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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

[ १० ]

[बायाँ स्तम्भ]
हर लेप । ऐडगजादि लेप । सिद्ध कुष्ठ-
हर लेप । कुष्ठ में स्नान पान, अनेक
योग । अभ्यंग । रक्त-पित्त प्रधान कुष्ठों
मे अनेक घृत । त्रैफल योग , तिक्तप-
ट्पल घृत । महातिक्तक घृत , महाखा-
दिर घृत । कृमि-कुष्ठ पर अनेक लेप ।
श्वित्र चिकित्सा । पलाश क्षार, खदिरो-
दक पान । मन शिलादि लेप, त्रिक पर
अनेक लेप । असाध्य रोग । किलास
के तीन भेद । किलास के कारण ।
उपसहार ।
अष्टमोऽध्यायः ( पृ० ४१५-४४२ )
राजयक्ष्मचिकित्सितम्—यक्ष्मा
की उत्पत्ति का उपाख्यान । यक्ष्मा के
चार कारण । राजयक्ष्मा के लक्षण ।
शक्ति से अधिक कार्य करने से उत्पन्न
क्षय । वेगोंके संधारण से उत्पन्न यक्ष्मा
धातुक्षय से उत्पन्न यक्ष्मा । विषमाश्रन
से उत्पन्न यक्ष्मा,राजयक्ष्मा का पूर्वरूप ।
यक्ष्मा के रूप और औषध । यक्ष्मा के
ग्यारह रूप । राजयक्ष्मा का लक्षण-स्वर
भेद आदि । प्रतिश्यायादि लक्षणों पर
चिकित्सा । स्वेदन । प्रदेह । बस्ति, नलों
का शिरावेध आदि । सद्यमनी क्रिया ।
संशमन चिकित्सा । यक्ष्म रोगी की मल
स्रसन से मृत्यु । दशमूलाद्य घृत । कास,
श्वासादि लक्षणों पर स्नेह और लेह ।
पञ्च पञ्चमूल घृत । चार लेह । सितो-
पलादि लेह-वासा घृत-शतावरी घृत ।
गोक्षुरादि घृत । जीवन्त्यादि घृत ।
बलादि क्षीर । अन्य उपयोगी योग ।
यवानी षाडव । तालीशाद्य चूर्ण । पथ्य,


[दायाँ स्तम्भ]
घृत-सेवन । दशमूलादि घृत । पञ्चको-
लादि । रास्नादि घृत । सेवन विधि ।
उत्सादनयोग, स्नानीय जल । पथ्य
खाद्य । अभ्यंग । उपसहार ।
नवमोऽध्यायः ( पृ० ४४२–४६२ )
उन्मादचिकित्सितम्—उन्माद के
कारण और सामान्य लक्षण,सम्प्राप्ति-
लक्षण । कारणभेद से उन्माद के दो
भेद-निज और आगन्तुज । आगन्तुज के
पाच प्रकार । वातजन्य उन्माद,
लक्षण । पित्तजन्य उन्माद के पूर्वरूप
और लक्षण-कफज उन्माद, पूर्वरूप और
लक्षण । सन्निपातजन्य उन्माद-आग-
न्तुज उन्माद-लक्षण-ग्रहोन्माद के लक्षण
देव, सिद्ध, पितृ, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस,
ब्रह्मराक्षस, पिशाच आदि से उत्पन्न
ग्रहोन्माद । उनके आगमन काल ।
असंख्य ग्रहों मे मुख्य आठ ग्रह । निज
आगन्तुज भेद से उन्माद के दो प्रकार ।
उपचार कल्याणक घृत । महाकल्याणक
घृत । महापैशाचिक घृत । लशुनाद्य
घृत । हिग्वादि पुरातन घृत योग ।
नस्य और अञ्जन । उन्माद पर प्रायो-
गिक धूम । उन्माद पर अन्य उपचार,
दैवव्यपाश्रय चिकित्सा, उपसहार ।
दशमोऽध्यायः ( पृ० ४६२–४७४ )
अपस्मारचिकित्सितम्—अपस्मार
का लक्षण,निदानपूर्वक सम्प्राप्ति । सामा-
न्य लक्षण । अपस्मार के चार प्रकार ।
वातिक अपस्मार के लक्षण । पैत्तिक
अपस्मार के लक्षण । कफजन्य अपस्मार
के लक्षण । चिकित्सा । पञ्चगव्य घृत ।

[ ११ ]

महापञ्चगव्य घृत, ब्राह्मी घृत। अपस्मार
नाशक अनेक योग, अपस्मार नाशक
नस्य । तीन योग अञ्जन । धूपन । अत-
त्त्वाभिनिवेश नामक महारोग । चिकि-
त्सा । उपसहार ।
एकादशोऽध्यायः (पृ० ४७४-४८६)
क्षतक्षीणचिकित्सितम्—कारण और
सम्प्राप्ति । लक्षण । चिकित्सा । अनेक
योग । अमृतप्राश घृत । श्वदंष्ट्रादि घृत ।
सक्तु प्रयोग । सर्पिर्गुड के चार योग ।
सर्पिर्मोदक । सैन्धवादि चूर्ण । षाडव ।
उपसहार ।
द्वादशोऽध्यायः (पृ० ४८६-५१२)
श्वयथुचिकित्सितम्—कारण । दो
भेद-निज और आगन्तुज । निज शोथ के
भेद । सम्प्राप्ति, पूर्वरूप सामान्य
लक्षण । पैत्तिक शोथ कफजन्य शोथ
असाध्य शोथ । शोथ के उपद्रव । साध्य
शोथ । आमजन्य शोथ की चिकित्सा ।
अपथ्य । चिकित्सा । अनेक योग ।
गण्डीराद्यरिष्ट । अष्टशतारिष्ट । पुनर्न-
वाद्यरिष्ट । फलत्रिकाद्यरिष्ट । क्षार
गुडिका, गुडार्द्रक प्रयोग । शिलाजतु
प्रयोग । कसहरीतकी । पटोलमूलाद्य
घृत । चित्रकाद्य घृत, चित्रक घृत ।
जीवन्त्यादि यवागू । अन्य पथ्य, शाक-
शैलेयादि तैल, प्रदेह । पैत्तिक शोथ
चिकित्सा । कफजन्य शोथ चिकित्सा ।
शोफ रोगी को उबटन । बिडालिका
का लक्षण-तालु विद्रधि । उपजिह्विका,
उपकुश । गलगण्ड-गण्डमाला चिकित्सा,
ग्रन्थि । चिकित्सा—असाध्यग्रन्थि ।

बिदारिका-विस्फोटक-कक्षा । रोमान्तिका-
मसूरिका-वृद्धिगेग । भगन्दर-चिकित्सा,
श्लीपद-जालगर्दभ-चिकित्सा । उप-
सहार-आगन्तुज शोथ । उपसहार ।
त्रयोदशोऽध्यायः (पृ० ५१२-५४५)
उदरचिकित्सितम्—अग्निवेश का
निवेदन-आत्रेय ऋषि का उपदेश ।
उदर रोग के सामान्य कारण । उदर
रोग के पूर्व रूप । रूप । वातोदर के
कारण और लक्षण । पित्तोदर के कारण-
लक्षण । कफोदर के कारण-लक्षण ।
सन्निपातोदर के कारण और लक्षण ।
प्लीहोदर । यकृत्प्लीहोदर । बद्धगुदोदर
लक्षण । छिद्रोदर-लक्षण । उदकोदर-
लक्षण । असाध्य रोगी । वातोदर की
चिकित्सा । पित्तोदर की चिकित्सा ।
कफोदर की चिकित्सा । अनेक योग ।
रोहितक घृत । बद्धगुदोदर की चिकित्सा,
छिद्रोदर की चिकित्सा । उदकोदर की
चिकित्सा । अपथ्य । उदर रोग पर तक्र
का प्रयोग । दुग्धयोग लेप-परिषेचन,
अवसेचन, अष्टमूत्र प्रयोग । दीपनीय
घृत । पञ्चकोल घृत । नागराद्य घृत ।
चित्रक घृत । यवाद्य घृत । पटोलमूला-
दिचूर्ण । गवाक्ष्यादि चूर्ण । नारायण
चूर्ण । हबुषाद्य चूर्ण, नीलिन्याद्य चूर्ण ।
अन्य अनेक योग । वर्धमान-पिप्पली
विधि से हरड़ का सेवन । दूष्योदर
(सन्निपातोदर) में दन्त्यादि तैल ।
वातोदर में सरलादि तैलाभ्यंग । अरिष्टों
के प्रयोग । उदकोदर पर अज्ञकरीषादि
क्षार योग । अन्य अनेक योग-उदर-

