चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१७
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१७
धनिया, अजवायन, पृथ्विका (कलौंजी), सुमुख, सुरस, कुठेरक, काण्डीर,
कालमालक, पर्णास, क्षवक, फणिज्जक, (सब तुलसी के भेद हैं), भूतस्तृण
(गन्धतृण), अदरक, पिप्पली, सरसों, असगन्ध, रास्ना, रुहा (वृद्धरुहा या
मास्तराहिणी), अवराहा (असगन्ध भेद, लाजवन्ती), वच, बला, अतिबला,
विगलय, त्वाफ, शीतवल्ली (नीलदूर्वा), नाकुली (रास्ना भेद), श्वेता (सफेद
गरणी), मालकंगनी, चित्रक, अध्यण्डा (तालमखाना या कौंच), अम्लचांगेरी
(तिनपतिया), बदर, कुलत्थी, माष (उड़द) इस प्रकार के तथा अन्य उष्ण
वीर्य पदार्थों में जितने भी प्राप्त हो सकें उन सबका संग्रह करके उनके साथ
कषाय बनावे । इन्हीं उष्णवीर्य द्रव्यों के कल्क के साथ और सुरा, सौवीरक
(धान्याम्ल), तुषोदक (धान्यासव), मेरेय, मेदक, दही का पानी, कांजी,
कटवर, (मक्खन न निकाला गया तक्र) मिलाकर तैल पकावे । (यहाँ पर द्रव
के द्रव्य स्नेह के समान होने चाहिये । इस प्रकार से सुरा आदि तैल के समान
और कल्क तैल से चतुर्थांश चाहिये) । कुछ गरम गरम तैल से अभ्यंग करे,
इनसे शीतज्वर नष्ट हो जाता है। इन्ही ओषधियों को बारीक पीस कर कवोष्ण
प्रदेह करे । इन्हीं के सुहाते गरम पानी में अवगाहन, परिषेक, ज्वर की शान्ति
के लिये करे ॥ २६७ ॥
भवन्ति चात्र—त्रयोदशविधः स्वेदः स्वेदाध्याये निदर्शितः ।
मात्राकालविदा युक्तः स च शीतज्वरापहः ॥ २६८ ॥
सा कुटी तच्च शयनं तच्चावच्छादनं ज्वरम् ।
शीतं प्रशमयन्त्याशु धूपाश्चागुरुजा घनाः ॥ २६९ ॥
पवित्रचारुगात्राश्च तरुण्यो यौवनोष्मणा ।
आश्लेषाच्छमयन्त्याशु प्रमदाः शिशिरज्वरम् ॥ २७० ॥
स्वेदनान्यन्नपानानि वातश्लेष्महराणि च ।
शीतज्वरं जयन्त्याशु संसर्गबलयोजनात् ॥ २७१
स्वेद अध्याय में जो तेरह प्रकार के स्वेद कहे हैं, मात्रा और काल को
जानने वाला वैद्य इनका भी प्रयोग करे । ये शीत ज्वर को नष्ट करते हैं । (१)
वह कुटी, वह बिस्तर और वह ओढ़ने के वस्त्र जो कुटी-स्वेद में वर्णित हैं तथा
अगर के घने धूप शीत को शान्त करते हैं । (२) स्वच्छ और सुन्दर शरीर
वाली, युवती स्त्रिया अपने यौवन की गरमी से आलिंगन द्वारा शीत को नष्ट
करती हैं । (३) स्वेदन अर्थात् पसीना लाने वाले और वात-कफ नाशक खान-
पान संसर्ग के बल के अनुसार शीत ज्वर को नष्ट करते हैं । यथा—यदि ज्वर
३१८ चरकसंहिता [ अ० ३
वात कफ से हो और इसमे वायु बलवान् हो तो गुरु, उष्ण, स्निग्ध, अनुपान बरते, यदि कफ बलवान् हो तब उष्ण, रूक्षप्राय चिकित्सा करे ॥ २६८-२७१ ॥
वातजे श्रमजे चैव पुराणे क्षतजे ज्वरे ।
लङ्घन न हितं विद्याच्छमनेस्तानूपाचरेत् ॥ २७२ ॥
वायुजन्य—वायुआ के श्रम से उत्पन्न, पुरातन ज्वर, क्षयजन्य ज्वर मे लङ्घन हितकारी नही है, उनके लिये शमनी चिकित्सा करे ॥ २७२ ॥
विक्षिप्यामाशयोष्माणं यस्माद् गत्वा रस नृणाम् ।
ज्वरं कुर्वन्ति दोषास्तु हीयतेऽग्निबल ततः ॥ २७३ ॥
यथा प्रज्वलितो वह्निः स्थाल्यामन्धनवानपि ।
न पचत्योदन सम्यगनिलप्रेरितो बहिः ॥ २७४ ॥
पक्तिस्थानात्तदा दोषरूष्मा क्षिप्तो बहिर्नृणाम् ।
न पचत्यन्वहृत कृच्छ्रात्पचति वा लघु ॥ २७५ ॥
अतोऽग्निबलरक्षार्थं लङ्घनादिक्रमो हितः ।
सप्ताहेन हि पच्यन्ते सर्वधातुगता मलाः ॥ २७६ ॥
निरामश्चाप्यतः प्रोक्तो ज्वरः प्रायोऽष्टमेऽहनि ।
क्योकि आमाशय की ऊष्मा को बाहर निकाल कर रस-धातु मे जा कर ज्वर उत्पन्न करते है, इसलिये पुरुषो का अग्नि बल घट जाता है। जिस प्रकार चूल्हे मे जलती हुई आग ईन्धन होने पर भी वायु के झोके से बाहर की ओर आने से पतीली के चावल को नही पकाती, इसी प्रकार दोषो के कारण आमाशय से बाहर आई हुई अग्नि भुक्त भोजन को नहीं पचाती, या लघु भोजन कठिनाई से पचता है। इसलिये अग्निबल की रक्षा के लिये ही यह लङ्घन आदि उपक्रम बताया है। सब धातुओ के मल प्राय सात दिन के भीतर पच जाते है। इसलिये प्राय आठवे दिन ज्वर को 'निराम ज्वर' कहते है। [ कभी कभी सात दिन के पीछे भी सामता रह जाती है । ] ॥ २७३-२७६ ॥
उदीर्णदोषस्त्वल्पाग्निरश्नन् गुरु विशेषतः ॥ २७७ ॥
मुच्यते सहसा प्राणैश्चिरं क्लिश्यति वा नरः ।
एतस्मात्कारणाद्विद्वान्वातिकेऽप्यादितो ज्वरे ॥ २७८ ॥
नाति गुर्वति वा स्निग्ध भोजयेत्सहसा नरम् ।
ज्वरे मारुतजे त्वादावनपेक्ष्यापि हि क्रमम् ॥ २७९ ॥
कुर्यान्निरनुबन्धानामभ्यङ्गादीनुपक्रमान् ।
पाययित्वा कषायं च भोजयेद्रसभोजनम् ॥ २८० ॥
जीर्णज्वरहरं कुर्यात्सर्वश्वाप्युपक्रमम् ।