चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] शरीरस्थानम् ११
पश्यतोऽपि यथाऽऽदर्शे सक्लिन्ने नास्ति दर्शनम् ।
तत्त्वं जले वा कलुषे चेतस्युपहते तथा ॥ ५५ ॥
आत्मा ज्ञानी है। करण—मन, बुद्धि और इन्द्रियों इनके सयोग से इस
आत्मा को ज्ञान होता है । करण अर्थात् साधनों के निर्मल न होने वा इनके
सयोग न होने से ज्ञान नही होता । जिस प्रकार आख से देखने पर भी मलिन
दर्पण मे मुख दिखाई नहीं देता और जिस प्रकार मलिन जल में प्रतिबिम्ब
नही दीखता, उसी प्रकार चक्षु आदि इन्द्रिय और चित्त रूप साधनों के विकृत
या दुष्ट होने पर भी ज्ञान नही होता ॥ ५४-५५ ॥
करणानि मनो बुद्धिर्बुद्धिकर्मेन्द्रियाणि च ।
कर्तुः संयोगजं कर्म वेदना बुद्धिरेव च ॥ ५६ ॥
नैकः प्रवर्तते कर्तुं भूतात्मा नाश्नुते फलम् ।
संयोगाद्वर्तते सर्वं तदृते नास्ति किंचन ॥ ५७ ॥
मन बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिया करण हैं । करने वाले आत्मा के
सयोग से कर्म होता है । करने वाले के सयोग से ही बुद्धि और वेदना भी
उत्पन्न होती है। अकेला भूतात्मा बिना करणो के प्रवृत्त नही हो सकता और
न फल का उपभोग कर सकता है । किन्तु शरीर, सत्त्व, (मन) इन्द्रिय इनके
सयोग से ही सब कुछ होता है। सयोग के बिना कुछ नही होता ॥५६-५७॥
न ह्येको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः ।
शीघ्रगत्वात्स्वभावाच्चस्वभावो न व्यावर्तते ॥ ५८ ॥
कारण रूप भाव अकेला कार्य-उत्पत्ति में प्रवृत्त नही होता, किन्तु सयोग
होने पर ही प्रवृत्त होता है। भाव एक रूप वाले नहीं हैं। क्योकि परिणामी हैं,
बिना हेतु के भी नहीं हैं, वे भाव शीघ्रगामी स्वभाव को नहीं छोड़ते। जैसा
पहिले सूत्रस्थान अ० १६ में कहा है कि—'प्रवृत्तिर्हेतुर्भावाना न निरोधेऽस्ति-
कारणम् ।' इति ॥ ५८ ॥
अनादिः पुरुषो नित्यो विपरीतस्तु हेतुजः ।
सदकारणवन्नित्य दृष्ट हेतुजमन्यथा ॥ ५९ ॥
तदेव भावादग्राह्य नित्यत्व न कुतश्चन ।
भावाज्ज्ञेयं तद्व्यक्तमचिन्त्यं व्यक्तमन्यथा ॥ ६० ॥
अनादि पुरुष (आत्मा) नित्य है। मोह, इच्छा, द्वेष आदि निमित्त से
उत्पन्न 'राशि' सज्ञक पुरुष इस से विपरीत अर्थात् अनित्य है। जो सत् और
अकारणवान् अर्थात् कारण से रहित है वह नित्य है, तथा जो कारणजन्य है