रोगो में शस्त्रचिकित्सा । उपसहार ।

[ ५२ ]

[बायाँ स्तम्भ]
रोगो में शस्त्रचिकित्सा । उपसहार ।
चतुर्दशोऽध्यायः (पृ० ५४६-५८८)
अर्शश्चिकित्सितम्— प्रश्न और उप-
देश । अर्श रूप । अर्शभेद । अर्श संज्ञा
विवेक । सहज र्श । लक्षण उत्पत्ति ।
कारण । वातादिजन्य अशो की विशे-
षता । वातजन्य अर्श के कारण । पित्त-
जन्य अर्श के कारण-कफ प्रधान अर्श
के लक्षण । कारण । पूर्वरूप । असा-
ध्यता । चिकित्सा । अर्श पर शस्त्र के
अयुक्त प्रयोग से हानियो की सम्भावना,
शुष्क अर्शो की चिकित्सा । आठ प्रलेप,
दूषित रक्त पर जलोका प्रयोग । पाचन
योग । दश योग । तक्रारिष्ट । तक्र का
सर्वोपरि प्रयोग । मास रस का प्रयोग ।
तक्रों और यूषों का प्रयोग । अनेक
योग । तीन घृत-चव्यघृत । नागराद्य-
घृत । पिप्पलाद्य घृत । मास रस ।
शाक । अनुवासन । अनेक योग-अभया-
रिष्ट । दन्त्यरिष्ट । फलारिष्ट । शर्करा-
सव । कनकारिष्ट । शुष्क अर्शों की
सिद्ध फल-चिकित्सा । स्रावी अर्शों की
सिद्ध-चिकित्सा । रक्तपित्तोल्बण स्रावी
चिकित्सा-अन्ययोग कुटजादि रस क्रिया,
अनेक योग और पथ्य अर्श के मस्सों का
प्रतिसारण । पिच्छाबस्ति । ह्रीवेरादि
घृत । सुनिषण्णकचाङ्गेरीघृत । उपसंहार ।
पञ्चदशोऽध्यायः (पृ० ५८६-६३२)
ग्रहणीचिकित्सितम्—जाठर अग्नि
वा देहाग्नि की प्रधानता । देहाग्नि द्वारा
आहार पाचन की चूल्हे पर रखी भात
की हडिया से तुलना । आहार से रस
का बनना । उससे इन्द्रियो का तर्पण ।


[दायाँ स्तम्भ]
भौम आदि पाच प्रकार की उष्माए,
उन द्वारा पाच प्रकार के गुणों का पाक,
सात अग्नियो द्वारा सात देह धातुओ के
दो प्रकार के पाक, किट्ट और प्रसाद ।
प्रसादज धातु, रस द्वारा धातुओ के
पोषण मे ४ प्रकार के न्यायो का वर्णन ।
उपधातुओ की उत्पत्ति । किट्ट का रूप ।
आहार रसो को धातुओ मे बदलने का
काल क्रम । धातु-परिवर्तन के सम्बन्ध
से चक्रपाणि का मत-अचि सन्तान और
शब्दसन्तान का दृष्टान्त । आहर रस से
रक्तादि बनने के सम्बन्ध मे अग्निवेश
का प्रश्न । आत्रेय का उत्तर । रस को
फैलाने मे विक्षेपक व्यान का कार्य,
निरन्तर गतिशील रस के स्रोतों में रुक
जाने से व्याधियों की उत्पत्ति । तीन
प्रकार की अग्नियों मे जाठराग्नि की
मुख्यता । अजीर्ण के सामान्य कारण ।
सामान्य लक्षण । घोर अन्नविष की
उत्पत्ति, उसके द्वारा अनेक रोगो की
उत्पत्ति । विषमाग्नि के द्वारा धातु-वैष-
म्य और देह-शोष । समाग्निसे धातु-
सरता दुर्बलाग्नि द्वारा अन्न का विदग्ध
होना, उसका गुदद्वार से विरेचन, ग्रहणी
रोग का स्वरूप, ग्रहणी के लक्षण, ग्रहणी
के पूर्वरूप, ग्रहणी का स्थान और निरुक्ति।
ग्रहणी रोग के ४ प्रकार । वातजन्य
ग्रहणी लक्षण । पैत्तिक ग्रहणी-लक्षण ।
कफजन्य ग्रहणी-लक्षण। ग्रहणी दोष।
सन्निपातजन्य ग्रहणी । ग्रहणी चिकित्सा ।
आम दोष में चिकित्सा-दशमूलाद्य घृत ।
त्र्यूषणाद्य घृत । पञ्चमूलाद्य चूर्ण । अन्य

[ १३ ]

योग-साम और निराम मल की परीक्षा- | भासव । मूलासव । पिण्डासव । मध्व-
अपवाद । चित्रकाद्य गुडिका-छ योग । | रिष्ट । क्षार घृत । पिप्पल्यादि योग ।
वमन, अर्श, ग्रन्थि-शूल मे सिद्ध योग । | तीन क्षार । क्षार गुडिका । वत्सकादि
आमयुक्त । शूल मे सिद्धयोग । अग्नि- | योग । अग्निवर्धक त्रिफलादि क्षार योग।
वर्धक पिप्पल्याद्य-चूर्ण । मरिचाद्य चूर्ण। | त्रिदोषजन्य ग्रहणी मे पञ्च कर्म । कफ
अन्य योग । पञ्च प्रकार यवागू । भोज- | की प्रबलावस्था मे वमनादि विधि ।
नादि व्यवस्था । तक्र प्रयोग । तक्रारिष्ट, | मन्दाग्निवाले को दीपनीय ओषधि
चन्दनाद्य घृत । तिक्त घृतो का प्रयोग । | साधित घृत पान । नाना प्रकार की
नागराद्य चूर्ण । भूनिम्बादि चूर्ण । | महा अग्नियो पर अनेक उपचार । अग्नि-
किराताद्य चूर्ण । कफजन्य ग्रहणी मे | मान्द्य का कारण । भस्मक चिकित्सा ।
वमन-पलाशादि योग । अग्निवृद्ध्यर्थ | सम्प्राप्ति । उसके १८ उपचार । पथ्य ।
योग । मध्वासव । मधूकासव । दुराल- | देश-काल विचार से भोजन विधि ।
| उपसंहार ।

