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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७७

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७७

सन्तापः सारुचिस्तृष्णा चाङ्गमर्दो हृदि व्यथा।
ज्वरप्रभावो जन्मादौ निधने च महन्तमः ॥ २६ ॥
प्रकृतिश्च प्रवृत्तिश्च प्रभावश्च प्रदर्शितः ।
निदाने कारणान्यष्टौ पूर्वोक्तानि विभागशः ॥ २७ ॥
सन्ताप, अरुचि, तृष्णा, अगमर्द ( अंगों में पीड़ा अगड़ाई आदि ),
हृदय में पीड़ा का अनुभव होना यह ज्वर का प्रभाव है । ये लक्षण अपथ्य
सेवन से उत्पन्न ज्वर के हैं । जन्म तथा मृत्यु के समय होने वाला ज्वर महा-
तम होता है । इस प्रकार से प्रकृति, प्रवृत्ति और प्रभाव कह दिये हैं। निदान-
स्थान में ज्वर के आठ कारण विभाग रूप में प्रथम कहे जा चुके हैं ॥२६-२७॥
आलस्यं नयने सास्त्रे जृम्भग् गौरवं क्लमः ।
ज्वलनातपवाय्वम्बुभक्तिद्वेषावनिश्चितौ ॥ २८ ॥
अविपाकास्यवैरस्ये हानिश्च बलवर्णयो ।
शीलवैकृतमल्प च ज्वरलक्षणमग्रजम् ॥ २६ ॥
केवलं समनस्कं च ज्वराधिष्ठानमुच्यते ।
शरीरं, बलकालस्तु निदाने संप्रदर्शितः ॥ ३० ॥
ज्वर का पूर्वरूप—आलस्य, आंखों में आंसू, जम्भाई, शरीर में भारीपन,
क्लम, आग, धूप, वायु, पानी, भोजन में अनिश्चित रूप से इच्छा और द्वेष का
होना, अपचन, मुख की विरसता, बल और वर्ण की हानि, स्वभाव का परिवर्त्तन
ये ज्वर के सक्षिप्त पूर्वरूप है । सम्पूर्ण शरीर और मनोयुक्त शरीर ही ज्वर का
आश्रय-स्थान है । ज्वर का बल-काल निदान स्थान में दिखा दिया है ॥२८-३०॥
ज्वरप्रत्यात्मिकं लिङ्गं संतापो देहमानसः ।
ज्वरेणाविशता भूतं न हि किंचिन्न तप्यते ॥ ३१ ॥
ज्वर का अपना स्वरूप—देह और मन का सन्ताप ही ज्वर का अपना
स्वरूप है । ज्वर से आक्रान्त होने पर प्राणि का कोई भी ऐसा अंग नहीं होता,
जो कि तपता नहीं, गरम नहीं होता । अपितु सारा शरीर अन्दर और बाहर से
गरम हो जाता है ॥ ३१ ॥
द्विविधो विधिभेदेन ज्वरः शारीरमानसः ।
पुनश्च द्विविधो दृष्टः सौम्यश्चाग्नेय एव च ॥ ३२ ॥
अन्तर्वेगो बहिर्वेगो द्विविधः पुनरुच्यते ।
प्राकृतो वैकृतश्चैव साध्यश्चासाध्य एव च ॥ ३३ ॥
पुनः पञ्चविधो दृष्टो दोषकालबलाब्लात् ।

