । (१८) नीलि-
न्याद्य घृत—नीलिनीमूल, निशोथ, दन्तीमूल, हरड, कमीला इनसे साधित घी मे
[ घृत की अपेक्षा चौगुना पानी मिला कर ] बिड नमक, यवक्षार और सोठ
मिला कर विरेचन के लिये देना चाहिये । अथवा त्र्यूषणादि घृत मे इनका चूर्ण
मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । (१६) नीलिन्याद्य घृत (२)—गाय का घी
१ प्रस्थ, नीलिनी मूल, त्रिफला, रास्ना, खरैटी, कुटकी, वायविडंग, कटेरी
इनको एक एक पल लेकर १ आढक पानी मे पकाना चाहिये । चतुर्थांश शेष
रहने पर घी और दही १ प्रस्थ, सेहुण्ड का दूध १ पल मिला कर घी पकाना
चाहिये । इस घी की एक पल मात्रा (आज कल १ तोला) को यवागू के मण्ड
मे मिला कर देवे । इसके जीर्ण हो जाने पर और रोगी को विरेचन हो जाने
पर मास रस का भोजन देवे । इस घी से गुल्म, कुष्ठ, उदर-रोग, व्यङ्ग, शोफ,
पाण्डु रोग, ज्वर, श्वित्र, प्लीहा और उन्माद रोग नष्ट होते हैं ॥१०४-१०६॥
कुक्कुटाश्च मयूराश्च तित्तिरिक्रौञ्चवर्तकाः ॥ ११० ॥
शालयो मदिरा सर्पिर्वातगुल्मभिषग्जितम् ।