चिकित्सा सम्बन्धी उपयोगी पुस्तकें

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ओ३म्
चरकसंहिता
शारीरस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथातः कतिधापुरुषीयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'कतिधापुरुषीय' नामक शारीर-स्थान की व्याख्या करते हैं,
ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ २ ॥
अग्निवेश उवाच—
कतिधा पुरुषो धीमन् धातुभेदेन भिद्यते ।
पुरुषः कारणं कस्मात्, प्रभवः पुरुषस्य कः ॥ ३ ॥
किमज्ञो ज्ञः स नित्यः किं किमनित्यो निदर्शितः ।
प्रकृतिः का विकाराः के किं लिङ्गं पुरुषस्य च ॥ ४ ॥
भगवान् आत्रेय से अग्निवेश पूछते हैं—हे धीमन् गुरो ! धातुभेद से पुरुष
का कितने प्रकार से भेद किया है । इस संसार में पुरुष को प्रधान कारण किस
लिये कहा जाता है ? पुरुष का उत्पत्ति कारण क्या है ? यह पुरुष ज्ञान से
रहित मूढ है या ज्ञानी हैं ? यह पुरुष नित्य है या अनित्य ? प्रकृति क्या वस्तु
हे ? विकार कौन से हैं ? पुरुष के लक्षण क्या हैं, ( जिनसे इसका अनुमान
होता है ) ॥ ३-४ ॥
निष्क्रियं च स्वतन्त्रं च वशिनं सर्वगं विभुम् ।
वदन्त्यात्मानमात्मज्ञाः क्षेत्रज्ञं साक्षिणं तथा ॥ ५ ॥
आत्मा को जानने वाले ब्रह्मवादी आत्मा को क्रियाहीन, स्वतन्त्र, सब को
वश में करने वाला, सर्वव्यापक,विभु (महान्) क्षेत्रज्ञ, और साक्षी कहते हैं ॥५॥
निष्क्रियस्य क्रिया तस्य भगवन् ! विद्यते कथम् ।
स्वतन्त्रश्चदनिष्टासु कथं योनिषु जायते ॥ ६ ॥

२ चरकसंहिता [ अ० १
वशी यद्यसुखैः कस्माद्भावैराक्रम्यते बलात्।
सर्वाः सर्वगतत्वाच्च वेदनाः कि न वेत्ति सः ॥ ७ ॥
न पश्यति विभुः कस्माच्छैलकुड्यतिरस्कृतम् ।
क्षेत्रज्ञः क्षेत्रमथवा किं पूर्वमिति संशयः ॥ ८ ॥
ज्ञेयं क्षेत्रं विना पूर्वं क्षेत्रज्ञो हि न युज्यते ।
क्षेत्रं च यदि पूर्वं स्यात् क्षेत्रज्ञः स्यादशाश्वतः ॥ ६ ॥
साक्षिभूतश्च कस्यायं कर्ता ह्यन्यो न विद्यते ।
स्यात्कथं चाविकारस्य विशेषो वेदनाकृतः ॥ १० ॥
हे भगवन् ! यदि आत्मा क्रियाहीन है तो उसकी क्रियायें किस प्रकार
से होती हैं ? क्रियाहीन क्रिया नहीं कर सकता ! आत्मा यदि स्वतन्त्र है तो
फिर वह दुःखकारक, अनिष्ट दुःखदायी योनियों में किस लिये उत्पन्न होता
है ? यदि आत्मा वशी है, तो वह दुःखदायक पदार्थों से क्यों बलात् पीड़ित
होता है ? आत्मा यदि सर्वत्र व्यापक है तो सब शरीरों की समस्त वेदनाओं को
क्यों नहीं जानता ? आत्मा यदि आकाश के समान व्यापक और महान् है तो
पर्वत या दीवार से छिपे पदार्थों को क्यों नही देखता ? आत्मा 'क्षेत्रज्ञ' है।
क्षेत्रज्ञ और क्षेत्र में पहिले कौन है, इसमें संशय है ? ज्ञेय क्षेत्र के बिना ज्ञाता
क्षेत्रज्ञ हो ही नहीं सकता । और यदि पहिले क्षेत्र हो पीछे क्षेत्रज्ञ मानों तो क्षेत्रज्ञ
अनित्य हो जाता है। आत्मा किसके कर्मो का साक्षी है ? [ दूसरे के कर्मों को
देखने वाला लोक में साक्षी कहा जाता है ] । क्योंकि आत्मा से अतिरिक्त कोई
दूसरा कर्त्ता नहीं है । आत्मा यदि 'निर्विकार' है तो वेदना से उत्पन्न सुख-
दुःख आदि क्यों होते हैं ? ॥६-१०॥
अथ चाऽऽर्तस्य भगवंस्तिसृणां कां चिकित्सति ।
अतीतां वेदना वैद्यो वर्त्तमानां भविष्यतीम् ॥ ११ ॥
भविष्यन्त्या असंप्राप्तिरतीताया अनागमः ।
सांप्रतिक्या अपि स्थानं नास्त्यर्तैः संशयो ह्यतः ॥ १२ ॥
हे भगवन् ! वैद्य रोगी की अतीत, वर्त्तमान और भविष्य इन तीन प्रकार
की वेदनाओं में से किस वेदना ( पीड़ा ) की चिकित्सा करता है ? क्योंकि
भविष्य में होने वाली वेदनाये ( पीड़ायें ) अप्राप्त हैं, वे उपस्थित ही नहीं,
उनकी चिकित्सा हो नहीं सकती। अतीत वेदनायें फिर नहीं आयेगी, वे तो
जा चुकीं । शेष वर्त्तमान काल की वेदनाओं की भी स्थिति नहीं है, क्योंकि
वे अनित्य है । इसलिये संशय है ॥११-१२॥

अ० १] शारीरस्थानम् ३

अ० १] शारीरस्थानम् ३
कारणं वेदनानां किं किमधिष्ठानमुच्यते ।
क्व चैता वेदना सर्वा निवृत्ति यान्त्यशेषतः ॥ १३ ॥
सर्ववित्सर्वसंन्यासी सर्वसंयोगनिःसृतः ।
एकः प्रशान्तो भूतात्मा कैर्लिङ्गैरुपलभ्यते ॥ १४ ॥
वेदनाओं का क्या कारण है ? वेदनाओं का आश्रय क्या है ? ये सब
वेदनाए किस अवस्था में शान्त हो जाती है ? सर्वज्ञ, सर्वसन्यासी, सब प्रकार
के संयोगों से मुक्त, प्रशान्त, भूतात्मा किन लक्षणों से जाना जाता है ? अग्नि-
वेश के ये तेईस प्रश्न हैं ॥१३-१४॥
इत्यग्निवेशस्य वचः श्रुत्वा मतिमतां वरः ।
सर्वं यथावत्प्रोवाच प्रशान्तात्मा पुनर्वसुः ॥ १५ ॥
खादयश्चेतनाषष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः ।
चेतनाधातुरप्येकः स्मृतः पुरुषसंज्ञकः ॥ १६ ॥
पुनश्च धातुभेदेन चतुर्विंशतिकः स्मृतः ।
मनो दशेन्द्रियाण्यर्थाः प्रकृतिश्चाष्टधातुकी ॥ १७ ॥
बुद्धिमानों मे श्रेष्ठ, प्रशान्त चित्त वाले पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश के इन
प्रश्नों को सुनकर क्रम से सबका यथोचित उत्तर दिया—आकाश, वायु, अग्नि,
जल, पृथिवी और चेतना ( मन सहित आत्मा ) ये छः धातु 'पुरुष' शब्द से
कहे जाते हैं, १एक अकेले प्रकृति आदि से पृथक् चेतना धातु को भी पुरुष
शब्द से कहते है । [ यह साख्य मत का पुरुष चिकित्सा का विषय नहीं है,
चिकित्सां का विषय तो प्रथम प्रकार का पुरुष ही है ] । फिर धातु भेद से
चौबीस राशियों को भी 'पुरुष' शब्द से कहा है । मन, पाच ज्ञानेन्द्रिय, पाच
कर्मेन्द्रिय, पाच अर्थ—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये १६, अव्यक्त, महान्
अहकार और पञ्चमहाभूत ये आठ प्रकृतिया हैं, इस प्रकार से चौबीस तत्त्व
हैं२ । [ ये चौबीस तत्त्व अचेतन है और पुरुष चेतन३ है । यही पुरुष भोक्त
है । लंगड़े और अन्धे के समान इनका सयोग होने से सृष्टि उत्पन्न
होती है४ ] ॥१५-१७॥
१ यह वैशेषिक मत से कहा ।
२ मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या प्रकृतिविकृतय सप्त ।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ सा० का ३ ॥
३ तस्मात् तत्संयोगादचेतन चेतनावदिव लिङ्गम् ॥ सा० का० २० ॥
४. पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि सयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥ सांख्य का० २१ ॥