२७८ चरकसंहिता [ अ० ३
संततः सततोऽन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकौ ॥ ३४ ॥
पुनराश्रयभेदेन धातूनां सप्तधा मतः ।
भिन्नः कारणभेदेन पुनरष्टविधो ज्वर ॥ ३५ ॥
विधि-भेद से ज्वर दो प्रकार का है । एक शारीर ज्वर और दूसरा मानस
ज्वर । फिर भी ज्वर दो प्रकार का देखा जाता है । जैसे-सौम्य और आग्नेय ।
वेग के अभिप्राय से भी दो प्रकार का है । अन्तर्वेग और बहिर्वेम । प्राकृत
और वैकृत । साध्य और असाध्य भेद से भी ज्वर दो प्रकार का है । दोष
और काल के बल-अबल के भेद से ज्वर पाच प्रकार का देखा गया है ।
जैसे-सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक और चतुर्थक । रस आदि सात
धातुओं के भेद से ज्वर सात प्रकार का है । जैसे-रसज, रक्तज, मासज,
मेदज, अस्थिज, मज्जाज और शुक्रज । कारण भेद से ज्वर आठ प्रकार का है ।
जैसे-वातज, पित्तज, कफज, पित्त-कफज, वात-कफज, वात-पित्तज, और
सन्निपातज तथा आगन्तुज ॥३२-३५ ॥
शारीरो जायते पूर्वं देहे मनसि मानसः ।
वैचित्त्यमरतिर्ग्लानिर्मनसस्तापलक्षणम् ॥ ३६ ॥
इन्द्रियाणां च वैकृत्यं देहसन्तापलक्षणम् ।
वातपित्तात्मकः शीतमुष्णं वातकफात्मकः ॥ ३७ ॥
इच्छत्युभयमेतत्तु ज्वरो व्यामिश्रलक्षणः ।
योगवाही परं वायु संयोगादुभयार्थकृत् ॥ ३८ ॥
दाहकृत्तेजसा युक्तः शीतकृत्सोमसंश्रयात् ।
शारीरिक ज्वर वातादि दोष के कारण प्रथम शरीर में उत्पन्न हो जाता है ।
पीछे से मन आक्रान्त होता है । परन्तु मन में उत्पन्न होने वाला ज्वर प्रथम मन
में होता है, पीछे से शरीर में आता है । मानस ज्वर के लक्षण-चित्त का
विक्षिप्त होना, बेचैनी, ग्लानि का होना है । शारीरिक ज्वर में इन्द्रियों में विकृति
उत्पन्न हो जाती है (अभिलषित विषय भी तब अच्छे नहीं लगते) । वात-
पित्तजन्य ज्वर में उष्णता की चाह करता है । मिश्रित लक्षणों वाले ज्वर में
शीत और उष्ण दोनों की चाह करता है । वायु अतियोगवाही है—सयोग के
कारण दोनों कार्य करता है । पित्त के साथ मिलने से उष्णिमा, कफ के साथ
मिलने से शीतलता को उत्पन्न करता है ॥ ३६-३८ ॥
अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः ॥ ३९ ॥
सन्धयस्थिशूलमस्वेदो दोषवच्र्चोविनिग्रहः ।

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७९
अन्तर्वेगस्य लिङ्गानि ज्वरस्यैतानि लक्षयेत् ॥ ४० ॥
अन्तर्वेग ज्वर के लक्षण—शरीर के अन्दर दाह, प्यास का अधिक होना,
प्रलाप, श्वास का तेज़ी से चलना, चक्कर आना, सन्धियों और अस्थियों म शूल,
पसीने का आना, दोषों तथा वर्च (मल) का रुक जाना, बाहर न आना, ये
अन्तर्वेग ज्वर के लक्षण हैं ॥ ३६-४० ॥
सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम् ।
बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च ॥ ४१ ॥
बहिर्वेग ज्वर के लक्षण—ज्वर में बाह्य ताप अधिक रहता है, तृष्णा,
प्रलाप आदि लक्षण थोड़ी मात्रा में होते हैं, यह ज्वर सुखसाध्य है ॥४१॥
प्राकृतः सुखसाध्यस्तु वसन्तशरदुद्भवः ।
कालप्रकृतिमुद्दिश्य प्राच्यते प्राकृतो ज्वरः ॥ ४२ ॥
उष्णमुष्णन संवृद्ध पित्तं शरदि कुप्यति ।
चितः शीते कफश्चैव वसन्ते समुदीर्यते ॥ ४३ ॥
वसन्त और शरद् ऋतु में उत्पन्न होने वाला प्राकृत ज्वर सुखसाध्य है।
वसन्त में उत्पन्न होनेवाला कफज्वर, शरद् में उत्पन्न होने वाला पित्तज्वर है।
[ वर्षाऋतु में होनेवाला वातज्वर प्राकृत होते हुए भी सुखसाध्य नहीं है।]
यहाँ पर काल-स्वभाव को देखकर ही यह प्राकृत ज्वर कहा जाता है। सञ्चित
हुआ उष्ण गुणवाला पित्त धूप आदि की उष्णिमा के कारण शरद् ऋतु में
कुपित होता है। इसी प्रकार से शीतकाल में सञ्चित कफ वसन्त ऋतु में
कुपित होता है ॥ ४२-४३ ॥
वर्षास्वम्लविपाकाभिरोषधीभि १सवारिभिः ।
सञ्चितं पित्तमुद्रिक्तं२ शरद्यादित्यतेजसा ॥ ४४ ॥
ज्वरं संजनयत्याशु तस्य चानुबलः कफः ।
प्रकृत्यैव विसर्गाच्च तत्र नानशनाद्भयम् ॥ ४५ ॥
प्राकृत पैत्तिक ज्वर—वर्षाऋतु में ओषधियों और जलों के अम्लविपाकी
होने से सञ्चित पित्त शरद् ऋतु में सूर्य के तेज से प्रकुपित होकर शीघ्र ज्वर को
उत्पन्न करता है। काल के स्वभाव तथा विसर्ग के कारण इस ज्वर के साथ
कफ का अनुबन्ध हो जाता है। अतः प्रकृति स्वभाव तथा विसर्ग काल होने से
लंघन करने पर भी कोई नुकसान नहीं होता ॥ ४४-४५ ॥
१. 'रद्भिरोषधिभिस्तथा' इति च पाठः । २. 'पित्तमुत्क्लिष्टं' इति च ।