चिन्त्यं विचार्यमूह्यं च ध्येयं संकल्प्यमेव च ।

४ चरकसंहिता [ अ० १
लक्षणं मनसो ज्ञानस्याभावो भाव एव वा ।
सति ह्यात्मेन्द्रियार्थानां संनिकर्षे न वर्तते ॥ १८ ॥
१वैवृत्त्यान्मनसो ज्ञानं, सान्निध्यात्तच्च वर्तते ।
अणुत्वमथ चैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ ॥ १९ ॥
चिन्त्यं विचार्यमूह्यं च ध्येयं संकल्प्यमेव च ।
यत्किंचिन्मनसो ज्ञेयं तत्सर्वं ह्यर्थसञ्ज्ञकम् ॥ २० ॥
इन्द्रियाभिग्रहः कर्म मनसः स्वस्य निग्रहः ।
ऊहो विचारश्च, ततः परं बुद्धि प्रवर्तते ॥ २१ ॥
इन्द्रियेणेन्द्रियार्थो हि समनस्केन गृह्यते ।
कल्प्यते मनसाऽप्यूर्ध्वं गुणतो दोषतो यथा ॥ २२ ॥
जायते विषये तत्र या बुद्धिर्निश्चयात्मिका ।
व्यवस्यति यया वक्तुं कर्तुं वा बुद्धिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
मन का लक्षण—ज्ञान का न होना और होना मन का लक्षण है, क्योंकि
आत्मा और इन्द्रिय का विषय के साथ सन्निकर्ष होने पर भी मन का योग न
होने से ज्ञान नहीं होता। मन का योग होने पर ही ज्ञान होता है। २ मन के
दो गुण हैं (१) अणुत्व और (२) एकत्व ।
मन के विषय—चिन्त्य (नाना प्रकार के विषयों को सोचना, गुण या दोष
से विचारना), तर्क (एकाग्र मन से सोचना), सकल्प, (कर्त्तव्य अकर्त्तव्य
का निश्चय) इनके अतिरिक्त और भी जो सुख दुःख आदि मन से ग्राह्य हैं, वे
सब मन के विषय कहे जाते हैं।
मन के कर्म--इन्द्रियों का नियमन उनको अपने विषय मे प्रवृत्त करना,
इस मन को अहित वस्तुओं से रोकना, शास्त्र में कही बात पर युक्ति से विचार
करना, विचार, ध्यान, सकल्प आदि ये सब मन के कार्य हैं, इसके आगे बुद्धि
प्रवृत्त होती है।
बुद्धि की उत्पत्ति—प्रथम मन से युक्त कान आदि इन्द्रिया, इन्द्रिय के
विषयों का ग्रहण करती हैं। वे वस्तुमात्र को ही ग्रहण करती हैं। मन इन्द्रिय
से गृहीत विषय का गुण या दोष रूप से विचार करता है। इन्द्रिय से ग्रहण
१ वैवृत्यात्—या
२ मन का लक्षण--'अयोगपद्यात् ज्ञानानां तस्याणुत्वमिहेष्यते' ।
विश्वनाथकारिका । 'ज्ञानयौगपद्यादेकं मन' ॥ न्याय० २ । ४ । ६० ॥

अ० १ ] शारीरस्थानम ५

अ० १ ] शारीरस्थानम ५
क्रिये और मन से विचारे हुए विषय मे जो निश्चयात्मक बुद्धि होती है, उसका
नाम प्रत्यक्ष है । इस निश्चयात्मक बुद्धि से ही पुरुष वैसा कहने या करने का
निश्चय करता है ॥ १८-२३ ॥
एकैकाधिकयुक्तानि खादीनामिन्द्रियाणि तु ।
पञ्चकर्मानुमेयानि येभ्यो बुद्धि प्रवर्तते ॥ २४ ॥
हस्तौ पादौ गुदोपस्थं जिह्वेन्द्रियमथापि वा ।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव, पादौ गमनकर्मणि ॥ २५ ॥
पायूपस्थौ विसर्गार्थं हस्तो ग्रहणधारणे ।
जिह्वा वागिन्द्रिय, वाक् च सत्या ज्योतिस्तमोऽनृता ॥२६॥
इन्द्रिय—श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और घ्राण ये पाच इन्द्रिया आकाश,
वायु, अग्नि, जल, पृथिवी इन पच महाभूतों से उत्पन्न होने पर भो इनमें एक
एक भूत की अधिकता रहती है । यथा—श्रोत्र में आकाश की, त्वचा में वायुकी ।
इनमे जिस भूत की अधिकता होती है इन्द्रिय उसी की ओर दौड़ती है। इन इन्द्रियों
के अतीन्द्रिय होने से इनका ज्ञान ( अनुमान रूप ) इनके कार्यों ( श्रवण, स्पर्शन,
दर्शन, रसन और घ्राण ) से किया जाता है । इन इन्द्रियों मे बुद्धि अर्थात् ज्ञान
प्रवृत्त होता है । कर्मेन्द्रिय— हाथ, पाव, गुदा, 'उपस्थ' और वाणी ये पांच कर्म-
न्द्रिय हैं । इनमें पाव चलने के लिये, पायु ( गुदा ) और उपस्थ ( लिंग )
विसर्ग अर्थात् मल, मूत्र और शुक्र के त्यागने के लिये, हाथ ग्रहण और धारण
करने के लिये, वाग्-इन्द्रिय ( जिह्वा ), बोलने के लिये है । वाणी दो प्रकार की
है--सत्य और असत्य । इनमे सच्ची वाणी--ज्योति वा प्रकाश स्वरूप ( दोनों
लोकों को प्रकाशित करनेवाली) है और अनृत वाणी अन्धकारमयी है ॥२४-२६॥
महाभूतानि खं वायुरग्निरापः क्षितिसथा ।
शब्दः स्पर्शश्च रूप च रसौ गन्धाश्च तद्गुणाः ॥ २७ ॥
तेषामेकगुणः पूर्वो, गुणवृद्धिः परे परे ।
पूर्वः पूर्वगुणश्चैव क्रमशॊ गुणिषु स्मृत ॥ २८ ॥
महाभूत--आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पाच महाभूत
हैं । इन महाभूतों के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये क्रम से पाच गुण
हैं । इन महाभूतों में प्रथम आकाश एकगुणवाला है, आगे उत्तरोत्तर गुणों
की वृद्धि होती गई है । जैसे—वायु दो गुणों वाला ( आकाश, वायु ), अग्नि
तीन गुणों वाला ( आकाश, वायु, अग्नि, ), आप ( जल ) चार गुणों

६ चरकसंहिता [अ० १
वाला (आकाश, वायु, अग्नि, जल) और पृथिवी पाच गुणों वाली है।
इस प्रकार अगले भूत का गुण क्रम से दूसरे २ भूत में आता जाता है १ ॥२८॥
खरद्रवचलोष्णत्वं भूजलानिलतेजसाम् ।
आकाशस्याप्रतीघातो दृष्टं लिङ्गं यथाक्रमम् ॥ २६ ॥
लक्षणं सर्वमेवैतत्स्पर्शनेन्द्रियगोचरम् ।
स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयः स्पर्शो हि सविपर्ययः ॥ ३० ॥
पञ्च महाभूतों के लक्षण - खरत्व, द्रवत्व, चलत्व, उष्णत्व और अप्रतिहनन
ये पृथिवी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के क्रमशः लक्षण समझने चाहिये ।
ये सब लक्षण स्पर्शनेन्द्रिय (त्वचा) से ग्रहण करने योग्य है । इनमें आकाश
का अप्रतिहनन (रोक न करना) भी स्पर्श के विपरीत अस्पर्श होने से ही
त्वचा से ग्रहण करने योग्य है। [क्योंकि जो द्रव्य जिस इन्द्रिय से ग्रहण किया
जाता है, उस द्रव्य के अभाव का भी उसी इन्द्रिय से ग्रहण होता है ।
इसलिये आकाश का अप्रतिघात गुण भी स्पर्शनेन्द्रिय से ही ग्रहण करने
योग्य है ] ॥ २९-३० ॥
गुणाः शरीरे गुणिनां निर्दिष्टाश्चिह्नमेव च ।
अर्थाः शब्दादयो ज्ञेया गोचरा विषया गुणाः ॥ ३१ ॥
ग्राह्य-विषय- शरीर में गुणियों के गुण चिह्न रूप ही कहे हैं। इसलिये
खरत्व आदि गुणों का लक्षण शब्द से ही कह दिया है। शब्द आदि पाच
भूतों के गुण हैं, वे ही अर्थ हैं। इनको इन्द्रियगोचर या विषय अथवा गुण
करके जानना चाहिये ॥ ३१ ॥
या यदिन्द्रियमाश्रित्य जन्तोर्बुद्धिः प्रवर्तते ।
याति सा तेन निर्देशं मनसा च मनोभवा ॥ ३२ ॥
प्राणी की जो बुद्धि (ज्ञान) जिस इन्द्रिय की सहायता से उत्पन्न होती
है, वह बुद्धि उसी इन्द्रिय से कही जाती है। जैसे आख से प्रवृत्त होने वाली
बुद्धि चक्षुर्बुद्धि कही जाती है। इसी प्रकार मन से उत्पन्न होने वाली बुद्धि
मनोभवा बुद्धि कहाती है ॥ ३२ ॥
भेदात्कार्येन्द्रियार्थानां बह्व्यो वै बुद्धयः स्मृताः ।
आत्मेन्द्रियमनोर्थानामेकैकसंनिकर्षजा ॥ ३३ ॥
१ आकाशपवनदहनतोयभूमिषु यथासङ्ख्यमेकोत्तरपरिवृद्धा शब्दस्पर्शरूप-
रसगन्धाः । (सुश्रुतसूत्र ४२ अ०)

अ० १ ] शारीरस्थानम् ७
अंगुल्यंगुष्ठतलजस्तंत्रीवीणानखोद्भवः ।
दृष्टः शब्दो यथा बुद्धिर्दृष्टा संयोगजा तथा ॥ ३४ ॥
कार्य, इन्द्रिय और विषयों के बहुत भेद होने से बुद्धिया भी बहुत प्रकार
की हैं। इनमें एक एक बुद्धि आत्मा का मन से, मन का इन्द्रियों से और
इन्द्रियों का विषय के साथ सयोग होने से उत्पन्न होती हैं। जिस प्रकार शब्द
मध्यमांगुलि, अगुष्ठ, हथेली तन्त्री (तात), वीणा और नख के सयोग से
उत्पन्न होता है, उसी प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान भी आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषय
के सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है ॥ ३३-३४ ॥
बुद्धीन्द्रियमनोर्थाना विद्याद्योगधरं परम् ।
चतुर्विंशक इत्येष राशिः पुरुषसंज्ञकः ॥ ३५ ॥
बुद्धि, इन्द्रिय, मन और विषय इन के संयोग को शरीर रूप से धारण
करने वाला इनसे पृथक् 'अव्यक्त' आत्मा है। पाच महाभूत, पाच विषय,
दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहकार और महान् इन चौबीस तत्त्वों का राशि
समूह को 'पुरुष' कहते है ॥ ३५ ॥
रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोऽयमनन्तवान् ।
ताभ्यां निराकृताभ्यां तु सत्त्ववृद्ध्या निवर्तते ॥ ३६ ॥
रज और तम से युक्त पुरुष का यह सयोग अन्त वाला नही होता,
लगातार चलता ही रहता है। सत्त्व के प्रबल होने पर संसार बन्धन के
कारणरूप रज और तम के हटने पर यह सयोग भी समाप्त हो जाता है। यही
पुरुष का मोक्ष है ॥ ३६ ॥
अत्र कर्मफलं चात्र ज्ञानं चात्र प्रतिष्ठितम् ।
अत्र मोहः सुखं दुःख जीवितं मरणं स्वता ॥ ३७ ॥
एवं यो वेद तत्त्वेन स वेद प्रलयोदयौ ।
पारम्पर्यं चिकित्सा च ज्ञातव्य यच्च किंचन ॥ ३८ ॥
पुरुष आत्मा — अदृष्ट (कर्म), कर्मफल, ज्ञान, अज्ञान, अनुकूल एवं प्रति-
कूल वेदनायें, जन्म, मरण, मेरी स्त्री, मेरा पुत्र आदि ममत्व ये सब बाते इसी
राशिसंज्ञक शरीरपुरुष में प्रतिष्ठित हैं। जो पुरुष इन सब बातों को यथार्थ रूप
से जानता है, वह प्रलय (प्रकृति का महत् आदि में लय) एव उदय (उत्पत्ति)
इन दोनों को जानता है। वह वेदनाओं के पारम्पर्य सम्बन्ध और चिकित्सा को
भी जानता है। इसके अतिरिक्त इस पुरुष में और भी जो कुछ जानने योग्य
होता है वह उस सब को जानता है ॥३७-३८॥

८ चरकसंहिता [ अ० १
भास्तमः सत्यमनृतं वेदाः कर्म शुभाशुभम् ।
न स्यात्कर्ता वेदिता च पुरुषो न भवेद्यदि ॥ ३९ ॥
नाशयो न सुखं नार्तिर्न गतिर्नागतिर्न वाक् ।
न विज्ञानं न शास्त्राणि न जन्म मरणं न च ॥ ४० ॥
न बन्धो न च मोक्षः स्यात्पुरुषो न भवेद्यदि ।
कारणं पुरुषस्तस्मात्कारणज्ञैरुदाहृतः ॥ ४१ ॥
न चेत्कारणमात्मा स्याद्भा'दयः स्युरहेतुकाः ।
न चैषु संभवेज्ज्ञानं न च तैः स्यात्प्रयोजनम् ॥ ४२ ॥
कृतं मृद्दण्डचक्रैश्च कुम्भकारादृते घटम् ।
कृतं मृत्तृणकाष्ठैश्च गृहकाराद्विना गृहम् ॥ ४३ ॥
यो वदेत्स वदेद्देहं संभूय करणैः कृतम् ।
विना कर्तारमज्ञानाद्युक्त्यागमबहिष्कृतः ॥ ४४ ॥
आत्मा—यदि कर्ता, वेदिता (ज्ञाता) पुरुष न हो तो प्रकाश, अन्धकार
सत्य, झूठ, स्वर्गादि के प्रतिपादक वेद, शुभाशुभ कर्म ये सब निष्प्रयोजन हो
जाय । यदि कर्त्ता, बोद्धा पुरुष न हो तो धर्म और अधर्म का कोई आश्रय न
रहे, धर्म और अधर्म निराश्रय हो जाए । सुख, दुःख, जाना, आना, सत्य वाणी,
शास्त्रज्ञान, शास्त्र, जन्म, मरण, बन्ध और मोक्ष कुछ भी न रहे। क्योंकि पुरुष के
लिये ही ये सब हैं । इसलिये कारण को जानने वालो ने पुरुष को कारण कहा
है। यदि आत्मा कारण न हो तो दीप्ति आदि बिना कारण के हो जाय । पुरुष
के न होने पर शरीर की सृष्टि बिना कारण की हो जाय । इतना ही नहीं, इन
भूतों से बने शरीर में ज्ञान (चैतन्य) भी संभव नहीं। (क्योंकि भूतों मे ज्ञान
(चैतन्य) का अभाव है), ज्ञान और चेतना का कारण आत्मा है। आत्मा के
न होने पर ये सब निष्प्रयोजन हो जाते हैं । जिस प्रकार कोई कहे कि 'बिना
कुम्हार के मिट्टी, दण्डे और चक्र ने मिल कर घड़ा बना दिया, अथवा बिना
घर बनाने वाले के मिट्टी तिनके और काष्ठ से घर बन गया, उसी प्रकार कर्ता
रूप आत्मा के बिना ही कारणरूप पञ्चमहाभूतों ने मिल कर स्वय इस शरीर को
बनाया है, यह कहना अज्ञान से पूर्ण और युक्ति आदि प्रमाण से रहित है ॥४४॥
कारणं पुरुषः सर्वैः प्रमाणैरुपलभ्यते ।
येभ्यः प्रमेयं सर्वेभ्यः आगमेभ्य प्रमीयते ॥ ४५ ॥
१ खादय.-यो०