२८० चरकसंहिता [ अ० ३
अद्भिदोषधिभिश्चैव मधुराभिञ्चितः कफः ।
हेमन्ते सूर्यसन्तप्तः स वसन्ते प्रकुप्यति ॥ ४६ ॥
वसन्ते श्लेष्मणा तस्माज्ज्वरः समुपजायते ।
आदानमध्ये तस्यापि वातपित्तं भवेदनु ॥ ४७ ॥
आदावन्ते च मध्ये च बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ।
शरदूसन्तयोर्विद्वाञ्ज्वरस्य प्रतिकारयेत् ॥ ४८ ॥
कालप्रकृतिमुद्दिश्य निर्दिष्टः प्राकृतो ज्वरः ।
मधुर रस, जल और ओषधियों द्वारा हेमन्त ऋतु में संचित कफ, वसन्त-
ऋतु में सूर्य की गरमी द्वारा कुपित होता है । इसलिये वसन्तऋतु में कफजन्य
ज्वर उत्पन्न होता है । जिससे यह आदान काल का मध्यवर्ती समय होता है,
इसलिये वायु और पित्त भी इस कफ के अनुबन्ध बन जाते हैं। इससे इस
समय भी थोड़ा लंघन करने से कोई भय नहीं रहता । कफ और पित्त दोनों द्रव
धातु हैं, अतः ये लंघन को सहन कर सकते हैं। इसलिये वैद्य को चाहिये कि
शरद् तथा वसन्त ऋतु में उत्पन्न प्राकृत ज्वर की चिकित्सा काल के आदि,
अन्त और मध्य में दोष के बलाबल को देखकर करे । वसन्त के प्रारम्भ में
कफ प्रबल, मध्य में मध्यबल, और अन्त में निर्बल, शरद् के प्रारम्भ में पित्त
प्रबल, मध्य में मध्यबल और अन्त में निर्बल होता है । इस प्रकार काल की
प्रकृति के उद्देश्य से प्राकृत ज्वर को कह दिया है ॥ ४६-४८ ॥
प्रायेणानिलजो दुःखः कालेष्वन्येषु वैकृतः ॥ ४६ ॥
वर्षाऋतु में होनेवाला वातजन्य ज्वर प्राकृत होते हुए भी प्रायः कष्टसाध्य
होता है । इसी प्रकार अन्य कालों मे ( शरद् ऋतु में कफजन्य या वसन्त में
पित्तजन्य ) उत्पन्न वैकृत ज्वर विरुद्ध चिकित्सा होने से कष्टसाध्य है ॥ ४६ ॥
हेतवो विविधास्तस्य निदाने संप्रदर्शिताः ।
बलवत्स्वल्पदोषेषु ज्वर. साध्योऽनुपद्रवः ॥ ५० ॥
इस वैकृत ज्वर के निदान कारणों को निदानस्थान में कह दिया है ।
बलवान् तथा अल्प दोषवाले पुरुषों मे उपद्रवों से रहित ज्वर साध्य है ॥ ५०॥
हेतुभिर्बहुभिर्जातो बलिभिर्बहुलक्षणः ।
ज्वरः प्राणान्तकृद्धश्च शीघ्रमिन्द्रियनाशनः ॥ ५१ ॥
जो ज्वर बहुत प्रबल कारणों को लेकर उत्पन्न होता है, बहुत से लक्षणों से
युक्त हो शीघ्र इन्द्रिय-शक्तियों को नष्ट कर देता है, वह ज्वर प्राणनाशक
होता है ॥ ५१ ॥