अ० १ ] शारीरस्थानम् ६

अ० १ ] शारीरस्थानम् ६
कारण रूप पुरुष सब प्रमाणों से सिद्ध है । जिन सब प्रमाणों से प्रमेय जाना
जाता है, उन सब प्रमाणों (प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम आदि) से पुरुष कारण
है, यही ज्ञान होता है ॥ ४५ ॥
न ते तत्सदृशास्त्वन्ये पारम्पर्यसमुत्थिताः ।
सारूप्यात्ते त एवेति निर्दिश्यन्ते नवा नवाः ॥ ४६ ॥
भावस्तेषां समुदयो निरीशः सत्त्वसंज्ञकः ।
कर्ता भोक्ता न स पुमानिति केचिद् व्यवस्थिताः ॥ ४७ ॥
नास्तिक मत—जो शरीर में जल आदि पदार्थ दिखाई देते हैं। वे वे
नहीं हैं। परन्तु परम्परा से उत्पन्न वे उनके सदृश वा भिन्न ही पदार्थ हैं।
समान रूप होने से नये से नये भी वे ही हे, ऐसे कहे जाते हैं। उनका समु
दाय जिसका कोई स्वामी नहीं है, 'सत्त्व' कहाता है, पुरुष कोई कर्त्ता और
भोक्ता नहीं है, ऐसा कई मानते हैं। इसी प्रकार जो भाव बाल्यावस्था में होते
हैं वे यौवनावस्था में नहीं रहते । अन्य भाव पूर्व के समान होते हैं, परम्परा
से उत्पन्न होने के कारण उनके समान होते हैं। इस प्रकार से नये से नये भाव
समान रूप और सादृश्य होने से वे ही (पूर्वके ही) कहे जाते हैं। बाल्यावस्था
के देवदत्त युवावस्था में भी रहता है। इन भावों का समुदाय (पूर्वापर
सन्तान) आत्मारहित सत्त्व-सञ्ज्ञक, प्राणी होता है। इनके मत में कर्त्ता, कर्मों
का भोक्ता, देह से अतिरिक्त पुरुष नहीं है। ऐसा कोई देह को ही आत्मा
मानने वाले नास्तिक मानते हैं ॥ ४६--४७॥
तेषामन्यैः कृतस्यान्ये भावा भावैर्नवा फलम् ।
भुञ्जते सदृशाः प्राप्तं यैरात्मा नोपदिश्यते ॥ ४८ ॥
नास्तिक मत में दोष—जो लोग शरीर से पृथक् आत्मा की स्थिति नहीं
मानते उनके मत में अन्य 'भावों' (पदार्थों) द्वारा किये शुभाशुभ कर्मों के
फल उनके समान नये नये अन्य 'भाव' भोगते हैं। जो कर्म करते हैं उन को
किये कर्म का फल भोगना नहीं पडता ॥ ४८ ॥
करणान्यन्यथा दृष्ट्वा कर्तु कर्ता स एव तु ।
कर्ता हि करणैर्युक्तः कारणं सर्वकर्मणाम् ॥ ४९ ॥
करने वाले कर्त्ता के करण भी अनेक देखे जाते हैं। परन्तु करने वाला
वह अकेला होता है। इसी प्रकार यह कर्त्ता इन्द्रिय आदि अनेक उपकरणों से
युक्त होकर दर्शन आदि नाना कर्म करता है। इसलिये देह से भिन्न आत्मा
सब कर्मों का कारण है ॥४९॥

२० चरकसंहिता [ अ० १
निमेषकालाद्भावानां कालः शीघ्रतरोऽत्यये ।
भग्नानां न १पुनर्भावः कृत नान्यमुपैति च ॥ ५० ॥
मतं तत्त्वविदामेतद्यस्मात्तस्मात् स कारणम् ।
क्रियोपभोगे भूतानां नित्यः पुरुषसंज्ञकः ॥ ५१ ॥
जितने समय में आंख की पलक झपकती है यह 'निमेष काल' कहाता है ।
इस निमेष काल से भी अधिक शीघ्रता से भाव बदल रहे हैं, नाश हो रहे हैं ।
नाश हुए पदार्थों का पुनः सद्भाव नहीं होता और एक के किये कर्म का फल
दूसरा नहीं भोगता, अपितु जिसने किया होता है वही भोगता है । यही सब
तत्त्वज्ञानियों का सिद्धान्त है । इसलिये प्राणियों के किये हुए कर्म का फल
भोगने वाला देह से अतिरिक्त नित्य 'पुरुष' नामक चेतन आत्मा है ॥५०-५१॥
अहङ्कारः फलं कर्म देहान्तरगतिः स्मृतिः ।
विद्यते सति भूतानां कारणे देहमन्तरा ॥ ५२ ॥
आत्मा के देह से पृथक् होने पर ही अहंकार-भाव ( मैंने यह किया, मैं
यह जानता हूँ), फल को उद्देश्य रख कर काम करना, किये कर्म का फल
भोगना, एक शरीर से दूसरे शरीर में जाना, स्मृति अर्थात् स्मरण (बाल्या-
वस्था का यौवनावस्था में स्मरण), ये सब बातें होती हैं ॥ ५२ ॥
प्रभवो न ह्यनादित्वाद्भिद्यते परमात्मनः ।
पुरुषो राशिसंज्ञस्तु मोहेच्छाद्वेषकर्मजः ॥ ५३ ॥
परमात्मा का कोई उत्पत्ति कारण नहीं है, क्योंकि वह अनादि है । परन्तु
राशि-संज्ञक पुरुष को भोगों के आयतन (आश्रय) रूप शरीर का मोह, इच्छा,
राग और द्वेष ये तीन२ उत्पन्न करते हैं ॥ ५३ ॥
आत्मा ज्ञः, करणैर्योगज्ज्ञानं त्वस्य प्रवर्तते ।
करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न वर्तते ॥ ५४ ॥
१ 'भग्नानां च पुनर्भाव' इति पाठान्तरम् । अर्थात् टूटे हाथ पांव आदि
भी पुन बन जाते हैं, यह भी आत्मा की सत्ता का प्रमाण है ।
२ तीनों दोषों के तीन पक्ष हैं । यथा—(१) रागपक्ष—काम, मत्सर,
स्पृहा तृष्णा और लोभ । (२) द्वेषपक्ष—क्रोध, ईर्ष्या, असूया, द्रोह, अमर्ष ।
(३) मोहपक्ष—मिथ्याज्ञान, विचिकित्सा, मान और प्रमाद ।
वात्स्यायन (न्या० ४ । १ ३)
पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः। न्याय । दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानाना-
मुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः ॥

अ० १ ] शरीरस्थानम् ११

अ० १ ] शरीरस्थानम् ११
पश्यतोऽपि यथाऽऽदर्शे सक्लिन्ने नास्ति दर्शनम् ।
तत्त्वं जले वा कलुषे चेतस्युपहते तथा ॥ ५५ ॥
आत्मा ज्ञानी है। करण—मन, बुद्धि और इन्द्रियों इनके सयोग से इस
आत्मा को ज्ञान होता है । करण अर्थात् साधनों के निर्मल न होने वा इनके
सयोग न होने से ज्ञान नही होता । जिस प्रकार आख से देखने पर भी मलिन
दर्पण मे मुख दिखाई नहीं देता और जिस प्रकार मलिन जल में प्रतिबिम्ब
नही दीखता, उसी प्रकार चक्षु आदि इन्द्रिय और चित्त रूप साधनों के विकृत
या दुष्ट होने पर भी ज्ञान नही होता ॥ ५४-५५ ॥
करणानि मनो बुद्धिर्बुद्धिकर्मेन्द्रियाणि च ।
कर्तुः संयोगजं कर्म वेदना बुद्धिरेव च ॥ ५६ ॥
नैकः प्रवर्तते कर्तुं भूतात्मा नाश्नुते फलम् ।
संयोगाद्वर्तते सर्वं तदृते नास्ति किंचन ॥ ५७ ॥
मन बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिया करण हैं । करने वाले आत्मा के
सयोग से कर्म होता है । करने वाले के सयोग से ही बुद्धि और वेदना भी
उत्पन्न होती है। अकेला भूतात्मा बिना करणो के प्रवृत्त नही हो सकता और
न फल का उपभोग कर सकता है । किन्तु शरीर, सत्त्व, (मन) इन्द्रिय इनके
सयोग से ही सब कुछ होता है। सयोग के बिना कुछ नही होता ॥५६-५७॥
न ह्येको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः ।
शीघ्रगत्वात्स्वभावाच्चस्वभावो न व्यावर्तते ॥ ५८ ॥
कारण रूप भाव अकेला कार्य-उत्पत्ति में प्रवृत्त नही होता, किन्तु सयोग
होने पर ही प्रवृत्त होता है। भाव एक रूप वाले नहीं हैं। क्योकि परिणामी हैं,
बिना हेतु के भी नहीं हैं, वे भाव शीघ्रगामी स्वभाव को नहीं छोड़ते। जैसा
पहिले सूत्रस्थान अ० १६ में कहा है कि—'प्रवृत्तिर्हेतुर्भावाना न निरोधेऽस्ति-
कारणम् ।' इति ॥ ५८ ॥
अनादिः पुरुषो नित्यो विपरीतस्तु हेतुजः ।
सदकारणवन्नित्य दृष्ट हेतुजमन्यथा ॥ ५९ ॥
तदेव भावादग्राह्य नित्यत्व न कुतश्चन ।
भावाज्ज्ञेयं तद्व्यक्तमचिन्त्यं व्यक्तमन्यथा ॥ ६० ॥
अनादि पुरुष (आत्मा) नित्य है। मोह, इच्छा, द्वेष आदि निमित्त से
उत्पन्न 'राशि' सज्ञक पुरुष इस से विपरीत अर्थात् अनित्य है। जो सत् और
अकारणवान् अर्थात् कारण से रहित है वह नित्य है, तथा जो कारणजन्य है

१२ चरकसंहिता [ अ० १
वह अनित्य है। १'कोई वस्तु उत्पत्ति कारण वाली होने से नित्य नहीं हो
सकती। जो वस्तु कारणजन्य है, वह वस्तु किसी भी प्रकार से नित्य नही हो
सकती। क्योंकि उसकी उत्पत्ति हुई है। कारणवान् होने से अनित्य है। इस-
लिये यह नित्य-अव्यक्त है, ग्रहण न होने से अव्यक्त है, अचिन्त्य है। इससे
विपरीत व्यक्त और अनित्य है ॥ ५६-६० ॥
अव्यक्तमात्मा क्षेत्रज्ञः शाश्वतो विभुरव्ययः ।
तस्माद्यदन्यत्तद् व्यक्तं, वक्ष्यते चापरं द्वयम् ॥ ६१ ॥
व्यक्तं चैन्द्रियकं चैव गृह्यते तद्यदिन्द्रियैः ।
अतोऽन्यत्पुनरव्यक्तं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ ६२ ॥
आत्मा को अव्यक्त शब्द से कहा जाता है। इसी आत्मा को क्षेत्रज्ञ,
शाश्वत, विभु और अव्यय कहते है। आत्मा से पृथक् जो कुछ है वह सब
व्यक्त है। अन्य प्रकार मे भी व्यक्त-अव्यक्त कहे जाते ह। जो ऐन्द्रियक अर्थात्
इन्द्रियों मे उपलब्ध होता है वह सब व्यक्त है। जो इन्द्रिय से ग्रहण नहीं होता
वह अतीन्द्रिय और अव्यक्त है। लक्षणों से इस अव्यक्त का अनुमान होता है ॥६२॥
खादीनि बुद्धिरव्यक्तमहङ्कारस्तथाऽष्टमः ।
भूतप्रकृतिरुद्दिष्टा—
पाच सूक्ष्म भूत, पंच तन्मात्रा (आकाश, वायु, अग्नि, जल और
पृथिवी), बुद्धि और महान् (अव्यक्त) ये सात अव्यक्त मूल प्रकृति तथा
अहङ्कार यह आठ भूत-प्रकृति कही हैं ॥
विकाराश्चैव षोडश ॥ ६३ ॥
बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च ।
समनस्काश्च पञ्चार्था विकारा इति सञ्ज्ञिताः । ६४ ॥
इनके सोलह विकार हैं। पाच ज्ञानेन्द्रिय, पाच कर्मेन्द्रिय ओर मन के
साथ पाच अर्थ (विषय-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) ये १६ विकार
कहे हैं ॥ ६३-६४ ॥
इति क्षेत्रं समुद्दिष्टं सर्वमव्यक्तवर्जितम् ।
इन चौबीस तत्त्वो में अव्यक्त (मैलित प्रकृति और पुरुष) को छोड़ कर
शेष तेईस तत्त्वों को क्षेत्र (शरीर) कहा जाता है।
अव्यक्तमस्य क्षेत्रस्य क्षेत्रज्ञमृषयो विदुः ॥ ६५ ॥
ऋषि लोग अव्यक्त को इस क्षेत्र का जानने वाला 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं ॥६५॥
१ 'सदकारणवन्नित्यम्' वै० द० ४।१।१।

अ० १ ] शारीरस्थानम् १३

अ० १ ] शारीरस्थानम् १३
जायते बुद्धिरव्यक्ताद्बुद्ध्याऽहमिति मन्यते ।
परं खादीन्यहङ्कारादुत्पद्यन्ते यथाक्रमम् ॥ ६६ ॥
ततः सम्पूर्णसर्वाङ्गो जातोऽभ्युदित उच्यते ।
पुरुषः प्रलये चेष्टैः पुनर्भावैर्वियुज्यते ॥ ६७ ॥
अव्यक्त ( मूल प्रकृति से मिले हुए पुरुष ) से बुद्धितत्त्व उत्पन्न होता है ।
बुद्धि से 'मै' ऐसा अभिमान करता है । अर्थात् बुद्धि से अहङ्कार उत्पन्न होता
है । इसके पश्चात् अहङ्कार से क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी
ये पांच सूक्ष्म भूत ( तन्मात्रा ) उत्पन्न होते हैं १ । इन पञ्च तन्मात्राओ से पञ्च
महाभूत, इन भूतों से इन्द्रिया उत्पन्न होती हैं । इन पाच भूतों से सम्पूर्ण अगों
वाला पुरुष अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था मे उत्पन्न होता है । अब
इसको उत्पन्न हो गया वा 'अभ्युदित' ऐसा कहते है और फिर यह पुरुष प्रलय
में ( शरीराम्भक भूतों के कारण में लय होने पर ) बुद्धि आदि इष्ट भावों
( कार्य पदार्थों ) से पृथक् हो जाता है, यही मृत्यु है । अव्यक्त कारण से व्यक्त
होना 'जन्म' कहाता है । व्यक्त का कारण में लीन होना 'मृत्यु' है ॥६६-६७॥
अव्यक्ताद् व्यक्ततां याति व्यक्तादव्यक्ततां पुनः ।
रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत्परिवर्तते ॥ ६८ ॥
पुरुष रज और तम के कारणों से बधा हुआ अव्यक्त ( कारण ) से व्यक्त
रूप में आता है, यही 'जन्म' है । व्यक्त अवस्था से फिर अव्यक्त अवस्था
( कारण ) में लीन हो जाता है । यही 'मरण' है । वह फिर व्यक्त होता है ।
फिर अव्यक्त होता है, इस प्रकार चक्र के भाति जब तक मोक्ष नहीं होता,
घूमता रहता है २ ॥ ६८ ॥
येषां द्वन्द्वे पराऽऽसक्तिरहङ्कारपराश्च ये ।
उदयप्रलयौ तेषां, न तेषां ये त्वतोऽन्यथा ॥ ६९ ॥
जिन पुरुषों की रज और तम के जोड़े मे अत्यन्त आसक्ति है और जो
'मै और यह मेरा है' ऐसा मिथ्या अभिमान रखते है, उनका ही उदय और
प्रलय अर्थात् जन्म और मरण होता है, और जो रज और तम से पृथक् और
निरहङ्कार हैं उनका जन्म और मरण नहीं होता ॥ ६९ ॥
१ तन्मात्रा का अर्थ अकेला वही तत्त्व, उसमे और किसी भूत का ससर्ग
नहीं-जैसे-शब्दतन्मात्र, रूपतन्मात्र आदि ।
२ अव्यक्तादीनि भूतानि, व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ गीता० अ० २।२८

१४ चरकसंहिता [ अ० १
प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः ।
इन्द्रियान्तरसञ्चारः प्रेरणं धारणं च यत् ॥ ७० ॥
देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा ।
दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा ॥ ७१ ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः ।
बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारो लिङ्गानि परमात्मनः ॥ ७२ ॥
यस्मात्समुपलभ्यन्ते लिङ्गान्येतानि जीवतः ।
न मृतस्यात्मलिङ्गानि तस्मादाहुर्महर्षयः ॥ ७३ ॥
पुरुष के लक्षण-शरीर से अतिरिक्त आत्मा के लक्षण प्राण (शरीर में
श्वास लेना) और अपान (श्वास पुनः छोड़ना) अर्थात् वायु की ऊर्ध्व और
अधोगति होना, उन्मेष-निमेष, जीवन, शरीर की वृद्धि, क्षत और भग्न का
संरोहण कार्य, मन का अभिमत विषय में गमन, एक इन्द्रिय को छोड़ कर दूसरी
इन्द्रिय में मन का जाना, इन्द्रियों को विषय में प्रवृत्त करना, देह को धारण
करना, स्वप्नावस्था में देशान्तर में जाना, मृत्यु का ज्ञान कर लेना, दायें आंख
ने देखे पदार्थ का बायें आंख से ग्रहण करना, इच्छा (स्वार्थ या परार्थ को प्राप्त
करने की चाह), द्वेष (अनिष्ट पदार्थ को त्यागने की इच्छा), सुख (आत्मा
के अनुकूल वेदनीय), दुःख (प्रतिकूल वेदनीय), प्रयत्न, उत्साह, चेतना, धृति
(धैर्य), बुद्धि (ज्ञान), स्मृति और अहंकार ये परम अर्थात् सर्वोपरि आत्मा
के लक्षण हैं। १ये प्राण आदि समस्त लक्षण जीवित पुरुष में ही उपलब्ध होते
हैं, मृत पुरुष में आत्मा के ये चिह्न नहीं मिलते, इसलिये महर्षियों ने प्राण,
अपान आदि सब को आत्मा का लक्षण कहा है ॥७०-७३॥
शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् ।
पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते ॥ ७४ ॥
इस चेतन आत्मा के शरीर से चले जाने पर शरीर शून्य घर की भांति चेतना
से रहित हो जाता है। इस शरीर में केवल पांच भूत ही शेष रह जाते हैं, इस
लिए शरीर को पञ्चत्व को प्राप्त हुआ कहते हैं ॥ ७४ ॥
अचेतनं क्रियावच्च मनश्चेतयिता परः ।
युक्तस्य मनसा तस्य निर्दिश्यन्ते विभोः क्रियाः ॥ ७५ ॥
चेतनावान् यतश्चात्मा ततः कर्ता निरुच्यते ।
अचेतनत्वाच्च मनः क्रियावदपि नोच्यते ॥ ७६ ॥
१ प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेष-
प्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि । वैशेषिक० ३ । २ । ४ ।

अ० १ ] शारीरस्थानम् १५

अ० १ ] शारीरस्थानम् १५
मन अचेतन और क्रियावान् है। शरीर को चेतन करने वाला आत्मा
चेतन मन से भी पर अर्थात् मुख्य है। क्रियाशील मन के साथ इस विभु आत्मा
का योग होने पर आत्मा की ही वे सब क्रिया कही जाती हैं। क्योंकि आत्मा
चेतनावान् है, इसी लिये वह कर्ता कहा जाता है। मन क्रियावान् होने पर भी
अचेतन है, इसलिये कर्ता नहीं कहा जाता ॥ ७५-७६ ॥
यथास्वेनात्मनाऽऽत्मानं नयते सर्वयोनिषु ।
प्राणैस्तन्त्रयते प्राणी न ह्यन्योऽस्त्यस्य तन्त्रकः ॥ ७७ ॥
वशी तत्कुरुते कर्म यत्कृत्वा फलमश्नुते ।
वशी चेत समाधत्ते वशी सर्वं निरस्यति ॥ ७८ ॥
आत्मा सब प्राणियों, नर, पशु आदि योनियो मे अपने आप अपने को ले
जाता है और अपने आप अपने को प्राणों से युक्त करता है। इस आत्मा का
कोई दूसरा सचालक नहीं है। वह स्वयं वशी ( सब को परवश करने वाला )
आत्मा उस कर्म को करता है जिसे करके वह फल भोगता है। वह वशी आत्मा
ही चित्त को लगाता है और वह वशी ही सब कुछ त्याग देता है । [ अर्थात्
वही फलार्थी होकर कर्म करता है और चाहे तो कभी फलाकाक्षा को त्याग भी
सकता है ] ॥७७-७८॥
देही सर्वगतो ह्यात्मा स्वे स्वे सस्पर्शनेन्द्रिये ।
सर्वाः सर्वाश्रयस्थास्तु नात्माऽतो वेत्ति वेदनाः ॥ ७९ ॥
आत्मा सब मे व्याप्त होकर भी देहवान् बनकर केवल अपनी स्पर्शननेन्द्रिय
से युक्त देह मे रहता है। इसलिये अन्य सब शरीरों की वेदनाओ को नहीं जानता ७९
विभुत्वमत एवास्य यस्मात्सर्वगतो महान् ।
मनसश्च समाधानात्पश्यत्यात्मा तिरस्कृतम् ॥ ८० ॥
आत्मा सब मे व्याप्त और महा परिमाण है, अत 'विभु' है । मन को
एकाग्र कर, समाधि के बल से भित्ति आदि से छिपे पदार्थों को भी देख लेता है।८०।
नित्यानुबन्धं मनसा देहकर्मानुपातिना ।
सर्वयोनिगतं विद्यादेकयोनावपि स्थितम् ॥ ८१ ॥
शरीर और कर्मों का अनुसरण करने वाले मन के साथ आत्मा का नित्य
सम्बन्ध है। वह एक योनि में स्थित होने पर भी उसे मन के द्वारा सब योनियों
मे व्याप्त समझना चाहिये ॥ ८१ ॥
आदिर्नास्त्यात्मन क्षेत्रपारम्पर्यमनादिकम् ।
अतस्तयोरनादित्वात्कि पूर्वमिति नोच्यते ॥ ८२ ॥